युवाओ के सर चढ़ कर बोलता ……… स्वप्नीली दुनियाँ का जुनून

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युवाओ के सर चढ़ कर बोलता ……… स्वप्नीली  दुनियाँ  का जुनून

वो दुनियाँ शायद कुछ और ही होती होगी
जहाँ चमकते हैं सितारे
बरसता है पैसा
गुनगुनाती है शोहरत
शायद बहुत मजबूत होते होंगे
उनके घर के दरवाजे
सारे दुःख बाहर ही रह जाते होंगे
उसके  सपनो की दुनियाँ
धरती पर स्वर्ग
वही तो हैतभी तो शुरू हो गयी है
मन को झुठलाने की कवायद
कि नक़ल ही सही
एक अहसास तो बना रहे कुछ ख़ास होने का
 लाइट्स! कैमरा! एक्शन! …..
नायक  कैमरे के सामने आता है और आत्मसम्मान
भरे गर्व  के भाव  से बोलता है “ मैं आज भी फेंके हुए पैसे नहीं
उठाता “तभी आवाज़ आती है  “कट! कट! कट!”  सर जरा भाव  में थोड़ी कमी रह गयी है एक रीटेक करना पडेगा |
कई रीटेक के बाद सीन फायनल होता है और पसीना पोछते हुए  नायक 
कार में बैठ कर घर वापस चला जाता हैं | फिर वो सामान्य आदमी है | उसी तरह
खाता –पीता , हँसता -रोता है | पर यही दृश्य जब फिल्म  में एक साथ चलता है तो बड़ा प्रभावशाली लगता है |
हम दांतों के बीच में अंगुलियाँ दबाये साँस रोके हुए देखते है अपने सुपर मैंन को |
एक आदर्श पुरुष की कल्पना को साकार करता है हमारा नायक पूरा हॉल  तालियों की गडगडाहट  से भर जाता है | हम फिल्म खत्म होते ही हॉल से
बाहर  आ जाते हैं पर  मन पर चढ़ा सुपर हीरो का जादू अभी भी यथावत रहता
है |                                              
         हमारा नायक जो 
चाहे डॉक्टर हो  ,इंजिनीयर हो या
मजदूर …….. दुश्मन सामने आये तो १० से अकेले निपट सकता है |  वो न्याय प्रिय है ,सत्य का साथी है | शूरवीर
है ,सुपरमैन है |  मुझे पुरानी फिल्म का एक
गाना याद आता है………..

 “ आ चल के
तुझे मैं ले के चलूँ ,एक ऐसे गगन के तले
जहाँ गम भी न हो आँसू भी न हों ,बस प्यार ही प्यार
पले
            ऐसी दुनियाँ  का कोई 
अस्तित्व नहीं है पर ऐसी ही दुनियाँ हम देखना चाहते हैं | ये है हमारे
सपनों की सतरंगी दुनियाँ ,कल्पनाओ का इन्द्रधनुषी संसार | जो वास्तव में है नहीं,और
 हो भी नहीं सकता |  सुख और – दुःख जिंदगी के अभिन्न अंग हैं | ये
जानते हुए भी दिल मानना नहीं चाहता है |कहीं न कहीं हम इस झूठ को सच मानने की
कवायद में लगे रहते हैं | हमारे बच्चे और युवा इस चमक से सबसे ज्यादा प्रभावित
होते हैं | इस प्रभाव को गहराने के लिए , इस के बाद मीडिया परोसता है हमारे सामने
हमारे नायक ,नायिकाओं का आदर्श रूप , जिसमें इन  टी वी शोज , स्टेज और पत्रपत्रिकाओ में  तन और मन पर ढेरों मेकअप की पर्त चढ़ाये हुए
हँसते –मुस्कुराते चेहरे हमें हर गम ,हर दुःख से दूर ,धरती पर स्वर्ग भोगते हुए
लगते हैं | ऐसी ही तो जिंदगी हम चाहते हैं | बहुत जल्दी ही ये हमारे बच्चो और
युवाओ के  दिलो –दिमाग पर राज़ करने लगते
हैं |
                  वह  खुद उन जैसा दिखना  चाहते 
हैं , बनना चाहते हैं |  कहीं उनके
द्वारा पहने गए कपडो के प्रतिरूप  साथ
निभाना साथिया की गोपी  की पायल , हम दिल
दे चुके सनम की ऐश्वर्या की साड़ी व् स्वदेश के शाहरुख खान की जींस के रूप में
बाजारों  में सज जाते हैं युवा वर्ग इन्हें
जल्दी  से जल्दी खरीद कर पहनने को अपना
स्टेटस सिम्बल समझता है | वो गौरवान्वित होना चाहता है उधार के व्यक्तित्व से
जिसमें उसका अपना कुछ नहीं होता |बड़े शहरों में फिल्मों का अन्धानुकरण करके आधे –अधूरे  कपडे पहने हुए युवा अक्सर दिख जाते हैं…. जो
उनके व्यक्तिव को विशेष नहीं बनाते अपितु 
देश काल और परिस्तिथियों के अनुरूप न होने के कारण आँखों में खटकते हैं |  पर युवा व् किशोर आत्ममुग्धा की अवस्था में उसके
विपरीत प्रभाव को समझ ही नहीं पाते |,
           एक पुरानी फिल्म है गुड्डी|
जिसमें फिल्म की  किशोर नायिका एक सामान्य
लड़की है पर वो एक सुपरस्टार के लिए दीवानी है , दीवानगी इस हद तक है कि वो पिता
द्वारा पसंद किये गए लड़के  से विवाह  से इनकार करती है | कारण  जानने के बाद पूरा परिवार आश्चर्य में पड़ जाता
है | एक योजना के तहत उसे मुबई ले जाया जाता है और फ़िल्मी दुनिया की हकीकत से
रूबरू कराया जाता है | परदे के पीछे के खोखलेपन को जानकार उसका दिवास्वप्न टूटता
है ,फिर वो  उस लड़के से विवाह के लिए हां
कर देती है | ये सिर्फ कहानी नहीं है बल्कि किशोर और युवा वर्ग की सच्चाई है |
फिल्म की नायिका  गुड्डी की तरह लड़कियाँ
नायकों के समान पति की और लड़के नायिकाओं के समान पत्नी की कल्पना करने लगते हैं |
पर हकीकत में ये संभव नहीं है | तिलस्मी दुनियाँ  के स्वप्न हकीकत के धरातल पर एक अंतहीन दौड़ के
अतरिक्त कुछ भी नहीं रह जाते हैं | फ़िल्मी दुनियाँ जैसा प्रेम न मिलना कई विवाहों
में झगडे व् उनके टूटने का कारण भी बनता है |         
                           काफी वक्त
पहले दूरदर्शन पर एक बच्चो का मनोविज्ञान जानने  के लिए क्विज प्रोग्राम आता था | उसमें एक बार
एंकर ने बच्चों से प्रश्न पूंछा “आप का रोल मोडल कौन है ?एक दो छोड़ कर हर बच्चे ने
किसी फिल्मी हीरो ,हीरोइन को  अपना रोल
मॉडल बताया | एंकर ने फिर प्रश्न किया क्यों ? किसी बच्चे ने बताया की वो बहुत
सीधा /सीधी  है | वो अन्याय के खिलाफ लड़ता
/लडती है | कुछ उनके रूप, हेयर सटाइल ,ड्रेसिंग सेन्स पर फ़िदा थे | तभी एंकर  ने बच्चों से प्रश्न करा कि “अगर आप को पता चले
कि अपनी असली जिंदगी में वो शराब पीते हैं ,अभद्र भाषा का प्रयोग करते हैं ,चीखते
चिल्लाते हैं तो ? बच्चों के चहरे उतर गए ,वो यह बात मानने से इनकार करने लगे ,और
असली प्रश्न वही छूट गया “अगर वो रीयल लाइफ में वैसे नहो जैसे  परदे पर दिखते  हैं तो ?
                    वो तो बच्चे थे ….
पर हम तो बड़े हैं | एक किसान आत्महत्या करता है उसी दिन एक सेलिब्रेटी शादी करता
है | आप को क्या लगता है टी वी पर क्या ज्यादा दिखाया जाएगा ?निश्चित तौर से जो
किसान  भूख से मर गया उसको दिखाने से टी आर
पी नहीं बढ़ेगी | ग्लैमरस शादी दिखाने से बढ़ेगी |जूते ,चप्पल ,फेयरनेस क्रीम ,xxx
ब्यूटी पार्लर के विज्ञापन आयेंगे | हम भी माथे की बिंदी से लेकर फेरे कराने  वाले पंडित की पोशाक के विवरण को  देखने में खो जायेंगे | किसान  की आत्महत्या भूख ,गरीबी …… मरने के बाद भी
हार जाएगी | क्या हम संवेदन हीन हो गए हैं ?क्या हम यही देखना  चाहते हैं ? अगर मीडिया की माने तो हां ! वो तो
वही परोसता है जो जनता  देखना  चाहती है | सवाल वही का वही है  “पहले मुर्गी आई या पहले अंडा” |
            मोटे अनुमान   के
अनुसार फ़िल्मी गॉसिप मैगज़ीन का ही  अच्छा –खासा
साप्ताहिक कारोबार है |  समझ से परे है कि
करीना कपूर , मल्लिका  शेहरावत या आमिर खान
की निजी जिंदगी में ऐसा क्या विशेष है की हमारे बच्चे और युवा  बड़ी ख़बरों को छोड़ कर इन चैनलों को लगा लेते हैं   तमाम मीडिया और फ़िल्मी गॉसिप मैगज़ीन सलेब्रिटीज
 की छोटी से छोटी गतिविधियों को दिखाकर आम
लोगों के मन में और ज्यादा जानने की जिज्ञासा पैदा करते हैं | उनकी एक आदर्श छवि
प्रस्तुत की जाती है | सनसनी व् ग्लैमर इस तरह दिखाया जाता  है की आम लोगों को लगने लगता है कि ये वहीँ हैं जो
हम बनना चाहते हैं |लोगों यह मानने को तैयार ही नहीं होते की वह भी हमारे जैसे ही
है हाड मांस के बने … शायद जरा से ज्यादा खूबसूरत , जरा ज्यादा चमकदार या जरा
ज्यादा पैसे  वाले |
                           कुछ दिन पहले तुलसी
जैसी बहू  का जबरदस्त क्रेज था | तुलसी
सासों  की निगाह में बहू  की रोल मॉडल है | लिहाजा अपनी बहू  से असंतोष  होना स्वाभाविक है | एक सामान्य इंसान चौबीसों
घंटे मेकअप में मुस्कुराता हुआ नहीं रह सकता | सलेब्रिटीज  की दीवानगी 
का आलम यह है कि उनके मंदिर बनवाये जा रहे हैं | लोग उनके जैसे कपडे ,जूते
,हैण्ड बैग के चक्कर में अपने घर का बजट बिगाड़ लेते हैं | बच्चों, किशोरों  और युवाओं पर तो  यह नशा जूनून की तरह सर चढ़ कर बोलता है | शादी-
विवाह आदि में ज्यादा से ज्यादा  वैसे ही
कपडे ,जेवर आदि ख्र्रीदने से कहीं न कहीं ये लगता है कि हम भी कुछ ख़ास हैं | पर यह
कुछ ख़ास हमारे अपने अन्दर छुपे ख़ास को हमारी नज़रों से गिरा देता है |किसी के जैसा
बनने की होड़  आत्मसम्मान  को झुकाने के लिए पर्याप्त है | जो कहीं न कहीं अतृप्ति
और असंतोष का भाव उत्पन्न करता है | चमक दमक वाली दुनिया देखकर बच्चे तो अक्सर यही
सोचते हैं कि प्रसिद्ध होना ही सब समस्याओं का समाधान है |
          ऐसा नहीं है की पुरानी पीढ़ी
इस चमक –दमक से आकर्षित नहीं होती थी | होती थी पर उस समय ज्यादा सुविधाए नहीं थी |जगह
–जगह ब्रांडेड सामान नहीं मिलता था | सच तो यह भी है की वो लोग तब जानते ही नहीं
थे कि प्रसिद्द कैसे हुआ जाए  | पर आज सब
सुविधायें हैं |अन्तर जाल से आप रातो –रात प्रसिद्ध हो सकते हैं | इस तरह प्रसिद्ध
होने और खुद को सलिब्रेटीज की तरह दिखाने के लिए बार – बार सेल्फी खीच कर फेस बुक
पर अपलोड करने का चलन बढ़ गया है | यू टयूब पर अपने वीडियो अपलोड किये जा रहे हैं |
“बदनाम हुए तो क्या नाम न होगा” की तर्ज पर ऊल –जुलूल हरकते कर के उनके वीडियो भी
अपलोड किये जा रहे हैं | ये एक मनोरोग की तरह उभर रहा है | हर कोई प्रसिद्ध होना
चाहता है | वो भी जिसके पास प्रसिद्ध होने का कोई खास  कारण नहीं है |एक ही चाहत बस प्रसिद्ध हो जाने
से हैं | यह सौ मर्जो की एक दवा बन गया है |
               सबसे दुखद है बच्चे और
किशोर जो कि हमारा भविष्य हैं उनके ऊपर  सितारों का नशा जूनून की हद तक है |  वो उनके बारे में सोचने ,बात करने ,में अपना
कीमती समय  बर्बाद कर देते हैं | जो समय पढ़
कर अपना  जीवन बनाने में लगाना चाहिए वो
नक़ल में चला जाता है | बच्चों को तो यहाँ तक लगने लगता है कि पढ़ाई में समय बर्बाद
होता है ,क्योंकि पैसा रुपया शोहरत तो सेलेब्रिटीज बनने से आती है | इस सोच के
चलते वो पढने में मन नहीं लगाते | फिर न ये मिलता है न वो | बस रह जाता है एक
असंतोष ,एक अवसाद | पर “ फिर पछताये होत क्या जब चिड़िया चुग गयी खेत “
                   चैनलों के लिए भी स्कूल सबसे अच्छा
चारागाह बन गए हैं | जहाँ आये दिन टी वी रीयलटी शो के नाम पर स्पोंसर आ जाते हैं |
अगर स्कूल में नहीं आये तो एक छोटा सा विज्ञापन अखबार में आ जाएगा …….. “ झूम –झूम
नाच का ऑडिशन … फिर देखिये २ से १७ साल तक के बच्चों को लेकर आये माता –पिताओं
की भीड़ लग जायेगी | मैं न सही तो मेरा बच्चा टी वी पर आ जाए | जो बच्चे अभी ठीक से
अपने हाथ से खाना –खाना नहीं सीख पाए हैं वो नाच रहे प्रसिद्धि ,नाम, पैसा नचा रहा
है | नृत्य कर भारत नृत्य कर …. शोहरत ,नाम पाने की ख्वाइश का नशा हमें नचा
रहा है | हम नाच रहे हैं क्योंकि हमें भी प्रसिद्द होना है |येन –केन प्रकारेंण
,किसी भी तरह ….
     आजकल पैकेजिंग का ज़माना है …
लाल नीले हरे ,पीले पैकेट में चमकीले वर्कों की लिखावट खराब से खराब सामन आकर्षक
लगने लगता है | वैसे ही  ही चमकते चेहरों
के पीछे का सच हमारे किशोर व् युवा  कहाँ
देखते हैं | वो अकेलापन वो अवसाद ,वो सामान्य से अलग हटकर जी गयी जिन्दगी जिसमें
एक आम आदमी तरह सड़क पर चलने की आज़ादी भी
छिन   जाती है जुनून  की हद तक सितारों का अन्धानुकरण करने  वाले कुछ लोगों ने माइकल जैक्सन  की मौत के बाद खुद को मारने की कोशिश की | उनमें
से एक को बचाने  वाले पुलिस कर्मी से वो
व्यक्ति गिडगिडा कर कह रहा था “मुझे क्यों बचाया ,मुझे मर जाने देते ,मुझे उसी के
साथ जीवन बिताना है |शायद ही वो व्यक्ति उनसे मिला हो पर उस के लिए मृत्यु स्वीकार
है | हमारे देश में भी सेलेब्रिटीज के लिए जप –दान ,पूजा पंडाल लगाने की खबरे
अक्सर सुनने को मिल जाती हैं | इनमें से कई अपने ऐसे भी होंगे जो अपने बुजुर्ग
माता –पिता को बीमारी में २ रूपये की दवा भी ला कर नहीं देंगे पर पर किसी
सेलेब्रिटीज के बीमार पड़ने पर भंडारा की व्यवस्था करेंगे | ये जूनून की हद तक
दीवानगी नहीं तो और क्या है ?
             आज के युग में यह आशा तो
नहीं की जा सकती की हम अपने बच्चों ,किशोरों को इससे पूरी तरह से बचा कर रख सकते हैं
|  यह उचित भी नहीं है | मीडिया भी अपने
कारोबारी हितो को ध्यान में रखते हुए वो सब परोसता रहेगा जो उसे लगता है बिकता है  | पर 
थाली में जो रखा हो वो सब खाना जरूरी नहीं  है |  दवा की अधिक मात्रा भी जहर बन जाती है |हमारे
बच्चों,युवाओ  को  यह विवेक उत्पन्न  करना पडेगा कि रील लाइफ और रियल लाइफ में अंतर
है  | इस चमक से उनकी आँखें चुंधिया जाती
हैं तभी तो वो अन्धेरा नहीं दिख पाता  जो
इस चमक के ठीक पीछे है |अभिनय के द्वारा वो पात्र जिया जा रहा है उसकी सोच विचार
अभिनीत चरित्र से सर्वथा भिन्न हो सकती है | ये बात भी काबिले गौर है कि सफलता और
प्रसिद्धि की इक्षा रखना कोई बुरी बात नहीं है पर इसे अन्धानुकरण न करके अपने दम
पर कडा परिश्रम करके प्राप्त करना चाहिए  |
कोई जिन्न नहीं निकलता है
बोतल से जो पहुंचा दे यहाँ से वहाँ तक
कि सीढियां भी नहीं है
वहां जाने की
बस है कच्ची पगडंडियाँ
जहाँ ढूँढने पड़ते हैं
खुद रास्ते
धस जाते हैं पैर भी दलदल में
सन जाते है जूते
पर निकलना है खुद ही
गर ,बनानी  है पहचान
अपने वजूद की अपने दम पर

वंदना बाजपेयी 
कार्यकारी संपादक 
अटूट बंधन (राष्ट्री हिंदी मासिक पत्रिका )


अटूट बंधन ……… हमारा फेस बुक पेज 

4 COMMENTS

  1. सच को दिखाता संपादकीय है।आज युवा वर्ग दिग्भ्रमित इसलिये है कि वो परदे के पीछे छुपे सत्य को देख नहीं पाता और न उसे दिखाया जाता है।
    काल्पनिकता का चोला पहने फिल्में वास्तविक ज़िन्दगी से परे होती हैं।और यदि यथार्थ दिखाया जाये तो वह दर्शकों को हज़म नहीं होगा।

  2. सच को दिखाता संपादकीय है।आज युवा वर्ग दिग्भ्रमित इसलिये है कि वो परदे के पीछे छुपे सत्य को देख नहीं पाता और न उसे दिखाया जाता है।
    काल्पनिकता का चोला पहने फिल्में वास्तविक ज़िन्दगी से परे होती हैं।और यदि यथार्थ दिखाया जाये तो वह दर्शकों को हज़म नहीं होगा।

  3. सच को दिखाता संपादकीय है।आज युवा वर्ग दिग्भ्रमित इसलिये है कि वो परदे के पीछे छुपे सत्य को देख नहीं पाता और न उसे दिखाया जाता है।
    काल्पनिकता का चोला पहने फिल्में वास्तविक ज़िन्दगी से परे होती हैं।और यदि यथार्थ दिखाया जाये तो वह दर्शकों को हज़म नहीं होगा।

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