अटूट बंधन वर्ष -२ अंक -३ सम्पादकीय

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कुछ खो कर पाना है ……..
चलों
कि जाने कि बेला आई है
तैयार हैं पालकी ,
सिंदूर मांग टीका , बड़ी लाल टिकुली
कहीं कमी न रह जाए दुल्हन के श्रृंगार में
फिर एक बार गले लग के
जी भर के रो लें
समेट लें यादों कि पोटली को
और कर दें विदा समय कि दुल्हन को
जो चली जायेगी क्षितिज के उस पार
छोड़ कर अपनी ढेर सारी  स्मृतियाँ
कुछ हंसने को
कुछ रोने को
फिर नयी सुबह के साथ स्वागत करे आगत का
किसी का जाना किसी का  आना
यूँही बस
जीवन नदिया
तुम
अनवरत  बहते जाना
           नया साल ! पर कुछ भी तो
नहीं बदला है | कल जो सूरज डूबा था , वही तो आज उदित हुआ  है | उतना ही लाल , उतना ही जलता हुआ उतना  ही प्रिय | हां ! शायद  ओढ़नी जरूर  बदल ली है | कल तक जिस पर लिखा था २०१५ आज उसी
पर २०१६ लिख गया है | ये महज ओढ़नी बदलने का कमाल है |  या तारीख बदलते ही बहुत कुछ बदल जाता है | समय
उम्र की एक पायदान और ऊपर चढ़ जाता है | आश्चर्य है , समय के पास भी निश्चित समय
होता है | जिसके साथ साथ  हम भी  केंद्र से परिधि की ओर और खिसकते जाते हैं |
बचपन से युवा , युवा से प्रौढ , प्रौढ़ से वृद्ध | और इसी बीतते समय के साथ हम आकलन
करने लगते हैं खोने और पाने का |रात के बारह बजे | ठीक एक क्षण | मिलन और जुदाई का
आने और जाने का , खोने और पाने का | पुराने को समेटने की नाकाम कोशिशों  के साथ नए के साथ आगे बढ़ जाने का | युवा
जोश  में 
हैप्पी न्यू इयर चिल्लाते हैं | बच्चे कौतुहल से ये कौतुहल सीखते है | और
वृद्ध चुपचाप रजाई मुँह पर  और ऊपर घसीट
लेते हैं |अरे !  नया क्या है | एक साल खो
कर एक साल पा लिया है |  इस साल का
गूगल  डूडल देख कर बरबस ही चेहरे पर
मुस्कान आ गयी | अंडे से फूट कर निकला २०१६ का नया साल सब को भौचक हो खुशियाँ
मानाते देख रहा है | आखिर उसने पा क्या लिया है | 
                    अभी कुछ दिन पहले
कि ही तो बात है | साल का आखिरी महीना लगा था , गर्मी विदा हो रही थी  और   सर्दी शुरू हो रही थी | ऊनी कपडें , हीटर ब्लोअर
, जो पिछले एक वर्ष से प्रतीक्षा कर रहे थे कब हमें इस कैद से छुटकारा मिलेगा कब
हम दोबारा खुली हवा में सांस लेंगे , उनकी  प्रतीक्षा आज पूरी हुई थी | मैं महसूस कर रही थी
कि घर में मद्धिम सी आवाज़े शायद उन्ही के चहकने की  हैं | इन्हीं सामानों के बीच में रखी थी  एक अंगीठी , कुछ मायूस सी | जो निकाली तो जायेगी
पर जलायी नहीं जायेगी | यह वही अंगीठी है जिसे मैं मायके से ले आयी थी अपनी कुछ
यादों को समेटते –समेटते | मैं शायद भूल गयी पर अंगीठी याद करती है वह दिन, जब माँ
उसे सुलगा जाड़े में खाना बनाया करती थी और 
हम चारों भाई बहन उसके चारों ओर अपनी –अपनी थाली ले कर बैठ जाते | माँ एक
रोटी के चार टुकड़े कर हम सब की  थाली में
डाल  देती | हम बहनें अपनी थाली के टुकड़े
भाइयों कि थाली में डाल  देते | एक अजीब
संतोष का भाव उभरता | खाने से ज्यादा खिलाने में आनंद था | उस समय अंगीठी
मुस्कुराती , उसकी मुकुराहट से घर में धुँआ भर जाता पर हमारी हँसती  आँखों में कभी उस धुँए कि कारण आँसू  नहीं आये | मन का उजास दीवाल के काले पन  को ढँक  देता जो अंगीठी अपनी छाप डालने के कारण बना देती
| अब अंगीठी नहीं निकलती , वो शिकायत नहीं करती बस एक नज़र देख कर बैठ जाती है
चुपचाप दीवान के अन्दर |
                                     
अंगीठी को देखकर मुझे माँ याद आ जाती हैं | झुर्रीदार चेहरे में अनुभव कि
परतें समेटे | वो  ढूढ़ लेती हैं घर का कोना
, और शुरू कर देती हैं  माला फेरना | माँ
शिकायत नहीं करती एक नज़र देख कर सिर्फ दुआएं देती हैं , अंगीठी की  तरह | माँ जानती हैं अब अंगीठी नहीं निकलती,  निकलते हैं ब्लोअर | पूरा कमरा गर्म  एक साथ | पास बैठने कि जरूरत नहीं | इसलिए तो इस
गर्माहट में स्नेह कि गर्माहट नहीं होती | न टुकड़ा , टुकड़ा रोटियाँ बँटती  हैं , 
जब बंटे  हो दिल | आलिशान घरों कि
दीवारें कालापन बर्दाश्त नहीं करना चाहती |स्टेटस मेन्टेन करने की राह में दीवारों  का कालापन हैसियत पर धब्बा है | तभी तो  वो स्यामलता भर जाती है मन में | अंगीठियां अब
भी सुलगती हैं पर कमरे में नहीं मन में अकेलेपन की  अंगीठियाँ | भर जाता है धुँआ अन्दर ही अन्दर ,
और उस धुंध में खो जाता  है अपनापन |यह
विकास का फल है | एक क्षितिज पाने और खोने का | कुछ खोते हुए कुछ  पाते हुए आगे बढ़ जाना है |
          रज्जो घर में रहती है | सुबह
उठ जाती है | घर आँगन बुहारती है | क्यारी में लगे पौधों को पानी देती है | एक –एक
फूल चुनती है | माला पिरोती है | भजन गाती है | रज्जो खिड़की से बाहर देखती है |
बाहर उसे दिखाई देती है मीरा | ऊपर से नीचे तक टिप –टॉप | सुबह सुबह पर्स ले
कर  बस पकड़ने को भागती | एक आज़ाद नारी , एक
कमाऊ स्त्री | दोनों की नज़ारे अक्सर टकरा जाती हैं | दोनों ही निराशा से भर जाती
हैं | रज्जो के पास आज़ादी नहीं है | मीरा के पास आज़ादी का उत्सव मनाने का समय नहीं
है| दोनों ने ही कुछ पाया है कुछ खोया है | इंदिरा नुई कहती हैं , “ स्त्री के
दोनों हाथों में लड्डू नहीं होते | पर यह स्तिथि केवल स्त्री तक ही सीमित नहीं है
| ये समान रूप से हर किसी पर लागू एक ध्रुव सत्य है |
          हम कहतें हैं आज के बच्चे
बहुत तेज हैं |  क्या सचमुच ? सच है कि
उनकी अंगुलियाँ की बोर्ड पर तेजी से दौड़ती हैं | पर क्या वो एक दो पीढ़ी पीछे के
बच्चों कि तरह  पेड़ पर भी उतनी ही तेजी से
चढ़ पाते हैं ?उनके पास शोसल साइट्स हैं | 
फेस बुक हैं | जहाँ  पर हजारों
दोस्त हैं | पर हैं तो एक स्क्रीन के आगे आभासी | इतने  दोस्तों के होते हुए भी क्या उनके  साथ कोई ऐसा है जो  बारिश के पानी में छप –छप करे | जो साथ में
चल  पड़ोस के श्यामू चाचा की सायकिल का टायर
पंचर कर दे और छुप  जाए | फिर श्यामू चाचा
का  का उतरा , परेशान  चेहरा देख कर ठहाके लगाए | इन बच्चों ने भी
हज़ारों फेस बुक फ्रेंड्स की कीमत चुकाई है | जोक्स भरे स्टेटस पर मुस्कुरा सहज
हास्य खोया है | वैसे ही जो अमीर  हैं उनके
पास पैसे कि चकाचौध है | महंगे कपडे हैं , ज्वेलरी है पर गरीब कि तरह परिवार के
साथ सुकून की चाय नहीं है | जो गरीब हैं उनके पास बस चाय ही है |       
                            स्वेता  , जो रोज़ फोन पर भाई –बहन से बात करती है |
अक्सर मिलने जाती है | रक्षा बंधन पर महँगी राखी बांधती है | मिठाई की जगह स्विस
चॉकलेट  गिफ्ट में देती है |  रक्षा बंधन पर एक  फेस बुक स्टेटस पढ़ कर फफक कर रो पड़ती है | उसमें
जानती है उस स्त्री के राधा के बारे में  पूरे एक बरस बाद भाई से मिलती थी |  जहाँ बहते आँसुओ  के बीच साल का भर के दुःख –दर्द का आदान प्रदान
होता था | भाई को हाथों से बनी राखी 
बाँधती थी | और घर  की खिडकी सी
जाते हुए भाई  को नज़रों से ओझल हो जाने तक
निहारती थी | अचानक से स्वेता को अपने जीवन में मिला सब कुछ बेमानी लगने लगता है |
उसे अपने भाई के स्नेह में वो ममत्व नहीं 
दिखता जो राधा के भाई में है | चंपा अपने ऑफिसर पति  की तुलना 
अपने किसान पिता  से कर के निराश हो
जाती है | जो शारीरिक परिश्रम करने के कारण मानसिक रूप से स्वस्थ घर आते थे | थके
टूटे मुँह लटकाए नहीं दीखते थे |विनोद जी का दुःख किसी से छुपा नहीं है जो तीनों
लायक बेटों के विदेश में बस जाने पर कहते हैं , “ काश उनका एक नालायक बेटा होता |
       विचित्र विडम्बना है |  रज्जो 
अपने जीवन में मीरा को खोज रही है , मीरा रज्जो को , महंगे मोबाइल पकडने
वाला बच्चा अपने जीवन में सड़क पर डंडे से टायर दौडाने वाले  बच्चे को खोज रहा है तो वो बच्चा मोबाइल वाले
बच्चे को | स्वेता  अपने जीवन में राधा
जैसा भाई खोज रही है और राधा स्वेता जैसा | चंपा पति में पिता को खोज रही हैं तो
शर्मा जी पत्नी में माँ को | और मैं…. मैं 
भी तो खोज रही हूँ पुरानी अंगीठी में रिश्तों  कि आंच  को , दीवाल पर धुएं के निशान  को , थाली में एक टुकड़ा रोटी को , भुने हुए
सिंघाडों  को , | अपने बच्चों को बीच मैं
खोज रही हूँ अपनी पुरानी सफ़ेद झालर वाली 
फ्राक को | हम सबके अन्दर एक गहरी हुक है | हम संब एक नोस्टाल्जिया  में जी रहे हैं | जो पाया है उसे छोड़ कर जो छूट
गया है या जो नहीं मिला है उसे पकड़ने की चाह | एक प्रसिद्द लेखक के कथन के अनुसार
“ हमारे सबसे खुशनुमा दिन सबसे दुखनुमा  यादें बन जाते हैं | “
                 विध्वंश  पर ही नव 
निर्माण  की  नींव है |बीज टूट कर ही वृक्ष बनता है |  कुछ खोना और पाना ही जीवन का मूलभूत सिद्धांत है
| और इस सिद्धांत को बिसरा देना ही दुखों का मूल है | या यूँ कहे दोनों हाथों में
लड्डू किसी के नहीं होते | कुछ खो कर ही कुछ मिलता है |  केवल पाना ही पाना संभव नहीं है | सांझ की
दुल्हन कितना भी श्रृंगार कर लें उषा की पालकी में बैठ कर उसे विदा होना  ही पड़ेगा | हमारी भारतीय संस्कृति ने पहले ही इस
तथ्य को समझ लिया था | इसलिए गीता दर्शन जीवन को तटस्थ भाव से लेने का दर्शन है | जीवन
को स्वीकार करने करने का दर्शन | जीवन जैसा है वैसा ही अनमोल है | आज विदेशी रैपर
में  इसे पावर  ऑफ़ नाउ कहा जाता है |जो भी है बस यही एक पल है
| इसी को खुल कर जीना है |   हम ही अतीत में या भविष्य में खोजते हुए इसे
दुरूह बना देते है |यह  जितना सहज है उतना
ही सरल है | और इसकी सहज स्वीकार्यता में ही शांति है |
सभी पाठकों को नव वर्ष की हार्दिक शुभकामनाएं 

वंदना बाजपेयी 
कार्यकारी संपादक 
‘अटूट बंधन ‘
राष्ट्रिय हिंदी मासिक पत्रिका 
               
               
  

                           

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