बदचलन


लघुकथा 
पूनम पाठक
इंदौर ( म. प्र. )
सब तरफ चुप्पी
छाई थी . कहीं कोई आवाज नहीं थी सिवाय उन लड़कों के भद्दे कमेंट्स की जो उस बेचारी
को सुनने पड़ रहे थे . लेकिन किसी की हिम्मत उन लड़कों से भिड़ने की नहीं थी लिहाज़ा
सभी मूकदर्शक बन चुपचाप तमाशा देख रहे थे . मैंने भी अपने काम से काम रखने वाली
नीति अपनाते हुए मोबाइल पर अपनी निगाहें नीची कर ली थीं
, कि तभी तड़ाक की
आवाज ने जैसे सभी को जड़वत कर दिया . 



नीची निगाहें उठाकर देखा तो अपनी ही कायरता पर
शर्मिंदगी हुई ….हाँ ये वही लड़की है जिसे हम कभी अपनी दोस्ती के काबिल नहीं
समझते थे . कहाँ हम कॉलेज के टॉपर बच्चों में से एक और कहाँ वो मर्दाना तरीके से
रहने वाली मस्त
, बेलगाम लड़की . जो सिर्फ कहने मात्र को लड़की थी , वरना लड़कियों
वाली कोई बात उसमे नजर नहीं आती थी . उसके दोस्तों में अधिकतर आवारा टाइप के लड़के
हुआ करते थे . बिना गालियों के बात करते हमने उसे नहीं देखा . पढाई लिखाई से कोसों
दूर पर कॉलेज की नेतागिरी में अव्वल . 

सामने तो मारे डर के कभी उसे कुछ कह नहीं
पाये
, परन्तु पीठ पीछे हम उसे आवारा , बदचलन और बदमाश आदि शब्दों से ही नवाजते थे .
उसी बदचलन ने आज भीड़ भरी बस में एक मासूम लड़की के साथ बुरी तरह से छेड़खानी कर रहे
लड़कों को ऐसा सबक सिखाया कि हम सभी शरीफों की नजरें नीची हो गयीं .

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