मास्टर जी ने सबकी शिक्षा के लिए सारा जीवन त्याग किया |पर मास्टरजी के बीमार पड़ने पर क्या हुआ ?

मास्टर जी

द्वारका प्रसाद जी पेशे से सरकारी विद्यालय में मास्टर थे । रायगढ़ नाम के छोटे से गाँव में उनकी पोस्टिंग हो गयी थी । पोस्टिंग हो क्या गयी थी यूँ समझिए कि ले ली थी । उन्होंने स्वयं ही माँग  की थी कि उन्हें उस छोटे से गाँव में तबादला  दे दिया जाए । गाँव में कोई इकके -दुक्के लोग ही थे जिन्हें पढ़े -लिखे लोगों की श्रेणी में रखा जा सकता था । बाकी की गुजर-बसर तो खेती , सुथारी या लुहारी पर ही चल रही थी ।  सभी हैरान थे कि द्वारका प्रसाद जी को इस छोटे से गाँव में क्या दिलचस्पी थी ?  कि वहाँ जा कर बस ही गयेखैर वह तो उनका निजी मामला था ।


 गाँव के हर घर में उनकी ख़ासी पहचान थी । सारे गाँव के बच्चे उनके विद्यालय में पढ़ने आते । और अगर कोई न आता तो  मास्टर जी ढूँढ कर उन बच्चों के माता-पिता से बात करते और उन्हें समझाते कि वे अपने बच्चों को पढ़ने के लिए भेजें । किंतु गाँव के लोग बहुत ग़रीब थे वे बच्चों को  पढाना तो दूर  की बात अपने बच्चों के लिए दो वक़्त की रोटी भी न जुटा पाते सो अपने बच्चों को कुछ न कुछ काम धंधे में लगा रखा था ।  मास्टर जी ने सरकारी दफ़्तरों में जा-जा कर अफसरों से बात कर विद्यालय में खाने का भी प्रावधान करवा दिया ताकि गाँव के लोग खाने के लालच में अपने बच्चों को विद्यालय में दाखिला तो दिलाएँ । अब गाँव के अधिकतर बच्चे विद्यालय में पढ़ रहे थे ।


   शाम के समय मास्टर जी गाँव के बीचों-बीच लगेनीमके पेड़ के गट्टे पर बैठ जाते।और अपने आस-पास गाँव के सारे लोगों को जमा कर लेते । किसी न किसी बहाने बात ही बात में वे उन्हें  पढ़ने के लिए प्रेरित करते ।



 लेकिन गाँव के लोग तो पढ़ाई का मतलब समझते ही न थे । उन्हें तो बस हाथ का कुछ काम करके दो वक़्त की रोटी मिल जाए बस इतनी ही चिंता थी । और औरतों की शिक्षा के बारे में तो बात उनके सिर के उपर से ही जाती थी । दो टुक जवाब दे देते मास्टर जी को । कहते " इन्हें तो बस चूल्हा-चौका करना है , उसमें पढ़ाई का क्या काम " रही बात गाँव की बेटियों की , पढ़-लिख गयी तो पढ़ा-लिखा लड़का भी तो ढूँढना पड़ेगा


मास्टर जी बार-बार उन्हें समझाते कहते " पढ़ाई कभी व्यर्थ नहीं जाती । दो अक्षर पढ़ लेंगे तो जेब से कुछ जाने वाला नहीं है । किंतु गाँव के लोग आनाकानी कर जाते ।किंतु जब किसी को कोई चिट्ठी लिखनी होती या कोई सरकारी दफ़्तर का कार्य होता तो मदद के लिए मास्टर जी के पास ही आते । मास्टर जी उनको मदद करने के लिए सरकारी दफ़्तरों के चक्कर लगाते , उनकी चिट्ठियाँ लिखते व उनके अन्य कार्यों में भी सामर्थ्य अनुसार उनकी मदद करते ।धीरे-धीरे सभी लोगों का मास्टर जी पर विश्वास जमने लगा था । और मास्टर जी की प्रेरणा से प्रेरित हो कर मास्टर जी से थोड़ा- थोड़ा पढ़ना-लिखना सीखने लगे थे । और तो और गाँव की महिलाएँ भी चूल्हा-चौका निपटा कर रोज एक घंटा मास्टर जी से पढ़ने लगी थीं । मास्टर जी उन्हें थोड़ा शब्द ज्ञान देते और थोड़ा अन्य नयी-नयी जानकारियाँ देते । यह सब कार्य मास्टर जी मुफ़्त ही करते । 



समय बीतता गया , मास्टर जी के बच्चे बड़े हो गये और आगे की शिक्षा के लिए शहर चले गये । शहर की चमक-दमक बच्चों को बड़ी भा गयी । वे बार-बार मास्टर जी को गाँव छोड़ शहर आने की ज़िद करने लगे । पर मास्टर जी थे कि टस से मस न होते । सो मास्टर जी की पत्नी भी मास्टर जी को छोड़ अपने बच्चों की सार​-संभाल करने के लिए शहर चली गयीं । मास्टर जी अब कहने को अकेले थे किंतु गाँव अब परिवार मे परिवर्तित हो गया था । ज़्यादा से ज़्यादा समय मास्टर जी गाँव के लोगों के साथ ही बिताते ।



 तभी एक दिन मास्टर जी को दिल का दौरा पङ गया । मास्टर जी का पड़ौसी सुखिया उन्हें झट से गाँव के वैद्य के पास ले गया । वैद्य जी उन्हें प्राथमिक उपचार दे कर बोले " अच्छा होता कि मास्टर जी को शहर ले जाते और बड़े अस्पताल में दिखा देते , नब्ज़ थोड़ी तेज ही चल रही है । 

गाँव के लोगों ने तुरंत ही  उनके पत्नी व बच्चों को सूचित कर शहर ले जाने की तैयारी कर ली । शहर जाते ही उन्हें वहाँ के बड़े अस्पताल में भरती कर दिया गया । गाँव का उनका पड़ौसी सुखिया उनके साथ में था । बड़े अस्पताल में डॉक्टर ने दवाइयों की लंबी लिस्ट और अस्पताल के खर्चे का बिल उनकी पत्नी के हाथ में थमा दिया । इतना पैसा मास्टर जी की पत्नी के पास न था सो लगी अपने भाई व अन्य रिश्तेदारों को फोन करने ,सोचा शायद कहीं से कोई मदद मिल जाए । किंतु आजकल किसको पड़ी है दूसरे की मुसीबत के बारे में सोचने की । सुखिया मास्टर जी व उनकी पत्नी की हालत बखूबी  समझ रहा था । मास्टर जी की पत्नी  स्वयं से ही अकेले में बड़बड़ा रही थी।" समय रहते सोचते तो ये दिन न देखना पड़ता , कभी दो पैसे न बचाए , लुटा दिए गाँव वालों पर ही "  कभी कोई ऊपर की कमाई न की " ।


बच्चे भी बोल रहे थे कितनी बार कहा था शहर आ जाओ किंतु हमारी एक न सुनी । कम से कम यहाँ रहते तो ट्यूशन कर अतिरिक्त कमाई तो करते , फालतू ही गाँव के लोगों के साथ वक़्त जाया  किया । सुखिया अब मास्टर जी की माली हालत से वाकिफ़ हो गया था । उसने झट से गाँव फोन किया और अगले ही दिन गाँव से एक आदमी आया जिसे मास्टर जी ने ही पढ़ाया था और उनके ही विद्यालय में नयी नियुक्ति मिली थी उसे । साथ में वह एक पोटली लाया था और कुछ रुपये भी । वह पोटली उसनेमास्टर जी  की पत्नी को थमा दी और बोला गाँव के लोगों ने जमा किया है । मास्टर जी की पत्नी ने पोटली खोली तो हैरान रह गयी । उसमें तो गाँव की औरतों के गहने थे और साथ में एक चिट्ठी भी थी ।

 मास्टर जी की पत्नी ने चिट्ठी पढ़ी जिसमें लिखा था " बेटी गाँव की सभी औरतों ने मिल कर कुछ जेवर इकट्ठे किए हैं , इन्हें बेच मास्टर जी का इलाज करवा दो और कुछ रुपये भी हैं वह भी काम में ले लो, मास्टर जी के इलाज में कोई कमी न आने देना  और कोई परेशानी हो तो ज़रूर बताना बेटी, सारा गाँव तुम्हारे साथ है किसी प्रकार की कोई चिंता न करना " । यह चिट्ठी गाँव के सबसे वृद्ध व्यक्ति छज्जू काका ने लिखी थी । मास्टर जी की पत्नी की आँखें तर हो आई थीं ।


 मास्टर जी का इलाज चालू हो गया था और जल्द ही वे ठीक हो गये । ठीक होते ही मास्टर जी सुखिया के साथ गाँव को रवाना हो गये । गाँव पहुँचते ही लोग उनके स्वागत में मालाएँ ले कर खड़े थे और उनमें सबसे आगे था रामसुख ,जिसे मास्टर जी ने ही पढ़ाया था और उसी सरकारी विद्यालय में अध्यापक के पद पर कार्यरत था । सब मिल कर मास्टर जी को उनके घर ले गये और रामसुख बोला " मास्टर जी अब आप आराम कीजिए , आपकी अनुपस्थिति में गाँव की सेवा का कार्य मैंने संभाल लिया है , बस आप आग्या कीजिए । मास्टर जी के चेहरे पर मुस्कुराहट खिल आई थी । आज उन्हें अपना जीवन सफल हुआ महसूस हो रहा था ।


रोचिका शर्मा
चेन्नई
डाइरेक्टर,सूपर गॅन ट्रेडर अकॅडमी



लेखिका


परिचय
नाम : रोचिका शर्मा (खांडल)
शिक्षा: एलेक्ट्रिकल इंजिनियरिंग
वर्तमान : डाइरेक्टर  सूपर गॅन ट्रेडर  अकॅडमी प्राइवेट लिमिटेड
( Director   Super  Gann Trader  Academy )
                  www.tradingsecret.com
प्रकाशन: कविताएँ, आलेख, कहानी ,बाल कविताएँएवं  कहानियाँ विभिन्न पात्र - पत्रिकाओं में प्रकाशित 

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Atoot bandhan

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5 comments so far,Add yours

  1. भावोद्वेलक मर्मस्पर्शी कहानी । बधाई।

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    1. धन्यवाद विश्वमोहन जी

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  2. बहुत ही भावपूर्ण रचना । सादर ।

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  3. बहुत ही हृदयस्पर्शी रचना....

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