angerया गुस्सा , हाई ब्लड प्रेशर , ह्रदय रोग व् स्ट्रेस जैसे अनेकों बीमारियों का कारण है | इसकी वजह से मन खिन्न रहता है और रिश्ते बिगड़े | आइये जाने इसे कैसे काबू में करा जाए |

   
अपने गुस्से को काबू में कैसे करें ?

सुबह अलार्म की घडी टाइम पर नहीं बजी ...अपने ऊपर गुस्सा आ रहा है |
  बच्चे ने पराठे खाने से साफ इनकार कर के सैंडविच खाने की फरमाइश कर दी ... बच्चे पर गुस्सा आ रहा है |
इतनी भाग -दौड़ के बाद भी बस लेट आई ... बस ड्राइवर पर गुस्सा आ रहा है |
                                                                    क्या आप कभी गिनते हैं कि सुबह सात  बजे से सुबह नौ बजे तक आप कितनी बार गुस्सा कर लेते हैं | इसी गति से दिन भर में कितनी बार गुस्सा कर लेते हैं या मात्र " मूड ऑफ " कह कर अपनों का कितना मूड ऑफ कर देते हैं| गुस्सा कैसा भी हो किसी पर भी हो उसका प्रभाव तन , मन और जीवन पर नकारात्मक ही पड़ता है| विज्ञान कहता है कि हम दिन भर काम करने में उतना नहीं थकते जितना एक घंटे गुस्सा करने में थक जाते हैं | गुस्सा बहुत ही स्वाभाविक है ये मान कर हम गुस्सा करते जाते हैं ...तब तक जब तक स्ट्रेस दिल , दिमाग को अपनी गिरफ्त में नहीं ले लेता| अगर आप चाहते हैं कि गुस्से को अपने ऊपर हावी न होने दें तो आपको गुस्से पर काबू करना सीखना होगा |

How to control your anger(in Hindi)


                                       अगर आप भी अपने गुस्से से परेशान  हो चुके हैं तो जरूर ही आप उसे अपने काबू में रखना चाहते होंगें | आइये हम आपको बताते हैं कि गुस्से पर कैसे काबू रखे| ये बहुत ही आसान है क्यों कि   आपको गुस्से को control में रखने के लिए थिंकिंग पर ध्यान देना है | जानिये कैसे -

अपनी इमोशनल चाभी अपने हाथ में रखे


                                              फलाने की हिम्मत कैसे हुई कि ऐसा कहे , ढिकाने ने मुझे देख कर आखिर मुँह क्यों फेर लिया , इसने, उसने  ने आखिर क्या समझ कर .... अकसर हमें गुस्सा इस बात पर आता है कि लोग हमारे साथ ऐसा व्यवहार क्यों करते हैं ? यहाँ पर  हमारे स्ट्रेस में आने या गुस्सा करने का सीधा सा अर्थ है कि हमने अपने इमोशन की चाभी अगले को पकड़ा दी है | अब अगर किसी को पता चल जाए कि वो बस इतना सा कह कर या जरा सा मुंह बना कर आपका दिन बिगाड़ सकता है तो कोई क्यों न फायदा उठाये | बेहतर है की आप अपने इमोशन की चाभी अपने ही पास रखें |

                                    एक बहु और सास की कहानी याद आ रही है | एक बहु  अपनी सास को कुछ कहती नहीं थी बस उसके पानी मांगने या कोई काम कहने पर मुंह चिढ़ा देती थी , यह देख कर सास का गुस्सा सातवे आसमान पर चढ़ जाता और फिर वो बहु को अनाप शनाप जाने क्या -क्या बोलती रहती | बाहर से लोग केवल सास की आवाज़ सुनते बहु की नहीं | उन्हें लगता सास बुरी है जो गाय जैसी बहु पर गुस्सा करती हैं | यहाँ बहु जान गयी थी कि सास उसके मुंह बनाने पर चीखेगी-चिल्लाएगी | सास ने अपने गुस्से की चाबी बहु को दे दी थी | अगर लोगों को पता चल जाए कि हमें किस बात पर गुस्सा आता है तो वो दस बार हमें गुस्सा दिला सकते हैं | इसलिए कोई दूसरे को ये अधिकार मत दीजिये की वो आपको गुस्सा दिला सके |

दूसरों को दें बेनिफिट ऑफ़ डाउट


                               कई बार कोई व्यक्ति हमें  ऐसी बात कह जाता है जो हमें बहुत बुरी लग जाती है | उस बात पर हमें बहुत गुस्सा आता है | लेकिन जब आप आराम से सोंचतें  है तो देखते हैं की उस व्यक्ति का वो कहने का इरादा नहीं था | या जो हमने समझा , वो उस आशय के शब्द उसने कहे ही नहीं थे |

उदाहरण के लिए मीता की बेटी के १२ th में 70 % मार्क्स आये थे | दरसल वो कोचिंग और  स्कूल को संभाल  नहीं पा रहीथी | उसने कोचिंग पर ज्यादा ध्यान दिया और १२ th में प्रतिशत बिगड़ गया | मीता  ने उस समय उसका साथ दिया |बेटी ने अपनी पढाई जारी रखी और कॉलेज  में उसने बेहतर किया|  मीता की कोशिश यही रहती थी कि वो अपनी बेटी का आत्मविश्वास टूटने न दे |
समय आगे बढ़ा | मीता की छोटी बेटी 12 th में आ गयी | मीता उसे पढाई का महत्व समझा रही थी|  बीच में बेटी ने पूँछ दिया ," मम्मी आपके 12th में कितने नमबर आये थे| मीता ने कहा , "71% , फिर रुक कर बोली , तुम ज्यादा मेहनत करो , हमारे जमाने में 71 % बहुत होशियार बच्चों के आते थे , पर आज तो जो 71 -72 % लेकर आता है उसे मूर्ख हो कहते हैं | तभी दूसरे कमरे से बड़ी बेटी की आवाज़ आई ,"thank you" मम्मी , इतना कह कर उसने गेट बंद कर लिया| मीता का इरादा बड़ी बेटी को कमतर कहने का नहीं था , बस वो बात करते समय उसका वाकया  भूल गयी | परन्तु बड़ी बेटी बहुत दिन तक उससे नाराज़ रही , उसे लगा मम्मी ने उसे मूर्ख कहा है |

                            ऐसी बहुत सारी परिस्थितियाँ जिंदगी में आती हैं और हम  लम्बे समय तक गुस्सा पाले रहते हैं | जबकि बाद में बात साफ़ होने पर पता चलता है कि कहने वाले का वो आशय ही नहीं था जो हमने समझा |
कई बार तो ये गुस्सा जिंदगी भर पला रहता है | इसलिए बेहतर है कि बात बुरी लगने पर दूसरे को बेनिफिट ऑफ़ डाउट दें और बात को भूल जाएँ |


सोंच -समझ कर प्रतिक्रिया दें -


                                 एक पुरानी  कहावत है कि जब गुस्सा आये तो कुछ भी बोलने  से पहले धीमे -धीमे १० तक गिनें | ऐसा इसलिए कहा जाता है क्योंकि गुस्से में कुछ भी बोल देने से बात बिगड़ने का डर रहता है | दस तक गिनने में दिमाग को कुछ सोंचने समझने का मौका मिलता है | जिस कारण तुरंत प्रतिक्रिया नहीं देता | अब यहाँ एक बात ख़ास है जो लोग तुरंत कुछ कह देते हैं उससे अगला तो नाराज़ हो ही जाता है , उनके लिए भी अच्छा नहीं होता | अगर हम अपने गुस्से का इजहार सही तरीके से करना सीख लें तो आधी से ज्यादा जीवन की समस्याएं खत्म हो जायेंगी |

                          अब जैसे महेश जी  का बच्चा टी . वी देख रहा है , पढ़ नहीं रहा | महेश जी  ऑफिस से  आते हैं  , उसे देखते ही गुस्से में टी वी बंद करके कहने लगते हैं कि , " रिक्शा चलाओगे , पढना नहीं बस बैठे , बैठे मेरे पैसों को खाते रहना | बच्चा उठ कर चला जाता है | वो किताब के आगे बैठा रहता है पर उसका मन पढने में नहीं लगता क्योंकि उसके दिमाग में पिता द्वारा कहे अपमान जनक  शब्द घूम रहे हैं, शायद ये शब्द कभी भी न निकलें | इसके विपरीत अगर महेश जी बेटे को टी .वी देखने देते , बाद में खाना खाते समय या रात को उसे अपने पास बुला कर समय व् पढाई के महत्व को प्यार से समझाते तो बच्चा उसे अवश्य समझता , साथ ही उसके मन में अपने पिता के लिए इज्ज़त बढ़ जाती|

                                            स्टीव जॉब्स को अपनी ही कंपनी से निकाल दिया गया था , पर उन्होंने तुरंत प्रतिक्रिया नहीं दी बल्कि दो कम्पनियाँ कड़ी करने के  प्रतिउत्तर दिया |गुस्से पर तुरंत प्रतिक्रिया न देकर समय पर प्रतिउत्तर दें |

दूसरों को क्षमा करें


                            दबा हुआ क्रोध वो जलता हुआ कोयला है जिसे आप अपने हाथ में इस आशा से पकडे रहते हैं कि समय आने पर दूसरों पर फेंक देंगे | लेकिन इससे पहले की उसे आप दूसरों पर फेंक पाए आप  खुद ही अपना हाथ जला बैठते हैं |

                                       अक्सर हम क्रोध को प्रदर्शित नहीं करते पी जाते हैं | कई बार हम पलट कर जवाब देने की स्थिति में नहीं  होते, जैसे कि अगर हमारा बॉस हमें डांट  रहा है , या क्लस में टीचर , या घर में कोई बड़ा  तो हम उसे सुनने के लिए विवश हैं उस गुस्से को  हम अक्सर प्रकट  नहीं करते पर वो गुस्सा एक जहर की तरह हमारे शरीर की धमनियों में भरा रहता है | इससे एक तरफ तो हम खुद नकारात्मक होते हैं व् दूसरी तरफ स्ट्रेस के शिकार होते हैं | बेहतर है ऐसी स्थिति में माफ़ कर दिया जाए | ये माफ़ी अपने भले के लिए है |

                                      मधुलिका की सास उससे अकसर भला -बुरा कहा करती थी | उसे बहुत गुस्सा आता , पर बहु होने के कारण वो कुछ कह ना पाती और गुस्सा अन्दर ही अन्दर पीती रहती | एक दिन उसने यूँही सोंच लिया कि सासू माँ ने  ऐसी ही  सास देखी हैं ये उन्हीं का बदला उससे ले रही हैं , वो दिल की बुरी हैं नहीं | कुछ दिन कह कर खुद ही शांत हो जायेंगी | ये ख्याल आते ही उसका गुस्सा शांत होने लगा | फायदा उसे ही मिला | क्योंकि अब वो पहले से ज्यादा खुश रहने लगी | धीरे - धीरे सास को भी उससे शिकायतें कम हो गयी | इसी आशय से सम्बद्ध एक कहानी यहाँ " चुटकी भर नमक" आप पढ़ सकते हैं |

लोगों को स्वीकार करें

                         कई बार हम गुस्सा इसलिए करते हैं , क्योंकि लोग हमारे मुताबिक़ नहीं होते | यहाँ हमें लोगों को स्वीकारना सीखना पड़ेगा | हमें समझना पड़ेगा कि लोग गलत या सही नहीं होते बस अलग होते हैं | वैसे ही जैसे बाग़ में फूल अलग होते हैं , रंग अलग होते हैं ...लोगों के ढंग अलग होते हैं |

                            मिस्टर खन्ना ने ऑफिस से एक आदमी को बस इसलिए निकाल दिया कि वो काम तो ठीक करते हैं पर बोलते बहुत हैं | वो आदमी तो चला गया , उसके बाद मिस्टर खन्ना को कोई काबिल आदमी नहीं मिला , जो उस काम को उसी सलीके से कर सके | कम्पनी को घाटा होने लगा , वही  आदमी फिर बुलाया गया | अब मिस्टर खन्ना को उससे कोई शिकायत नहीं थी क्योंकि वो जान गए थे कि वो भले ही ज्यादा बोलता हो पर आदमी काम का है | जरा अपनी रोजमर्रा की जिंदगी पर ध्यान दें ...वो भी कोई आदमी है उसे होली ही नहीं पसंद , यार जो पूजा नहीं करता न वो इंसान सच्चा तो हो ही नहीं सकता , उसके साथ तो बैठना भी मुमकिन नहीं है क्योंकि उसे काला रंग पसंद है और अक्सर वही पहनती है |

                                             हर इंसान की पसंद , नापसंद उसके काम करने का ढंग , सोंच हमसे अलग हो सकती है , गलत या सही नहीं | याद रखिये अगर हम इन भर तराजू लिए हुए नहीं घूमेंगे तो हम हर किसी को वैसे ही स्वीकार करने लगेंगे जैसे वो हैं | जाहिर से बात है कि फिर गुस्से का सवाल ही पैदा नहीं होता |

                                               गुस्सा हमारी खुशियों में जहर का काम करता है | इसलिए इन तरीकों को अजमा कर अपने गुस्से को control में रखिये और खुश रहिये |
                                   


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Atoot bandhan

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