छोटी दीदी -एक कहानी जो अधूरी रह गयी

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छोटी दीदी -एक कहानी जो अधूरी रह गयी



छोटी दीदी की कहानी , मेरी अपनी जिन्दगी की कहानी का एक हिस्सा है एक बिंदु पर आकर दोनों कहानियाँ मिल गयीं थोड़ी दूर साथ चलीं फिर अलग हों गयीं , पर जब -जब मेरी जिन्दगी की कहानी में छोटी दीदी थीं हैं और रहेंगी | 

छोटी दीदी -एक कहानी जो अधूरी रह गयी 


छोटी दीदी की बक्सा साफ़ करने का जिम्मा मुझे दिया गया | उसमें सिर्फ
किताबें भरीं थीं | कितना पढना चाहतीं थी वो , पर… , कुछ किताबें पलटने के बाद मेरे
हाथ में वो भगवद्गीता थी , जिसके बारे में छोटी दीदी ने कई बार मुझे बताया था | ये
कोई साधारण गीता नहीं थी | छोटी दीदी को आठवीं कक्षा में वाद्द –विवाद प्रतियोगिता
में प्रथम आने पर मिली थी | आँखों के वेग को रोकते हुए मैंने पन्ना पलटा | बड़े –बड़े
शदों में लिखा था , “ हम आपके उज्जवल भविष्य की कामना करते हैं | “ नीचे
प्रधानाचार्या के हस्ताक्षर थे | कुछ पन्ने और पलटने के बाद एक मुड़ा-तुड़ा कागज़
मिला | मैंने खोल कर देखा |
 ये छोटी दीदी
ने ही लिखा था | साफ़ –साफ़ मोती जैसे अक्षर | 


मैं खत खोलकर पढने लगी | खत में कुछ
स्मृतियाँ दर्ज थी | ये तब की बात है जब छोटी दीदी ७ -८ की साल की थीं | उम्र छोटी
थी पर लड़कियों को घर के बाहर जाने की इजाज़त नहीं
 थी | घर में माँ का हाथ बटायें या गुड्डी गुडिया
से खेले दिन में थोड़ी बहुत आज़ादी थी पर
 जैसे ही सूरज अस्ताचल की ओर जाता लड़कियों ,
औरतों की दुनिया घर के भीतर ही सिमिट जाती | बड़ी दीदी को सब स्वीकार था | उनके सर
को केवल उर्ध्व
 दिशा में हिलाने की आदत थी
| न कभी कोई तर्क किया ना , ना कहना सीखा , पर छोटी दीदी ऐसी नहीं थीं | उनके पास
ढेरों रंग थे , जिससे वो दुनिया को रंगना चाहती थीं , कभी तितली बन कर उड़ना चाहती
थीं , तो कभी बादल बन कर सारी धरती पर बरसना चाहती थीं | उनकी राह में
  रोड़ा मुख्य द्वार पर जड़ा वो बड़ा सा लोहे का
दरवाजा था , जिसकी सिर्फ सांकल ही नहीं बंद होती, बाहर और अंदर की दुनिया को पूरी
तरह से अलग करने के लिए एक बड़ा सा क्षैतिज लकड़ी का लट्ठा लगा दिया जाता | वहीँ पास
तख़्त में बाबा सुपारी खा कर उंघते रहते , मजाल है कि कोई निकल जाए | 



 पर छोटी दीदी कहाँ मानने वालीं थी , वो  कुर्सी लगा कर उस क्षैतिज लट्ठे पर चढ़ जातीं और
बाहर की दुनिया को नन्हीं आँखों से परखने की कोशिश करतीं कि आखिर क्या है इस बाहर
की दुनिया में जो सांझ होते ही लड़कियों के लिए निषिद्ध हो जाता है | छोटी दीदी की
लाख चतुराई के बाद
 भी अक्सर बाबा उन्हें
पकड़ लेते और जोर से चिल्लाने लगते , “ ई ससुरी नहीं मानिहै , टाँगे काट दे ईकी तब
ना चढ़ पहीये , अपनी बड़ी बहन की सरीकत भी नाही करत है कि अम्माँ का हाथ बटावे , कुल
का नास करे है | बाबा देर
 तक बडबडाते और
छोटी दीदी चुपचाप दरवाजे से उतर कर चूल्हे पर रोटियाँ सेंकती अम्माँ से चिपक जातीं


बाबा चूल्हे की ही रोटी खाते थे | गैस की रोटी में छूत लग जाती ,  उनका तर्क होता ई गैस के कारण ही आज् कल मानुष
बड़े बुजर्गन से जवाब –तलब करने लाग है , हमारे घर में ई ना चलिहैं | छोटी दीदी देर
तक अम्माँ से चिपक कर सुबकतीं
 पर अम्माँ
जरा भी ना हिलतीं , ना पक्ष में ना विपक्ष में ,
 
वो आंच में पूरी तरह पक चुकी थीं , बड़ी दीदी ने तय कर लिया था जब पकना ही
है तो चिल्लाना बेकार है , छोटी दीदी आंच में डाले जाने की शुरुआत से ही विद्रोह
पर उतारू थीं | 



ऐसी ही किसी एक शाम को बाबा से डांट खाने के बाद छोटी दीदी सुबक कर
अम्माँ से चिपकी नहीं , बल्कि अम्माँ को झकझोर कर कहा , “ अम्माँ देखना एक दिन
मैं
  दरवाजे को लड़कियों के लिए शाम को बंद
हो जाने की प्रथा को खत्म कर दूँगी
  ,
हमारी अध्यापिका कहतीं हैं , खूब पढने –लिखने से से औरतें अपने मन का जीवन जी
सकतीं हैं | देखना अम्माँ मैं खूब पढूंगी , भैया से भी ज्यादा , बहुत ज्यादा | उस
समय अम्माँ ये किसी मशीन की तरह होरसे
 पर
चलते हाथ रुक गए उन्होंने पलट कर कुछ कहना चाहा
 पर तब तक छोटी दीदी अपनी किताब ले कर जा चुकी
थीं | ये पहला विद्रोह का स्वर था जो हमारे घर में उठा था |



छोटी दीदी -एक अधूरी कहानी (एक अंश )


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8 COMMENTS

  1. कहानी बहुत अधूरी सी है कितना अच्छा होता अगर कथा को थोड़ा और विस्तार दिया जाता |

  2. वंदना दी, आगे की कहानी जानने की बहुत उत्सुकता हैं। लेकिन इस ब्लॉग पर अन्य लेखकों की भी पोस्ट होने से कई बार आपकी पोस्ट्स भी मिस हो जाती हैं। अतः आपसे निवेदन हैं कि इस कहानी के आगे की कहानी का लिंक कृपया मुझे मेल कर दीजिएगा। मेरा मेल आपको मेरे ब्लॉग के परिचय में मिल जाएगा।

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