तेज भागती हुई जिन्दगी बहुत कुछ पाने की चाह में कितना कुछ खोती है ... क्या कभी सोचा है ?


कविता -जरा धीरे चलो


आज फुर्सत किसके पास है , हर कोई भाग रहा है ...तेज , और तेज , लेकिन इस भागने में , अपने अहंकार की तुष्टि में , ना जाने कितने मासूम पलों को खोता जाता है जो वास्तव में जिंदगी हैं ... तभी तो ज्ञानी कहते हैं ...

कविता -जरा धीरे चलो 


जिन्दगी थोड़ा ठहर जाओ
जरा धीरे चलो

तेज इस रफ्तार से 
घात से प्रतिघात से 
वक्त रहते , सम्भल जाओ
जरा धीरे चलो
जिन्दगी - - - -

कामना के ज्वार में
मान के अधिभार में
डूबने से बच , उबर जाओ
जरा धीरे चलो
जिन्दगी - - - -

शब्दाडम्बरों के
उत्तरों प्रत्युत्तरों के
जाल से बच कर , निकल जाओ 
जरा धीरे चलो
जिन्दगी - - - -

ऊषा अवस्थी


लेखिका -उषा अवस्थी



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Atoot bandhan

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1 comments so far,Add yours

  1. A very good n important msg
    Yes the poem wants us to slow down n reflect on life ratherror than join the rat race that others are running to go ahead. Deepak Sharma

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