हे! धतुर वाले बाबा

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कविता -हे! धतुर वाले बाबा)




भोले बाबा जो धतूरा , बेल , मदार और ना जाने कितने जहरीले फल प्रेमसे चढ़ा देने पर प्रसन्न हो जाते हैं और सब की बिगड़ी बनाने लगते हैं | उन्हीं के चरणों में एक भक्तिमय प्रार्थना

हे! धतुर वाले बाबा



सुना है—
सबकी बिगड़ी बनाते हो
हे! धतुर वाले बाबा।
ना दौलत ना शोहरत से आप खुश हो,
ऐसा सुना है,कि
आप उन लोगों के भी है,
जिनका कोई नहीं—-
हे! मजुर वाले बाबा।
सुना है—-
सबकी बनाते हो
हे! धतुर वाले बाबा।
ना हो पाऐ पुरी शैतानी ख्वाहिश,
इसके लिए—-
समंदर से निकला जहर तक पिया
हे! त्रिशूल वाले बाबा।
सबको दिया घर और दुनिया चलाई,
हिमालय की चोटी पर जाकर बैठे,
हो खुद आधा नंगा—-
हे! फक्कड़,हे! अवघड़, हे! मुड़ वाले बाबा।
रहमत जरा सा हमपे भी कर दो,
देखो, रोते गले से “रंग” तुमको पुकारे,
हे! दूर वाले बाबा।
सुना है—-
सबकी बिगड़ी बनाते हो
हे! धतुर वाले बाबा।

@@@रचयिता—रंगनाथ द्विवेदी।
जज कालोनी, मियांपुर
जिला–जौनपुर 222002 (U P)


लेखक -रंगनाथ द्विवेदी





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