पदमश्री डॉ. उषाकिरण खान के उपन्यास 'गयी झुलनी टूट की विस्तृत समीक्षा


                                             
गयी  झुलनी टूट –लोक में रची बसी एक संघर्ष कथा(पुस्तक समीक्षा )
 

पदमश्री’ और ‘भारत भारती’ आदि अनेकों श्रेष्ठ  पुरुस्कारों से सम्मानित डॉ. उषाकिरण खान जी यानि कि उषा दी का किताबघर से प्रकाशित उपन्यास ‘गयी झुलनी टूट’ अपने नाम से जितना आकर्षित करता है उतना ही अपने कवर पेज से भी | इसके कवर पेज में बनी मधुबनी पेंटिग सहज ही ध्यान खींच लेती है | उन्होंने ‘महालक्ष्मी’ मधुबनी को इस किताब में क्रेडिट भी दिया है | लोक कलाओं के विस्तार का उनका ये तरीका मन को छू गया | उषा दी का नाम आते ही पाठकों के मन में  ‘भामती, ‘अगन हिंडोला’ और ‘भामती’ जैसे ऐतिहासिक उपन्यासों की याद ताज़ा हो जाती है | पर यह उपन्यास उनसे अलग हट कर है | इसमें हाशिये के चरित्रों के जीवन के संघर्षों को दिखाया गया है | इसमें वो एक मार्मिक सवाल उठाती हैं कि

“...जीवन केवल संगसाथ नहीं है | अगर संगसाथ है तो वंचना क्यों है ?”



पूरा उपन्यास एक स्त्री के संघर्ष की जीवंत कहानी है जो कहीं ठहरती नहीं | हर धड़कन के साथ धड़कती हुई महसूस होती है |


उषा दी  निरंतर अपने आस –पास के परिवेश की कहानियाँ लिखती आई हैं | उनकी कहानियाँ गल्प नहीं होती जीवन का यथार्थ होती हैं | इसीलिये वो मन में गहरे उतर जाती हैं | उनकी कहानियाँ से  उस परिवेश  के जीवन व् स्त्रियों की दशा, पर्यावरण आदि के बारे में भी बहुत कुछ जानने समझने को मिलता है | जो यहाँ शहर में बैठ कर हम नहीं देख पाते | वो स्वयं कहती हैं कि ,  “मैंने जब 1977 से कहानी लिखने के लिए कलम उठाई तब से यही कह रही हूँ कि जहाँ रहती आई हूँ उस भूमि की, नदी की पर्यावरण की कथा किसी ने नहीं लिखी | वह स्थान ओझल ही रहा | वह स्थान ओझल रहा तो स्त्री भी ओझल ही रही | मेरी कहानी पढ़कर कुछ तो टूटा |” उनके विमर्श शहरी स्त्री के सरोकारों से ना जुड़े होकर भारतीय गाँवों की स्त्री के सरोकारों से जुड़े हैं | जहाँ आज भी भारत की 80 प्रतिशत आबादी रहती है |


गाँव की स्त्री के सरोकार शहरी स्त्री के सरोकार से भिन्न हैं | उसके कष्ट अलग हैं | वहाँ  सवाल शुचिता का नहीं है |  आज हम शहर में जिन ‘लिव इन’ संबंधों की बात कर रहे हैं, जिन पर लिखी कहानियाँ नए ज़माने के तथाकथित  ‘दैहिक विमर्श’ के खाँचे में धकेल दी गयी हैं,  वो गाँवों में मौजूद ही नहीं है  पूरी तरह से स्वीकार्य भी है | किसी की यहाँ  का समध कर लेना, किसी की चूड़ी बदल लेना ये सब शब्द गाँवों में आम हैं | स्त्री की शुचिता का वो प्रश्न यहाँ नहीं दिखता जिस पर शहरों में तलवारें तन जाती हैं | वो दुखी है पर उसके दुःख अलग हैं |


सच्चाई ये है कि  उनके जीवन में  कष्टों की नदी का कोई ओर छोर नहीं है | उनके पति शहर में रोजी रोटी कमाने चले जाते हैं और पीछे बच जाती हैं औरतें | ये औरते जो परिवार के विरिष्ठ लोगों द्वारा प्रताड़ित की जाती हैं | अकेली जीवन काटती बच्चों को पालती स्त्री के मार्ग में अपने ही क्या –क्या काँटे बो सकते हैं वे उस पर मार्मिकता से प्रहार करती हैं | रोजी-रोटी  की तलाश में जो औरतें गाँवों से आकर बड़े शहरों  में झुग्गियों में बस गयीं हैं | वो हमारे बड़े शहरों के वो अँधेरे कोने हैं जिस पर हम प्रकाश डालने से भी बचते हैं | रोज सुबह समय पर आकर हमारे घरों की फर्श को आईने की तरह चमकाने वाली हमारी कामवालियों, घरेलु सहायिकाओं  की अपनी निजी जिन्दगी किस कालिमा में डूब रही है उसका किसी विमर्श का हिस्सा न बनना निराशाजनक है | शहर आ कर अपनी पहचान खो चुकी ये चेहराविहीन स्त्रियाँ अपने अस्तित्व की लड़ाई नहीं लड़ती,ये दो जून रोटी की लड़ाई लड़तीं हैं | हर सूर्योदय के साथ इनका संघर्ष उदय होता है और हर सूर्यास्त को पस्त हुए तन-मन के साथ अस्त होता है कुछ घंटों की बेचैन रात  में ठहरने के बाद अगले सूर्योदय को फिर उदित होने के लिए | हालांकि ये स्त्रियाँ  संघर्षशील स्त्रियाँ  है | वह किसी स्थान पर अटक कर रोते हुए जिन्दगी नहीं काटती बल्कि संघर्ष करते हुए आगे के रास्ते बनाती है | इनके जीवन में आपसी इर्ष्या और परनिंदा है पर समय आने पर ये एक दूसरे को सहयोग देकर फिर से खड़ा करने में भी तत्पर रहती हैं |


“जीवन की गति न्यारी है | नदी तल से निकाली मिटटी की तरह फिर समतल हो जाना नियति है |


जब आप कहानी के माध्यम से आगे बढ़ते जाते हैं तो सिर्फ आप कहानी ही नहीं पढ़ते लोक जीवन से रूबरू होते हैं | लोक संस्कृति से रूबरू होते हैं | गाँव के पंचायत निर्माण की प्रक्रिया हो या प्रधानी के चुनाव किस तरह सम्पन्न होते हैं उसकी जानकारी भी मिलती है | वहाँ घांटो जैसा मजबूत चरित्र हैं जो गाँव के विकास के लिए, शिक्षा के लिए, जरूरी सुविधाओं के लिए काम करता है, तो घूँघट वाली ऐसी औरतें भी हैं जो सरपंच तो बन गयी हैं पर वैसे ही घरेलु कामों में व्यस्त हैं और सरपंच के मुखौटे के पीछे असली सत्ता उनके पति संभाले हुए हैं |चालाकियाँ, गुट बाजी, अपने खेमे, वर्चस्व की लड़ाई ,  सब कुछ अनपढ़ और मासूम  से ग्रामीणों  में भी वैसे ही आम है जैसे शहरों में | आखिर असली मानव स्वाभाव भिन्न थोड़ी न है |

 गयी  झुलनी टूट –लोक में रची बसी एक संघर्ष कथा 

गयी झुलनी टूट की लेखिका -डॉ . उषाकिरण खान

गयी झुलनी टूट पढ़ते हुए न जाने कितनी बार लगा कि जैसे मन में कहीं से कुछ टूट गया है | कुछ दरक गया है |मन के चारों तरफ दर्द पसर गया | ये दर्द कमली का दर्द था तो घांटों का भी | किसना का तो जगत का भी | हम कमली के दर्द के साथ रोते कलपते  आगे बढ़ते जाते हैं पर हर पात्र अपने हिस्से का दर्द जी रहा होता है | अपने हिस्से का संघर्ष  कर रहा होता है और अपने हिस्से की गलतियों पर पछता रहा होता है | हम जीव विज्ञान में एक शब्द पढ़ते हैं बायो मैगनिफिकेशन | यानि किसी भी  जहरीले  पदार्थ खाद्य श्रृंखला में एक स्तर से दूसरे में जाने पर अधिक सान्द्र होते जाना  | कभी –कभी दुःख भी जीवन में ऐसे ही आता है | एक बार अपनी चपेट में ले लेता है तो उम्र के हर पड़ाव पर बढ़ता ही जाता है | तभी तो कमली का दर्द पन्ने  दर पन्ने बढ़ता ही रहा |

दगा दे गए बालम, गयी झुलनी टूट |
सगरो सोनरवन  से गयी यारी छूट
दगा दे गए बालम, गयी झुलनी टूट |



ये कहानी है दूध से गोरी व् चाँद सी सुंदर कमलमुखी उर्फ़ कमली की | जिसकी  एक ही इच्छा है कमलदह में रात्रि  में कमल की पंखुड़ियों में बंद निर्मोही भौरे को  प्रभात की स्वर्णिम रश्मियाँ पड़ते ही उड़ जाते हुए देखना | इसीलिये वो भोरे –भोर कमलदह जा कर प्रतीक्षा करती है | इसके लिए डांट भी खाती हैं, पर उसकी ये इच्छा कभी पूरी नहीं होती | हालांकि उसके जीवन के संग्राम में उसके स्नेह से जीवन रात्रि में पोषित भँवरे उड़ते रहे और वो गहन पीड़ा के साथ ये सब देखती रही | क्या कमल भी ऐसी ही पीड़ा से जूझता होगा ...हर सुबह | कहाँ समझ पाते हैं हम मौन  प्रकृति की भाषा | कमली पढ़ती थी ...पढना चाहती थी पर उसके आँसुओं की भाषा कौन पढ़ सका ?

“कमली कमलदह के किनारे बैठकर पुरइन के पत्तों के ऊपर चढ़ी जलमक्खियों को देखती | एक जलमक्खी के पीछे कई –कई लग जातीं कोमल हरित पत्र काँपता, जलबिंदु आँसुओं से ढुलक जाते |


कमली इस गाँव में तब आई थी जब वो अपनी माँ के पेट में थी | यहाँ  उसकी मौसी रहती थी | सम्पन्न घराने की विधवा माँ अपने दुःख दर्द को कुछ कम करने के प्रयास में यहाँ आई और यहीं की हो कर रह गयी | मौसी के देवर जगत से उसने उस समय सम्मध कर लिया जब उसकी पत्नी घांटों अपनी बीमार माँ की तीमारदारी के लिए अपने गाँव गयी हुई थी | इसके बाद ना तो घंटों कभी गाँव आई न ही जगत और देवकी ने उसे कभी बुलाने का प्रयास ही किया | घांटों और जगत की जोड़ी बहुत प्रेममय थी | घांटो की घंटी जैसे हँसी पूरे गाँव में प्रसिद्द थी | इसी लिए उसका नाम घांटों पड़ा | गाँवों  में नाम ऐसे ही पड़ते हैं | इस पर उषा दी बड़ी रोचक जानकारी देती हैं ...


बाबा की जलढारी  मढिया की वजह से गाँव का नाम मढिया पड़ा | पाकड़ पेड़ गाँव के किनारे खड़ा है तो पकरिया | ठूँठा पाकड़ खड़ा हो तो ठुठठी पकरिया | बड़ गाछ खड़ा हो तो बडगाँव, महुए का बहुत पेड़ हो तो महुआड़ | मढिया के चारों तरफ छोटे –छोटे गाँव हैं, सिटकिया, नौला , भालुआहा सभी गज भर की दूरी पर | भलुआहा  में कमलदह है | खूब भरा हुआ कमलदह | बरसात में डूब जाता है और पानी कम होने पर जग जाता है अपनी पूरी इयत्ता  के साथ |


कमली को पिता का जो भी प्रेम मिला जगत से ही मिला | उसकी माँ देवकी के जगत से कई और बच्चे हुए | जिनको पालने का जिम्मा कमली का था | कमली पूरी जिम्मेदारी से ये काम और खेत बाथन सँभालती पर माँ के स्नेह से वंचित ही रहती | पता नहीं क्यों उम्र बढ़ने के साथ उसके खिलते रूप को देखकर देवकी डर जाती | उसे मढिया पर जाने से भी रोकती | उसके ब्याह की बात करने पर देवकी जगत को भी बरज देती, “ काहे दूसरे के बच्चे का चिंता करते हो |” फिर भी बचपन था तो कमली खुश ही रहती | उसके लिए तो जगत भी अपना था औरर छोटे भाई बहन और साथ में ही अपना था कमलदह | पर जिन्दगी यहाँ ठहरी नहीं | एक दिन उसके चाचा उसे लिवाने आ गए | माँ भी ब्याह के खर्चे से बचना चाहती थी | सो उस परिवार की अमानत को उसे ही सुपुर्द कर दिया | ये सोचे बिना कि कमली अचानक से उन्हे कैसे स्वीकर कर पाएगी | अपने छोटे भाई बहनों जिनमें उसका मन रमा रहता है उनके बिना कैसे जी पाएगी | कैसे रह पायेगी भालुआहा की कमलिनी इटहर में | पर समझौता  करना तो स्त्री की किस्मत में लिखा है कर ही लेगी सोचकर देवकी –जगत के घर से कमली काका के साथ  विदा कर दी गयी | कमली का घर पैसे वाला था |पर उनकी नीयत में खोट था | वो कमली के हिस्से का जेवर-खेत आदि  हडपना चाहते थे |


उधर घांटों की शादी उसके भाइयों ने उससे बीस साल बड़े दोहाजू जोखड मरड से कर दी | उससके दो बच्चे थे | पैसे वाला घर था | घांटो ने विमाता होते हुए भी बच्चों को स्नेह दिया | पर उसका पति उसे प्रेम का वह सुख नहीं दे सका जो जगत से मिला था | नव यौवन के पाँच वर्ष तक चलने वाले अल्हड़ , मनमौजी प्रेम की स्मृतिया उसे दंश की तरह चुभती थीं | उसके प्रेम को इस तरह जगत द्वारा अस्वीकार किये जाना वो कभी भूल ही नहीं सकी | वो अपनी गृहस्थी में रम गयी पर उसकी घंटी जैसे स्निग्ध हंसी गायब हो गयी | उसकी अपनी कोई संतान न हुई | काल चक्र कुछ ऐसा घूमा की  कमली घांटों  के पुत्र  रंजन की की दूसरी पत्नी बन कर उस घर में आ गयी | आ क्या गयी उसके चाचा ने ब्याह की शर्ते रखी कि वो कमली के हिस्से के लिए परेशान  ना करें व् रुपये की मांग भी की | रंजन कमली से बारह वर्ष बड़ा था | उसकी पहली पत्नी की मृत्यु एक संतान को छोड़ कर हो गयी थी | आसपास के गाँव में कोई लड़की देने को तैयार ना था | बहन इटहर में ब्याही थी | सीधी सादी कमलिनी पर नज़र पड़ी और बात बन गयी | कमली सादे ढंग से बिना ढोल –बताशे के सिरिपुर आ गयी |


शुरू में जब तक घांटो को कमली का अतीत नहीं पता था उसका व्यवहार कमली के साथ अच्छा ही था | परन्तु साल भीतर जोखड मरड की मृत्यु के बाद उसके काका द्वारा सारा रहस्य जानने के बाद घांटो की पुरानी स्मृतियाँ ताज़ा हो गयीं | घाव फिर से हरे हो गए और निर्दोष गर्भवती कमली से दुर्व्यवहार कर वो उन घावों पर मलहम लगाने की असफल कोशिश करने लगी |

“ए मलकीनी, झाड़ू लेकर बीच आँगन में किस खसम को दिखाने बैठ गयी हो ? आधा आँगन  बुहारकर छोडोगी ? कुलाक्षिनी तो हो ही | जनम से पहले बाप को लील गयी, और इस घर में गोर पैर रखते ही हमारा सेनुर चाट गयीं , अब हमारे इकलौते बेटा पर दांत गडाई हो |”


सास के अत्याचार बहु को किस तरह तोड़ते हैं ये घर उसका उदहारण बनने लगा | इसके बाद कहानी चार कोनो को समेट कर आगे बढ़ने लगी | एक कोना जहाँ जगत और देवकी हैं जो कहीं न कहीं अपनी बेटी की खोज खबर ना लेने के कारण अपराधबोध ग्रस्त हैं | जगत का अपराधबोध ज्यादा है क्योंकि वो समय के साथ जान गया कि कमली की सास घांटो ही हैं जो उसे कष्ट पर कष्ट दे रही है | कभी उसे अपने द्वारा घांटों पर किये अन्याय का दर्द होता  कभी कमली को इटहर भेज देने का तो कभी देवकी को कमली का सही हाल न बता देने का |

घांटो ने  कई बार दांत पीसते हुए सुनाया था कि देवकी ने उसका बसा बसाया घर उजाड़ दिया | उसे देवकी का बदला मुझसे लेना था क्योंकि मैं ही उसका अपराधी हूँ देवकी नहीं | अपने दिमाग से जगत मरड यह विचार निकाल ही नहीं पा रहा था कि सबसे बड़ा अपराधी वाही है कमली का |”


दूसरे कोने पर कमली है जो एक पैसे वाले घर की बेटी और पैसे वाले घर की बहु होते हुए भी पटना में दूसरों के घरों की जूठन साफ़ करने वाली काम वाली बाई बन जीवन के दिए में तेल भरने की कोशिश में लगी | न जाने क्यों कमली का जीवन वृत्त पढ़ते हुए मिथिला की बेटी सीता मैया का ध्यान आने लगता है | सम्पन्न मायका और  ससुराल होने पर भी स्त्री के हिस्से के दर्द का भोग कम नहीं होता | पर वो अपने हिस्से का संघर्ष करती है | अपने बच्चों को अपने दम पर पालती है | प्रेम के नाम पर जंगी सिंह के शोषण का शिकार भी होती है | टूटती है पर फिर उठ खड़ी होती है |



तीसरे कोने पर खड़ी है घांटों जो अपने जीवन की प्रेम की कमी को दुनियावी सफलता से भर लेना चाहती है |इससे उसके आहत स्वाभिमान को राहत मिलती है |  वो एक खराब सास है ...पर क्यों ? ये सवाल उसके तमाम अत्याचारों  में भी उसके साथ संवेदना रखने को विवश करता है | उसने अपने आप को गाँव के लिए पूरी तरह झोंक दिया है |  वो पंचायत में बैठती है | सरपंच बनती है , मुखिया बनती है पर वो उन पैसों से अपना घर नहीं भरती | गाँव की भलाई के लिए खर्च करती है |रिवाल्वर का लाइसेंस  लेने जाने पर समझाए जाने पर उसके दुर्प्रयोग की बात को वो समझती है और बिना आवेदन करे लौट आती है | उसमें निर्णय  लेने की क्षमता है |  घांटों में मुझे एक सशक्त स्त्री दिखाई देती है | उसमें कुछ इंसानी कमजोरिया है पर वो सशक्त स्त्री हैं | जो बुजुर्गों और स्त्रियों  के लिए खोले गए शिक्षा केन्द्रों में मुखिया होने के बावजूद खुद पढने जाती है | पढना सीखती है | जब वो सभा में तमाम पूरुष सरपंचों द्वारा अंगूठा लगाए जाने के बीच अपने हस्ताक्षर करती है तो पाठकों का दिल जीत लेती है |


घांटो और कमली के चरित्र में एक समानता मुझे खासी आकर्षित करती है कि पति द्वारा ठुकराए जाने पर वो वापस पलटकर पति के पास नहीं जातीं | हालाँकि कि दोनों के मन में हूक  है पर स्वाभिमान उस पर हावी है | वो स्त्री सशक्तिकरण का वो नमूना पेश करती हैं जो हमारे गाँवों में है और शहर की स्त्रियाँ उसके लिए संघर्ष करना शुरू कर रही हैं | कितना विरोधाभास है,  पर यही सच है | दोनों की हूक  का एक –एक उदाहरण दे रही हूँ ...


घांटो ...  "तुमने उस मोम की पुतली में कौन सा जुवार देखा जो हममें  नहीं था | जोबन मेरा छार कर दिया | हिलक –हिलकर  कर रोती  घांटों बरसों पीछे चली गयी | “

कमली ..., “ भाभी जितना आप जानती हैं, वह मैं भी जानती हूँ, रेशम सुखी रहेगी | दबंग मरद और दुलार करने वाली सास जिस औरत के हों उसको क्या, दुख |” इस वाक्य में कमलमुखी की जीवन भर की पीड़ा का उत्स छिपा था | 


तीसरे कोने में कमली का पति रंजन कुमार है | जो दब्बू स्वाभाव का है | विमाता के अत्याचारों से जब वो अपनी पत्नी की रक्षा नहीं कर सका तो “ आँख फूटी पीर गयी” की तर्ज पर  कलकत्ता भाग गया | उसने अपनी पत्नी का कभी साथ नहीं दिया | उसे घर से निकाले जाने की खबर मिलने पर भी उसे ढूँढने का प्रयास नहीं किया | वो कमली से प्रेम करता था | उसने दूसरा विवाह नहीं किया पर किसी भगोड़े की तरह अकेले पूरा जीवन काट दिया | गाँव के लोगों में शहर जैसा बेगानापन नहीं होता वो एक दूसरे की खबर रखते हैं | रंजन कुमार को भी कमली के कामवाली बाई बनने का पता चल गया था | वो उसके प्रति अपराधबोध से ग्रस्त तो रहता है पर आगे बढ़ कर उसका जीवन सुधारने का कोई प्रयास नहीं करता | न ही अपने बिछुड़े बच्चों की खोज खबर लेने का प्रयास करता है | चाहे रंजन कुमार हो या जंगी सिंह ये तो बस बच्चे पैदा करने में अपनी भूमिका निभाते हैं बच्चों की जिन्दगी तो माँ ही पार लगाती है |


इनके बीच में मास्टर सीताराम जी का भी  चरित्र है जो गर्म धरती पर बारिश की फुहार सा लगता है | मास्टर सीताराम पढ़े –लिखे व्यक्ति हैं | जिन्हें जोखड मरड ने अपने बच्चों को पढ़ने के लिए गाँव में बसा दिया था | इस अहसान का बदला मास्टरजी जीवन भर चुकाते हैं | अनपढ़ घांटो का चुनाव में साथ देते हैं | उसके कागज़-पत्र देखते हैं | वे सारी उम्र गाँव के बच्चों की शिक्षा के लिए प्रतिबद्ध रहते हैं |



और अंत में जीवन एक नदी है , जिसके रास्ते में पर्वत हैं , पत्थर हैं, घाटियाँ है | उसे संघर्ष से ही आगे बढ़ना है | किसी का जीवन पर्वतों से  टकराकर अथाह पीड़ा से साथ रास्ता बनाता है तो किसी का घाटियों में गिरने के बाद ही समतल मैदान में चलने का अवसर पा पाता है | किसी के रास्ते पत्थर ही पत्थर हैं , जो उनसे सर फोड़ता, टकराता दम साधता  हुआ आगे बढता रहता है | सुखी यहाँ कोई नहीं है | सबके अपने –अपने संघर्ष हैं | कमली का संघर्ष बहुत बड़ा है वह पाठक के ह्रदय को तार-तार कर देता है | परन्तु घांटो का संघर्ष,  रंजन कुमार और जगत का अपराध बोध भी हौले से दिल में अपने सशक्त दस्तखत दर्ज करता है | ८० वर्ष का जगत जब अपराध बोध से अपना पुराना जीवन याद कर रहा होता है |

“किसी एक व्यक्ति के सुख से ना तो खेतों में हरियाली छा जाती है ना उसके दुःख से खेत नदियाँ तालाब सूख जाते हैं | जब मन में पीड़ा का आलोड़न हिलोर मारने लगता है तब भी चेहरे पर मुस्कान बनाए रखना पड़ता है सामने की पौध के लिए |”

जगत उठ कर चौकी पर लेट गया | आँखे मूँद कर मढिया वाले बाबा से दुआ मांगी की कल का सूरज ना देखूं |


कहते हैं जीवन ताश के पत्तो का घर है एक पत्ता हिला नहीं कि आगे ना जाने कितने पाते गिरते जाते हैं | एक पत्ता जगत ने गिराया घांटों के साथ अपनी सुखी गृहस्थी के बंधन तोड़ कर उसके बाद ना जाने कितने पत्ते गिरते गए निरपराध , निर्दोष | इससे  कमली का ही नहीं किसना का भी जीवन चपेट में आया | आगे की पीढ़ियाँ प्रभावित हो गयीं |इस उपन्यास की खास बात जो आकर्षित करती है स्त्री का स्त्री के संघर्ष में साथ देना | चाहे वो सिरिपुर की बुजुर्ग औरतें हो जिन्हें पता चलता है कि घांटो की बहु कमली सम्पन्न परिवार की होते हुए भी फाटे कपड़े  पहनती है | तेल, कंघा नहीं कर पाती तो वो सास के अत्याचार से उसे बचाने के लिए रोज उसके घर आ बैठती हैं |


“किसी सास को छुट्टा थोड़ी ना छोड़ दिया जाएगा बहु पर अन्याय करने को | ? कौनो हवेली दारों का घर है की बहु को चाँप चढ़ा के दफ़न कर दिया और  किसी को कानों कान खबर नहीं |”

वहीँ कामवाली बाइयों के घरों में भी तमाम ताक –झाँक और निंदा के बावजूद एक –दूसरे को गिरते से थाम लेने का जज्बा है |  


यूँ तो पूरा उपन्यास बेहतरीन है पर सबसे ज्यादा प्रभावित करती है उपन्यास की भाषा | जहाँ कथा के स्तर पर उषा दी ने लोक बसा दिया है वहीँ भाषा से उस रंग को और भी चटक कर दिया है | कभी –कभी सोचती हूँ की अगर इसमें सामान्य हिंदी भाषा का प्रयोग होता तो ? तो शायद लोक से जुडी होने के बावजूद ये कथा निष्प्राण हो जाती है | कथ्य –शिल्प और भाषा तीनों स्तर पर इस सुंदर तालमेल के लिए उषा  दी को हार्दिक बधाई | क्योंकि ये असली जीवन की कहानी है इसलिए संघर्ष उस पर कुछ विजय फिर संघर्ष कुछ विजय ....फिर किसी ना किसी संघर्ष पर ही छूट जानी है | जीवन की कहानियाँ भी तो किसी न किसी संघर्ष ने निपट कर किसी दूसरे संघर्ष से युद्धरत पर अधूरी छूट जाती हैं | ऐसे आंतों को सकारात्मक या नकाराताम्क की श्रेणी में नहीं रखा जा सकता | कहा जा सकता है तो बस इतना ...

दगा दे गए बालम, गयी झुलनी टूट |
सगरो सोनरवन  से गयी यारी छूट
दगा दे गए बालम, गयी झुलनी टूट |


किताब घर प्रकाशन से प्रकाशित इस उपन्यास में 135 पृष्ठ हैं | अगर आप लोक से जुडी असली संघर्ष कथाएँ पढना चाहते हैं तो ये उपन्यास जरूर पढ़ें |

गयी झुलनी टूट –उपन्यास
लेखिका –उषा किरण खान
प्रकाशक –किताबघर
पृष्ठ -135
मूल्य – 270 (हार्ड  बाउंड )
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समीक्षा -वंदना बाजपेयी 
समीक्षा -वंदना बाजपेयी



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