आधी आबादी कितनी कैद कितनी आज़ाद -किरण सिंह

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जटिल प्रश्न 

आधी आबादी कितनी कैद कितनी आजाद इसका उत्तर देना काफी कठिन है क्योंकि उन्हें खुद ही नहीं पता वे चाहती क्या हैं...! वह तो संस्कृति , संस्कारों , परम्पराओं एवं रीति रिवाजों के जंजीरों में इस कदर जकड़ी हुई हैं कि चाहकर भी नहीं निकल सकतीं.... स्वीकार कर लेती हैं गुलामी.... आदी हो जाती हैं वे कैदी जीवन जीने की पिंजरे में बंद परिंदों की तरह जो अपने साथी परिंदों को नील गगन में उन्मुक्त उड़ान भरते हुए देखकर उड़ना तो चाहते हैं किन्तु उन्हें कैद में रहने की आदत इस कदर लगी हुई होती है कि वे उड़ना भूल गए होते  हैं और यदि वे पिंजरा तोड़कर किसी तरह उड़ने की कोशिश भी करते हैं  तो बेचारे मारे जाते हैं अपने  ही साथी परिंदों के द्वारा....! 
मध्यम और निम्न वर्ग की महिलाओं की तो स्थिति और भी दयनीय है वह ना तो आर्थिक रूप से आजाद हैं ना मानसिक रूप से और ना ही शारीरिक रूप से..! छटपटाती हैं वे किन्तु कोई रास्ता नहीं दिखाई देता है उन्हें और वह अपने जीवन को तकदीर का लिखा मानकर जी लेती हैं घुटनभरी जिंदगी किसी तरह...! 
दूसरा तबका जो सक्षम है , उड़ान भरना जानती हैं , नहीं आश्रित हैं वे किसी पर, उन्हें नहीं स्वीकार होता है कैदी जीवन, उन्हें चाहिए आजादी ,अपनी जिंदगी की निर्णय लेने की... उन्हें नहीं पसंद होता है किसी की टोका टोकी.. इसीलिए बगावत पर भी उतर जाती हैं वे कभी कभी ....! चूंकि समाज संस्कृति और परंपराओं की घूंघट ओढ़े स्त्री को देखने का आदी रहा है इसलिए स्त्री के ऐसा उन्मुक्त रुप को सहजता से स्वीकार नहीं कर पाता....! 
बदलाव की तरफ बढ़ रहा है समाज , दर्जा मिल रहा है घरों में बेटा बेटियों को बराबरी का...... कानून भी महिलाओं के पक्ष में बन रहे हैं .. फिर भी  महिलाएं अभी तक आजाद नहीं हैं...खास तौर से अपने जीवन साथी के चुनाव करने में जहाँ लड़कों की पसंद को तो स्वीकार कर लिया जाता है किन्तु लड़कियों को आज भी काफी कठिनाइयों का सामना करना पड़ता है...! 
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©कॉपीराइट किरण सिंह 

अटूट बंधन 

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