लघुकथा – कला

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कला

तुम्हारा क्या … दिन भर घर में रहती हो … कोई काम धंधा तो है नहीं … यहाँ बक बक वहां बक बक … आराम ही आराम है … बस पड़े पड़े समय काटो । एक हम हैं दिन भर गधे की तरह काम करते रहते हैं ।

ये कहते हुए श्रीनाथ जी ऑफिस के लिए निकल गए 

अनन्या आँखों में आंसू लिए खड़ी रही । ज्यादा पढ़ी लिखी वो है नहीं,  घर के कामों के अलावा उसके पास जो भी समय होता कभी टीवी चला लेती कभी किसी को फ़ोन मिला लेती … आखिर समय तो काटना ही था ।
पर पति पढ़ा लिखा पुरुष है …. ऊंची पदवी , नाम , उसके पास समय का सर्वथा अभाव रहता है । जो थोड़ा बहुत समय मिलता भी है वह आने जाने वाले खा जाते हैं ।

अनन्या के हिस्से में पति का समय तो नहीं आता पर शिकायत करने पर ताने जरूर आ जाते हैं

समय बदला … अब श्रीनाथ जी रिटायर हैं । न ऑफिस का काम है … न पदवी के कारण दिन भर घर पर लगा रहने वाला लोगों का मजमा । बच्चे दूसरे शहर में रहते हैं । माँ से तो घंटों फ़ोन पर बात करते है पर पिता से बस हाल चाल … क्योंकि एक तो श्रीनाथ जी को फ़ोन पर इतनी बात करने की आदत नहीं है और दूसरे समय अभाव के कारण बच्चों से इतना घनिष्ठ रिश्ता भी नहीं बना ।
अनन्या व्यस्त है । घर के काम … पड़ोस की औरतों के साथ सत्संग …आदि आदि । पति के लए अब उसके पास समय नहीं है ।
निराश … ऊबे हुए श्रीनाथ जी एकदिन अनन्या से पूछते है ‘ तुम कैसे इतनी आसानी से समय काट लेती हो ‘।
अनन्य मुस्कराकर कहती है ‘ कोई चीज़ व्यर्थ नहीं जाती … आपने बड़ी बड़ी डिग्री हांसिल की जो जीवन भर आपके काम आई । मैंने केवल यही डिग्री हांसिल की जो अब मेरे काम आ रही है ‘।
समय समय की बात है ।
आखिर समय काटना भी एक कला है ।
वंदना बाजपेयी
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1 COMMENT

  1. बहुत बढ़िया वंदना जी। जीवन जीने की कला अनपढों को भी बखूबी आती हैं यह आपने लघुकथा के माध्यम से बहुत खूबी से बता दिया।

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