स्मिता दात्ये के दोहे






आँखें उलझी नेट में, मोबाइल में कान
टेक्नोसॅवी हो रहे, बच्चे बूढ़े जवान।
स्वयं मानव ने बुना, अपनी खातिर जाल
अभी जाने आगे क्या, होगा उसका हाल।।
दुनिया कर ली मुट्ठी में, भुला दिया घरबार।
अनदेखा अनसुना रहा, अपना ही परिवार।।
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न बदली है न बदलेगी नेता तेरी जात
टेढ़ी पूँछ श्वान की तीन ढाक के पात।
जनता पर ऐसे पड़ी किस्मत तेरी मार
कल कहा जिसे लुटेरा, अब है तारणहार।।
श्वेत वस्त्र पर यों चढ़ा राजनीति का रंग।
पल पल बदलता देखकर गिरगिट भी है दंग।।
जब जब भी आरक्षण की चले कहीं भी बात।
वे कहते अधिकार है, ये कहते सौगात।।
पाँव लटकते कब्र में, सत्ता छोड़ी न जाय।
संत कबीरा कह गए, लालच बुरी बलाय।।
जोश नहीं कुछ काम का, अनुभव का है मोल।
यह कहकर वे बजा रहे, अपना अपना ढोल।।
लेन-देन कोयले का,  होंगे काले
हाथ।
मुँह भी काला कर लिया यह अचरज की बात।।
करोडों की माया है एक रुपये की आय।
यह चमत्कार कैसा है कोई ज़रा बताय।।
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फैला शीतल चांदनी, बोला अकड़कर चांद।
सूरज अपनी धूप का यह देखो अनुवाद।।
धूप चढ़ी सहा न गया, जब सूरज का ताप।
दूब की आँखों से तब, ढली ओस चुपचाप।।
कितना सिखाया चांद को, तू भी तपना सीख।
सूरज वही कहलाता, तोड़ चले जो लीक।।
झाडी, झुरमुट घास पर पसरी अजगर धूप।
हेमंती सर्दी का ये ठिठुर सिहरता रूप।।
पहाड़ चढ़ सूरज थका, कल लूँ कुछ आराम।
नींद उसे ऐसी लगी, सुबह हुई ना शाम।।
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स्मिता दात्ये 

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