काव्य जगत में प्रस्तुत हैं अन्तरा करवड़े की पाँच कवितायें |

अन्तरा  करवड़े की पाँच कवितायें |

काव्य जगत में प्रस्तुत हैं अन्तरा  करवड़े की पाँच कवितायें | जिनमें कुछ में लयात्मकता है तो कुछ गद्य की हद तक जा कर अपनी बात कहने की कोशिश करती है | ये एक नयी शैली है पर इसमें भावों की लय  कहीं टूटती नहीं है | 


1
झूला


झूले पर बैठा नन्हा मन
जिसे मीठी यादों के दादा धकियाते हैं                
लेता है पींगे कल के लिए
फिर कल के ही समीकरण उलझाते हैं
बचपन से आगे का पेन्डुलम
सम्हल नही पाता फिर यह आना जाना
थमता जाता है झोंकों का सिलसिला
सच्चाई में पींगों का गढ्ढों में तब्दील हो जाना
मन बडा होकर झूलता नही है
लेकिन स्थिर होकर भी झोंकों को भूलता नही है
झूले की पींगों से नाता जोडता है
खुद की याद को धकियाता दादा बनकर
झूले में खुद को ही झुलाता जाता है
फिर नन्हा सा मन हो जाता है



2

हो जाओ तुम पत्थर………


हो जाओ तुम पत्थर मै तुम पर फूल फूल गिरता जाऊंगा
तुम्हे कद ऊंचा इतना दूंगा कि तुम्हारी नीची आंखे पा जाऊंगा
मिले तुम्हे धन मान सम्मान मै भरपेट तुम्हे खिलाया करूंगा
दुनिया में तुम बडे. खड़े हो तुममे तुमको ही सुलाया करूंगा
होंगी जो आंखे सबकी तुमपर मै सबपर आंखे अपनी रखूंगा
बहते गिरते पड़ते तुमको हंस कौवे का ज्ञान भी दूंगा
गाओगे जब विजय गान तुम थोड़ा जल धर जाया करूंगा
तुम मुझको कोसो फिर जी भर मै ही तुम्हे याद आया करूंगा
हो जाओ तुम पत्थर मै तुम पर फूल फूल गिरता जाऊंगा
तुम्हे कद ऊंचा इतना दूंगा कि तुम्हारी नीची आंखे पा जाऊंगा
स्वप्न सजाओ तुम माया के मैं प्रेम की छाया करता रहूंगा
तुम ऊंचे बस बढ़ते जाना मैं सीढ़ी बन बिछता जाऊंगा
चढ़ते सूरज से तेजस तुम मैं जल बन ताप सहता जाऊंगा
ढ़लते दिन से थके हारे तुम मैं सिर पर हाथ फिराया करूंगा
खुद से चाहो दूर तुम होना मैं मन की डोर बंधाता रहूंगा
रिश्तों में सीलन जो आए मैं ही तपिश दे मिटाता रहूंगा
हो जाओ तुम पत्थर मै तुम पर फूल फूल गिरता जाऊंगा
तुम्हे कद ऊंचा इतना दूंगा कि तुम्हारी नीची आंखे पा जाऊंगा
दुनिया की तहज़ीब अजब है तुम्हे गिरने से बचाता रहूंगा
होंगे जब दुश्मन वो तुम्हारे मैं प्रेम प्रस्ताव देता रहूंगा
तरूणाई के सुंदर स्वप्न तुम मै शरीर नही मन को तकूंगा
ढ़लती धूप के साथ तुम्हारे तन को सहारा दिये चलूंगा
भटको रेगिस्तानों में तुम मैं दहलीज़ें याद दिलाया करूंगा
शर्मसार घर से जब हो तुम बिरह गीत गा बुलाता रहूंगा
हो जाओ तुम पत्थर मै तुम पर फूल फूल गिरता जाऊंगा
तुम्हे कद ऊंचा इतना दूंगा कि तुम्हारी नीची आंखे पा जाऊंगा
आंसू तुम्हारे खारे होंगे समुंदर मै बन जाया करूंगा
तुम जो जीवन से रूठे तो कठिनाई मै जी जाया करूंगा
हो जाओ जब लक्ष्यहीन तुम लक्ष्य बन तीर झेला करूंगा
मौत बुलाए तुम्हे जो कभी तान के छाती खड़ा रहूंगा
तुम मुझे अपना भर कह दो मै खुद को भुला बस तुम्हारा रहूंगा
हिल जाने दो नीवें फिर ये पत्थर मै बन जाया करूंगा
हो जाओ तुम पत्थर मै तुम पर फूल फूल गिरता जाऊंगा
तुम्हे कद ऊंचा इतना दूंगा कि तुम्हारी नीची आंखे पा जाऊंगा



3
जब वसीयत विरासत हो जाती है


रिश्तों के पौधों पर पनपते सिक्के अचानक खनकने लगते हैं
लकडी से छडी पर पदोन्नति के साथ मुखौटे ढाई इंच में सजते हैं
किसे मेला दिखाया और कंधे पर बैठाया की यादे जोर मारने लगती है
रिश्तों के नवीनीकरण की योजना भी तब असर दिखाने लगती है
कब? जब वसीयत विरासत हो जाती है
घर की एक एक ईंट शरीर की हड्डी सी प्यारी बन जाती है
कोने कोने से अधिकारों की अमरबेल उग आया करती है
आपकी सांसों की सलाईयों से सपनो की इबारते बुनी जाती है
वर्तमान की कडाही से निकली यादों की खुरचने तब खाई जाती है
कब? जब वसीयत विरासत हो जाती है
राखी भाईदूज पर उपहारों का स्तर ऊंचा हो जाता है
गांव के खेत का छोड का दाना भी मोती मोती लगता है
कभी खण्डहर रही पुरानी तांबे की कोठी भी इमली पा जाती है
किटी जाति बहूरानी को भी गांव की नाईन तब याद आ जाती है
कब? जब वसीयत विरासत हो जाती है
पुरखों के इतिहास की गर्द सम्मान से झाडी जाती है
फिर बडों का मन रखने को छत पर मुंगौडी भी तोडी जाती है
बच्चों के नाक और आंखें किसी पूर्वज से मिलाई जाती है
और बेढब ही सही चौखट पर रंगोली की लकीर भी तब खिंच जाती है
कब? जब वसीयत विरासत हो जाती है
टूटा चश्मा सुनहरी फ्रेम बन आंखों पर इतराता है
और बुजुर्गों के कागज सम्हालने को वक्त भी अब मिल जाता है
कमर झुकाकर बच्चो को मम्मी आदर मान करना सिखलाती है
और अटाले में पडी सासूजी की फोटो फ्रेम तब सुहागन हो जाती है
कब? जब वसीयत विरासत हो जाती है
लेकिन चमकती हैं दो आंखें सुनहरी फ्रेम के पीछे से
अनुभव कहता है कि खरपतवार ही उगती है बिना किसी के सींचे से
ये बहता प्रेम नदिया तो नही, बरसाती नाले की ही प्रजाति है
और राजहंस बन बुजुर्ग की नज़रें, जो करना है कर जाती है
कब? जब वसीयत विरासत हो जाती है



4
हम क्या हैं                                                 

क्या ऎसा नही लगता कि हम सभी के भीतर एक सुकरात जिंदा है
कभी ना कभी तो जहर का प्याला हम भी पीते हैं, हंसते हंसते
फिर कभी हमारी भी तो बदसूरती दिखाई देती है आईने को
और हम भी अपनी ही सोच की जेल में बंद रहते हैं, थोडे अधार्मिक होकर

इससे आगे चलें तो हममें कभी वॉल्डेन के थोरो जिंदा दिखाई देते हैं
लौट पडते हैं हम भी उन्ही की मानिंद भगवदगीता की ओर
आध्यात्मिकता को ओढते हैं, भौतिकता को बिछाते हैं, धर्म जीने लगते हैं
फिर अचानक स्वाद बदलने को, मिट्टी माथे से लगाने झुकते हैं

यात्रा जारी रखेंगे तो कोई पगलाया सा निमाई भी मिलेगा हममें
हां हां, चैतन्य महाप्रभु, सत्य के स्पर्श से आल्हादित, प्रमुदित निमाई
लेकिन हमारे पगलाएपन में भी ध्यानाकर्षण का चैतन्य होता है 
तभी कोई हमें नही कहता कि काश सभी हमारे समान पागल हो सकते

मन के शांत ताल में कभी राबिया होती है तो जुन्नैद भी टहलते हैं
लेकिन इनकी दरवेशी के किस्से हम मेहंदी रचाकर ही सुनते हैं
मन की उडानों में हम भी सूफी तो कभी झेन हो जाना चाहते हैं
अपनी सहूलियत के हिसाब से हम थोडा कबीर भी गा लिया करते हैं

मन ठहर ठहर करता है लेकिन बस हां कह गुजरते जाते हैं
पहले हम कहीं से गुजरते हैं फिर तो गुजरे हुए हो जाते हैं
सब कुछ हो जाने की चाह में शायद शून्य परिभाषित करते हैं
बेहतर शब्दों की तलाश में मन गीत मुरझाने लगते हैं

चूंकि भोर चाहिये तो बस सिंदूरी सूरज ही तो बनना होगा हमें
उथली बतकहियों से गहरे, मन समुन्दर की सीपियों के मुहानों पर
खारे समुन्दर की टक्कर का है चेहरे की दो झीलों का सैलाब यहां पर
एक भरी पूरी सांस ही काफी होगी फिर इस दुनिया के जवाब में



5
तुमसे

वो छोटी सी बात ये मन कभी नही कह पाएगा
तुमसेकुछमिल जाता है, ये मान ही ना पाएगा
तुम भी पक्की मिट्टी के हो, मैं पत्थर की मूरत जैसी
तुमसे कहनी बारिशें है लेकिन, सूखा ही रह जाएगा

कितने तो सैलाब है रोकें, कितने सपने दफन किये
शब्दों के सागर को रोका, तुमको मन के मौन दिये
तुम माटी, मेरे ना के आंसू, देखो आह के फूल खिले
आंखे भिगोई बारिश में कि तुमको भी कुछ चैन मिले

नही कहूंगी कहते कहते सपने सजाने लगती हूं
तुमवोनही हो, कहते कहते तुमको जीने लगती हूं
तुम हो मौन अटल तो ये भी खेल बस मेरे मन का है
आंसू तुम्हारे नही है, ये तो आंखों में कोई तिनका है

डर लगता है तट को छोड़ ये शब्द उफन कर कह ना पडे
जतन से बनाए झूठ के बांध ये तुम्हे देखकर बह ना पडे
अपनी चुप्पी मुझको दे दो, शायद झरना हो जाएगा
तुमसे कहनी बारिशें है लेकिन, सूखा ही रह जाएगा



अन्तरा करवड़े

कवियत्रि



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