ओ री गौरैया !

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ओ री गौरैया !
 कई दिनों से
वो गौरैया उस रोशनदान पर घोसला बनाने में लगी थी
| वो एक-एक
तिनका अपने चोंच में दबा कर लाती और उस रोशनदान में लगाने की कोशिश करती पर उसकी
हर कोशिश नाकाम हो जा रही थी कारण ये था कि उसी रोशनदान से डिश का तार कमरे के
भीतर आ रहा था इस लिए उसके द्वारा रखे जा रहे तिनके को आधार नही मिल रहा था और वो
तिनका नीचे गिर जा रहा था पर इस बात से बेखबर गौरैया लगातार तिनका अपनी चोंच में
लाती जा रही थी
| नीचे गिरे हुए तिनकों का ढेर उठा-उठा कर मै फैंकती, थोड़ी
देर बाद फिर से ढेर लग जाता



गौरैया का परिश्रम देख कर मै परेशान हो रही थी उसका घोसला
बनने लगता तो मुझे खुशी होती पर उसके द्वारा लाया गया हर तिनका नीचे आ रहा था
| मै
दो दिन से यही देख कर परेशान थी पर उसके लिए मै कुछ भी नहीं कर पा रही थी
, अचानक
ही मेरे मन में एक ख्याल आया
, मैंने घर के सामने लगे पेड़ से कुछ पतली-पतली शाखाएँ तोड़ी और
पत्तियों सहित ही उसे मोड़ कर छुप कर कमरे में स्टूल पर चढ़ कर खड़ी हो प्रतीक्षा
करने लगी कि गौरैया अपना तिनका रख कर उड़े तो मै जल्दी से उसे रोशनदान में फँसा दूँ
ताकि उसके द्वारा रखे गये तिनके को नीचे से सहारा मिल जाय और वो घोसला बना सके
(गौरैया तिनका कमरे के बाहर की तरफ से लगा रही थी )
| वो
ज्यों ही तिनका रख कर उड़ी मैं कमरे के भीतर से उन पतली मुड़ी हुयी डंडियों को
रोशनदान में फंसाने लगी मै हटने ही वाली थी कि गौरैया तिनका ले कर वापस आ गई और
वहाँ पर हलचल देख कर घबरा कर चीं-चीं-चीं-चीं करते हुए वापस उड़ गई
, शायद
वो डर गई थी
|


एक क्षण के लिए मै भी सकते में आ गई पर फिर सोचा कि अभी वापस
आ जायेगी और अबकी बार वो अपना घोसला बनाने में सफल हो जायेगी पर देखते-देखते पूरा
दिन बीत गया वो वापस नही आई
, बाहर उसका दाना-पानी भी यूँ ही रखा रहा | दूसरा
दिन भी बीत गया
, अब मुझे अपराधबोध हो रहा था | कहाँ से कहाँ
मैंने उसके काम में हस्तक्षेप किया पर अब क्या करूँ
? कैसे
बुलाऊं उसे
? कोई इंसान हो तो उससे क्षमा मांग लूँ, उसकी
मनुहार कर उसे मना कर ले आऊँ पर अब क्या करूँ
? मेरी समझ में नही आ रहा था कि उस नन्हें
परिंदे को मै कैसे बुलाऊँ ..
? मेरा मन अब किसी काम में नही लग रहा था | बार-बार
मै बाहर झाँक कर देखती कि शायद वो पानी पीने ही चली आये
; पर
वो नही आई
| तीन दिन बीत गये अब मेरा मन बहुत उदास हो गया, उसके
साथ एक रिश्ता सा बन गया था
| मै उसके लिए रोज दाना-पानी रख देती, वो
आ कर तुरंत ही दाने चट कर जाती
, पानी पीने तो वो दिन में कई-कई बार आती


कई
बार उसके साथ पूरी फ़ौज होती
, तब वो लड़ते झगड़ते दाना चुनतीं और कई बार तो पानी का कटोरा ही
उलट देतीं
| मै फिर से कटोरा भर कर रख देती | इन
परिंदों के साथ बहुत सुख मिलता मुझे
, उन्हें पानी पीते और दाना चुनते देख
कर मुझे आत्मिक संतुष्टि मिलती थी पर अब मै उसकी आवाज सुनने को तरस रही थी
| उसे
कैसे बुलाऊँ
? कई दिन बीत गये, मुझे अपनी बेबसी पर रोना आ गया..अपनी
गलती कैसे सुधारूँ
? मुझे कुछ समझ नही आ रहा था अचानक ही मुझे धीरे से चीं-चीं की
आवाज सुनाई दी
| मैंने जल्दी से अपनी आँखें पोंछी और दबे पाँव जा दरवाजे की ओट
से देखने लगी
, मै सावधान थी इस बार कि कहीं मेरी आहट पा कर वो फिर से ना उड़
जाय
| मैंने
देखा
, वो
पानी पी रही थी
, मेरा मन खिल उठा, असीम सुख की अनुभूति हुयी जैसे कोई
रूठा हुआ वापस आ गया हो
| मै धीरे से वापस अपनी जगह आ कर बैठ गई और उनकी उपस्थिति को
महसूस करने लगी
, धीरे-धीरे कई गौरैया आ गईं थीं


उनकी
आवाजें बता रही थीं कि पानी पीने कई गौरैया आ गयीं हैं
| मेरा
मन चहक उठा अचानक ही पानी का कटोरा छन्न से गिरा इस बार मै दौड़ कर बाहर आई मेरी और
उनकी नजरें जैसे ही चार हुईं वो चीं-चीं करते हुए फुर्र से उड़ गयीं
, मेरे
मन में खुशी की फुलझडियाँ सी फूटने लगीं
, मै मुस्कुरा कर उनका कटोरा उठा कर
दोबारा भरने के लिए भीतर आ गई
| मेरी नन्ही सखी ने मुझे माफ़ कर दिया था, अब
वो फिर मेरे घर में चहक रही है और उसके साथ मै भी………
मेरी
प्यारी सखी तुम यूँ ही आती रहना क्यों कि तुम्हारे बिना ये घर
, घर
नही लगता………….
|


मीना पाठक कानपुर
लेखिका



(एक निवेदनकृपया गौरैया के लिए अपने घर की छत पर या अपने छोटे से बगीचे
में या अपने खुले बरामदे में दाना-पानी आवश्य रखें
| रख कर देखिये
अच्छा लगेगा
|)

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