जीवित कामायनी

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जीवित कामायनी


इंतजार करती है———–
अपने कोठे पे बैठ हर शाम कोई ग्राहक।
न आने पे फिर वहीं से खोलती है,
जहा से उसने मोड़ रखा था——–
जय शंकर प्रसाद की कामायनी।
डबडबाई आँख मे मनु और इडा से ज्यादा,
भर आते है आँसू !
ये अथाह पीड़ा के फफोले का फूटना रोज सहती है,
इसी कोठे पे———–
जब कोई आता दिखता है,
तो टुटी कुंडी वाले दरवाज़े की तरफ बढ़ चलती है,
ग्राहक की जल्दबाजी में————
बंद करते दरवाज़े की टुटी कुंडी की आवाज़,
का मतलब वे समझ—————-
अपने एक-एक कपड़े को उतारती है,
और चारपाई पे————–
उसका ग्राहक पैसे सुलता है!
फिर थकी मादी उठती है———-
मरहूम जय शंकर प्रसाद की ये जीवित कामायनी।

@@@रचयिता—–रंगनाथ द्विवेदी।
जज कालोनी,मियाँपुर
जौनपुर।


कवि व् लेखक



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