चरित्रहीन , ये ऐसा अपशब्द है जो केवल स्त्री के ही हिस्से में आया है | सदियों से लेकर आज तक सवाल अब भी वहीँ है कि दो लोगों के गुनाह के लिए केवल स्त्री ही चरित्रहीन क्यों ?

                           
केवल स्त्री ही चरित्रहीन क्यों?




पति -पत्नी का रिश्ता एक मर्यादित रिश्ता है| स्त्री और पुरुष में से जब कोई किसी तीसरे के प्रति आसक्त होता है तो चरित्रहीन की गाली  केवल स्त्री को ही क्यों मिलती है| क्यों नहीं पुरुष को भी चरित्रहीन कहा जाता है| 

Why only women are labelled as "CharecterLess"

एक बार की बात है महात्मा बुद्ध एक गाँव में प्रवचन देने गए, उन्होंने गाँव में घूम –घूम कर प्रवचन देना शुरू किया | तभी एक स्त्री उनके पास आई और बोली महात्मन मैं जानना चाहती हूँ कि आप ने इतनी युवावस्था में संन्यास क्यों लिया|

गौतम बुद्ध ने उसे समझाया, “ ये शरीर अभी युवा है, स्वस्थ है, कल को रोग लगेंगे , वृद्धवस्था आएगी और एक दिन इस नाशवान शरीर का अंत भी होगा| जो चीज खत्म ही होनी है उससे मोह करके उसमें आसक्ति क्यों रखी जाए | क्यों न समय रहते इस शरीर का उपयोग ज्ञान को प्राप्त करने व् उसका प्रसार करने में किया जाए, जिसके लिए ईश्वर  ने हमें भेजा है| इसी कारण मैंने सन्यास लिया|


स्त्री महात्मा की बात से बहुत प्रभावित हुई | उसने महात्मा बुद्ध को अपने घर पर भोजन के लिए बुलाया| महात्मा बुद्ध ने सहर्ष उसका आमंत्रण स्वीकार कर लिया| जैसे ही ये बात गाँव के लोगों को पता चली उन्होंने महात्मा बुद्ध को उसके घर जाने से मन किया| उन्हने बुद्ध से कहा, “ आप इस गाव में नए हैं, आप नहीं जानते वो स्त्री चरित्रहीन है | इसीलिये वो गाँव के बाहर की तरफ रहती है, गाँव वाले उससे संपर्क भी नहीं रखते|

 उसकी बात सुन कर महात्मा बुद्ध ने उसका एक हाथ पकड लिया और कहा अब जरा ताली बजा कर दिखाओं? वह व्यक्ति थोड़ी देर हवा में हाथ चलाता रहा, फिर बोला महाराज , ये क्या अनर्थ है ? आपने मेरा एक हाथ पकड़ा हुआ है, अब एक हाथ से मैं ताली कैसे बजाऊं?

महात्मा बुद्ध ने उसका हाथ छोड़ते हुए कहा,  “ अभी तुमने स्वीकार किया कि एक हाथ से ताली नहीं बज सकती, तो फिर वो स्त्री अकेली ही कैसे चरित्र हीन हो सकती है? अवश्य ही इस गाँव के पुरुष भी चरित्र हीन होंगे, पर मुझे तो कोई पुरुष अपने परिवार से दूर वहां गाँव की सरहद पर अकेले रहते नहीं दिखा|  ये दंड केवल उस स्त्री को ही क्यों? जब मैं उन घरों में भोजन कर चुका हूँ जहाँ चरित्र हीन पुरुष रहते हैं, तो मैं उस स्त्री के घर भी भोजन करने जाऊँगा| गाँव के लोगों को महात्मा बुद्ध की बात समझ आगयी और वो उनके पैरों में गिर कर माफ़ी मांगने लगे|


                  
                   मित्रों, ये प्रेरक कथा बुद्ध के समय की है| तब से कितना समय बदला लेकिन समाज का नजरिया अभी भी स्त्रियों के लिए वैसा ही है| अभी भी दो व्यस्क लोगों द्वारा बनाये गए रिश्ते में सामाजिक अवहेलना की शिकार स्त्री ही होती है| स्त्री के ऊपर चरित्रहीन का धब्बा लग जाता है, जबकि पुरुष को ज्यादा से ज्यादा इतना कहा जाता है की वो उस स्त्री के जाल में फंस कर बहक गया था| क्यों नहीं पुरुष को भी कहा जाता है कि वो भी चरित्रहीन है| जब एक हाथ से ताली नहीं बज सकती तो फिर स्त्री अकेले ही चरित्र हीन कैसे हुई| सवाल अभी भी वहीँ है , जवाब हमें ही तलाशने होंगे?

टीम ABC
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Atoot bandhan

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7 comments so far,Add yours

  1. वाह्ह्ह...सत्य वचन👌

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    1. धन्यवाद श्वेता जी

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  2. लाजवाब

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  3. ये समाज पुरुष समाज है और अपने सामने पुरुष किसी को कुछ समझता नहि है ... झूठे दम पे सत्ता चलाता है ... जानकी केवल मारी के दम पे ये समाज, घर उर व्यवहार चलता है ... समाज को उन्नति करनी है तो नारी को मान देना ही होगा ...

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    1. धन्यवाद दिगंबर जी

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  4. बहुत बढ़िया।

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