भगवान् राम ने समुद्र पर पुल बनाते समय वानरों को एक ऐसा पाठ पढ़ाया जो कार्पोरेट जगत का महत्वपूर्ण सूत्र बना | | हमारे धर्म ग्रंथों में ऐसी अनेक कहानियाँ है जिनमें गहरा जीवन दर्शन छुपा है |

                               



आप सोंच रहे होंगे प्रभु श्री राम  , मर्यादा पुरुषोत्तम श्री राम, कौशल्या नंदन श्रीराम  दया के सागर  भगवान् राम का कार्पोरेट जगत से क्या मतलब हो सकता है| ये सोंचना ठीक वैसा ही है जैसे  सेब के नीचे गिरने का गुरुत्वाकर्षण से क्या संबंध हो सकता है| युनिवर्सल लॉ एक समान ही होते हैं, एक सामान ही काम करते हैं | हमारे सभी धार्मिक ग्रन्थ छोटी -छोटी कथाओं के माध्यम से जीवन के वो पाठ पढ़ाते  हैं जो कार्पोरेट ही क्या जीवन के हर क्षेत्र में काम करते हैं |  चाहे वो रिश्ते हों या राजनीति या फिर कार्पोरेट जगत , परन्तु हम धार्मिक किताबों को धर्म के रूप में " पूजा टाइम " में पढ़ कर रख देते हैं ,उनमें दिए गए गहन दर्शन को न तो समझने की कोशिश करते हैं न ही उनसे लाभ उठा पाते हैं | आपको ये जान कर आश्चर्य होगा की हमारे इन्ही ग्रंथों से सूत्र निकाल -निकाल कर आज कार्पोरेट जगत में इस्तेमाल किये जा रहे हैं , M .BA में पढाये जा रहे हैं | आज एक ऐसे ही पाठ की चर्चा करेंगे , जिससे आप अपने व्यवसाय , अपने परिवार के मुखिया के तौर पर रिश्तों में और एक नेता के रूप में अपनी पार्टी या संगठन में इस्तेमाल करेंगे तो  आपके व्यापार , परिवार और संघटन का विकास निश्चित है |

      जब भगवान् राम ने पढ़ाया कार्पोरेट जगत का महत्वपूर्ण पाठ 


                              बात तब की है जब प्रभु राम की सेना संमुद्र के   इकट्ठी थी | लंका जाने के लिए समुद्र पर पुल बनाने की तैयारी कर रही थी | सभी वानर बड़े- बड़े भारी-भारी  पत्थर उठा कर समुद्र में डाल रहे थे | उसी समय  गिलहरी जिसकी क्षमता मुश्किल से ५० ग्राम भर उठाने की    थी , १००    ग्राम भर का कंकण बड़ी मेहनत से  कर ला रही थी | तभी  वानर ने उसे देख लिया वो जोर से हँसा  , उसने गिलहरी से कहा ," अरी गिलहरी ये क्या कर रही है | ये पुल तो बड़े -बड़े पत्थरों से बनेगा , तेरे इस कंकण का भला क्या होगा , तू बेकार ही इसे उठाये घूम रही है |  परे हट , कहीं हम लोगों के पैर के नीचे दब   कर मर न  जाए , कहते हुए उसने गिलहरी को उठा कर दूर फेंक दिया | सारे वानर हँसने लगे | गिलहरी लगभग उडते हुए भगवान् राम के चरणों के पास आ कर गिरी | गिलहरी की आँखों में आँसू थे | उसे अपने फेंके जाने  दुःख नहीं था , उसे लग रहा था   कि भगवान् राम का काम करने में वो असमर्थ है | भगवान् राम ने गिलहरी को  उठाया , उसकी पीठ पर हाथ फेरा , कहते हैं उसी से उसकी पीठ पर तीन धारियाँ बनी | भगवान् राम उसे उठा  कर वानरों के पास आये और उनसे कहा तुमने गिलहरी के योगदान को कम कैसे कहा | उसका योगदान तुमसे भी ज्यादा है |    किसी भी कार्य में सबसे महत्वपूर्ण भावना है |

उसी दिन भवान राम ने एक महत्वपूर्ण सूत्र दिया



भगवान्र राम ने वानरों से कहा तुम पर्वत  उठा सकते हो पर उठा केवल बड़े -बड़े पत्थर ही रहे हो और ये गिलहरी जो केवल  ५० ग्राम ही उठा सकती थी वो १०० ग्राम यानी अपनी क्षमता से दोगुना उठा रही है , और तुम अपनी क्षमता से आधा काम कर रहे हो | देखना सिर्फ तुम्हारे बड़े पत्थरों से ही पुल न बनेगा उसके उठाये छोटे कंकण भी पुल को बनाने में बहुत काम आयेंगे | और यही हुआ  भी | बड़े पत्थरों से पुल तो बन गया पर उनके    बीच के गैप गिलहरी जैसे छोटे-छोटे जानवरों के द्वारा उठाये गए पत्थरों से ही  भरे |


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कैसे है ये कार्पोरेट जगत का महत्वपूर्ण पाठ


                                              भगवान् राम की इस कथा से कार्पोरेट जगत का महत्वपूर्ण सूत्र निकला ...

 आपके द्वारा किया गया कार्य         
............................................        X  100
आपकी कार्य क्षमता


अब गिलहरी की क्षमता ५० ग्राम वजन उठाने की थी वो १०० ग्राम उठा रही थी , तो फोर्मुले के अनुसार

100
----   X  100= २०० %    गिलहरी अपनी क्षमता का २०० % दे रही थी |
250
             
ये फार्मूला कार्पोरेट जगत में  इस तरह से काम करता है कि एक अच्छे  कम्पनी लीडर की ये खासियत है कि वो अपनी कम्पनी से हर सदस्य से उसकी क्षमता का  सर्वाधिक उपयोग करवा ले | इसके लिए जरूरी है कि वो उसकी   काम करने की इच्छा को पहचाने | हो सकता है कि शुरू में उसके पास इतनी क्षमता न हो , प्रतिभा न हो पर अगर  उसमें इच्छा है तो इन दोनों चीजों का विकास हो सकता है |  इसलिए उनकी इच्छा को पहचानना और उसे इनाम् देकर  प्रोत्साहित करना टॉप लीडर का गुण होना चाहिए |

कई बार टॉप लीडर अपनी कंपनी के कुछ प्रतिभाशाली नेतृत्व की शिकार हो जाती है जो अपनी क्षमता का आधा ही दे रहे होते हैं | ये वो लोग है जो सोंचते हैं कम्पनी उन पर टिकी है , ये छोटे प्रतिभाशाली लोगों को पनपने का मौका ही नहीं देते | वो निराश हो जाते हैं उनकी इच्छा शक्ति खत्म हो जाती है |  कई बार बड़ी पोस्ट पर बहुत प्रतिभाशाली लोगों के बैठने के बावजूद कम्पनी घाटे में चली जाती है क्योंकि हर काम का महत्व होता है | छोटे लेवल पर उतासहीनता  के कारण हर छोटा काम देर से होता है कम अच्छा होता है उसका असर पूरी कम्पनी पर पड़ता है |

( यहाँ एक बात खास है कि अगर कोई टॉप पोस्ट पर बैठा व्यक्ति अपना २०० % दे रहा है तो उसके महत्व को अगर कम आँका गया तब भी दिक्कत आएगी ... गिलहरी के काम को महत्व देने का अर्थ हनुमान के काम को नकारना नहीं है बल्कि एक टीम के रूप में सबको अपनी क्षमता के विकास का अवसर देना है )

राजनैतिक पार्टी के नेता के रूप में


                                              कोई भी राजनैतिक पार्टी बड़े -बड़े नेताओं से नहीं जीतती है | वो अपने कार्यकर्ताओं के उत्साह से जीतती है | इसका उदाहरण हम दिल्ली किरण बेदी की हार के रूप में देखा है | इसमें कोई शक नहीं कि किरण बेदी ज्यादा काबिल व् सुलझी हुई व्यक्ति हैं, फिर भी क्योंकि उन्हें बाहर से लाया गया था तो कार्यकर्ताओं के बीच ये मेसेज गया की उन्हें थोपा गया है , जिससे उनके उत्साह में कमी हुई , ये कमी उनकी हार के रूप में दिखाई दी | देखने में तो बड़े फैसले , बड़ी योजनायें बड़े नेता बनाते हैं | कार्यकर्ताओं को केवल  अपने हिस्से का थोडा-थोडा काम करना होता है | पर वो थोडा काम मिल कर के ही किसी राजनैतिक पार्टी की योजना को लागू  करवाने में सफल होता है |

                यूँ कार्यकर्ताओं की कोई पहचान नहीं होती पर इन्हीं कार्यकर्ताओं के कारण  पार्टी की पहचान बनती है | जो पार्टी अपने कार्यकर्ताओं के छोटे -छोटे योगदान को अनदेखा कर देती है वो कभी बड़ी पार्टी नहीं बन पाती है |

यहाँ भी वही  फार्मूला है ... कायकर्ताओं की क्षमता कम होती है , फिर भी अगर वो अपनी क्षमता का १०० % दे रहे हैं तो उनका योगदान भी संस्था को चलाने के लिए बड़े नेता के बराबर ही है | आगे ये कार्यकर्ता में से ही पार्टी को बड़ा नेतृत्व मिलता है |


5मिनट रुल -दूर करें काम को टालने की आदत

परिवार व् रिश्तों में


               देखा जाए तो परिवार समाज की सबसे छोटी संस्था है | आज परिवार टूट रहे हैं उसके पीछे सिर्फ नयी पीढ़ी का नहीं परिवार के मुखिया का भी दोष होता है | अगर आप परिवार के मुखिया है , तो आपको देखना होगा कि किसमें  काम करने की इच्छा है , क्षमता कम होने पर भी अगर वो अपना  १०० % दे रहे हैं तो  आपको उनका योगदान को भी सम्मान देना चाहिए |

 आपका कोई बेटा सम्पन्न है , कोई नहीं , कोई बहु सम्पन्न परिवार से है , कोई नहीं , ऐसे में तो आप उनके दिए उपहारों की तुलना करेंगे तो परिवार को जोड़ कर नहीं रख पायेंगे |

एक बहु कमाती है , एक घर में रह कर आपकी सेवा कर रही है , दोनों का योगदान है इस योगदान को एक मुखिया के नाते समझना होगा | जहाँ नौकरी करने वाली बहु अपने घर में बिताये जाने वाले थोड़े समय में घर के कामों के प्रति अपनी जिम्मेदारी महसूस करती है , निभाती है तो घर के काम में उसका भी योगदान का प्रतिशत नज़रअंदाज नहीं किया जा सकता , वही दूसरी ओर जो बहु सारा दिन घर का काम कर रही है ,आपको  समय दे रही है तो आपको समझना होगा कि समय पैसे से भी ज्यादा महत्वपूर्ण है | दोनों की तुलना नहीं हो सकती |

                                                     इस फार्मूले को परिवार के हर रिश्ते पर लागू किया जा सकता है , जहाँ  ये देखना है कि व्यक्ति अपनी क्षमता का १०० % दे रहा है या नहीं .. अगर व्यक्ति अपनी क्षमता का १०० % दे रहा है तो उसके योगदान को कम करके नहीं आँकना चाहिए , क्योंकि फिर वो निराश होकर उतना करना भी बंद कर देगा | परिवार को जोड़े रखने के लिए हर छोटे से छोटे सहयोग को  महत्व  देना होगा |

                                         मित्रों हमारे सारे धर्म ग्रथ कथाओं  के माध्यम से हमे जीवन दर्शन देते रहे हैं , जरूरत है उस ज्ञान को समझने की | देखिये कैसे राम कथा के माध्यम से  कार्पोरेट जगत का महत्वपूर्ण पाठ आने वाली पीढ़ियों तक  पहुँचाया  गया | आगे भी हमारा प्रयास रहेगा कि  इन कथाओं  के ऐसे ही  छिपे अर्थ आपके सामने लाते रहे |

वंदना बाजपेयी

फोटो क्रेडिट -navhindu.com


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Atoot bandhan

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4 comments so far,Add yours

  1. अगर मैनेजमेंट के नज़रिए से देखा जाए तो सभी आध्यात्मिक कहानियों में हमें कुछ ना कुछ सिख ज़रूर मिलती है| कहानियों के इस अतुलनीय संकलन के लिए बहुत बहुत धन्यवाद एवं शुभकामनाए|

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  2. रामायण गीता या महाभारत मेनेजमेंट की सीखों से भरे पड़े हैं ...

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