गिरगिट

गिरगिट

काॅलेज में परीक्षा चल रही थी। प्राचार्य महोदयअपने काॅलेज के व्याख्याताओं से घिरे बैठे थे। तभी फोन की घंटी घनघना उठी। उधर से आवाज आई, ’’मैं वरूण बोल रहा हूँ। घर में जरूरी काम हैमुझे कल छुट्टी लेनी पडे़गी। प्लीज सरबहुत जरूरी है।’’



प्राचार्य जी को ध्यान आयावरूण के पिताजी जज हैं और दूरदर्शिताव्यावहारिकता और प्रत्युत्पन्न मति का प्रयोग करते हुएउन्हांेने जवाब दियाठीक हैबेटाहम काम चला लेंगे। तुम छुट्टी ले लो।’’



जैसे ही प्राचार्य जी ने फोन का रिसीवर रखाएक व्याख्याता ने कहा, ’’सरआपने वरूण को छुट्टी कैसे दे दी कल तो अनिवार्य हिंदी का पेपर हैकाॅलेज के सभी कमरों में परीक्षा है।’’
’’कोई बात नहींवरूण के पिताजी जज हैंदुनियादारी भी कोई चीज है।’’

’’लेकिन सरउसके पिता तो रिटायर हो गएअब नौकरी में नहीं है।

’’अच्छामुझे तो पता ही नहीं था। कोई बात नहींअब मना कर देते हैं। वरूण का नंबर मिलाओ।’’



नंबर मिलते हीप्राचार्य जी नें कहा, ’’वरूणउस समयमैने ड्यूटी रजिस्टर नहीं देखा थाकल तुम्हें किसी भी हालत में छुट्टी नहीं दी जा रही है। …..नहींनहींकल तो तुम्हें आना ही है काॅलेज।’’ उन्होंने तुरंत रिसीवर रख दिया।
डाॅ॰ अलका अग्रवाल
भरतपुर ( राज)


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