जाने कितनी सारी बातें मैं कहते कहते रह जाती हूँ... ये दुनिया भर की औरतों के शब्द हैं , जो कभी मुँह से निकलते ही नहीं ... पढ़िए खूबसूरत ग़ज़ल

जाने कितनी सारी बातें मैं कहते कहते रह जाती हूँ


लफ्जों को समझदारी में लपेट कर निगल जाती हूँ 
जाने कितनी सारी बातें मैं कहते कहते रह जाती हूँ । 

और तुम ये समझते हो ,मै कुछ समझ नही पाती हूँ 
है प्यार तुमको जितना मुझसे , मै समझ जाती हँ । 

बड़ी मुश्किल से मुहाने पर रोकती हूँ ...बेचैनी को 
और इस तरह अपना सब्र....मै रोज़ आजमाती हूँ । 

आरजू हो ,  किसी मन्नत के मुरादो में मिले हो तुम 
सलामत रहों सदा.... दुआ मैं दिन भर गुनगुनाती हूँ ।

चाहे तुम रहो जहां कहीं ....तुम मुझसे दूर नही हो 
आखें मैं बंद करू और  अपने मन में  तुम्हें पाती है ।

अब कहीं कहां मेरा...... कोई ठौर या ठिकाना 
एक कड़ी हर रोज़ तुम्हारे और करीब आती हूँ || 

_________ साधना सिंह 
                     गोरखपुर 

लेखिका


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Atoot bandhan

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