midlife crisis एक मनोवैज्ञानिक समस्या है , जिसका प्रभाव शारीरिक स्वास्थ्य पर भी पड़ता है | इस समस्या से निजात पाई जा सकती है |

                 
Midlife Crises क्या है और इससे कैसे बाहर निकलें



  एक तरफ बुजुर्ग होते माता -पिता की जिम्मेदारी दूसरी तरह युवा होते बच्चों के कैरियर व्  विवाह की चिंता और इन सब से ऊपर अपने खुद के स्वास्थ्य का गिरते जाना या उर्जा की कमी महसूस होना | midlife जिसे हम प्रौढ़ावस्था भी कहते हैं  वो समय है जब लगातार काम करते -करते व्यक्ति को महसूस होने लगता है कि उसकी जिन्दगी काम के कभी खत्म न होने वाले चक्रव्यूह में फंस गयी है |तबी कई भावनात्मक व् व्यवहारात्मक परिवर्तन होने लगते हैं | जिसे सामूहिक रूप से midlife क्राइसिस के नाम से जाना जाता है |


Midlife Crises क्या है और इससे कैसे बाहर निकलें 


     याद है जब पहला सफ़ेद बाल देखा था ... दिल धक से रह गया होगा | क्या बुढ़ापा आने वाला है ? अरे हम तो अपने लिए जिए  ही नहीं अब तक | तभी किसी हमउम्र की अचानक से मृत्यु की खबर आ गयी |कल तक तो स्वस्थ था आज अचानक ... क्या हम भी मृत्यु की तरह बढ़ रहे हैं| क्या इतनी जल्दी सब कुछ खत्म होने वाला है |45 से 65 की उम्र में अक्सर लोगों को एक मनोवैज्ञानिक समस्या का सामना करना पड़ता है , जिसे midlife crisis के नाम से जाना जाता है | इसमें मृत्यु भय , अभी तक के जीवन को बेकार समझना , जैसा जी रहे थे उससे बिलकुल उल्ट जीने की इच्छा , बोरियत , अवसाद , तनाव या खुद को अनुपयोगी समझना आदि शामिल हैं | ये मनोवैज्ञानिक समस्या शार्रीरिक स्वास्थ्य को भी प्रभावित करती है |



                             उदहारण के तौर पर  कल रास्ते में  साधना जी मिल गयीं | बहुत थकी लग रहीं थी | धीमे -धीमे चल रही थीं | मैंने हाल चल पूंछा तो बिफर पड़ी , " क्या फायदा हाल बताने से ,  डायबिटीज है , पैरों में ताकत नहीं लगती ऊपर से अभी घुटने का एक्स रे कराया तो पता चला कि हड्डी नुकीली होना शुरू हो गयी है | डॉक्टर के मुताबिक अभी अपना ध्यान रख लो तो  जल्दी ऑपरेशन करने की नौबत नहीं आएगी  अब आप ही बताइये सासू माँ का हिप रिप्लेसमेंट हुआ है , बेटे के बोर्ड के एग्जाम चल रहे हैं , बाकी रोज के काम तो हैं ही ऐसे में तो लगता है कि जिन्दगी बस एक मशीन बन कर रह गयी है |



                   ऐसा नहीं है कि ये समस्या सिर्फ महिलाओं के साथ है पुरुष भी इससे अछूते नहीं हैं | रमेश जी  ऑफिस से लौटे ही थे कि पत्नी ने नए सोफे  के लिए फरमाइश कर दी | बस आगबबुला हो उठे | तुम लोग बस आराम से खर्चा करते रहो और मैं गधो की तरह कमाता रहूँ | अपने लिए न मेरे पास समय है न ही  तुम लोगों के बिल चुकाते -चुकाते पैसे बचते हैं |


                ये दोनों ही mid life crisis के उदाहरण हैं |इसके अतिरिक्त भी बहुत सारे कारण होते हैं | जैसे महिलाओं का मेनोपॉज व् माता -पिता की मृत्यु या किसे हम उम्र प्रियजन को खोना , अपने सपनों के पूरा न हो पाने का अवसाद ( इस उम्र में व्यक्ति को लगने लगता है कि उसके सपने अब पूरे नहीं हो पायेंगे क्योंकि उम्र निकल गयी है |



Midlife Crises के सामान्य लक्षण 


                                 यूँ तो midlife crisis के अनेकों लक्षण होते हैं जो अलग -अलग व्यक्तियों के लिए अलग होते हैं पर यहाँ हम कुछ सामान्य लक्षणों की चर्चा कर रहे हैं |

mood swings _ये लक्षण सामान्य तौर पर सबमें पाया जाता है | लोग जरा सी बात पर आप खो बैठते हैं | इसका बुरा प्रभाव रिश्तों पर भी पड़ता है |

अवसाद और तनाव - इसका शिकार लोग दुखी restless या तनाव में रहते हैं |

खुद के लुक्स पर ज्यादा ध्यान -  उम्र बढ़ने को नकारने के लिए खुद पर ज्यादा ध्यान देने लगते हैं | स्रि

बोरियत - ऐसा लगता है कि वो जीवन में कहीं फंस गए हैं जहाँ से निकलने का कोई रास्ता नहीं है | जीवन का उद्देश्य समझ नहीं आता |

मृत्यु के विचार - दिमाग पर अक्सर  मृत्यु के विचार छाए रहते हैं |

midlife crisis से निकलने के उपाय 
          
                   midlife crisis से निकलने के लिए कुछ सामान्य  उपाय अपनाए जा सकते हैं |

संकल्प -

                         बीमारी कोई भी हो सुधर का पहला रास्ता वो संकल्प है जिसके द्वारा ह्म ये स्वीकार करते हैं कि मेरी जिंदगी जैसे है वैसे नहीं रहनी चाहिए मुझे इसे बदलना है | अगर आप भी ये संकल्प ले लेते हैं तो समझिये आधा रास्ता तय हो गया |

ध्यान 


                          ध्यान एक बहुत कारगर उपाय है जो आपको अपनी तात्कालिक समस्याओं के कारण उत्त्पन्न तनाव व् अवसाद को दूर करने में सहायक है | दिमाग का स्वाभाव है कि वो एक विचार से दूसरे विचार में घूमता रहता है | कभी नींद न आ रही हो तो आपने भी ध्यान दिया होगा कि इसकी वजह ये नहीं थी कि आप रकिसी एक विचारपर केन्द्रित थे बल्कि आपका दिमाग एक विचार से दूसरे विचार पर कूद रहा था | जिसे आम भाषा में " monkey mind" कहते हैं | नेयुरोलोजिस्ट के अनुसार ये DMN या DEFAULT MODE NETWORK
है | ध्यान  मेडिटेशन हमें किसी एक विचार पर ध्यान  केन्द्रित अ सिखाता है | जिस कारण विचार भटकते नहीं है और गुस्सा , अवसाद व् तनाव जो कि अनियंत्रित विचारों का खेल है काफी हद तक कम हो जाता है | 



ख़ुशी की तालाश छोड़ दें 


                                 सुनने में अजीब लगेगा पर midlife crisis की एक बड़ी वजह ख़ुशी की तलाश है | लोग सोचते हैं कि कुछ ऐसा हो जिसमें वो खुश हो जाए | जब खुद छोटे थे तो ख़ुशी थी , युवा थे तो सपनों की ख़ुशी थी |बच्चे छोटे थे तो उनकी बातों में ख़ुशी थी |  प्रौढ़ अवस्था में ये सब खुशियाँ नहीं रहती तो लोग कारण तलाशते हैं कि ऐसा कुछ हो जाए तो खुश हो जाए , वैसा कुछ हो जाए तो खुश हो जाए | परन्तु ऐसा कुछ होता नहीं ... जिन्दगी अपनी गति से चलती है | ऐसे में ख़ुशी का इंतज़ार करने के स्थान पर ख़ुशी का निर्माण करना चाहिए | कितनी भी विपरीत परिस्तिथियाँ हों एक दिन छुट्टी लेकर सहेलियों के साथ निकल कर देखिये | एक -एक पल का आनन्द लें सोच पर खुद ब खुद असर पड़ने लगेगा | 



अपनी हॉबी विकसित करिए 

                                इस उम्र तक आते -आते हम भूल जाते  हैं कि हमारी भी कोई हॉबी थी | हॉबी वो काम है जिसे करने में हमें आनंद आता है |  जब जीवन से जीवंतता चली जाए तो याद करना चाहिए कि बचपन में हम ऐसा क्या करते थे कि हमें आनंद आता था | चित्रकला , लेखन , सिलाई , बुनाई , संगीत कुछ भी जो आप बचपन में करते थे उसे फिर से शुरू करिए | 



जीवन को उत्सव समझिये 


                                 जीवन अपने आप में उत्सव है | ये एक चमत्कार है कि इस समय हम जिन्दा हैं | ओशो के अनुसार जीवन के उत्सव में पूरी तरह से लीं हो जाइए | यहाँ कुछ बनना या पाना ही नहीं सिर्फ होना भर काफी है | आप के पास साँसे हैं तो आप अनुभूति कर पा रहे हैं |  सुख या दुःख , ख़ुशी या बोरियत इस अनुभूति का ही तो हिस्सा हैं | इसलिए जो कुछ मिला है उसके लिए शुक्रिया करते हुए जीना सीखिए | 



याद रखिये कि अभी भी कुछ नया कर सकते हैं 

उम्र बढ़ने का अर्थ जिंदगी खत्म होना नहीं है | कई लोगों ने प्रौढ़ावस्था से ही अपनी जिन्दगी को एक नया मतलब दिया | 

बोमन इरानी ने ४५ की उम्र में पहली फिल्म की |

मैत्रेयी पुष्पा जी की पहली कहानी छपी तब उनकी उम्र ४० के ऊपर थी |
सैम वाल्टन ने वालमार्ट की स्थापना ४४ की उम्र में की |
च्र्ल्स डार्विन ने ५० की उम्र में अपना रिसर्च वर्क पब्लिश किया |

                                  उम्र एक नंबर है | इससे ज्यादा कुछ नहीं | कभी भी नया करने की शुरुआत कर सकते हैं | 




                       जैसा की पहले भी कहा है midlife crisis एक मनोवैज्ञानिक समस्या है इसलिए मन को दुरुस्त रखने से ये अपने आप ठीक रहेगी | 


सरिता जैन 



लेखिका

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Atoot bandhan

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