इलाज केवल बीमार शरीर का ही नहीं होता , जीवन में अनेक परिस्थितियाँ आती हैं जिन्हें सही इलाज की जरूरत होती है |



कहानी -सही इलाज

विवाह के बाद अक्सर कुछ समस्याएं आती हैं , जिन्हें परिवार के लोग अपने अनुभव से सुलझाते हैं | ऐसी ही एक कहानी पढ़िए जहाँ बहु -बेटे की टूटती गृहस्थी को कैसे सही इलाज से बचाया गया 

कहानी - सही इलाज 

महानगर की भीड-भाड़ से दूर वो नवयुवक एक छोटे से कस्बे मे रहता था।पढ लिख कर अपने पैरो पर खडा था,यानि नौकरी करता था।एकाएक समय ने करवट ली।मंहगाई को देख वो आगे बढने के चक्कर मे एन.सी.आर मे नौकरी करने की लालसा करने लगा।क्योकि कस्बे मे रहकर पैकिज बढाना सम्भव नही था।
एक सुखद भविष्य की कल्पना मे वो दूर निकल गया घर से।एक मल्टीनेशनल कम्पनी मे ज्याब पाकर वो निहाल हो गया।पर ये क्या------पैकेज तो बढा,पर किराये के फ्लैट ने सारा मजा किरकिरा कर दिया था।
माता-पिता को भी साथ नही रख सकता था क्योकि अभी नौकरी से भी पूरी तरह संतुष्ट नही हुआ था।माता-पिता अपनी थोडी जी जरूरतो मे ही खुश थे।
इधर आजादी की बयार नवयुवक को ऐसी लगी थी कि बंधन अब कबूल ना था।पहले-पहल दोस्तो के संग वक्त गुजरता मजे मे। पर अब उमर हो रही थी,सभी दोस्तो की शादियो मे जा जाकर उस नवयुवक के मन मे भी विवाह करने की हसरत किलकारियां मार रही थी।कस्बे मे रह रहे माता-पिता से मिलने एकाध बार चक्कर लगा लेता पर अब मन करता था अपनी भी गृहस्थी जमे।।
इस बार जब वो घर आया तो अपनी मां से कहने लगा-
बेटा-मां अब मेरा ब्याह कर दो।क्या बुढापे मे मेरा विवाह करोगे?
मां-बेटा,हम तो खुद यही चाहते है कि कोई बहू बेटी बनकर हमारे घर आंगन मे घूमे।
बेटा-देखो ना मां,मेरे सभी दोस्तो की शादियां हो गयी,मै अकेला ही रह गया हूं!
मां-बेटा,बता तेरी नजर मे कोई है क्या?
बेटा-नही मां,आप ही देखो।
मां-बेटा,इस कस्बे की तो तुम्हे पसन्द आयेगी नही,फिर तुम्हारी पसन्द--------
बेटा-फिर क्या?
ऐसा है मां,आप मेरा एन सी आर मे ही मंदिर मे विवाह हेतु नाम लिखवा दो। वही की लडकी ढीक रहेगी।
मां-ढीक है बेटा।हम तो किसी को जानते नही,तुम्ही जाकर ये काम करो।
बेटा-ढीक है मां,मै ही ये काम कंरुगा।।
संयोगवश वहां भी एक परिवार ऐसा आया,जिसे इस नवयुवक का बायोडाटा जंच गया!इकलौता लडका था वो भी घर से दूर,,,,,
उनकी बेटी शादी की उमर क़ो भी पार कर चुकी थी बतीस बरस की हो गयी थी।कोई रिश्ता उन्हें जमा नही था।क्योकि तीन-तीन बेटियां थी,देने के लिये दहेज भी नही था।ऐसे वर की तलाश थी जो बिना दहेज ही उनकी बेटी ब्याह ले।घर बैठै-बैठे उनकी बेटी एम बी ए कर गयी थी,पर कोई भी नौकरी हेतु आवेदन करती,घबरा जाती व नौकरी छोड घर लौट आती।आत्मविश्वास की कमी थी उसमे।माता-पिता भी कब तक घर बैठाकर रखते,उन्हें भी अपनी जिम्मेदारी उतारनी थी।इस नवयुवक का बायोडाटा उन्हे जम रहा था।इसीलिये उन्होने तुरन्त लडके को फोन कर दिया।
लडका संस्कारी था उसने आदर से अपनी मां का फोन नं देते हुऐ वार्तालाप करने को कहा।पर लडकी के पिता को इतनी जल्दी थी कि वो लडके को देखने उसके आफिस ही पहुंच गये।
लम्बा उंचा कद,गोरा रंग,स्मार्ट लडके को देखते ही लडकी वालो की बाछे खिल गयी,!अब वो सोच रहे थे कोन सा पल हो ये रिश्ता हो जाये।
आननफानन मे उन्होने शहद मे घुली बाते की,लडके की मां से।और उन्हे अपने घर अपनी बेटी दिखाने को न्योता दिया।
शरीफ व सीधे सादे लोग उनकी शहद भरी मीठी बातो मे आ गये,बिना किसी रिश्तेदारों की सलाह लिये वो दोनो ही रेलगाड़ी से जैसे ही स्टेशन पहुंचे,लडकी का पिता गाडी लेकर उनके सामने था।आदरपूर्वक अपने घर ना ले जाकर किसी दर्शनीय स्थल पर ले आया था।लडके की मां ने घर देखने की मंशा जतायी,लेकिन वो बडी चालाकी से टाल गये थे।वही लडके को बुलाकर लडकी दिखा दी गयी।कस्बे के भोलेभाले लोग भावविभोर हो गये,उनकी खातिरदारी देख कर।सब कुछ जल्दीबाजी मे तय हो गया।दो ही दिन बाद लडकी वाले पूरे परिवार संग लडके वालो के घर थे।तुरन्त रौका कर दिया गया।लडके वाले चाहकर भी अपने रिश्तेदारों को इतनी जल्दी बुला नही पाये।एक माह बाद ही शादी का दिन तय कर दिया ।लडके वालो ने कहा-अभी थोडा समय दो!पर लडकी वालो ने दलील दी,हमे अपनी दूसरी लडकी की भी शादी करनी है!उसके रिश्ते भी आ रहे है,जबकि बाद मे तीन साल बाद दूसरी बेटी की शादी की थी।लडके वाले अपने बेटे की शादी बडी धूमधाम से अपने कस्बे मे ही करना चाह रहे थे पर लडकी वालो ने मना कर दिया,और अपनी जिद करके एन सी आर मे ही शादी हेतु आने को कह दिया,।सारे रिश्तेदार सीधे वही आ जायेगे,रेलगाडियों की आवागमन अच्छी है,तुरन्त शादी निपटाकर लौट जायेगे,आपको कोई परेशानी नही होगी,आप बस अपनी गाडी करके दुल्हन ले जाओ हम वहां सारा इन्तजाम बढिया कर देगे।अब किसी को भी ना कहने की गुजाईश ही नही थी।
जून माह की आग बरसाती गरमी मे विवाह सम्पन्न हुआ।भूख से ज्यादा प्यास सबको सता रही थी।
इधर वहां पहुचने पर खराब इन्तजाम देख लडके के माता पिता का माथा ठनका।खुद लडका भी परेशान हो गया,नहाना छोड पीने का पानी भी नही था।सारे बारातियों को परेशान देख कर सीधे-सादे माता पिता का सिर शर्म से पानी-पानी हो गया।वो कोस रहे थे उस दिन को कि वो क्यों लडकी वालो की बातो मे आ गये!इससे बेहतर वो लडकी वालो को अपने कस्बे मे बुलाकर विवाह सम्पन्न कराते।
विवाह के फेरे होते ही सब रिश्तेदार खिसकने शुरु हो गये।लडकी वाले अपनी बेटी की डोली घर से देगे,ये ऐलान कर अपने घर खिसक लिये।केम्न्टीसैन्टर पर हम दुल्हन संग कुछ लोग ही रह गये।उन्हे हमारे नाश्ते कि भी फिक्र नही थी।बाजार से हमने पानी की बोतले मंगवाई।इधर गाडी का डाइवर व फोटो वाला दोनो परेशान हो गये,वो लडके वालो पर दबाब बनाने लगे कि उन्हे दूसरी बुकिग पर जाना है।हार कर हम ही बिदा कर दुल्हन लेकर अपने घर लौट आऐ।

धीरे-धीरे लडकी वालो की असलियत सामने आ गयी थी।उन्हे सिर्फ लडके मे रुचि थी,उसके माया पिता मे नही।
क्योकि उन्होने अपनी बेटी को कोई संस्कार नही दिये थे।रसोई मे भी वो घुसने से डरती।खाना बनाना नही आता था।लाड प्यार मे बिगाड दिया था बेटी को।इसीलिये बेटी एन सी आर मे हमारी आंखो के सामने
रहे यही सोच ऐसा लडका चुना था।
ससुराल आकर बेटी का मन ना लगा।वो इस कस्बे मे कैसे रहेगी यही सोच लडकी की पिता पच्चीस दिनो मे ही बेटी को विदा कराने आ गया।सास ससुर को झूठ ही कह दिया कि इसका नौकरी के लिये काल लैटर आने वाला है। 
दुखी मन से लडके के माता पिता ने भेज दिया।पर उनके तो सपने ही टूट गये थे।सबसे बडी गाज तो लडके पर पडी थी,जिस लडकी को वो अपनी जीवनसंगिनी बनाकर लाया था वो त़ उसके माता-पिता को एक आंख पसन्द नही करती थी,ना ही वो कभी उनके संग रहना चाहती थी।बेटे की खुशियो को ध्यान मे रखकर बहू को रहने की इजाजत दे दी थी।बीमार व बूढे माता-पिता चाहते थे बस बहू बेटा खुश रहे।पर भीतर ही भीतर उनका दिल रो रहा था कि इकलौते बेटे के बिना हम कैसे जीवेगे?उनके बेटे के ये सपने थे कि हम हमेशा एक साथ रहे,।बेटा भी चाहता था कि मै अपने माता-पिता के संग एक आदर्श परिवार की रचना कंरू।पर अब सब बेकार हो गया था।बहू बेटे के संग आजादी मे रहना चाहती थी,जब बेटा डयूटी चला जाता वो भी मायके खिसक जाती,हर दम उसका ध्यान अपने परिवार पर लगा रहता।सास ससुर के प्रति अपनी जिम्मेदारी से उसने पल्ला झाड लिया था।
कुछ दिनो से बेटे बहू मे अब बजने लगी थी,सास ससुर फिर भी बहू का पक्ष लेते और अपने बेटे को समझाते।
देखते ही देखते चार बरस बीत गये।घर मे कोई भी वार त्योहार होते बहू ना आती।कस्बे मे अब कानाफूसी होने लगी थी।बहू का हरदम मायके भागना,सास ससुर को संदेह मे डाल रहा था,बहू बेटे की गृहस्थी किस मोड पर जाकर रूकेगी,इसी चिन्ता मे उन्होने एक फैसला लिया और अपने बेटे को एन सी आर की नौकरी छोडकर कही दूर साऊथ की और जाने की समझाईश दी।बहू मायके से दूर हो जायेगी,तो तेरी गृहस्थी सही से चल पढेगी।बेटे को माता पिता की बात जंच गयी ।देखते ही देखते बेटा एन सी आर को छोडकर हैदराबाद की ओर निकल गया,और अब मजबूरन बहू का मायके का मोह छोडकर बेटे संग हैदराबाद जाना पडा।सही इलाज के चलते बहू बेटे का घर टूटने से बच गया था।और एक नयी खुशी ने उनके जीवन मे दस्तक दे दी थी।नन्ही सी फूल जैसी बेटी को पाकर वो दोनो खुश थे।देखते ही देखते सारे मोती मिलकर माला का रूप ले चुके थे।।

रीतू गुलाटी(ऋतु)

लेखिका -रितु गुलाटी


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Atoot bandhan

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