प्रस्तुत है इतिहास के पन्नों में दबी एक सशक्त नारी डॉ. सिताबो के ऊपर लिखे गए लघु उपन्यास की समीक्षा


डॉ. सिताबो बाई -मुक्त हुई इतिहास के पन्नों स्त्री संघर्ष की दास्तान

डॉ.सिताबो बाई 
जन्म - १९२५ विक्रमी संवत 
पिता -बाबू राम प्रसाद सिंह 
विवाह -मौजा कादीपुर जिला बनारसछात्रवृत्ति के सहारे शिक्षा 
आगरा मडिकल कॉलेज से डॉक्टरी  की शिक्षा 
पहले जबलपुर फिर उदयपुर फिर बनारस में सेवाएं दी | 
BHU के निर्माण में दस हज़ार का चंदा दिया 
विधवा आश्रम, आनाथ आश्रम , वृद्ध आश्रम खोले 
अपनी सारी  जायदाद समाज के लिए दान कर दी | 
                      डॉ. सिताबो बाई का इतना परिचय जान कर आप अंदाजा लगा चुके हिन्ज कि आप किसी महान विभूति के बारे में पढने जारहे हैं | साथ में ये प्रश्न भी उठा होगा कि उस  ज़माने की डॉक्टर, समाजसेवी महिला के बारे में आपको आखिर पता क्यों नहीं है ? यही तो है नारी जीवन की त्रासदी | 
आइये जाने स्त्री संघर्षों की एक ऐसी दास्तान के बारे में जिसे उसकी मृत्यु के बाद इतिहास में भी जगह नहीं मिली ....


डॉ. सिताबो बाई -मुक्त हुई इतिहास के पन्नों स्त्री संघर्ष की दास्तान 





‘डॉ. सिताबो बाई’ उपन्यास पर कुछ लिखने से पहले मैं इसकी लेखिका आशा सिंह जी को बधाई देना चाहती हूँ कि वो अतीत की खुदाई कर ऐसे जीवंत चरित्र को ले कर आई हैं जिसने  बेदर्द  ज़माने द्वारा दिए गए हर दर्द को न सिर्फ सहा बल्कि उससे क्षत-विक्षत अपने तन और मन  के साथ उसे ही संघर्ष की सीढ़ी बनाया | दर्द और सितम बढ़ते गए, सीढ़िया बढती गयीं , अपनी अदम्य इच्छा शक्ति व् सेवा भावना के कारण निजी जीवन में दुखी बहुत दुखी होते हुए भी कर्म क्षेत्र में और सामाजिक जीवन में बहुत सफलताएं हासिल की | जी हाँ ! डॉ. सिताबो बाई वो सशक्त स्त्री रही हैं जिनके संघर्ष , श्रम और जनसेवा भावना को इतिहास के पन्नों में बड़ी बेदर्दी से दबा दिया गया |


इस उपन्यास को पढ़कर मुझे लगा कि प्रेम अपराधिनी अनारकली को दीवारों में जिन्दा चुनवा दिया गया इसके बारे में हम सब जानते हैं | परन्तु कितने सशक्त स्त्री चरित्रों को इतिहास के पन्नों में चुनवा दिया गया इसकी खबर किसी को नहीं है | ऐसा ही एक चरित्र मल्लिका के साथ में मनीषा कुलश्रेष्ठ जी ने न्याय किया तो आशा जी ने डॉ. सिताबो के साथ | निश्चित रूप से ऐसे बहुत से चरित्र होंगे जहाँ हमें कलम से  खुदाई कर के पहुँचना है और उनके संघर्षों को उचित सम्मान दिलवाना है |

ऐसे चरित्रों पर लिखना आसान नहीं होता जहाँ आपके पास साक्ष्य नहीं होते | गूगल भी कोई मदद नहीं करता | ऐसे में किसी अँधेरी सुरंग के पार कुछ उड़ती-उड़ती सी  रौशनी दिखती है उसे ही कलम के सहारे पकड़ना होता है | ऐसा ही काम किया है आशा जी ने | उन्होंने साक्ष्य जुटाने का बहुत प्रयास किया परन्तु पंडित मदन मोहन मालवीय जी के पत्र, सेविंग अकाउंट, हॉस्टल के बिल से ज्यादा कुछ प्राप्त ना कर सकीं , यहाँ तक की उनकी तस्वीर भी नहीं | ऐसे में लिखने में संघर्ष बढ़ जाता है | जितना लिखा जाता उससे कहीं ज्यादा लिख कर मिटाया जाता | कितना समय तो सूत्र तलाशने में निकल जाता |

पर आशा जी संकल्प की धनी रहीं और आखिर कार उनका ये दृण  निश्चय हज़ार बाधाओं  को पार करते हुए उपन्यास के रूप में हमारे सामने आ गया | इस काम में बनारस हिन्दू यूनिवर्सिटी ( B.H.U) से उन्हें थोड़ी बहुत मदद मिली पर उनके परिवार वालों से बिलकुल भी नहीं, कारण था अपने परिश्रम से अर्जित किये हुए समस्त धन को डॉ.सिताबो बाई  विधवा आश्रमों, बालिका ग्रहों और अनाथालयों के लिए दान कर गयीं थी | परिवार वालों को उनसे  आपत्ति थी ..घोर आपत्ति थी पर उनके धन से तो नहीं थी | फिर वो इतना बड़ा निर्णय कैसे ले गयी | पितृसत्ता की जड़े काटना इतना आसन नहीं होता | रोती-तडपती अबलाओं की कहानियाँ आगे बढ़ती हैं और सशक्त स्त्री चरित्र दबा दिए जाते हैं | कहीं दूसरी औरतों को उनकी हवा ना लग जाए |  

एक सीता को तो हम सब जानते ही हैं ...प्रेम और त्याग की प्रतिमूर्ति सीता, जिन्होंने  पत्नी धर्म निभाने के लिए राज सुख का त्याग किया, उनके साथ जंगल –जंगल भटकीं और बदले में उन्हें मिली अग्नि परीक्षा द्वारा खुद को निष्कलंक सिद्ध कर देने की सजा और उस पर भी शांति ना मिलने पर गर्भावस्था में त्याग  दिए जाने का फरमान | सीता सबकी आदर्श रहीं हैं क्योंकि वो आदर्श पत्नी, बहु और बेटी हैं | वो तर्क नहीं करती हैं, प्रेम करती हैं प्रेम के साथ कर्तव्य निभाती हैं | पूरी पितृसत्ता अपनी पत्नी बहु, बेटी में सीता को देखना चाहती है | सीता का यही रूप जनमानस में छाया रहा | बेटियों के नाम ‘सीता’ रखे जाने लगे | आखिर हमें बेटियों से त्याग और प्रेम के अतिरिक्त और चाहिए ही क्या था, इसी से तो कुल की इज्ज़त थी |  ये अलग बात है कि प्रेम और त्याग की प्रतिमूर्ति सीता ने जो संघर्ष किया , अपने पुत्रों को अस्त्र-शास्त्र की शिक्षा दी | इसे भी कालांतर में कलम की खुदाई से ही निकाला गया |

खैर सीतायें जन्म लेतीं रहीं और ना जाने कितनी सीतायें ...माता सीता की तरह धरा की गोद में समाती रहीं | ऐसी ही एक सीता थी जिसने  संवत 1925 में वाराणसी के पियरी कला मुहल्ला में बाबू राम प्रसाद के यहाँ जन्म लिया | भाग्य या दुर्भाग्य अपनी हमनाम की तरह इस नन्ही बच्ची की भी प्रतीक्षा कर रहा था | पर उस नन्हीं बालिका ने कदम –कदम पर संघर्ष का सहारा लिया और धरा की गोद में समाने की जगह सीता से डॉ.सिताबो बाई का सफ़र तय किया | महिलाओं के लिए एक मिसाल बनी डॉ. सिताबो बाई की जीवन गाथा समस्त स्त्रियों के लिए प्रेरणा दायक है |  

 
डॉ .सिताबो बाई की लेखिका  आशा सिंह
डॉ .सिताबो बाई की लेखिका  आशा सिंह

गौरवर्णा, आकर्षक नैन–नक्श वाली बालिका सीता पढने में भी तेज थी | उस समय लड़कियों की शिक्षित करना अच्छा नहीं समझा जाता था | चिंता यही रहती थी कि अगर लड़की शिक्षित हो गयी तो उसके योग्य वर कैसे मिलेगा | कोई भी पुरुष अपनी पत्नी को अपने से योग्य देख नहीं सकता, इस कारण मेधावी लड़कियों को भी या तो पढ़ाया ही नहीं जाता या बस आखर –आखर जोड़ कर बस कुछ पढने लायक बना दिया जाता | परन्तु सीता के पिता व भाई उसकी शिक्षा के पक्ष में थे | माँ और भाभी के विरोध के स्वर को वो ‘उसे तो स्कॉलरशिप मिलती है’, हम कहाँ पढ़ा रहे हैं कह कर दबा देते | सीता चौथी जमात तक पढ़ गयी | तभी उनकी भाभी की बुआ मिलने आयीं | सीता की बड़ी बहन विधवा थीं और पीती के वियोग के बाद मायके आ कर ही रहने लगीं थीं | सीता को पढ़ते देखकर उन्हें अच्छा नहीं लगा | उन्होंने भाभी के कान भरे कि एक ननद  तो बोझ है ही दूसरी को पढ़ा लिखा रही हो, योग्य वर नहीं मिलेगा तो तुम पर बोझ बन जायेगी | जल्दी से हाथ पीले कर दो ताकि तुम्हारी दुर्गति ना हो | वर भी उन्होंने ही सुझाया | कादीपुर में रहने वाली अपनी सखी के बेटे इद्रजीत सिंह |

इन्द्रजीत ठाकुर परिवार के थे और तीन भाइयों में बड़े थे | तीनों भाई स्वस्थ, सुंदर व् बलिष्ठ थे , पर करते कुछ नहीं थे | परिवार में कोई शिक्षित नहीं था | उन दिनों बिचौलिए का काम शादी करवाना होता था| जो दोनों पक्षों से झूठ बोल कर विवाह तक विशिष्ट बना रहता और उसके बाद उसे इस बात से कोपी मतलब नहीं रहता कि वर –वधु परिवार सुखी है या नहीं | बुआ कि भी चिंता बस  ब्याह करवाने तक ही थी | इसलिए उन्होंने चाँद पर एक दाग मानते हुए सीता के शिक्षित होने की बात ससुराल वालों को नहीं बताई और इंदरजीत कुछ करते नहीं हैं ये बात सीता के घरवालों को नहीं बतायी |

बिना ज्यादा दान दहेज़ के विवाह हो गया | नन्ही नाजुक सीता दूसरे ही दिन से रसोई सँभालने लगी | बेचारी दिन भर काम करती और सास की डांट सुनती | उन दिनों नारियों का यही तो प्रारब्द्ध था | अपनी जान से ज्यादा मेहनत करना और ताने सुनना | एक दिन उसकी देवरानी ने उसे रामचरित मानस  पढ़ते देख लिया | घर में इसकी जानकारी होते ही जैसे तूफ़ान आ गया | वो शिक्षित होने की अपराधिनी घोषित कर दी गयी | इन्द्रजीत उसके सामने अपने को छोटा समझने लगे | उनका प्रेम जाता रहा | भला कोई पत्नी अपने पति से योग्य कैसे हो सकती है ? पुरुष अहम् आड़े आ गया | वो तो उसी समय मायके भिजवा दी जाती पर गर्भवती थी | परिवार को वंश चलाने के लिए पुत्र का लोभ था | इसी बीच गाँव में खबर फैलने पर गाँव की महिलाएं उससे चिट्ठी –पत्री पढवाने –लिखवाने आने लगीं | कभी –कभी वो भेंट भी दे जातीं | नाकारा पति को ये और भी नागवार गुज़रता |जितना नागवार गुज़रता उतने ही ताने उसकी थाली में परोस दिए जाते और वो असहाय सब कुछ पी जाती |  


दिन आगे बढ़े सीता को प्रसव वेदना शुरू हुई | घर की एक बदबूदार कोठरी में प्रसव गृह बनाया गया था | वहाँ  सीता ने बच्ची को जन्म दिया |  लड़की पैदा हुई है यह सुनते ही घर में मातम छा गया | भोथरे  चाकू से प्रसव कराने के कारण बच्ची को टिटनेस हो गयी | सोबर के कमरे से सीता गुहार लगाती रही पर बच्ची थी, उसकी जान की क्या कीमत, कौन सुनता | ये वो दौर था जब स्द्धज्यता कन्याएं नमक चटा कर मार दी जातीं थी | अपनी ही बेटियों के हत्यारे, उस पर भी अपनी बहुओं को बेटी जनने के अपराध से मुक्त नहीं करते थे | नन्ही सी बच्ची  तड़प –तड़प कर उसे हमेशा के लिए छोड़ कर चली गयी | उसकी मृत्यु पर सीता के अलावा कोई नहीं रोया सब संतुष्ट थे | अब उन्हें सीता की कोई जरूरत नहीं थी | बेचारी मायके भेज दी गयी | अपने योग्य पत्नी होने का दंश इन्द्रजीत नहीं सह पाए और किसी को बिना बताये घर से निकल गए | लोगों को उम्मीद थी कि शायद वो जहाज से मॉरिशश  चले गए | हालाँकि अंत तक उनकी सीता से भेंट नहीं हुई |

कुलबोरनी के उपनाम से अपमानित, पति द्वारा परित्यक्त, अपनी पुत्री को खो चुकी सीता शिक्षित होने के अपराध की सजा भुगतते  हुए मायके में जीवन काट रही थी | ऐसे समय में भाई ने साथ दिया और कहा, “ तुम अलग हो सीता, तुम पढो, जितनी इच्छा हो पढ़ो, ज्ञान का आलोक ही तुम्हारे जीवन का मार्ग प्रशस्त करेगा | सीता ने अपने को पढाई में डुबो दिया | स्कॉलरशिप मिलने लगी | १८९८ में उन्होंने आगरा मेडिकल कॉलेज में प्रवेश लिया | भाई ने उनको दिशा दिखा कर दुनियावी साथ छोड़ कर परलोक प्रस्थान किया पर बड़ी बहन उनके साथ गयीं | सीता पढाई करतीं और वो घर के कामों से उन्हें मुक्त रखतीं | १९०४ में सीता डॉ . बन कर निकलीं |

मध्य प्रदेश से मिले वजीफे के कारण उन्होंने तीन साल तक जबलपुर के अस्पताल में अपनी सेवाएं दी | महिलाएं उस समय कम ही डॉक्टर होती थीं | ज्यादातर पुरुष डॉ. थे | वहीँ उनकी मुलाक़ात डॉ. माइकल से हुई जो इंग्लैण्ड से आये थे | डॉ . माइकल सीता के गुणों से प्रभावित थे | वो सीता के जीवन में प्रेम का रंग भरना कहते थे | पर सीता अपनी सफ़ेद खद्दर साड़ी पर कोई दाग नहीं लगने देना चाहती थीं | वो अपने भारतीय संस्कारों पर द्रण थी | उनका जीवन बस सेवा के लिए समर्पित था उसमें रंगों का और निजी खुशियों का कोई स्थान नहीं था | उन्होंने माइकल को मना  कर गीता के कर्म के सिद्धांत पर चलते हुए नंदलाल , गोपाल की मुर्ति को ही अपने  मन की  शरण स्थली समझ लिया | आज समय बदल गया है | हम इसे पक्ष और विपक्ष में देख सकते हैं | सीता ने कई बेड़ियाँ तोड़ी थीं वो इस बेंडी  को भी आसानी से तोड़ कर नया जीवन, नए सुखो के रंगों  में डूब सकती थी | लेकिन वो अपने संस्कारों व् सेवाधर्म पर दृण  थीं | दरअसल सशक्त स्त्री को किसी परिभाषा में नहीं बांधा जा सकता | वो हर स्त्री जो अपने फैसले खुद लेती है सशक्त स्त्री हैं |

महामना  मदन मोहन मालवीय जी का पत्र
महामना  मदन मोहन मालवीय जी का पत्र 


इसके बाद की कहानी एक स्त्री के मार्ग में दुनिया के पत्थर बिछाने व् उनकी उसी में राह बनाने की कहानी है | एक ऐसी स्त्री की सत्य कथा जिसने कभी पीछे मुड़ कर नहीं देखा | उसने हर दुःख का सामना किया लेकिन समाज के लिए अपने उत्तरदायित्व को निभाती चली गयीं | ऐसा नहीं है कि वो कभी विचलित नहीं हुई | विचलित हुई | कभी –कभी सब छोड़ कर मथुरा वृन्दावन या हरिद्वार में भी रहीं | संन्यास लेने की भी इच्छा हुई | पर हर बार कृष्ण के कर्म का सिद्धांत और जन सेवा की भावना उन्हें कर्म पथ पर खींच लायी | उदयपुर, लाहौर में अपनी सेवाएं देने के बाद वो बनारस लौटी | वहाँ  उनका संपर्क महामना मदन मोहम मालवीय जी से हुआ | उन्होंने उस दौर में बनारस हिन्दू  यूनिवर्सिटी के लिए 10,000, का चंदा दिया | जो उस ज़माने के हिसाब से बड़ी बात थी | उन्होंने BHU में भी छात्राओं के लिए अपनी सेवाएं दी | मथुराकी एक रेप विक्टिम बच्ची को उन्होंने सदा अपने घर में अपने संरक्षण में रखा | अपने धन से वृद्धाश्रम, विधवाआश्रम और बालिका गृह खोले | शिक्षा के लिए जरूरत मंदों को वो खुले हाथ से धन देती थीं | उन्होंने मालवीय जी के साथ भारतीय स्वतंत्रता संग्राम में भी भाग लिया | और अंत में अपना सब कुछ जरूरत मंदों के लिए देकर १९४६ में चिरनिद्रा में लींन  हो गयीं |


क्योंकि कहानी में उत्सुकता बनी रहे इसलिए उनके जीवन के दुखों के पन्ने मैंने नहीं खोले हैं | जैसे –जैसे आप कहानी पढ़ते जायेंगे आप की आँखें उनका निजी दुःख देखकर भीगती जायेगी और ह्रदय श्रद्धासे झुकता जाएगा कि एक अकेली महिला किस तरह इतने दुःख झेलकर भी समाज के लिए इतना कुछ करती रही | दूसरी खास बात जो उनके व्यक्तित्व में मैंने देखी कि उन्होंने अपने जीवन काल में जात –पात और सम्प्रदाय का सिर्फ खंडन ही नहीं किया बल्कि हर किसी को उतने ही प्यार से अपनाया | उनका गाडी वांन  रहमान हो , मोक्षदा हो, रेप विक्टिम दलित कन्या हो, या बंगाली एक बित्तन  हो , हर किसी का उनके घर पर उनकी रसोई पर पूरा अधिकार था | इतना यश और धन कमाने के बाद भी वो बहुत ही सहनशील थी और अपनी सास के दुर्वचनों का कभी जवाब नहीं देती थीं | कडवे वचन उनके शब्दकोष में नहीं थे | कहीं वो कमजोर पड़ीं तो अपने दत्तक पुत्र लक्ष्मी के कारण जो उनकी देवरानी ने उसका भविष्य सुधरने के लिए उनकी गोद में डाल  दिया था |


इस लघु उपन्यास में एक खास बात और है वो है इसका समय बोध | इस को पढ़ते हुए भारतीय स्वतंत्रता संग्राम की मदन मोहन मालवीय जी की , उस समय  निकलने वाले पत्रों व् पत्रिकाओं की भी जानकारी मिलती है | लेखिका ने अपनी कलम के माध्यम से उस समय का बनारस पाठकों के सामने दृश्य रूप में खड़ा कर दिया है | वो पतली –पतली गलियाँ जिसमें से आम आदमी निकल ही न पाए , बनारस के घाट , ठंडाई और दोने में रबड़ी और जलेबी, ऐसा लगता है जैसे हम वहीँ कहीं हों | बीच-बीच में उन्होंने ठेठ मुहावरों और लोकोक्तियों का प्रयोग किया है | जो अपने देसीपन के साथ बहुत प्रभावशाली लगते हैं | एक उदहारण देखिये ...

“बद बाद चूरे भात, बुढ़िया कूदी अट्ठारह हाथ”
“नकुल चंद्रदास , पादे ठास –ठास “

भाषा सरल व् सहज है और उसमें प्रवाह है जो पाठक को बहाए लिए जाता है | हालांकि कुछ दृश्यों में मुझे ठहराव की जरूरत लगी | ये एक पाठक की दिल मांगे मोर वाली भावना भी हो सकती है |

कवर पृष्ठ आकर्षक है |डॉ. सिताबो बाई की चहरे की झुर्रियाँ उनके संघर्षों  की दास्ताँ बयान कर रही हैं | ज्ञान बुक्स प्राइवेट लिमिटेड के जेन नेक्स्ट पब्लिकेशन से प्रकाशित ८६ पेज के इस लघु उपन्यास में ऐसा बहुत कुछ है जो पाठक को बांधे रखता है |

अगर आप कोई ऐसा उपन्यास पढ़ना चाहते हैं जो  स्त्री संघर्षों पर आधारित हो, प्रेणादायक हो और उसमें इतिहास की जानकारी भी छुपी हो तो “डॉ. सिताबो बाई” आपके लिए मुफीद है |

इतिहास के पन्नों से एक प्रेरणादाई पात्र को निकाल कर उस पर गहन शोध कर उपन्यास लिखने  के लिए लेखिका आशा सिंह जी  को बधाई |  

डॉ सिताबो बाई -लघु उपन्यास 
पृष्ठ -86
लेखिका आशा सिंह 
प्रकाशक - जेन नेक्स्ट 
मूल्य -150 रुपये 

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वंदना बाजपेयी  

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Atoot bandhan

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3 comments so far,Add yours

  1. एक उत्कृष्ट कृति की उत्कृष्ट समीक्षा। हार्दिक बधाई एवम् अनंत शुभकामनाएँ आपको भी और इस पुस्तक की लेखिका आशा दी को भी ����

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  2. इतनी उत्कृष्ट समीक्षा से मेरा भी पढ़ने को मन हो आया।सच,किसी भी बिंदु को नहीं छोड़ा। ऐसे समीक्षक विरले ही होंगे,जो मर्म समझ कर लिखें। पाठकों में पढ़ने की उत्कंठा जगाये। आभार।

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