समीक्षा –कहानी संग्रह किरदार (मनीषा कुलश्रेष्ठ)

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समीक्षा –कहानी संग्रह किरदार (मनीषा कुलश्रेष्ठ)


That what  fiction is for . It’s for getting at the
truth when the truth  isn’t sufficient
for the truth “-Tim o’ Brien


मनीषा कुलश्रेष्ठ जी हिंदी साहित्य जगत में किसी परिचय की मोहताज़ नहीं
हैं |उनकी कहानी ‘लीलण’ जो इंडिया टुडे में हाल ही में प्रकाशित हुई है  आजकल चर्चा का विषय बनी हुई है | एक गैंग रेप
विक्टिम की संवेदनाओं को एक मार्मिक कथा के माध्यम से जिस तरह से उन्होंने
संप्रेषित किया है उसके लिए वो बधाई की पात्र हैं | मनीषा जी अपनी  कहानियाँ के 
किरदारों के मन में उतरती हैं और उनके मन में चलने वाले युद्ध, द्वंद , गहन
इच्छाशक्ति के मनोविज्ञान के साथ कहानी का ताना –बाना बुनती हैं | वो आज के समय की
सशक्त कथाकार हैं | उनकी कहानियों में विविधता है, उनकी कहानियों में विषयों का
दोहराव देखने को नहीं मिलता, हमेशा  वो नए –नए
अछूते विषयों को उठाती रहती हैं | इसीलिये उनकी  हर कहानी दूसरी कहानी से भिन्न होती है , न
सिर्फ कथ्य में बल्कि शिल्प और भाषा में भी | वो बहुत प्रयोग करती हैं और उनके
प्रयोगों ने हिंदी साहित्य को समृद्ध किया है | उनके कई उपन्यास मैंने पढ़े हैं |
जिनमें शिगाफ, स्वप्नपाश और मल्लिका प्रमुख हैं |
तीनों के ही विषय
बिलकुल अलग हैं | अपने किरदारों के बारे में उनका कहना है कि

“ मेरे किरदार थोड़ा इसी समाज से आते हैं, लेकिन समाज से थोड़ा दूरी
बरतते हुए | मेरी कहानियों में फ्रीक भी जगह पाते हैं, सनकी, लीक से हटेले और जो
बरसों किसी परजीवी की तरह मेरे जेहन में रहते हैं | जब मुक्कमल आकार प्रकार ले
लेते हैं , तब ये किरदार मुझे विवश करते हैं, उतारो ना हमें कागज़ पर | कोई कठपुतली
वाले की लीक से हटकर चली पत्नी, कोई बहरूपिया, कोई दायाँ करार दी गयी आवारा औरत ,
बिगडैल टीनएजर, न्यूड मॉडलिंग करने वाली …”
  
लेखिका -मनीषा कुलश्रेष्ठ

 किरदार -मेरे किरदार में मुज्मर है तुम्हारा किरदार

आज मैं
जिस कहानी संग्रह के बारे में आप से चर्चा कर रही हूँ उसका नाम भी
 ‘किरदार’ है  | यूँ तो हम सब का जीवन भी एक कहानी ही है | और
हम
 अपने जीवन की कहानी का किरदार निभा रहे
हैं |कहीं ये किरदार जीवंत हैं मुखर हैं तो कहीं अपनी ही जद
  में कैद हैं | ये किरदार अपने बारे में बहुत
कुछ छिपाना चाहते हैं, परन्तु जिद्दी कलमें उन्हें वहां से खुरच –खुरच कर लाती
रहीं हैं | ये मशक्कत इसलिए क्योंकि असली कहानी तो वही है जिसका संबंध असली
जिन्दगी से है | ऐसा ही कहानी संग्रह है किरदार | इस कहानी संग्रह में मनीषा जी
ऐसे किरदार लेकर आई हैं जो लीक से हट कर हैं | सबके अपने अपने अंतर्द्वंद हैं |
इसलिए मनीषा जी उन अनकहे दर्द की तालाश में उनके मन को गहराई तक खोदती चली जाती
हैं | बहुत ही कम संवादों के माध्यम से वो उनका पूरा मनोविज्ञान पाठक के सामने खोल
कर रख देती हैं |ज्यादातर कहानियों में उच्च मध्यम वर्ग है जो बाहरी दिखावे में
इतने उलझे रहते हैं कि इनके दरवाजों और चेहरों की सतह पर ठहरी हुई कहानियाँ एक बड़ा
छलावा, एक बड़ा झूठ होती हैं | असली कहानियाँ तो किसी तहखाने में बंद होती हैं और
वहां तक जाने की सुरंग लेखक किस तरह से बनाता है पूरी कहानी का भविष्य इसी पर
निर्भर होता है | अब
 ये उलझे हुए किरदार
उन्हें कहाँ मिले, कैसे मिले ? पाठक के मन में स्वाभाविक रूप से उठने वाले इन
प्रश्नों को उन्होंने पुस्तक की भूमिका में ही उत्तर दे दिया है |

“इस बार फिर कुछ बेसब्र किरदारों के साथ कुछ शर्मीले पर्दादार
किरदारों की कहानियाँ ले कर आई हूँ | हर बार ये मुझे औचक किसी सफ़र से उतारते हुए
या सफ़र के लिए चढ़ते हुए मिले |”

“एक बोलो दूजी मरवण ….तीजो कसूमल रंग” ये नाम है संग्रह की पहली
कहानी का | प्रेम जीवन का सबसे जरूरी तत्व लेकिन सबसे अबूझ पहेली | ये जितना
सूक्ष्म है उतना ही विराट | कोई सब कुछ लुटा कर भी कुछ नहीं पा पाता है तो किसी के
हृदय के छोटे रन्ध में पूरा दरिया समाया होता है |
 आज जब दैहिक प्रेम की चर्चाएं जोरो पर हैं और ये
माना जाने लगा है कि प्रेम में देह का होना जरूरी है तो मनीषा जी की ये कहानी
रूहानी प्रेम की ऊँचाइयों
 को स्थापित करती
हैं | एक प्रेम जो अव्यक्त हैं , मौन है लेकिन इतना गहरा कि सागर भी समां जाए | एक
ऐसा प्रेम जिसमें ना साथ की चाह
 है न ही
अधिकार भाव, और ना ही शब्दों के बंधन में बांध कर उसे लघु करने की कामना | एक ऐसा
प्रेम जिसका साक्षी है एक और प्रेमी युगल |
 
मध्यवय का  भावों को रंगों से
कैनवास पर उतारता चित्रकार युगल | जो कालाकार हैं, आधुनिक हैं , बोहेमियन हैं और
सफल भी | ऐसा युगल जिसका प्रेम शर्तों में बंधा है | पास आने की शर्ते, साथ रहने
की शर्ते और दूर जाने की भी शर्ते साक्षी बनता है एक ऐसे प्रेम का भीड़ भरी बस में
कुछ समय के लिए अव्यक्त रूप से व्यक्त होता है और फिर उस गहराई को अपने में समेट
कर अपनी –अपनी राह पर चल देता है | बिलकुल संध्या की तरह, जहाँ दिन और रात मिलते
हैं कुछ समय के लिए फिर अपने अपने मार्ग पर आगे बढ़ जाते हैं प्रेम की उस गरिमा को
समेट कर | संध्या काल पूजा के लिए आरक्षित है क्योंकि पूजा ही तो है ऐसा प्रेम |
वासना रहित शुद्ध, शुभ्र | ऐसा ही तो है कसमूल
 
रंग | सबसे अलग सबसे जुदा जो ना लाल है , ना गुलाबी , ना जमुनी ना मैजेंटा
| आपने कई प्रेम कहानियाँ पढ़ी होंगी पर इस कहानी में प्रेम का जो कसमूल रंग है वो
रूह पर ऐसा चढ़ता है कि उतारे नहीं उतरता |प्रेम की तलाश में भटके युगल शायद
…शायद यही तो ढूंढ रहे हैं |


“हमारे समान्तर एक प्रेम गुज़र गया था |अपनी लघुता में उदात्ता लिए |
अ-अभिव्यक्त, अ –दैहिक, अ –मांसल |
और हमारा प्रेम अपनी तमाम दैहिकताओं, अपनी कलाकाराना मौलिक
अभिव्यक्तियों के साथ –साथ तमाम विश्व के साहित्य और सिनेमा | प्रेम उक्तियों से
प्रेम और उसके नानाविध इजहार उधार लेकर एक छोटे बिंदु में लोप होता जा रहा था |


कहानी आर्किड पूर्वोत्तर राज्यों के निवासियों और सेना के बीच होने
वाले संघर्षों के ऊपर आधारित है | आर्किड एक ऐसा पौधा
 जो स्वपोषी होता है जिसे केवल सहारा चाहिए होता
है पोषण नहीं | आर्किड का फूल दुनिया भर में अपनी सुन्दरता व् अनोखेपन व् विविधता
के लिए प्रसिद्द है | पूर्वोत्तर के राज्य आर्किड ही तो हैं जिन्हें शांति
  बहुत पसंद है, वो मेहनती हैं मतलब रोज का
उगाना, कमाना, खाना –पीना और जीने
  का मजा
लेना | परन्तु सुरक्षा बालों की लगातार उपस्थिति उनके जीवन का ये रंग कहीं छीन ही
लिया | अपने जंगल खेतों से वो ही बेदखल कर दिए गए | बाज़ार तो आया, पर विकास उस तरह
से नहीं आया जैसा आना चाहिए | इतनी ही तो मांग है न उनकी कि आर्किड की तरह उन्हें
अपना पोषण खुद करने दो | स्वपोषी को परजीवी क्यों बनाया जाए ? क्या घुटन नहीं होगी
?
 

“ शुरू में सुरक्षा एजेंसियां इनके लिए मेहमान जैसे ही थीं | मेहमान
आये हैं, चले जायेंगे | लेकिन अब ये छला हुआ महसूस करते हैं | हमारे यहाँ लोग कहते
हैं कि सुबह मेहमान आये तो उसे ब्रेकफास्ट कराओ, फिर भी रुका रहे तो लंच कराओ,
दोपहर को सोने को बिस्तर दो , शाम को रुके तो चाय दो , रात को रुकना चाहे तो डिनर
दो | लेकिन अगर वो आपके घर की औरतें और खेती की जमीन मांगने लगे तो …काट दो मतं
काटने वाले नाइफ से …|”

ये कहानी है डॉ.वाशी और प्रिश्का की | डॉ. वाशी की पोस्टिंग वहां के अस्पताल
में हुई है और प्रिश्का वहीँ की निवासी, जो वहां के निवासियों से अलग है , जो ‘वहां
इंडिया
 में’ की जगह ‘अवर इंडिया’ बोलती है,
और दोनों के बीच में अस्पताल में आने वाले ढेर सारे मरीज …ढेर सारी लाशें,
सुरक्षा बलों की भी और वहाँ के नौजवानों की भी | ये कहानी पूर्वोत्तर की समस्या पर
न सिर्फ प्रकाश डालती है बल्कि गहन वेदना से भर देती है | जिस निष्पक्ष तरीके
  से मनीषा जी ने इस समस्या को देखा है और उस पर
कलम चलायी है वो आसान काम नहीं है | इस पर शोध कर इसे कहानी के रूप में पिरो कर
सहज रूप से प्रस्तुत करने के लिए वो बधाई की पात्र हैं |

एक और कहानी जिस पर मनीषा जी ने शोध किया है वो है “ समुद्री घोडा” | वैज्ञानिक
पृष्ठभूमि पर लिखी गयी यह कहानी मेल प्रेगनेंसी पर आधारित है | ये कहानी दो
वैज्ञानिक विषयों को साथ
 ले कर चलती है एक
मेल प्रेगनेंसी और दूसरी सेलुलर मेमोरी | क्योंकि बात विज्ञान और शोध की है इसलिए
इस कहानी में मेरी खास रूचि जगी | और इसके बारे में बात भी कुछ अलग तरीके से
करुँगी |


 बच्चा, माता –पिता का साझा
ख्वाब होता है, पर उसे नौ महीने गर्भ में रखकर जन्म देने का अधिकार माँ के ही पास
है | इसमें माँ की महानता भी है और एक कर्तव्य भी जो उसे प्रकृति ने दिया है |
लेकिन अगर कोई पत्नी माँ बनने
 से इंकार कर
दे या भविष्य में ऐसा समय आये जब स्त्रियाँ माँ बनने में अक्षम हो जाएँ तो क्या
पुरुष मानव सभ्यता को बचाने का ये बीड़ा उठाएंगे ? अगर जान –जोखिम का खतरा हो तो भी
? क्या विज्ञान उनकी इस क्षेत्र में मदद कर सकती है ? ये एक ऐसा प्रश्न है जो
भविष्य के गर्भ में है |

आप गूगल पर मेल प्रगनेंसी टाइप करेंगे तो आप को जानकार हैरानी होगी कि
दिशा में शुरुआत हो चुकी है | ये अलग बात है कि अभी तक मेल प्रेगनेंसी के जितने भी
मामले आये हैं वो सब ट्रांसजेंडर हैं | यानि उनके शरीर में गर्भाशय रहा है | इसमें
Trystan Reese का मामला अभी हाल ही में बहुत प्रसिद्द हुआ था |एक्टोपिक प्रेगनेंसी
जिसमें गर्भाशय
 के बाहर भ्रूण का विकास
हुआ है उसके कुछ सफल केस महिलाओं में देखे गए हैं | हालांकि ये बहुत खतरनाक है | पुरुषों
में अभी ऐसा नहीं हुआ हैं | ये उनके लिए जानलेवा भी हो सकता है | फिर भी विज्ञान
ये आशा करता है कि एक दिन ये संभव होगा | कोई न कोई तो होगा वो पहला पुरुष जो
एक्टोपिक प्रेगनेसी से बच्चे को जन्म देगा | और भविष्य की इसी आशा को संजोये हुए
बनती है कहानी ‘समुद्री घोडा” | लेखिका अपने पक्ष में जीव जगत से कई उदहारण लायीं
हैं | जहाँ एक कोशीय जीव भी हैं और बहुकोशीय जीव भी जहाँ नर व् मादा एक ही शरीर
में होते हैं | उसी जीव जगत
 में है
समुद्री घोडा …समुद्री जीव , लसलसा सा |पर समुद्री घोडा वो जीव है जिसमें नर
अपने निषेचित अन्डो को तब तक अपने मुँह में रखता है जब तक वो परिपक्कव नहीं हो
जाते | क्योंकि वो मुँह नहीं खोल पाता इसलिए वो इतने दिन भूखा रहता है | नर व्
मादा समानता का कितना खूबसूरत उदाहरण है समुद्री घोड़ा |
 

ये कहानी  है एक वायव और
रौद्रा की | रौद्रा एक एक्सीडेंट में अपना गर्भाशय खो चुकी है | पर वायव की जैविक
पिता बनने की इच्छा है | और उसके लिए वो मेल प्रेगनेंसी के अनदेखे मार्ग पर जाना
चाहता है | उसकी ये इच्छा एक बड़ी स्त्रीवादी बहस को जन्म देती है | जब प्रकृति में
कई जीव जंतुओं में नर –मादा की बच्चे पैदा करने में भूमिका बराबर की है तो इंसान
में क्यों ना हो ? मर्म को छूती , संवेदना को जगाती और तर्क की तलवार को धार देती
ये कहानी अपने आप में एक अलहदा कहानी है |


मेल प्रेगनेंसी के अतिरिक्त ये कहानी सेलुलर मेमोरी की भी बात करती है
| सेलुलर मेमोरी …एक ऐसा शब्द है जिसमें विज्ञान , मनोविज्ञान और
 पराजैविक अनुभव सिमटा हुआ है | जिस तरह से जैविक
मेमोरी हमारी हर सेल में रहती है और वो द्विगुणित हो कर अपने ही जैसे सेल बनाती है
वैसे ही हमारे जीवन भर के दुःख दर्द, हर्ट आदि
 मनोभाव हमारे हर सेल में मेमोरी के रूप में
स्टोर होते जाते हैं | आध्यात्म कहता है कि प्राण इसी मनोवैज्ञानिक मेमोरी को ले
कर निकलता है | जो हमारे
 अगले जन्म का मूल
स्वाभाव या संस्कार बनता है | एक दो साल का बच्चा भी गायन , लेखन या अभिनय के
प्रति अपनी गहन रूचि दिखाने
 लगता है |
जिसे हम कहते हैं “लगता है पिछले जन्म में कवि, चित्रकार आदि
 रहा होगा |” यहाँ तक तो हम स्वीकार करते हैं पर
ये कहानी सेलुलर मेमोरी के किस मनोवैज्ञानिक आस्पेक्ट को छूती है उसे आप कहानी पढ़
कर ही जान सकेंगे | फिर भी विज्ञानं, मनोविज्ञान और स्त्री विमर्श
 के त्रिभुज पर सधी ये कहानी पाठक के सोचने के कई
आयाम खोलती है |

कहानी “लापता पीली तितली” और ठगिनी दोनों मासूम बच्चियों  के दर्द से पाठक का ह्रदय चीर देती हैं |हालांकि
दोनों का विषय अलग –अलगहैं
 |  “लापता पीली तितली” एक ऐसे लड़की की कहानी है जो
चाइल्ड एब्यूज का शिकार हुई है | उस मासूम बच्ची को कुछ भी याद नहीं | याद है तो
वो पीली तितली जो ….
“पर रात जागती रही | चेतन –अवचेतन और स्वप्न के बीच वह पीली तितली
कुनमुनाई और गायब हो गयी चेतना से |

एक ऐसी बच्ची जो चाइल्ड अब्यूज का शिकार होती है | उसकी चेतना को कुछ
याद भी नहीं | फिर भी उसका सारा बचपन छिन जाता है | मासूमियत सतर्कता में बदल जाती
है और वाचालता ख़ामोशी में , बहुआयामी व्यक्तित्व अंतर्मुखी हो जाता है | कितना कुछ
है जिसके तार अवचेतन में उलझे हुए है और जब वो सुलझ कर रेशा रेशा पृथक हो जाते हैं
तो …| बच्चियों पर बढ़ते हुए यौन अपराधों की पीड़ा को उकेरती ये कहानी अपने मासूम
संवादों और शिल्प के साथ संवेदनाओं को झकझोर देती है |

ठगिनी रहस्य के साथ आगे बढती है | एक युवा लड़की जो मेले में भैस बेचने
आये पिता की उम्र के सरवण के पीछे चल पड़ती है | कौन है वो जो रेगिस्तान की परवाह
ना करते हुए जाने किस विश्वास के साथ उसके पीछे चली जा रही है | सरवण भी यही सोचता
है | ठग है शायद, उसके रूप से थोड़ा भटकता भी है पर वो निश्चिन्त बेखबर पीछे चली ही
जाती है | अंत में जब राज का पर्दाफाश होता है तो पाठक की आँखें नम हो जाती हैं |
ह्रदय चीत्कार कर उठता है और एक ही शब्द निकलता है उफ़ !| ये कहानी है पितृसत्ता के
उन षडयंत्रों
 की जो स्त्री के जन्म लेने
के अधिकार को भी छीन लेती है | आज के समय में जब महिलाएं आसमान में जा रहीं है तो
उसी आसमान के ठीक नीचे धरती पर कुछ ऐसे हिस्से भी हैं जो स्त्रियों के हाथों से
आसमान तो क्या जमीन भी छीन लेना चाहते हैं | ये कहानी है कंचन की उसकी शारीरिक ,
मानसिक पीड़ा की, उसके अस्तित्व विहीन जीवन की
 | यहाँ कंचन को माध्यम बना कर पितृसत्ता के
चेहरे के जिस मुखौटे को नोचकर मनीषा जी उसका विद्रूप चहेरा दिखाती हैं उससे पाठक
काँप जाता है | कहानी में मनीषा जी ने वहां के लोक –परिवेश और भाषा का इतना सुंदर
सम्मिश्रण किया है कि कहानी केवल पठनीय ही नहीं रह जाती वो
 दृश्य –श्रव्य हो उठती है |

कहानी ‘ब्लैक होल”  दो
पीढ़ियों के विचारों में अंतर और उससे उपजे आपसी विरोध को दर्शाती है | लेकिन आप इस
कहानी को उस तरह की कहानी बिलकुल मत मान लीजिये जो दो पीढ़ियों के सास –बहु टाइप टकराव
को दिखाती हैं | ये कहानी “आजकल के बच्चे “ की एक नयी परिभाषा रखती है | ये कहानी अपने
ही बच्चों के बारे में एक अलग तरह से सोचने को विवश करती है | हम अपने बच्चों को
बेस्ट से बेस्ट शिक्षा देना चाहते हैं , बेस्ट किताबे देना चाहते हैं | पर क्या
उससे विकसित हुए वैचारिक
 मन को सँभालने को
हम तैयार हैं ? कथनी और करनी के अंतर का ये वो ब्लैक होल है जो इंसानियत को निगलता
जा रहा है …समूचा | आज हर माता –पिता अपने बच्चों को अच्छी किताबें, अच्छी
शिक्षा तो मुहैया करा रहा है लेकिन चलाना उसे अपनी ही लीक पर चाहता है | उसे
वैचारिक स्वतंत्रता की आज़ादी नहीं है | ये मांग भी ऐसी नहीं है कि आप आयातित कह कर
नाक –भौ सिकोंण लें | ये मांग है जीवन मूल्यों की | ऐसा ही एक आवरण अपने पिता के चेहरे
से उनकी बेटी बड़ी ही शालीनता से उतार देती है | ये कहानी सोचने पर विवश करती है कि
कही हमने तो ऐसकोई आवरण नहीं ओढ़ रखा |
“ आखिरकार मैं पिता हूँ | मेरी हथेलियों को ग्लानि नम कर गयी है ,
जिसे मैं बार –बार पोछ  रहा हूँ , अपनी
पतलून से | वो लाल पोल्का डॉट्स वाली स्कर्ट में जो खड़ी है, अपने कॉलेज के गेट पर,
मुड़ कर मुझे देखती हुई , मेरी बेटी है | आज पहली बार मैं आहत हूँ अपने आप से, वह
मुझसे होगी ही , और उससे जो आहात होकर…जानें दें घबराहट होती है सोचकर |”

अब आते हैं संग्रह की आखिरी और उस कहानी पर जिस के नाम पर संग्रह का
नाम है “किरदार” |जिसके बारे में मनीषा जी शुरू में ही कह देती हैं, “ मेरे किरदार
में मुज्मर है तुम्हारा किरदार” |
 ये
कहानी तथाकथित सुखी
 स्त्री मन की परतों को
खोलती है | हमने सुखी स्त्री की एक परिभाषा बना रखी है और उस परिभाषा में फिट होने
वाली हर स्त्री पर हम सुखी स्त्री का टैग लगा देते हैं | ऊँचे ओहदे और प्यार करने
वाला
 पति , प्यारे बच्चे बड़ा सा घर ,रुपया
–पैसा शानो –शौकत इससे ज्यादा किसी स्त्री की क्या अभिलाषा हो सकती है ? क्या हर
स्त्री इस् किरदार
 में खुश रह सकती है |
क्या जो किरदार समाज हमें उपलब्द्ध कराता है उसको प्रारब्ध मान कर जीवन काट देना
ही नियति है | हम अपने से अलग साइज के कपड़े नहीं पहन पाते | कहीं सांस घुट्ती है |
 है तो कहीं जरूरत से ज्यादा ढीलापन या हवा
बर्दाश्त नहीं होती | फिर स्त्री कैसे जी पाती है किसी दूसरे के किरदार में |
मधुरा भी नहीं जी पा रही थी
 , तभी तो …


“ मैं गहरे नीले रंग वाली नोटबुक उठाता हूँ , जिससे पन्ना फाड़ कर
मधुरा ने सुसाइड नोट लिखा था…एक आखिरी पन्ने पर कुछ लिख कर काटा है पेन गड़ा-गड़ा
कर |  मैंने अपना किरदार पूरे जोश से
निभाया , अब और नहीं, सॉरी !

मधुरा की आत्महत्या केवल आत्महत्या नहीं है वह कला विहीन प्रेमविहीन
जीवन की वेदना के प्रति आत्मघाती विद्रोह है | एक ऐसी बेआवाज चीख जिसके पीछे लाखों
मौन चीखे हाथ थामे चली थी एक दूसरे को सहारा देते हुए …पर
 कब तक | मनीषा जी एक सुखी सी दिखने वाली कला
प्रेमी स्त्री के मन में झाँकती हैं तो निकल कर आती है एक ऐसी स्त्री जो मुक्तकेशनी
लक्ष्मी की बाग़ में विहार करती हुई तस्वीर में रंग भरना चाहती है, शेष शैया पर
विष्णु के पैर दबाती हुई लक्ष्मी की नहीं | एक कलाकार, कला प्रेमी स्त्री को सब
सुख देकर अगर उसकी कला को अभिव्यक्त करने की इजाजत नहीं है तो उसे क्या घुटन होती
है , क्या बेचैनी होती है …उसके दर्द को उसके एक –एक सूक्ष्म मनोभावों को मनीषा
जी खोलती हैं …और खुल जाती
 है स्त्री की
एक दुनिया जो किसी दूसरे के किरदार को निभा रही है | कोशिश कर रही है पूरे जोश से
निभाने की …पर आखिर कब तक ? मन के अँधेरे कोनो की एक विशष्ट शैली व् भाषा व्
 शिल्प के साथ की गयी ये यात्रा बहुत मर्मान्तक
है | एक नकली जीवन जीते हुए असली कला नहीं दी जा सकती | ये वो बेचैनी , वो घुटन है
जिसे हर कला से जुडा व्यक्ति महसूस करेगा |


ये कहानी प्रेम  की परिभाषा पर
भी प्रश्न चिन्ह लगाती है | क्या किसी को काट-छांट कर अपने अनकूल बना कर प्रेम
करना असली प्रेम है या किसी को उसके पूरे वजूद के साथ स्वीकार करना प्रेम हैं ? नकली
प्रेम को जीते हुए जो खोखलापन आता है , साथ में प्रेम करने वाला साथी हो पर मन की
एक बात भी ना की जा सके तो जो अकेलापन महसूस होता है एक ऐसा विष है जिसमें तिल –तिल
कर मरती है स्त्री |
 मन माफिक होना और
मनमाफिक दिखाना का जो द्वन्द है कहानी उसकी भी बात करती है | परिवार , समाज सब कुछ
होते हुए भी ये कहानी स्त्री के रूप में मधुरा की अपने स्वतंत्र अस्तित्व की खोज
है |
“ इस  किरदार को निभाने में
कोई सुख, कोई अदा , कोई शोखी , कोई खूबसूरती तो हो| तुम मुझे एक खास अंदाज में
रहने को कहते हो | मैं रंगों, स्याहियों, सुरों और आलापों में व्यक्त होना चाहती
हूँ |”

और अंत में मैं यही कहूँगी कि किरदार कहानी संग्रह के सभी पात्र
पर्देदार है ,
 जो अपनी कहानियाँ यूँ ही
नहीं बांचते फिरते | इनके अपने सुख दुःख हैं, संघर्ष हैं , ग्रंथियां हैं जिनसे ये
जूझते हुए आगे बढ़ते हैं | ये हमारे आस-पास हैं पर इन किरदारों को ढूँढने में उन पर
कलम चलाने में , उनके मनोविज्ञान की पड़ताल करने में जिस मेहनत की आवश्यकता होती है
वो मनीषा जी ने की है | इसी लिए इस संग्रह की कहानियों के किरदार कहानी खत्म करते
ही आपसे जुदा नहीं हो जाते बल्कि आपके
  साथ
कई दिन तक यात्रा करते हैं और आपके जेहन में हमेशा के लिए बस जाते हैं | संग्रह की
कहानियों की भाषा और शिल्प में इतनी विविधता है जो सहज ही मन मोह लेती है | राजपाल
प्रकाशन से प्रकाशित 140 पेज के इस संग्रह की कोई भी कहानी ऐसी नहीं है जिसे आप
जल्दी –जल्दी पढ़ लें | हर कहानी अपने मनन का एक जरूरी समय माँगती
 है |
अगर आप ऐसी कहानियाँ पढ़ना चाहते हैं जो आप के साथ लगातार चलती रहे तो
ये संग्रह आप के लिए मुफीद है |
किरदार –कहानी संग्रह
लेखिका –मनीषा कुलश्रेष्ठ
प्रकाशक –राजपाल
पृष्ठ -140
मूल्य -195

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समीक्षा -वंदना बाजपेयी 
                                        

लेखिका-वंदना बाजपेयी

  

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