कहानी कविताओं से इतर आज साहित्य में संस्मरण और जीवनी बहुतायत से पढे जा रहे हैं । इसका एक कारण यह है कि इसमें कल्पना और बिंबों के स्थान पर जीवन और घटनाओं को जैसा है , वैसा ही सामने रख दिया जाता है। सच्चे जीवन से उपजे ये संस्मरण अपने सहज भाव के साथ जीवन को देखने परखने की सीख भी हमारे दामन में बांधते चलते हैं। आत्मकथा, जीवनी और संस्मरण लिखना आसान नहीं है, इसमें न दुख छिपाए जाते हैं न गलतियाँ, न उम्मीदें, न कमजोरियाँ । इसकी सत्यता और बेबाकी ही ही इसकी सफलता की कसौटी होती है। ऐसी ही एक पुस्तक है ‘ऋषि’, जिसमें सुपरिचित साहित्यकार किरण सिंह जी ने अपने परिवार और ज्येष्ठ पुत्र ऋषि के साथ व्यतीत किए गए प्रसंगों को को इस तरह पिरोया है कि यह संस्मरणात्मक कृति एक औपन्यासिक कलेवर लेकर हमारे सामने आती है । कहीं भाषा का प्रवाह और चुटीलापन ममता कालिया की “रवि कथा” का स्मरण कराता है तो कहीं निराला की ‘सरोज स्मृति’ याद आती है। पाठक एक लय में पढ़ते हुए बहुत कुछ सीखता-समझता गाँठ में बांधता जाता है। कुल मिलाकर किरण सिंह जी ने ‘ऋषि’ के माध्यम से युवाओं के लिए एक प्रेरणादायक पुस्तक तैयार की है । जहाँ जीवन के सच्चे प्रसंगों से माता -पिता और बच्चों के लिए शिक्षा, खेलकूद, सफलता, ब्रेक एप जैसे मुद्दों को उठाया है। प्रस्तुत है पुस्तक का एक अंश-
पुस्तक अंश – ऋषि
दशहरे की छुट्टी में जाॅब के बाद ऋषि पहली बार घर आ रहा था..। कुछ छः महीने ही हुए होंगे किन्तु लग रहा था कि छः वर्षों के बाद आ रहा है ऋषि घर। उस रात पतिदेव रात भर करवटें बदलते रहे पर नींद अपने नखरे दिखाती रही थी तो पलकें झपकने का नाम ही नहीं ले रही थीं। उस रोज यदि उनका वश चलता तो रात भर एयरपोर्ट पर ही जाकर बैठे रहते….। उनकी इस बेचैनी को देखते हुए मैंने चुटकी लेते हुए ही उनसे कहा –
” चले जाइए ना रात में ही एयरपोर्ट आपके जाने से फ्लाइट भी शायद अभी आ जाये। .”
वैसे सच कहूँ तो उस रोज नींद मेरी आँखों से भी गायब थी ।
बेंगलूरु से आने वाली फ्लाइट पटना में सुबह ग्यारह बजे लैंड करने वाली थी। पतिदेव कई बार ऋषि से बात करते रहे थे –
“कब चलोगे? ” थोड़ी जल्दी ही घर से निकलना, सड़क जाम भी हो सकती है, ……हाँ आई कार्ड लेना मत भूलना.. आदि आदि..। फिर उधर से ऋषि की आवाज़ आती –
“पापा अब मैं बच्चा नहीं रहा… आप अभी तक मुझे बच्चों की ही तरह ही ट्रीट कर रहे हैं “अभी आराम से सोइये ना आप, क्यों बेकार का टेंशन लेते हैं । “
फिर पति देव मोवाइल रख कर टीवी पर न्यूज वगैरह में अपने को उलझाने लगे थे।

खाना बनाने का शौक मुझे किशोरावस्था से था इसीलिए बच्चों के घर आने पर उनकी पसंद की डिशेज बनाती ही रहती हूँ सो बनाई ही थी लेकिन उस रोज शायद पिता के हृदय को माँ की ममता से प्रतिस्पर्धा थी या फिर पुत्र प्रेम की अधिकता। वजह जो भी हो पतिदेव ने भी बाजार से ढेर सारे फल और मिठाइयाँ घर में लाकर भर दी थी जिसे मैंने बड़ी मुश्किल से फ्रीज में एडजस्ट करके रखा और पतिदेव से फिर छेड़ते हुए कहा – “अरे, बस इतना ही, आज तो आपको पूरा बाजार ही घर में उठा कर लाना चाहिए था ..।
पतिदेव मेरी बात को अनसुना करते हुए
एयरपोर्ट के लिए निकल गये , जबकि एयरपोर्ट घर से तीन चार किलोमीटर ही दूर है और जाने में टाइम भी पांच से दस मिनट ही लगता है। फिर भी पतिदेव नौ बजे ही एयरपोर्ट चले गए…। इस बार मैने उन्हें टोकना उचित नहीं समझा क्यों कि मैं भी माँ हूं और पिता के हृदय की विकलता को समझ सकती थी…। बल्कि मुझे तो यह सब देखकर ऐसा लग रहा था कि पिता को पुत्र मोह माता से भी अधिक होता है।
मैं घर का मेन गेट खुला छोड़ कर ही किचेन में कुछ – कुछ बनाने के लिए चली गयी थी शायद इसीलिए मुझे ऋषि के घर में आने की आहट नहीं सुनाई दी थी ।
“ऋषि किचेन में ही आकर मेरा पैर छूआ तो मैं उसे देखती ही रह गई। उस दिन भी उसने नीली शर्ट और स्काई ब्लू रंग का जींस पहना हुआ था पर उस दिन उसके चेहरे पर आत्मविश्वास की चमक थी। मुझे डर लग रहा था कि आज ऋषि को कहीं मेरी ही नज़र न लग जाये इसीलिए मैं मन ही मन उसकी सारी बलाएँ लेती रही। मेरा पैर छूने के बाद के बाद जो मैंने उसके लिए ब्राउनी बनाया था उसमे से एक टुकड़ा उठा लिया और खाते हुए ही अपने स्वभावानुसार सबसे पहले फ्रिज खोलकर उसका निरीक्षण किया जो कि उसकी बचपन की ही आदत थी और फिर कुछ मिठाइयाँ, कोल्ड्रिंक्स का बॉटल आदि निकाल कर अपने रूम में चला गया !
रूम में से कुछ ही देर बाद बाहर आकर टेबल पर ढेर सारा गिफ्ट फैला दिया जिसमें मेरे लिए टैब्लेट, अपने पापा के और चाचा के लिए घड़ी, भाई के लिए मोबाइल आदि था। यह सब देखकर पतिदेव के मुह से अनायास ही आदतन निकल पड़ा – “क्या जरूरत थी बेटा इतना खर्च करने की ?”
लेकिन मैं उनके चेहरे की खुशियों को अच्छी तरह से पढ़ पा रही थी ठीक वैसी ही खुशी जो कभी ऋषि के चेहरे पर देखने को मिलती थी जब हम उसे कोई सरप्राइज गिफ्ट लाकर दिया करते थे।
खैर खुश तो मैं भी बहुत थी क्योंकि मेरे लिए भी तो बेटा टैबलेट लाया था। खुशी के साथ-साथ मैंने भी कुछ शिकायती लहजे में बेटे से कहा –
” बेटा इतना महंगा टैबलेट लाने से बेहतर था ज्वैलरी वगैरह ले लेते कि………
ऋषि -” क्या मम्मी आप भी हर समय पैसा – पैसा किये रहती हैं। अब आप टेंशन मत लीजिए। आप आपका बेटा कमाने लगा है। ”
ऋषि मेरे मोबाइल का सिम निकालकर मेरे टैबलेट मे लगा दिया था।
तभी देवर का काॅल आ गया। मैने काॅल उठाकर देवर से कहा –
“आज मैं आपसे टैबलेट से बात कर रही हूँ….।”
देवर ने उधर से कहा -” टैबलेट से बात…..? ”
ओह अच्छा,, चलिए बहुत खुशी की बात है…. फिर मैंने उनसे बताया – “और आपके लिए घड़ी भी लाया है..बिट्टू ( ऋषि का नीक नेम) ।”
तभी कुछ देर बाद लूसी (देवरानी ) का भी काॅल आ गया… ।इतनी जोर से हँसी आ रही थी कि कुछ देर तक हँसती रही…. फिर उसने बताया –
” आपको पता है दी…. ये मुझसे पूछ रहे थे कि टैबलेट क्या होता है…?
फिर जब मैंने उन्हें बताया तो उन्होंने कहा कि मैं तो समझा कि बिट्टू अपनी मम्मी के लिए कोई ऐसी दवा लाया है कि उसे खाकर भाभी कितना भी बात करेंगी थकेंगी नहीं..।
देवरानी की बातें सुनकर मैं हँस – हँस कर लोट पोट होने लगी थी। फिर मैंने ये बात बिट्टू तथा घर में सभी को बताई तो सभी का हँस – हँस कर बुरा हाल हो गया था।

उस दिन ऋषि अपने पापा के साथ ही खाना खाया …. ।खाना खाते समय बीच – बीच में पतिदेव बड़े लाड़ से बेटे के प्लेट में कुछ – कुछ सर्व कर रहे थे। “बेटा ये लो न, बहुत टेस्टी है…. अरे ये चखो न…।उस दिन बेटे से बात करते – करते इतनी देर हो गई कि पतिदेव आॅफिस भी नहीं गए…. । पिता- पुत्र बातें कर रहे थे। बात क्या पिता आज एक अच्छे श्रोता की तरह सुन रहे थे और पुत्र किसी उच्च कोटि के वक्ता की तरह अपना वक्तव्य दे रहे थे… और मैं स्मृति वन में विचरण करने लगी……
जब ऋषि सेमेस्टर एग्जाम के बाद छुट्टियों में घर आता था…. ।प्रतीक्षा तो तब भी इतनी ही तिब्रता से करते थे ऋषि के पिता., तब भी परिस्थितियाँ कुछ ऐसी ही होती थीं., फल और मिठाइयों से घर तब भी भरा रहता था, अब और तब में अन्तर सिर्फ इतना ही था कि बेटे के आते ही शुरू हो जाता था पिता के प्रश्नों की लड़ियाँ और उसके बाद उपदेश – “. एग्जाम कैसा गया ? …. मेहनत से ही सफलता मिलती है.।
सक्सेस का एक ही मूलमंत्र है..मेहनत ,मेहनत और मेहनत..।
इतना सुनते ही ऋषि का हर बार एक ही उत्तर होता था… पापा मेहनत करने वाले जिन्दगी भर मेहनत करते रह जाते हैं और दिमाग वाले हमेशा ही आगे कुछ नया कर मेहनत करने वालों पर राज किया करते हैं… जरूरत सिर्फ मेहनत की ही नहीं होती बल्कि जरूर होती है कि मेहनत अपनी अभिरुचि के अनुसार सही दिशा में की जाये…उदाहरण के तौर पर देख लीजिए मेहनत मजदूर करते हैं और गरीब के गरीब रह जाते हैं… और उन्हीं मजदूरों पर राज ठेकेदार करते हैं और अमीर बन जाते हैं …..।इसके बाद होने लगती थी दोनों अधिवक्ताओं में गर्मागर्म बहस “तब मैं न्यायधीश की भूमिका में आ जाया करती थी.!
उसके बाद ऋषि को अकेले में समझाने लगती थी कि बेटा क्यों नहीं सुन लेते हो पापा की बातें चुपचाप,,, सही ही तो कहते हैं , बड़ों की बात मान लेना चाहिए…।
इस पर ऋषि कहता था –
” मम्मी ओबेडियेंट लोग अच्छे होते हैं, लेकिन जितने भी महान लोग हुए हैं वे अपने मन की ही किये हैं..
जरूरी नहीं है कि बड़ों की हर बात सही ही हो।
व्यक्ति को जिस विषय में इंट्रेस्ट हो वही चुनकर उसमें काम करेगा तो वह काम उसे काम न लगकर एक खेल लगने लगेगा.।जैसे आप अपना ही ले लीजिये,, आपको लिखने में इंट्रेस्ट है तो आपको कविता या कहानी लिखने में मजा आता है इसमें आपको खुशी भी मिलती है, इसमें आपको अधिक एफर्ट लगाने की भी जरूरत नहीं पड़ती होगी…. लेकिन यही सब उन्हें लिखने को दे दिया जाये जिन्हें लिखने में इंट्रेस्ट नहीं है या उन्हें लिखना नहीं आता है तो उन्हें यही काम मुश्किल लगेगा और हो सकता है कि महीनों लगा दे फिर भी कोई कविता या कहानी नहीं लिख पायें..।
लोग परेशान इसलिए रहते हैं कि वे अपने कैरियर बनाने के लिए विषय का चुनाव अपनी इंट्रेस्ट के हिसाब से न कर के अपने पेरेंट्स के सपनों को पूरा करने के लिए उनके द्वारा थोपे गए सब्जेक्ट्स चुनते हैं…इसीलिए उन्हें अपना काम उबाऊ लगने लगता है और विशेष मेहनत की आवश्यकता पड़ती है..!
खैर बात तो उसकी सही ही रहती थी, इसलिए उसपर मुझे विश्वास भी रहता था कि वह कुछ अच्छा ही करेगा लेकिन पिता तो पिता ही होते हैं न… उनकी डिक्सनरी में फिजूल बातें नहीं रहतीं हैं..।उन्हें तो रिजल्ट चाहिए होता है… और किसी भी कीमत पर सफलता…
सबसे परेशानी तो ऋषि की रात में जगने वाली आदत से होती थी..। .ऋषि रातभर लैपटॉप पर गेम खेलता था। “उसका कहना था कि अभी तो छुट्टियाँ हैं घर में कुछ दिनों तक तो मन मर्जी करने दिया कीजिये… फिर तो काॅलेज जाकर पढ़ना ही है। मैं उससे सहमत तो हो जाती थी लेकिन इतना सुना दिया करती थी –
” बेटा तुम लोग निशाचर हो गये हो। अरे रात में आराम से सोना चाहिए। जो खेलना कूदना है दिन में करते ..।”
मैं रात में खाने के लिए ऋषि के पसंद का स्नैक्स और पानी का बोतल उसके रूम में रख कर सोने चली जाती थी ..! कभी-कभी तो रात में पतिदेव की जोर – जोर से आवाज सुनकर उठ जाती थी…क्यों कि नीरव निशा में तो हल्की ध्वनि भी शोर लगती है न।
पतिदेव ऋषि से –” रात – रात भर कम्प्यूटर पर क्या करते हो?
ये कौन सा रुटीन है तुम्हारा..?
क्या तुम्हारे लिए कोई कम्पनी रात में खुली रहेगी? कौन सी कम्पनी तुम्हे काम करने के लिए लिए रात में खुली रहेगी…?
टाइम मैनेजमेंट सीखो वर्ना……………..
जबतक अपना रुटीन सही नहीं रखोगे तब तक लाइफ में कुछ भी नहीं कर सकोगे …..आदि आदि….. ।”
तब शान्ति स्थापना हेतु मेरी नाइट ड्यूटी लग जाती थी…।
पतिदेव का बदला रूप देखकर उस दिन मैं कुछ चकित सी थी… । सोच रही थी कि शायद सूरज पश्चिम में उग आया है। ऋषि बोल रहा था और उसके पिता सत्यनारायण भगवान की कथा की तरह उसकी बातें शांत भाव से सुन रहे थे…। हाँ कभी-कभी उत्सुकता और कौतूहल वश बीच – बीच में कुछ प्रश्न अवश्य कर लिया करते थे, बिल्कुल उसी तरह जैसे कथा सुनते हुए पंडित जी से श्रोता कुछ पूछते हैं..!
एक वक्ता इतना अच्छा श्रोता बन गया मुझे खुशी के साथ – साथ कुछआश्चर्य भी हो रहा था….।
आखिर में मुझसे रहा नहीं गया और मैंने चुटकी लेते हुए ऋषि से कहा –
“बेटा तुम्हारी घड़ी तो जादूगरनी निकली।”
(मेरा इशारा ऋषि के पिता के बदले हुए व्यवहार पर था जिसे ऋषि समझ गया )ऋषि ने भी भी हँसते हुए बोला
“टाइम है मम्मी”
कुछ दिन ऋषि घर में खुशियाँ बिखेर कर वापस बेंगलुरु चला गया।
पुस्तक अंश

किरण सिंह
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