असम्भावना में सम्भावना का आख्यान – लौ

 

किताब जो स्वयं को पढवाती है :

जिस प्रकार लेखन की अपनी प्रक्रिया होती है उसी प्रकार पाठन की भी अपनी प्रक्रिया होती है. पाठक किसी किताब को कैसे पढता है अलग बात है लेकिन कोई किताब अपने को कैसे पढवाती है ये नितांत भिन्न अनुभव होता है. अक्सर पाठक पूरी किताब पढने के बाद ही अपना रिव्यु देता है. कई बार कुछ किताबें बीच में ही हस्तक्षेप करने लगती हैं तब एक छोटी सी प्रतिक्रिया दे देता है. कोई कोई किताब ऐसी होती है जो हर पच्चीस पचास पेज के बाद कहती है मुझपर लिखो. वो न भी कहे, आप लिखे बिना रह नहीं पाते. कुछ ऐसे उसके सम्मोहन में घिर जाते हो. ऐसी ही किताब है रुख प्रकाशन से प्रकाशित बाबुषा कोहली की “लौ”. जो कुछ भी पढ़ते हुए महसूस हुआ या कहा जाए मुझ तक पहुंचा वो मैंने किताब पढ़ते पढ़ते ही लिखा और जिस रूप में उतरा अक्षरक्षः प्रस्तुत कर रही हूँ.

किताब पिछले साल बुक फेयर में खरीदी थी. अपनी व्यस्तताओं के चलते पढ़ नहीं पायी. पिछले दिनों जब इस किताब को उठाया तो उसकी गिरफ्त में ऐसी आयी कि निकल नहीं पायी शायद इसलिए क्योंकि यहाँ विषय केवल प्रेम नहीं है बल्कि प्रेम का अध्यात्म है, प्रेम का दर्शन है, प्रेम की वो ऊंचाई है जिसकी चाह तो हर कोई रखता है किन्तु उस तक पहुँचना सिर कटाने से कम नहीं होता. प्रेम बांधता नहीं है, प्रेम आपको खुला छोड़ता है. आपको अपने जैसा बनाता है तभी तो पूर्णता प्राप्त करता है.

असम्भावना में सम्भावना का आख्यान – लौ

 

प्रेम का अध्यात्म :

प्रेम को व्याख्यायित करना आसान नहीं. यही कारण है इसे किसी परिभाषा में नहीं बाँधा जा सकता. कहीं ये रूहानी होता है कहीं अध्यात्मिक तो कहीं शारीरिक. हर स्तर की अपनी अनुभूतियाँ होती हैं. रूहानी अनुभूतियों में मौन ही संवाद करता है। एक क्षण ऐसा आता है जब ये संवाद भी समाप्त हो जाता है। द्वि का अंत हो एकाकार हो जाते हैं। फिर न मिलन है न बिछड़न। तू मैं हर भाव से मुक्त। असीम होना यही तो है जहाँ उपस्थिति या अनुपस्थिति की स्थिति ही समाप्त हो जाए। एक अजस्र बहता नाद बन जायें। यही है दिव्यता, यही है खोज की पूर्णाहुति। यही तो है इश्क़ का मुबारक होना। जीवन जैसे इसी खोज, इसी अपूर्णता को पूर्ण करने के लिए प्राप्त हुआ है.

 

वो एक पुकार

जिसने बेधा है सीना मेरा

जाने कब से गूँज रही है अंतस में

अनंत युगों से

 

कहाँ हो तुम

कौन हो तुम

नहीं पता

तुम्हें भी नहीं पता

मैं कौन हूँ

तुम भी सफ़र में हो मैं भी

 

जाने कितने युग बीते

खोज है कि समाप्त ही नहीं होती

 

न न हम मिले न हों

ऐसा संभव ही नहीं

कभी न कभी

किसी न किसी

ज़िंदगी के स्टेशन पर

हम अवश्य मिले होंगे

हमने एक दूजे को

बहुत देर तक देखा भी होगा

मगर

 

सुनो देर कभी नहीं होती

बस हमारी पुकार में दम होना चाहिए

जब आत्मा आत्मा को पुकारेगी

जब तुम्हारी चेतना

मेरी चेतना को स्पर्श करेगी

मिलन पूर्णता प्राप्त कर लेगा

बस तुम्हें और मुझे

अपनी पुकार में वो कशिश

वो तड़प वो दर्द वो असर लाना होगा

कि कायनात का ज़र्रा ज़र्रा रोशन हो जाए

 

ये शरीरों का नहीं

ये रूहों का नहीं

ये प्यास का प्यास से मिलन होगा

जहाँ प्यास ही पूर्णता प्राप्त करेगी

 

बस अब हमें उसी दिव्यता को छूना है

हर भौतिक स्पर्श से परे

देहराग से आत्मराग की ओर प्रस्थान का समय है ये

 

 

ये इश्का और इल्हाम की प्रेम कहानी है. प्रेम अनाम होता है. प्रेम में नामों की आवश्यकता होती ही नहीं. एक प्रेम शब्द में सारा ब्रह्माण्ड समाहित है फिर उसे किसी भी नाम से पुकारो वो प्रेम की पुकार ही होगी. इस उपन्यास में दोनों द्वारा एक दूजे को अनेक नामों से किया संबोधन इश्क़ की इंतहा है जहाँ हर शब्द हर भाव में केवल प्रेमी ही प्रेमी है। उससे इतर कोई संसार नहीं। कण कण में व्याप्ति यही होती है जब प्रेम की दिव्यता उस स्तर पर पहुँच जाती है जहाँ दो रहते ही नहीं। मैं का विलास  समस्त जगत हो जाता है। ये संबोधन नहीं प्रेम की सृष्टि का विस्तार है जहाँ अंत में एक शून्य ही बचता है और वो नाम देना इसी ओर इंगित करता है। यहाँ हर संबोधित किया जाने वाला शब्द प्रेम का स्वरूप बन गया है. प्रेम को किसी भी नाम से पुकारो रहेगा प्रेम ही, उसे आरम्भ से अंत तक दर्शाया गया है मानो लेखिका कहना चाहती है प्रेम के संसार में द्वि का क्या काम.

ये उपन्यास केवल प्रेम का विस्तार नहीं है। ये जीवन का वो पाठ है वो खोज है जिसके लिए उम्रभर इंसान भटकता है लेकिन उस तक पहुँच नहीं पाता।ये समाधि की अवस्था से भी परे की स्थिति है। जीवन दर्शन है। देह के स्तर पर घटित होने वाली क्रियाओं का योग नहीं है। एक रूहानी मौज है जिसमें अगर आप डूब गए फिर स्वयं विस्मृत हो जाता है। स्व का जहाँ अभाव है। मैं तू वह का ह्रास है। एक अविरल बजती धुन है। एक नाद, ब्रह्मांड का स्वर जिसमें न कुछ खोना है न पाना है बस वही बन जाना है। वो चेतना वो ऊर्जा जिसके दम पर ब्रह्मांड धड़कता है।

यही है वो लौ 🔥 जो लग जाये फिर जीवन, उसकी क्रियाएं, उसके कार्यकलाप सब गौण हो जाते हैं। आप आत्मानुभूति के उस स्तर पर होते हैं जहाँ सामने के दृश्य अदृश्य हो जाते हैं। एक स्मित सदा के लिए मुखमंडल पर ठहर जाती है।

ये उपन्यास प्रेम से दिव्यता तक पहुँचने का मार्ग दिखाता है। आत्मानुभूति की लौ से उज्ज्वल मुख पर वो शांति व्योत हो जाती है जो मनुष्य से बुद्ध बनाती है।

 

एक मौन भीतर गूँजता है

संवादरत रहता है

किससे?

कौन है जो प्रश्नकर्ता है

कौन है जो सुनता है

कौन है जो उत्तर देता है

 

ध्यानयोग की ये परम अवस्था है

अनुपम आनंद की ये दिव्य गाथा है

समझेगा वही

जिसने तलवार की धार पर पांव धरा हो

हलाहल पीया हो

 

ब्रह्मांड से साँस लेना

ऐसा एकाकार का भाव होना

यूँ ही संभव नहीं होता

 

ब्रहमांड से सांस लेने की अवस्था ही दिव्य स्थिति है. खुदी जहाँ मिट जाती है. रूमी कहते हैं – ब्रह्मांड में सब कुछ तुम्हारे भीतर है, सब कुछ अपने आप से माँग लो। मानो लेखिका इसी स्थिति का यहाँ दर्शन करा रही हैं. ब्रह्माण्ड से सांस लेना अर्थात अपने अन्दर ही सब कुछ पा लेना.

 

पत्र शैली और जीवन दर्शन :

सम्पूर्ण उपन्यास खतों का कोलाज है. बेशक लेखिका ने खतों को आधार बनाकर उपन्यास की रचना की है जो एक जोखिम भरा कार्य भी है क्योंकि आवश्यक नहीं ये प्रयोग हर पाठक की पसंद पर खरा उतरे लेकिन यही लेखक की खूबी होती है वो जब कोई शैली पकड़ता है तो ये नहीं सोचता ये किस पाठक को आकर्षित करेगी.  ये साधारण ख़त नहीं हैं. यहाँ जीवन दर्शन है, अध्यात्म है, प्रेम है. ये प्रेम और दिव्यता के बीजमंत्र हैं जिनमें रूहानी गीत गुनगुना रहे हैं। जिनकी भाषा अद्वितीय है, कूटनीति से भरी हुई लेकिन छद्म रहित। एक सरलता एक सहजता एक प्रवाह जो आपको एक ऐसे लोक में ले जाएगी जो प्रतीत तो प्रेमियों का लोक होगा लेकिन उसका स्तर दार्शनिक होगा जहाँ हर शब्द को डिकोड करने पर जीवन रहस्य खुलते दिखाई देंगे। जीवन के ही नहीं बल्कि मृत्यु के रहस्य भी। जहाँ मृत्यु कोई दुखद स्थिति नहीं एक संगी सहेली सी लहराती बलखाती मिलेगी जिसका आगमन केवल मुक्ति नहीं। जिसका होना अवश्यंभावी होते हुए भी नए द्वार खोलता है। कितने जीवन कितनी मृत्यु चक्र एक सतत बहता चक्र उसमें एक खोज का जारी रहना, जब तक उस स्तर तक पहुँच न जाना बस इसी प्रक्रिया का दर्शन ये उपन्यास कराता है। इसमें आनंद की अनुभूतियों की तरंगों पर नृत्यरत रहने की कला का दर्शन होता है जब लौ लग जाती है। यही तरंग है वो लौ 🔥 जिसके लगने के बाद कुछ पाना खोना नहीं बचता। जिसके बाद ये संसार तो छोड़ो मैं भी नहीं बचता। उस दिव्यता को स्पर्श करने के बाद आपकी मृत्यु हो जाती है आध्यात्मिक रूप से चाहे शारीरिक रूप उपस्थित क्यों न हो। यही तो है बुद्धत्व। यही है परम आनंद की अवस्था जिसे नेति नेति कह संबोधित किया जाता है क्योंकि ये वर्णनीय नहीं है। गूँगे के गुड़ सा स्वाद – अवर्णनीय । जिसकी मिठास में आप घुल जाते हो। बह जाते हो। मिट जाते हो। जब कुछ शेष बचता ही नहीं तो कौन किसे व्याख्यायित कर सकता है। आनंद का न कोई पर्याय है न विलोम। आनंद अर्थात् रस अर्थात् रसानुभूति जो स्वयं रस बन गया हो वो किसे व्यक्त कर सकता है? उसका अस्तित्व शेष रहा ही नहीं। इस स्तर को व्यक्त करता उपन्यास है ये, जो कहीं न कहीं रसो वयी स: के भाव को पुष्ट करता है अर्थात् वह आनंद ही है। यहाँ वह कौन है ? बहुत से ज्ञानियों ने वह को ईश्वर अर्थात् परमात्मा की संज्ञा दी है जबकि इसके वास्तविक अर्थ आनंद के संदर्भ में ही हैं। वह अर्थात् जिस की खोज में मनुष्य जन्मांतर से भटक रहा है वह आनंद ही है अर्थात् आनंद की स्थिति जिसके उपरांत तुम बचोगे ही नहीं स्वयं आनन्दस्वरूप हो जाओगे। “अगर आपके दिल में रोशनी है, तो आपको अपने घर का रास्ता मिल जाएगा” – रूमी के इन्हीं शब्दों को जैसे दोनों जीते हैं. एक ऐसा ही संसार अपने इर्द गिर्द रचते हैं.

 

उपन्यास उस स्थिति का दर्शन कराता है जहाँ जब दो वेब लेंथ एक ही फ्रीक्वेंसी पर चलती हैं तो जैसे शीशे के आरपार नज़र आता है वैसे ही दोनों एक दूसरे के प्रत्येक क्रियाकलाप के साक्षी बन जाते हैं वहां जिस्मों की दूरियाँ मायने नहीं रखतीं क्योंकि आत्मिक और मानसिक स्तर एक हो चुके होते हैं। यही कारण होता है वो बिना कहे सुने भी एक दूसरे को सुन लेते हैं जान लेते हैं। इसे तत्वतः एक होना कहा जाता है क्योंकि पाँच तत्वों से बना ये शरीर है और जब दोनों समान स्तर पर आ जायें तो उनके लिए कुछ भी कहना शेष नहीं बचता उपन्यास उस स्तर की व्याख्या करता है। “प्रेमी अंततः कहीं नहीं मिलते, वे हमेशा एक-दूसरे में होते हैं”- जब रूमी ऐसा कहते हैं तब वे इसी भाव को पुष्ट करते हैं जहाँ द्वैत है ही नहीं.

 

बिनु पद चलई सुनई बिनु काना

कर बिनु करम करई निधि नाना

आनन रहित सकल रस भोगी

बिनु बानी बकता बड़ जोगी

 

तुलसी की ये चौपाई ब्रह्म के संदर्भ में है और ब्रह्म क्या है यही आनंद की स्थिति है जिसमें पहुँचने पर ऐसी ही स्थिति आ जाती है जहाँ बिना पैर के चलना बिना कान के सुनना बिना हाथ के काम करना बिना मुँह के सभी रसों को ग्रहण कर लेना और बिना वाणी के संवाद कर लेना संभव हो जाता है। अब उसे ईश्वर नाम दो ब्रह्म नाम दो या आनंद एक ही बात है। नामों का फ़र्क़ केवल समझाने के लिए है। जिसे जिस भाषा में समझ आ जाए।

यहाँ इश्का और इल्हाम के माध्यम से बेतार के तार पर प्रेम से अध्यात्म की ओर जाने के मार्ग को दर्शाया गया है। खतों के माध्यम से समस्त जीवन दर्शन दर्शाया गया है।

बाबूषा कोहली

बाबूषा कोहली

प्रेम और अध्यात्म का संगम :

 

इश्क़ का ढोल जोर से बजाया जाता है वहाँ दुराव छिपाव नहीं होता। यदि एक पक्ष भी छिपाव करे तो यही अर्थ निकलता है अभी घड़ा कच्चा था पका नहीं। कुछ ऐसा ही पड़ाव इस रूहानी इश्क़ की राहों में भी आता है। अनंत का इश्का के लिए बेशर्त प्रेम एक अलग ही आख्यान रचता है जो सब स्वीकार करता है। दो प्रेमियों के प्रेम का स्वीकार खुले दिल से करना, वहीं इलहाम का नीति से अपने संबंध को छुपाये रखना कभी कभी एक अलौकिक संबंध में भी लौकिक दरार उत्पन्न कर सकता है। कभी ऐसे से दो जोड़ों को आधार बनाकर उनके रूहानी प्रेम पर मैंने भी एक कहानी लिखी थी – अमर प्रेम। लगभग ऐसा ही कथ्य था शायद तभी ये उपन्यास और इसका कथ्य अंदर तक स्पर्श कर गया। प्रेम को खुला आकाश चाहिए जिसमें उसकी सुगंध चहुँओर फैले, उसमें गतिरोध न हों, यदि गतिरोध है तो उसे दूर करना आवश्यक होता है. किसी भी पक्ष में ये कमी हो तो दूजे को चाहिए उसे अपने स्तर तक लाने के लिए कठोर प्रयास करे और ऐसा ही इश्का करती है. देखने में लगेगा इल्हाम को ब्रहमज्ञान है लेकिन प्रेम के आगे उसका ब्रह्मज्ञान भी कमजोर पड़ जाता है.

 

यहाँ प्रेम को आधार बनाकर एक दूसरे में अपने आत्म को समाहित करना जैसे ईश्वर का स्वरूप प्रेम बन गया हो। जैसे एक साधक के जीवन में ईश्वरीय अनुभूतियाँ जन्म लेती हैं और एक दिन वो परम सत्ता से एकाकार हो जाता है इन दो प्रेमियों की वही स्थिति उपन्यास दर्शाता है। जरूरी नहीं आध्यात्मिक मार्ग से जाना और पाना, कई बार प्रेम मार्ग से भी पहुँचा जाता है उस अवस्था तक जिसमें पहुँचने के बाद न कुछ पाना है न खोना। न होना बचता है न ही न होना।

“ये तो प्रेम की बात है उधो बंदगी इतनी सस्ती नहीं है”

गोपियों की जो स्थिति होती है उसी स्थिति को इश्का और इलहाम पहुंचते हैं। जहाँ मिलन है वहाँ विरह भी है। वो प्रेम ही क्या जो अपने प्रत्येक रूप से परिचित न कराये। केवल प्रेम ही नहीं साधना के मार्ग पर आगे बढ़ते साधक के जीवन में भी ऐसी अनुभूतियाँ उत्पन्न होती हैं, कंटकाकीर्ण मार्ग पर भी चलना पड़ता है क्योंकि “यहाँ सर दे के होते हैं सौदे आशिक़ी इतनी सस्ती नहीं है” का भाव भी उत्पन्न होता है। ये प्रेम का वो दरिया होता है जिसे पार करना कोई सहज कार्य नहीं होता। “ख़ुसरो दरिया प्रेम का वा की उल्टी धार” वाले भाव का कदम कदम पर दर्शन होता है। कौन सा ऐसा भाव है जिसका उपन्यास दर्शन न कराता हो।

 

 

आप प्रेम के मार्ग से आगे बढ़ें, ध्यान के माध्यम से आगे बढ़ें, चाहे अध्यात्म के मार्ग से आगे बढ़ें अंततः पहुँचते वहीं हैं जहाँ अपना होना ही समाप्त हो जाये। एकात्म की स्थिति मिल जाये।

 

ब्रह्म की चर्चा ज्ञानी करता है और प्रेम की प्रेमी। प्रेम का नशा ऐसा होता है जो ज्ञानी के ज्ञान को धूल धूसरित कर देता है जैसे उद्धव के ज्ञान को गोपियों ने पल में धूल चटा दी। बिल्कुल ऐसी ही स्थिति इन दो प्रेमियों की है जहाँ इलहाम उद्धव की स्थिति में है तो इश्का गोपियों की। यही है खूबी इस उपन्यास की तत्व दर्शन, प्रेम और आनंद सभी को समाहित किया हुआ है लेकिन कहीं भी उस रूप में जिक्र नहीं है। पाठक ख़ुद ब ख़ुद रिलेट करने लगता है।

 

प्रेम की ऊँचाई आध्यात्मिक ऊँचाई से स्वतः रिलेट होने लगती है जब हिमालय की ऊँचाई और चींटी के संबंध को दर्शाया जाता है। “चींटी को ऊँचाई से गिरकर घायल होते देखा है” गहन भाव लिए है। जो एक बार प्रेम का हिमालय चढ़ गया उससे नीचे नहीं आ पाता क्योंकि वहाँ वो ब्रह्मानंद के सुख में डूब जाता है जो अनिर्वचनीय होता है। फिर यदि वो गिर भी जाये अर्थात् धरातल पर आ भी जाये लेकिन आंतरिक रूप से अपने आनंद में मगन रहता है।

वहीं प्रेम के पर्वत पर चढ़ने के बाद प्रेमी उसी भाव में मगन रहता है भाव दशा में ही प्रेमी से संवाद करता है, भाव दशा में ही लीलाएँ घटित होती हैं बिल्कुल वैसे ही जैसे पुराणों में वर्णित राधा और कृष्ण की लीलाएँ हैं। राधा की बिछोह में भाव दशा में ही कृष्ण साकार होते हैं जैसे सामने घटित हो रहा हो बिल्कुल वही दृश्य यहाँ नज़र आते हैं। जैसे आधुनिक राधा कृष्ण अवतरित हो गए हों और उनके रूप में प्रेम का साकार दर्शन हो रहा हो।

भाव में ही हँसना, भाव में ही रोना, भाव में ही मिलन, भाव में ही बिछोह, भाव में ही लड़ाई, भाव में ही मनुहार कौन सा ऐसा भाव है जो यहाँ दर्ज न हुआ हो।

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समकालीन सन्दर्भ और यथार्थ बोध :

 

ऐसा नहीं है उपन्यास केवल भाव संसार की बात ही करता हो. उपन्यास वर्तमान को साथ लेकर चलता है. वर्तमान की स्थिति और परिस्थिति दोनों का दर्शन कराता है और इल्हाम को यथार्थबोध भी कराता है. प्रेम को बंधन स्वीकार्य नहीं. बंधन कैसा भी हो, वो बाधक प्रतीत होता है. इश्का का प्रेम बिर्बंध है. जिसने अपनी सुगंध से तमाम कायनात को सुवासित कर रखा है तभी तो पति के रूप में अनंत के प्रेम, उसकी गहन अध्यात्मिक और व्यावहारिक दृष्टि का अवलोकन उपन्यास कराता है. उसे इल्हाम का इश्का के जीवन में होना केवल स्वीकार्य ही नहीं है बल्कि यहाँ ऐसा प्रतीत होता है जैसे तीनों एक ही डोर से बंधे हैं, तीनों में कोई अंतर नहीं. इश्का का संसार ऐसा ही है जहाँ जो भी उसके आसपास है अभिन्न है. उनमें आपस में कोई अंतर नहीं तभी तो उस ऊंचाई को स्पर्श कर पाती है. प्रेम आपको, संबंधों को एक स्पेस भी देता है यदि वास्तव में प्रेम है. यदि केवल शारीरिक स्तर पर है तो वहां प्रेम केवल शब्द भर होता है, इस महीनता को भी लेखिका रेखांकित करती हैं.

वास्तव में देखा जाए तो ये उपन्यास एक ऐसी यात्रा है जिसमें लौकिक से अलौकिक तक की यात्रा तो होती ही है साथ ही अलौकिकता के साथ वर्तमान भी अवगुंठित है. ये अलौकिकता से लौकिकता की ओर प्रस्थान का बिंदु भी देता है. ये उपन्यास केवल कोरी भावनाओं का संगम नहीं है. यहाँ जीवन जीने की एक दृष्टि भी है, संबंधों में दी जाने वाली स्पेस भी है, एकात्म होने का दर्शन भी है. समस्या संबंधों को थोपने से होती है. समस्या अविश्वास से होती है लेकिन उपन्यास इन्हीं सब बातों का अतिक्रमण करते हुए नवीन दृष्टि से परिचित भी कराता है.

उपन्यास सूफी परंपरा, अद्वैतवाद, प्रेम और भक्ति सभी को साथ लेकर चलता है जिसमें रूमी, तुलसी, गोपी प्रेम और उनका दर्शन सभी विस्तार से व्याख्यायित होता है. उपन्यास में रूमी का अध्यात्म और दर्शन मुखर रूप से दिग्दर्शित होते हैं. रूमी की छाप नज़र आती है. श्रीमद भागवद में वर्णित राधा कृष्ण प्रेम, बिछोह और उनकी अध्यात्मिक ऊँचाई सभी मिलकर जैसे इस उपन्यास की रचना करते हैं. यहाँ प्रकृति का कण कण तरंगित होता है, पञ्च तत्वों से संवाद और एकात्म भी उभरकर सम्मुख आता है. आप इसे किसी एक रेखा में नहीं बाँध सकते.

 

असम्भावना में सम्भावना का आख्यान :

आज के डिजिटल और त्वरित संवाद के युग में, यहाँ दो ऐसे प्राणियों को दिखाया गया है, जहाँ दोनों एक दूजे से अनजान हैं, न एक दूसरे को कभी देखा, न मिले, न फोन पर बात की, जो भी संवाद हो रहा है या तो खतों के माध्यम से हो रहा है या फिर सूक्ष्म आत्मिक तरंगों पर जहाँ बेतार के तार पर संवाद संभव होता है. अब प्रश्न उठता है क्या आज के दौर में ऐसा प्रेम संभव है? तो इसका उत्तर किसी के लिए भी सहज नहीं. बाबुषा ने असम्भावना में सम्भावना का आख्यान रचा है जिसके लिए वो बधाई की पात्र हैं.

लौ  प्रेम से अध्यात्म और अध्यात्म से आत्मविसर्जन तक की यात्रा है। यह उस अवस्था का दर्शन कराता है जहाँ ‘मैं’ का लोप हो जाता है और केवल आनंद शेष रह जाता है।

यह उपन्यास पाठक को केवल पढ़ने का नहीं, स्वयं में उतरने का अनुभव देता है। जो पाठक प्रेम को केवल भावनात्मक घटना नहीं, बल्कि आध्यात्मिक साधना के रूप में देखना चाहते हैं—उनके लिए लौ  एक महत्वपूर्ण और स्मरणीय कृति है।

 

वन्दना गुप्ता

वंदना गुप्ता

 

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