काव्य जगत
राग झुमर सुन रहा हूँ
रचयिता—–रंगनाथ द्विवेदी मै उसके कान की बाली का राग झुमर सुन रहा हूं, कंगन,बिछुवे,चुड़ियां संगत कर रही, कोई घराना नही …
रंडी—एक वीभत्स और भयावह यथार्थ
“अँधेरी रात मे——- वे शहर की स्ट्रिट लाइट से टेक लगा, अपना आधे से अधिक वक्षस्थल खोले, किसी ग्राहक को …
कतरा कतरा पिघल रहा है
साधना सिंह कतरा कतरा पिघल रहा है दिल नही मेरा संभल रहा है || हवा भी ऐसे सुलग रही …
स्मृति – पिता की अस्थियां ….
सुशील यादव पिता , बस दो दिन पहले आपकी चिता का अग्नि-संस्कार कर लौटा था घर …. माँ की नजर …
मदर्स डे : माँ को समर्पित कुछ भाव पुष्प ~रंगनाथ द्विवेदी
जहाँ एक तरफ माँ का प्यार अनमोल है वही हर संतान अपनी माँ के प्रति भावनाओं का समुद्र सीने में …
निर्भया को न्याय है
रचयिता—–रंगनाथ द्विवेदी। जज कालोनी,मियाँपुर जौनपुर। ये महज़ फाँसी नहीं————— उस निर्भया को न्याय है। जो चीखी,तड़पी,छटपटाई तेरी विकृत कुंठा के …
घूंघट वाली औरत और जींस वाली औरत
आँखें फाड़ – फाड़ कर देखती है घूंघट वाली औरत पड़ोस में आकर बसी जींस पहनने वाली औरत को याद …
बिकते शब्द
शब्द मीठे /कडवे बनाओं तो बन जाते शस्त्र तीखे बाण /कानों को अप्रिय आदेश हौसला ,ढाढंस ऊर्जा बढ़ाते मौत को …
सतरंगिनी – ओमकार मणि त्रिपाठी की सात कवितायें
1… आखिर कब तक….? डूबे रहोगे सिर्फ बौद्धिक व्यभिचार में वक्त पुकार रहा हैसमस्याओं के उपचारकी बाट जोह रहे हैं …
शिक्षक दिवसपर विशेष : गुरू चरण सीखें
बैठ कर हम गुरू चरण सीखे सभी मान दे कर गुरू को सदा पूजे सभी ज्ञान की नई विधा सीख …
कुछ चुनिन्दा शेर
मेरा मशवरा है यही की तोड़ दो उसे जिस आईने में ऐब अपने दिखाई न दें कहती है मेरे साथ कब्र …
सच की राहों में देखे हैं कांटे बहुत,
सच की राहों में देखे हैं कांटे बहुत,पर,कदम अपने कभी डगमगाए नहीं।बदचलन है जमाने की चलती हवा,इसलिए दीप हमने जलाए …
जिन्दगी कुछ यूं तन्हा होने लगी है
जिन्दगी कुछ यूं तन्हा होने लगी है अंधेरों से भी दोस्ती होने लगी है चमकते उजालों से लगता है डर …
सपेरे की बिटिया
कभी पढ़ने आती थी हमारे स्कूल में, सपेरो की बस्ती से————— एक सपेरे की बिटिया। वे तमाम किस्से सुनाती थी …