नए साल पर प्रेम की काव्य गाथा -दिसंबर बनके हमारे प्यार की ऐनवर्सरी आई थी
यूँ तो प्यार का कोई मौसम नहीं होता | परन्तु आज हम एक ऐसे प्रेम की मोहक गाथा ले कर …
यूँ तो प्यार का कोई मौसम नहीं होता | परन्तु आज हम एक ऐसे प्रेम की मोहक गाथा ले कर …
चढ़े हाशिये पर सम्बोधन ठहरी शब्द-नदी।। चुप्पी साधे पड़े हुए हैं कितने ही प्रतिमान यहाँ अर्थहीन हो चुकी समीक्षा सोई …
पिता , बस दो दिन पहले आपकी चिता का अग्नि-संस्कार कर लौटा था घर …. माँ की नजर में खुद …
हाथों में मेहँदी, पाँव में आलता और मांग में ,सिन्दूरी आभा लिए खड़ी है दुल्हन देहरी पर आँखों से गालों …
अनजान बेचैनियों में लिपटे, मेरे ये इन्तज़ार के लम्हें तुम्हें आवाज़ देना चाहते हैं.. पर मेरा मन सहम जाता …
वेग से बह रहा समय, उम्र कटती जा रही है । विरह की बह रही नदी, सब्र घटता जा रहा …
आँखें फाड़ – फाड़ कर देखती है घूंघट वाली औरत पड़ोस में आकर बसी जींस पहनने वाली औरत को याद …