“ना तुम जानो ना हम”

‘ हैलो मौम …, कैसे हो आप …’ ‘ अरे श्रद्धा ..! तुम कब आई . कोई खबर भी नही . अचानक से कैसे ...?’ ‘ मौम , मेरे एग्ज़ा म ...


हैलो मौम…, कैसे हो आप…’
अरे श्रद्धा..! तुम कब आई. कोई खबर भी नही. अचानक से कैसे...?’
मौम, मेरे एग्ज़ा ख़त्म हो गये तो सोचा क्यूँ ना घर कर आपको सर्प्राइज़ दूं. क्यूँ? कैसा रहा सर्प्राइज़...?’



बहुत बढ़िया बेटा..’
और वातावरण में हँसी की गूँज.
आज सब तुम्हारी पसंद का बनेगा. राजमा, जीरा राइस और…’
औरबूँदी का रायता…’
फिर हँसी के ठहाके
मौम, आज नानू के घर जाने का मन है..’
तो हम अपने बेटी के मन की हर बात पूरी करेंगे.. और…’
नानू के घर चलेंगे…’ दोनो चहकते हुए बोल उठीं
अभी दोनो माँ बेटी ने खाना शुरू ही किया था कि, फोन की घंटी बजी.


हेलो…, जी कौन..?’
'मेरा नाम गिरीश है. मैं सिविल अस्पताल से बोल रहा हूँ. सड़क दुर्घटना में एक व्यक्ति को गंभीर चोटें आई हैं और उनकी जेब से मुझे आपका नंबर मिला इसलिए आपको फोन मिला दिया. क्या आप उन्हें जानती हैं.'
'क्या नाम है उनका…?'
'जी, राकेश..'
'क्या..?'


'अगर आप उन्हें जानती हैं तो कृपया आप सिविल अस्पताल में जल्दी जाइए.'
'जी नही. मैं इस नाम के किसी भी व्यक्ति को नही जानती.'
और अर्चना ने फोन रख दिया..
'किसका फोन था माँ?'
'कुछ नही बेटा. रौंग नंबर था.'

अगली सुबह अर्चना घर से ये कह कर निकली कि, ज़रूरी काम से शहर से बाहर जा रही हूँ. शाम तक लौटूँगी.
सुबह के ग्यारह बज रहे हैं. अर्चना अस्पताल में दाखिल हुई
'सुनिए, मेरा नाम अर्चना है कल राकेश नाम के एक व्यक्ति को यहाँ दाखिल करवाया गया था. वो कहाँ पर हैं.' अर्चना ने वहाँ की रिसेप्षनिस्ट से पूछा.
'आप उनकी क्या लगती हैं?'
'मैंमैं पत्नी हूँ उनकी..'


'उनका कल शाम को ही देहांत हो गया. कोई भी रिश्तेदार ना आने पर अस्पताल की ओर से उनका अंतिम संस्कार कर दिया गया.'


अर्चना तो रो भी नही सकती थी. राकेश से उसका रिश्ता कब का बिखर चुका था. आज से बीस बरस पहले के पन्नों में दोनो ने एक दूसरे के साथ रहने की कस्में खाई थी. राकेश अर्चना से बहुत स्नेह करता था. घरवालों की सहमति से ही दोनो ने शादी भी की. शादी के कुछ महीनों बाद ही राकेश को किसी काम से दिल्ली जाना पड़ा और फिर उसने दिल्ली में ही नौकरी भी कर ली. वो दिल्ली से वापिस नही लौटा. घरवालों के फोन गये पर कोई भी जवाब नही मिल पाया. फिर अर्चना ने दिल्ली जाने का फैंसला किया. राकेश के पते के बारे में तो वो कुछ जानती नही थी. उसकी कंपनी के बारे में वो जितना जानती थी उसी के सहारे राकेश तक पहुँचने में सफल रही. राकेश के दफ़्तर पहुँचने पर उसे पता चलता है कि वो आज दफ़्तर नही आया. उसके घर का पता मालूम किया और अर्चना वहाँ पहुँच गयी.


अर्चना ने फ्लैट की घंटी बजाईदरवाजा खुला
'जी कहिए, किससे मिलना है आपको..?'
'क्या राकेश यहीं रहते हैं..?'
'जी हाँ..आप कौन?'
'मेरा नाम…'
अर्चना अभी अपने सच को कहने ही वाली थी कि.. इससे पहले ही सब मौन हो गया...
'तुमतुम यहाँ कैसे...??'
'तुम इसे जानते हो राकेश..? कौन है ये..?'
'उल्टे फेरे लेते हुए अर्चना वहाँ से चली आई..'


घर में किसी को कोई खबर नही कि राकेश कहाँ है, अर्चना कहाँ है. अर्चना के माता-पिता उसे ले कर बहुत चिंतित थे. उसके भाई को दिल्ली भेजा गया.. और यहाँ कर उसे सारी सच्चाई का पता चला. लेकिन, अर्चना का कुछ भी पता ना चल पाया.. हताश, वो लौट गया.


अर्चना ने अपने जीवन को समाप्त करने का निर्णय ले लिया. तीन महीने की गर्भवती वो अब कहाँ जाती. उसके पास कोई विकल्प नही था. ससुराल जाना नही चाहती थी और अपने मायके में क्या मुँह ले कर जाए. क्योंकि पसंद तो अर्चना की ही थी. कदम उसे कहाँ ले जा रहे थे वो भी नही जानती थी. सड़क को पार करते समय उसके मन में एक भयावह विचार आया कि क्यूँ ना वो अगली सड़क को पार करे ही ना. हाँ यही ठीक रहेगा..
गाड़ी की ज़बरदस्त ब्रेक लगी...


अरे भाई ध्यान से.. अभी कुछ अनहोनी हो जाती तो लेने के देने पड़ जाते..’
अर्चना कुछ ना बोली.
गाड़ी का दरवाज़ा खुला और 40-45 वर्ष का एक व्यक्ति. सफेद कुर्ता-पायजामा और पैरों में कोलपुरी जूती पहने हुए बाहर निकला.


क्या बात है बेटा. कहीं जाना है क्या..? रास्ता भूल गई हो क्या.. ? मैं कुछ मदद कर दूं...?’
अर्चना सुन्न खड़ी. मुँह से एक भी शब्द नही फूट रहा था.
देखो बेटा कुछ तो बताओ.. कौन हो तुम? और कहाँ जाना है तुम्हे?’
कहाँजाना हैमुझे....?हांनहीपता नहीकहाँजाना.. है.. मुझे...’


शब्दों को ढूंढ कर संजोने का असफल प्रयास करती हुई संजना फिर सन्नाटे की गोद में जा बैठी | ऐसे कई सन्नाटे होते हैं जो व्यक्ति के जीवन के साथ जुड़े होते हैं और कई बार उनमें से निकलना मुश्किल हो जाता है | दिल बहुत नाजुक होता है | इसे जितना भ्रम में रखो उतनी ही इसकी उम्र बढ़ जाती है | भ्रम टूटा तो यह भी टूट जाता है | परन्तु हम हमेशा भ्रम में नहीं रह सकते सच्चाई से परिचय होना बहुत जरूरी है |  




लगता है कोई ठिकाना नही है इसके पास.. कपूर साहिब ने एक अनुमान लगाया.. पर अपने साथ चलने के लिए भी कैसे कहूँक्यूँ भरोसा करेगी वो मुझपर.. मैं तो अंजान हूँ इसके लिए…’
कपूर साहिब ने अपने बेटी को फोन मिलाया और उसे वहाँ आने के लिए कहाकपूर साहिब ने अर्चना को सहारा देते हुए उठाया और अपनी बेटी पूर्वी का इंतज़ार करने लगे..
पापा क्या बात है..आपने अचानक मुझे यहाँ क्यूँ बुलाया है.. और येये कौन हैं…’
सब बताता हूँ बेटाइधर तो आओ..’
मेरी गाड़ी के साथ टकरा गयी ये..’
क्या ? कहीं चोट तो नही आई ना इसे…’

नही.. मुझे लगता है इसके साथ कुछ अनहोनी हुई हैजिससे ये परेशान है.. मैने तुम्हे यहाँ इसलिए बुलाया है कि तुम इसे घर ले जाओ और मैं पुलिस स्टेशन जा कर आता हूँ…’
ठीक है पापा.. आप निश्चिंत रहोमैं इसे घर ले जाती हूँ…’
पूर्वी, अर्चना को घर ले आईकुछहीसमयमेंकपूरसाहबभीघरपहुँचे
देखो बेटा इसे खाना खिला देना.. पता नही कुछ खाया है कि नही…’
पापा आपसे एक बात करनी थी..’
हां.. हां.. बेटा. बोलोक्या बात है…’
वोबात दरअसल ये है कि.. ये गर्भवती हैं…’
कपूर साहिब सोच में पड़ गये.. कि उन्हें क्या करना चाहिए
इसने कुछ अपने बारे में बताया..?’
हमम्म... बताया…’


पूर्वी ने सारी कहानी कपूर साहिब को बता दी..
तो ये माजरा हैइसके पति को तो जेल हो सकती है..’
नही पापा, वो कोई भी एक्शन नही लेना चाहती.. वो अपने अतीत कोभूल जाना चाहती है.. क्या हम उसके लिए कुछ नही कर सकते…?’
पूर्वी चिंतितस्वरमें... 

पूर्वी, बेटा एक काम करो. कुछ दिन उसे यहीं घर पर रखो और ये जानने की कोशिश करो कि उसके मन में क्या है. तो ही हम उसकी मदद कर पाएँगे..’
ठीक है पापा.’
पूर्वी सारा दिन अर्चना के साथ रहती और उसका खूब ख्याल रखती. दोनो अब बहनों जैसा रहने लगींअर्चना घर के कामों में पूर्वी का हाथ बटाने लगी. एक दिन पूर्वी ने अर्चना से पूछा कि अपने और अपने आने वाले बच्चे के भविष्य के बारे में क्या सोचा है. अगर कहीं नौकरी करना चाहती हो तो बता दो. मैं तुम्हारी मदद कर सकती हूँ.


हां. नौकरी तो मुझे करनी ही है. कब तक यूँही रहूंगी और आप लोगों पर भी बोझ…’
क्या बात कर रही हो बेटा.(कपूर साहिब ने अर्चना की बात को बीच में ही काटते हुए कहा) अगर तुम नौकरी करती भी तो भी यहाँ से कहीं नही जाओगी. समझी. जैसे मेरे लिए मेरी बेटी पूर्वी है ठीक वैसे तुम भी हो. इसलिए ये बात अपने मन से निकाल दो कि तुम हमारे लिए बोझ हो.’
पर…’
पर वर .. कुछ नही.. पूर्वी बोली.. जो पापा ने कह दिया है वैसा ही होगानो आर्ग्युमेंट्सपूर्वी ने माहौल में अपनापन भरते हुए कहा…’
और एक बात. अर्चना,इनकाग़ज़ों पर दस्तख़त कर दो बेटा…’
अर्चना ने बिना कुछ पढ़े ही दस्तख़त कर दिए


एक बार पढ़ तो लेती अर्चनाकपूर साहिब बोले..’
आपने मुझे अपनी बेटी माना है. तो मेरे लिए कुछ अच्छा ही सोचा होगा. इन काग़ज़ों को पढ़ कर मैं आपका अपमान करने की भूल नही कर सकती. एक अंजाने रिश्ते को विश्वास के अटूट बंधन में बाँधते हुए अर्चना ने कहा…’
वैसे किस बात के काग़ज़ हैं ये ..पापा.. पूर्वी ने पूछा..’

मैने अर्चना को गोद ले लिया हैअब अर्चना क़ानूनी तौर पर मेरी बेटी है. अर्चना के विश्वास पर कपूर साहिब ने अपनी पिता होने की मोहर लगाई.’


अर्चनाअपनीभावनाओं को व्यक्त नही कर पा रही थी. उसके लिए आज उसे सारी दुनिया फिर से मिल गयी हो जैसे. भगवान से कोई शिकायत नही रही थी. वो अपनी हर साँस में भगवान का शुक्रिया अदा कर रही थी. अपने जीवन में घटी उस दुर्घटना का अर्थ आज उसे समझ में रहा था. कुछ समय के लिए परमात्मा पर से उसका भरोसा उठ गया था. वो अपने हर आँसू का कसूरवार उसे ठहरा रही थी. पर आज.. आज उसके हर सवाल का जवाब उसे मिल गया था.

क्या मैं आपको बाऊजी कह सकती हूँ. भावुक हो कर अर्चना बोली.’
कपूर साहिब ने अपनी दोनो बेटियों को गले लगाया. एक पूरे परिवार का आभास हो रहा था उन्हें.’
मैं नही जानती राकेश कि तुम्हारे साथ ये क्यूँ हुआ. और ऐसी क्या बात हो गयी थी कि तुम इस तरह से…’

अर्चना की आँखों से राकेश पानी बन कर बहने लगा

शिवानी कोहली 

शिवानी कोहली 
ज़िला- होशियारपुर, पंजाब
पिनकोड- 144211

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