डॉ. गॉटमैन के एक्सपेरिमेंट को समझकर कर रिश्ता बचाने में उठाया गया “अगला कदम”
अगर आप इस समस्या से नहीं गुज़र रहे हैं तो आप भले ही शीर्षक पढ़ कर मुस्कुरा दें पर इस पीड़ा को वही समझ सकता है जिसके घर में संसद की तरह रोज पक्ष –विपक्ष की बहस होती हो |
कहते हैं की ये समय असहिष्णुता का समय है | लोग सोशल मीडिया पर अपने विचार व्यक्त करने से डरते हैं | एक तरह के विचार दूसरे विचारों से टकरा रहे हैं | कई बार इस टकराहट में असामान्य अशिष्ट भाषा का प्रयोग भी होता है |दरसल इसमें समय का कोई दोष नहीं है | अब हर किसी को सोशल प्लेटफोर्म मिला हुआ है | जिस कारण वो अपने विचार रख सकता है | लेकिन अगर विचार विरोधी हों तो ? ये सारी  नोक झोंक इन विचारधारों की लड़ाई के कारण ही है | जहाँ दोनों अपनी बात दूसरे पर थोपना कहते हैं | मनवाना चाहते हैं | क्योंकि उन्हें अपनी ही बात सही लगती है | अक्सर ऐसी ही विचारधाराओं की लड़ाई टी.वी. में जब दो पार्टियां आपस में बहस करती हैं तो देखने को मिलती है | उनका बढ़ा  हुआ ब्लड प्रेशर घर के अन्दर भी ब्लड प्रेशर बढ़ा  देता है | अगर बात टी .वी. की हो या सोशल मीडिया की  तो स्विच आपके हाथ में होता है | पर अगर आप का जीवन साथी ही विपरीत राजनैतिक विचारधारा का हो तो ?


शिरीष से जब मेरा यानी निकिता उर्फ़ निक्की का अरेंज विवाह हुआ था तो हम दोनों ने एक साथ एक सुंदर  घर बनाने का सपना देखा था |यूँ तो पति - पत्नी का रिश्ता अटूट बंधन होता है | परन्तु पहले दिन से ही हम दोनों में राजनैतिक विचारधारा के न मिलने के  कारण मनमुटाव होने लगा | मुझे  बहुत धक्का लगा जब मुझे पता चला की मैं वामपंथी या प्रगतिशील और शिरीष दक्षिणपंथी विचारधारा के समर्थक हैं | मैं रवीश पर फ़िदा और वो सुभाष चंद्रा  पर | मैं तो कभी कभी सुन भी लेती पर वो तो रविश का  नाम लेते ही चिल्लाने लगते | मैं  कुछ हद तक आधुनिकता की समर्थक वो घोर परंपरा वादी | कुल  मिला कर यह कह सकते हैं की हम दोनों पढ़े – लिखे , अच्छी नौकरी वाले वाले समझदार होते हुए भी हर बात पर उलझ जाते | इतना की एक दूसरे के साथ निभा पाने में असमर्थता लगने लगी थी |


अखबार की खबरें हमारे बेडरूम और किचन में ( यानी खाने और सोने में )  हम पर हावी हो रहीं थीं |ये नकारात्मकता  केवल ख़बरों तक ही सीमित नहीं रही | हम विचारधारा के आधार पर एक दूसरे की पर्सनाल्टी को जज करने लगे | हमारा घर कुरुक्षेत्र बनता जा रहा था |कब कैसे ये अटूट बंधन कमजोर पड़ता जा रहा था , हम जानते हुए भी नहीं जान पा रहे थे | 


 धीरे – धीरे दिन खिसकने लगे | मैं प्रेग्नेंट हो गयी | वैसे शुरू से शिरीष मेरे प्रति लविंग व् केयरिंग रहे हैं , मैं भी उनके प्रति वैसी ही हूँ पर राजनैतिक विचार धारा  की बात आते हुए हम दोनों एक दूसरे को नोच खाने को तैयार हो जाते | हमारी जान का दुश्मन अखबार सुबह – सुबह हमारे घर आ जाता | फिर ख़बरों की ऐनालिसिस में हमारा झगडा शुरू हो जाता | ट्रेन एक्सीडेंट में पक्ष और विपक्ष की क्या भूमिका हैं , अगला प्रधनमंत्री कौन बने , फलाना लीडर ज्यादा भ्रस्ट  है या ढीकाना,हम इस बात में भी लड़ पड़ते | सारा माहौल  बिगड़ जाता | हम दोनों झगड़े टालना चाहते  थे | पर झगड़े हर बात में हो रहे थे | क्योंकि हम एक दूसरे की नेगटिव एनालिसिस करने लगे थे | हमें हर बात में खोंट नज़र आने लगता | हर छोटी से छोटी बात में राजनैतिक दृष्टिकोण की भूमिका लगती | हम साथ रहना कहते थे पर हमारी जिंदगी नरक  होती जा रही थी | प्रेगनेंसी के समय इस बढ़ी हुई एंजाइटी के कारण मेरा स्वास्थ्य बिगड़ने लगा | बच्चे पर खतरा जान कर शिरीष मुझे डॉक्टर के पास ले गए | मेरी समस्या को समझते हुए डॉक्टर ने मुझे मनोचिकित्सक के पास भेज दिया | उन्होंने धैर्य  पूर्वक हमारी समस्या सुनी |उसे समझते देर न लगी की हमारी समस्या क्या है ? उन्होंने  बताया की राजनैतिक विचारधारा को अक्सर महत्व नहीं दिया जाता है परन्तु इससे कई बार घर में नकारात्मकता इतनी बढ़ जाती है की रिश्ता टूट जाता है | फिर मुझे रिलैक्स कर उसने डॉ . गॉटमैन व्के उनके एक्सपेरिमेंट के  बारे में बताया |

गॉटमैन का एक्सपेरिमेंट


 डॉ .गॉटमैन ने रिश्तों पर प्रयोग किये हैं | उनके अनुसार हर कपल में  झगडा होता है |चाहे गीला तौलिया बिस्तर पर रखने पर हो , खाने में नमक पर हो या आलसीपने पर हो या बिना कारण के हो | पर इतने झगड़ों के बावजूद भी कुछ शादियाँ टिकती हैं और कुछ टूट जाती हैं | इतने झगड़ों के बावजूद आखिर क्या है की कुछ शादियाँ टूट जाती हैं और कुछ टिकी रह जाती हैं | इस  पर 1970 में उन्होंने अपने सहयोगियों के साथ मिल कर एक्सपेरिमेंट किया | उन्होंने बहुत सारे जोड़ों को बुलाया और १५ मिनट में अपने किसी विवाद को सुलझा लेने को कहा | वहां उन्होंने उन्हें एक अलग  कमरा दिया | जिसकी रिकार्डिंग हो रही थी | उनका यह प्रयोग नौ साल तक चला | उन टेप्स  को सुनने के बाद व् उन कपल्स को नौ साल तक फॉलो करने के बाद डॉ. गॉटमैन ने यह निष्कर्ष निकाला की किसी भी जोड़े के झगड़ों को सुन कर 90 % सफलता के साथ यह बताया जा सकता है की इनमें से किस का रिश्ता ( शादी ) चलेगी व् किनमें अलगाव हो जाएगा |

कैसे निकाला डॉ गॉटमैन ने यह रिजल्ट


 इस रिजल्ट को निकालने में डॉ . गॉटमैन का सूक्ष्म निरिक्षण था | उन्होंने झगड़ों के आधार पर मैजिक रेशियो बनाया | जिसके लिए उन्होंने 5 :1 का स्केल चुना | डॉ . गॉटमैन के अनुसार वो कपल जिनका रिश्ता आगे चलना है वो झगडे के दौरान तमाम नेगेटिव बातों के बीच कुछ सकारात्मक बातें भी करते रहते हैं | यानी एक नकारात्मक बात के साथ पांच सकारात्मक  बातें | जैसे लड़ते – लड़ते हंस पड़ना , एक दूसरे की बात समझने की कोशिश करना या एम्पैथी से हाथ पकड लेना , उसकी शारीरिक अन्य तकलीफों का झगड़े के दौरान ध्यान रखना आदि | लेकिन जिनका रिश्ता नहीं चलता उनमें केवल नकारात्मक विचार – विनिमय होता है | गुस्सा अपने आप में नकारात्मकता आ जाती है | इसलिए पॉजिटिव इन्टेरेकशन जरूरी है | और अगर गुस्से के साथ ये सब रिपेयर वर्क न चले तो शादी का टूटना स्वाभाविक है |


 हमारे हाथ अपनी शादी को बचाए रखने का सूत्र लग गया था | हमने अपने  झगड़ों को स्केल पर नापा | हम ३ : १ पर पहुँच गए थे | यानी रिश्ते को बचने की सम्भावना ५० % थी | हमने अपने पर काम करना शुरू किया | आज हम अपनी ५ साल की बेटी व् ३ साल के बेटे के साथ खुशहाल जिंदगी जी रहे है | अगर आप के साथ भी ऐसी ही कोई समस्या है तो आप इन बातों पर ध्यान दें | क्योंकि राजनैतिक विवाद कहने को तो महज राजनैतिक विवाद हैं पर उनका असर पूरे दाम्पत्य जीवन पर पड़ता है |


१ ) अपने रिश्ते की समस्या को गंभीरता से लीजिये
                            

जब इतने झगडे होने लगे और शारीरिक व् मानसिक स्वास्थ्य पर असर पड़ने लगे | तो अपने रिश्ते की समस्या को गंभीरता से लीजिये | जैसा हमने किया | अपने रिश्ते की समस्या को सुलझाने के लिए मनोचिकित्सक के पास गए | याद रखिये कोइ परी नहीं आएगी व् ही कोई चमत्कार होगा जो रिश्ता एक दिन में ठीक हो जाएगा | घर के बड़े भी मेरी बेटी सही या मेरा बेटा  सही में बंटे  होते हैं | जिस कारण मामला सुलझने के बजाय उलझ जाता है |


२ )सहमत होने के लिए समझने के लिए बात सुनिए


 कई बार नकारात्मकता इतनी बढ़ जाती है की हम दूसरे की बात सुनना ही नहीं चाहते | या एक ने जरा सा मुंह खोला और दूसरा वहीँ से झगड़ना शुना कर देता हैं | यहाँ यह ध्यान रखना है की हम सहमत होने के लिए नहीं सुनने के लिए सुन  रहे हैं | इसलिए जब एक बोले तो दूसरे को बिना बीच में बात काटे यह समझने की कोशिश करी चाहिए की वो ऐसा क्यों कह रहा है | जैसे ट्रेन एक्सिडेंट के मामले में आप कह रहे हैं की सरकार की गलती नहीं है व् वो कह रहे हैं, कि  है | तो सहमत हुए बिना आप पूरी बात सुन कर समझने की कोशिश करिए की अगर वो ऐसा सोंच रहे हैं तो क्यों सोंच रहे हैं |


४ )किसी कॉमन पॉइंट पर चर्चा करना शुरू कर दें


 अगर आप देखते हैं की बातचीत के दौरान आपके किसी मसले पर अलग – अलग विचार आ रहे हैं  | तो प्राथमिकता इस बात को दीजिये की आपको घर में शांति रखनी है | जब मामला गर्म हो  रहा हो तो आप किसी कॉमन  पॉइंट पर बात करना शुरू कर दें | जैसे ये सरकार की वजह से हुआ या नहीं / विपक्ष जरूरत से ज्यादा शोर मचा रहा है के स्थान पट सॉल्यूशन पर विमर्श करिए | जो हो गया उसके स्थान पर अब क्या – क्या किया जा सकता है | पर बात करिए | क्योंकि विरोधी विचार रखते हुए भी दोनों देश का भला चाह रहे होते हैं |

५ ) जीतने के लिए नहीं विचार देने के लिए बात करिए



अक्सर राजनैतिक लड़ाई ईगो का प्रश्न बन जाती है | दिल के किसी कोने में हम जानते हैं की हम जिस पार्टी का सपोर्ट कर रहे हैं उसमें भी कुछ कमियाँ हैं | पर विचार विमर्श करते समय यह ईगो का प्रश्न  बन जाता है | हम जीतने के लिए बहस करने लगते हैं | याद रखिये जीतने के लिए चाहे आप घंटों बहस कर लें | अन्तत : दोनों हारते हैं | क्योंकि नकारात्मकता इतनी भर जाती है की राजनैतिक विवाद कब पर्सनल आरोप – प्रत्यारोप में बदल जाता है पता ही नहीं चलता |

५) जरूरत पड़ने पर ब्रेक लें



  अगर आप देख रहे हैं की कुछ ऐसा टॉपिक चल रहा है | जिस पर आप की गरमा गर्म बहस रोज के झगड़ों  में बदल रही है | तो जरूरी है थोडा ब्रेक लें | ख़बरों को नज़रंदाज़ करें | सोशल मीडिया से दूरी बनाये | क्योंकि हम यहाँ इन बहसों में अपने पक्ष के पॉइंट्स ढूंढते हैं | कई बार हमारे पक्ष के पॉइंट्स देने वाला व्यक्ति हमें बहुत करीब महसूस होने लगता है | ये बात जीवन साथी के साथ पैच अप करने से रोकती है व् आपसी दूरियाँ बढ़ सकती हैं | इसलिए आप दोनों न्यूज़ से ब्रेक लें | यकीन मानिए जब आप बहस नहीं कर रहे होंगे तब भी देश वैसा ही चलेगा जैसे चल रहा है | अलबत्ता आपका रिश्ता जरूर बेहतर चलने लगेगा |

६ ) सम्मान के साथ असहमत होइए


हर बात में सहमत होना जरूरी नहीं है |वहीँ असहमत होना भी गलत नहीं है |गलत है असहमति व्यक्त करने का तरीका | आप को तो कुछ पता ही नहीं है , आपके विचार तो बहुत गए बीते हैं, ऐसे तो आप देश को डुबो ही देंगे , उफ़ कितनी घटिया सोंच है आपकी ... अगर आप भी अपने विचार या असहमति  ऐसे ही व्यक्त करते हैं तो समझ जाइए की आप का रिश्ता खतरे मैं है | जरूरत है सम्मान के साथ असहमत हों | जैसे आप का दृष्टिकोण सही हो सकता है पर मेरे विचार से ..., या पूरे सम्मान के साथ मैं कहना चाहती /चाहता हूँ की ये विचार सही नहीं प्रतीत हो रहे आदि | यहाँ यह समझने की जरूरत है की रिश्ते किसी बात से नहीं बात कहने के तरीके से टूटते हैं |
७)विवाद के बीच – बीच हास्य पर ध्यान दें


विवाद तो जिंदगी का हिस्सा है | राजनैतिक विवाद आपके बीच में चल रहे हैं | इसका मतलब ये नहीं की आप एक दूसरे से प्यार नहीं करते | या किसी राजनैतिक पार्टी का पक्ष लेने के एवज में एक दूसरे को खोना चाहेंगे | इसलिए गंभीर तर्क – वितरक के बीच किसी मामूली  बात पर हास्य पैदा करने की कोशिश करें | हंसी  माहौल को हल्का कर देती है व् हँसी की नदी में नकारात्मकता झट से बह जाती है |

८ ) शब्दों से ज्यादा भावनाओं पर बात करें     

                                   
विवाद में अक्सर शब्द बहुत तीखे हो जाते हैं | ऐसे में शब्दों से ज्यादा भावनाओं पर ध्यान दें | जैसे किसी ट्रेन एक्सीडेंट में आपके पति सरकार के दोष छुपाने में या मज़बूरी गिनाने में लगे हैं और आप सरकार की कमियाँ गिनाने में लगी हैं तो बेहतर है आप उन लोगों की बात करें जो दुर्घटना में मारे गए हैं | उनके परिवार पर क्या बीती है | आप कह सकते हैं और समझ सकते हैं की आपका साथी उन्हीं की वजह से द्रवित है | पक्ष व्- विपक्ष की वजह से नहीं |

९ ) विवाद के बाद स्वस्थ बेलेंस बनाइये


  विवाद के बाद उसी पर मंथन कर के अगले विवाद के लिए पॉइंट्स ढूँढने के स्थान पर गॉटमैंन के अनुसार पॉजिटिव बातों पर ध्यान दें | जैसे किसी घरेलू फंक्शन की याद कर लें , कहीं बाहर जाने का प्रोग्राम बना लें | या उस वेकेशन को साथ – साथ याद करें जिसमें आप दोनों ने बहुत एन्जॉय किया था | ये उन घावों पर मलहम लगाने जैसा है | घाव भी ठीक और मन भी ठीक |

१० )विविधता का अपना ही मजा है

राजनैतिक झगड़ों पर अपना तापमान बढाने के स्थान पर सोंचिये की इस विविधता का अपना ही मजा है | अगर आप दोनों बिलकुल एक ही राजनैतिक विचारधारा के होते या एक बिलकुल भी एक्टिव नहीं होता तो बात करने के इतने मुद्दे ही कहाँ रहते | इन बातों के माध्यम से आप दोनों को एक दूसरे को जानने  समझने में कितनी सुविधा हुई है |आप संवाद हीनता का शिकार हो कर रिश्तों को खोने से बचे हैं |


  राजनैतिक विचारधारा कोई भी हो रिश्ते अनमोल हैं | आपस में लड़ना झगड़ना और फिर रिश्तों को सहेजना एक कला है | अगर वो कला आ गयी तो बहुत सारे विवादों के बीच में  भी आप  के घर को स्वर्ग बनने से कोई नहीं रोक सकता |

true story- deepika singh


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जीवन की रातों से गुज़र कर ही जाना जा सकता है की एक दिया जलना ही काफी होता है , जो रास्ता दिखाता है | बाकी सबको स्वयं परिस्तिथियों से लड़ना पड़ता है | बहुत समय से इसी दिशा में कुछ करने की योजना बन रही थी | उसी का मूर्त रूप लेकर आ रहा है
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जिसके अंतर्गत हमने कैरियर , रिश्ते , स्वास्थ्य , प्रियजन की मृत्यु , पैशन , अतीत में जीने आदि विभिन्न मुद्दों को उठाने का प्रयास कर रहे हैं | हर मंगलवार और शुक्रवार को इसकी कड़ी आप अटूट बंधन ब्लॉग पर पढ़ सकते हैं | हमें ख़ुशी है की इस फोरम में हमारे साथ अपने क्षेत्र के विशेषज्ञ व् कॉपी राइटर जुड़े हैं |आशा है हमेशा की तरह आप का स्नेह व् आशीर्वाद हमें मिलेगा व् हम समस्याग्रस्त जीवन में दिया जला कर कुछ हद अँधेरा मिटाने के प्रयास में सफल होंगे





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atoot bandhan

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3 comments so far,Add yours

  1. बहुत ही शिक्षाप्रद कहानी।

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  2. धन्यवाद ज्योति जी

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  3. ज्ञानवर्धक सार्थक कहानी द्वारा बहुत अच्छे ढंग से रिश्तों को समझने की सीख दी है

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