कुसुम पालीवाल जी के कहानी संग्रह कुछ अनकहा सा की विस्तृत समीक्षा

                           

समीक्षा -कुछ अनकहा सा -स्त्री जीवन के कुछ अव्यक्त दस्तावेज




बातें , बातें और बातें ...दिन भर हम सब कितना बोलते रहते हैं ...पर क्या हम वो बोल पाते हैं हैं जो बोलना चाहते हैं | कई बार बार शब्दों के इन समूहों के बीच में वो दर्द छिपे रहते हैं हैं जो हमारे सीने में दबे होते हैं क्योंकि उनको सुनने वाला कोई नहीं होता या फिर कई बार उन शब्दों को कह पाना हमारी हिम्मत की परीक्षा लेता है , आसान नहीं होता अपने बाहरी समाज स्वीकृत रूप के आवरण के तले अपने मन में छुपी उस  नितांत निजी पहचान को खोलना जिसको हम खुद भी नहीं देखना चाहते ...शायद इसी लिए रह जाता है बहुत कुछ अनकहा सा ..और इसी अनकहे  को शब्द देने की कोशिश की है कुसुम पालीवाल जी ने अपने कहानी संग्रह " कुछ अनकहा सा " में | जिसमें अनकहा केवल दर्द ही नहीं है प्रेम , समर्पण की वो भावनाएं भी हैं जिनको व्यक्त करने में शब्द बौने पड़ जाते हैं | इस संग्रह की ज्यादातर कहानियाँ स्त्री पात्रों के इर्द -गिर्द घूमती हैं | यह संग्रह किसी स्त्री विमर्श के साहित्यिक ढांचे से प्रेरित नहीं है , लेकिन धीरे से स्त्री जीवन की समस्याओं की कई परते खोल देता है ...जो ये सोचने पर विवश करती हैं कि इस दिशा में अभी बहुत काम किया जाना बाकी है |  कुसुम जी के कई काव्य संग्रह  पाठकों द्वारा पसंद किये जा चुके हैं ये उनका पहला कहानी संग्रह है | जाहिर है उनको इस पर भी पाठकों की प्रतिक्रियाएं व् स्नेह मिल रहा होगा | इस संग्रह को पढने के बाद मैंने भी इस अनकहे  पर कुछ कहने का मन बनाया है ....


कुछ अनकहा सा -स्त्री जीवन के कुछ अव्यक्त दस्तावेज 




"गूँज" इस संग्रह की पहली कहानी है | ये गरीब माता -पिता की उस बेटी की कहानी है  जिसकी पढाई बीच में रोक कर उसकी शादी कर दी जाती है | पिता शुरू में तो अपनी बेटी की शिक्षा में साथ देते हैं फिर उसी सामाजिक दवाब में आ जाते हैं जिसमें आकर ना जाने कितने पिता अपनी बेटियों की कच्ची उम्र  में शादी कर देते हैं कि पता नहीं कब अच्छा लड़का मिले | अपने ऋण से उऋण होने की जल्दी बेटी के सपनों पर कितनी भारी पड़ती है इसका उन्हें अंदाजा भी नहीं होता | यही हाल सरोज का भी है जो अपने सपनों को मन के बक्से में कैद करके कर्तव्यों की गठरी उठा कर ससुराल चली आती हैं | आम लड़कियों और सरोज में फर्क बस इतना है कि उसके पास माँ की शिक्षा की वो थाती है जो आम लड़कियों को नसीब नहीं होती | उसकी माँ ने विदा होते समय  चावल के दानों के साथ उसके आँचल के छोर में ये वाक्य भी बाँध दिए थे कि ,

" बेटा अपना अपमान मत होने देना , मर्द जाति  का हाथ एक बार उठ जाता हैं तो बार -बार उठता हैं तो बार -बार उठता है और इस तरह औरत का समूचा अस्तित्व ही खतरे में आ जाता हैं |" 

अपने आस -पास देखिये , कितनी माएं हैं जो ऐसी शिक्षा अपनी बेटी को देती हैं | ये सरोज की थाती है | शराबी पति , धीरे -धीरे बिकती जमीन , हाथ में कलम के स्थान पर गोबर कंडा पाथना और घर और बच्चों की परवरिश के लिए दूसरों के घर जाकर सफाई -बर्तन करना , सरोज हर जुल्म बर्दाश्त करती हैं | लेकिन जब एक दिन उसका पति उस पर हाथ उठाता  है, तो   ....अपने शराबी पति के लिए किये गए सारे त्याग समर्पण भूल कर एक झन्नाटेदार तमाचा उसे भी मारती है | ये गूँज उसी तमाचे की है .... जिसकी आवाज़ उसकी छोटी से झुग्गी के चारों ओर फ़ैल जाती है |

ये कहानी घरेलु हिंसा के खिलाफ स्त्री के सशक्त हो कर खड़े होने की वकालत करती है | अमीर हो , गरीब हो , हमारा देश हो या अमेरिका हर जगह पुरुष द्वारा स्त्री के पिटने की काली दास्तानें हैं | कितनी सशक्त महिलाएं बरसों बाद जब अपने पति से अलग हुई तो उन्होंने भी इस राज का खुलासा किया कि वो अपने पति से रोज पिटती थीं | आखिर क्या है जो महिलाएं ऐसे रिश्ते में रहती हैं ... पिटती हैं और आँसूं बहाती  हैं | हो सकता है हर स्त्री का पति सरोज के पति की तरह शराब से खोखले हुए शरीर वाला न हो और वो उस पर हाथ ना उठा सके पर पर अन्याय के खिलाफ पहले दिन से ही वो घर के बाहर आ कर खुल कर बोल सकती है | और शब्दों के इस थप्पड़ की गूँज भी कम नहीं होगी |


"कुछ अनकहा सा"   कहानी एक रेप विक्टिम की कहानी है | कहानी लम्बी है और कई मोड़ों से गुज़रती है | कहीं -कहीं हल्का सा तारतम्य टूटता है जिसे कुसुम जी  फिर साध ले जाती हैं | कहानी एक अनाथ बच्ची नर्गिस की है , जिसे उसका शराबी चाचा फरजाना बी को घरेलु काम करवाने के लिए बेंच देता है | उस समय नर्गिस की उम्र मात्र नौ साल होती   है | फरजाना बी एक समाज -सेविका हैं उनके तीन बेटे हैं सलीम , कलीम और नदीम | जिन्हें नर्गिस भाईजान कहती और समझती है | अपने कार्यकौशल से सबका ल जीतते हुए नर्गिस उस घर में   है ... और   साथ ही बड़ी होती है जाती है उसकी अप्रतिम सुंदरता जो तीनों बेटों के लिए आकर्षण का केंद्र हैं | एक  दिन बड़ा बेटा उसे अकेले में दबोच  लेता है | अपनी लुटी हुई इज्ज़त और टूटे मन  साथ जब वो फरजाना बी का सामना करती है तो वो उसे देख कर भी अनदेखा करती है | यहीं से दूसरे भाई को भी शह मिलती है और दोनों भाई जब -तब उसका उपभोग करने लगते हैं | रोज़ -रोज़ होते इन हमलों से खौफजदा बच्ची जो कभी कश्मीरी सेब सी थी  जाती है |


ऐसे में तीसरा भाई नदीम मसीहा बन कर आता है और उससे निकाह का प्रस्ताव रख देता है | नदीम सिर्फ उसके शरीर को ही नहीं भोगना चाहता  उससे प्रेम भी करता है | यहीं  नर्गिस की जिन्दगी  फिर से बहार आती है | नर्गिस से निकाह कर वो उसे ले अलीगढ में बस जाता है ताकि उसके भाइयों का साया भी नर्गिस पर ना पड़े | अपना घर , जायदाद छोड़ कर आया हुआ नदीम एक कंपनी में काम करते हुए कभी खुद का व्यापार खड़ा करने  सपना देखता है , परन्तु  एक के बाद   बेटियों होने , परिवार के खर्चे बढ़ने से वो     अठन्नी खर्चा रुपईया के फेर में पड़  जाता हैं | नर्गिस को  बाहर काम पर जाने देना नहीं चाहता | उसकी निराशा कुंठा दोनों के बीच बढ़ते झगड़ों की वजह बनती जा रही थी |

ऐसे में एक दिन नदीम अलीगढ छोड़ वापस अपने घर में अपने परिवार के साथ रहने का फैसला करता है | यहीं पर नर्गिस  दिल बैठ जाता है अब उसे अपनी फ़िक्र से कहीं ज्यादा अपनी बड़ी होती तीनों बेटियों की फ़िक्र है जो संभवत : उन दो भाइयों द्वारा दबोच ली जायेंगी |


अपनी बेटियों के हक़ में वो नदीम से अलग होने का फैसला करती है और चुपचाप बेटियों को लेकर दूर चली जाती है | उसे विश्वास है कि वो अपने इन अनकहे  दर्दों को अपनी बेटियों को समझा पाएगी... और अपनी बेटियों की जिन्दगी इस तरह से संवारेगी कि उनकी जिन्दगी में कोई दर्द ना हो |


पूरी कहानी  "सैड मोड " में चलती है | एक भारीपन का अहसास होता है | असली जिंदगी में भी तो अनाथ ,  रेप विक्टिम का दुःख के इस दरिया से निकलना आसान नहीं होता | कहानी बीच में थोडा सा खिचती है पर एक स्त्री के संघर्ष की राह को चुनने और अपनी बच्चियों को बेहतर भविष्य देने के सपने के साथ एक सार्थक अंत पर समाप्त होती है  |

"भीखू "कहानी अटूट बंधन में प्रकाशित हो चुकी है | आप चाहें तो इस लिंक पर पढ़ सकते हैं | ये कहानी भी एक शराबी पुरुष की है , जो शराब की लत में अपने घर -परिवार सब से बेखबर धुत्त रहता है | घर में खाने पीने के लाले पड़ने पर उसकी पत्नी अपनी जवान होती बेटी को जमींदार की पत्नी की सेवा के लिए सौंप देती हैं |  हालांकि उसे पता होता है कि उसे जमींदार की जरूरी , गैर जरूरी इच्छाओं का पालन करना पड़ेगा पर  पति के इलाज के लिए अपनी बेटी को इस कीचड में उतार देती है | दर्द से सूखती बेटी और माँ का वार्तालाप सुन कर भीखू का आत्मसम्मान जागता है और वह शराब छोड़ कर अपने परिवार के भरण -पोषण का संकल्प लेता है |


कहानी छोटी है पर इसमें शराबी व्यक्ति के परिवार के उस खौफ  और दर्द को दिखाया गया है जिसको वो भोगता है | शराब की लत केवल एक व्यक्ति को नहीं खाती पूरे परिवार को लीलती है | काश हर शराबी व्यक्ति को अपने परिवार की ये पीड़ा दिखाई दे और उसका आत्मसम्मान जगे |

सरप्राइज़ " इन भारी भरकम कहानियों के बीच में एक नाजुक सी कहानी है जो करवाचौथ के दिन पति के अचानक से आ कर सरप्राइज देने पर आधारित है |कहानी एक मीठा सा अहसास देती है |


"अफोर्ड "कहानी बढ़ती आकांक्षाओ को ओफोर्ड करने की ख्वाइश में कार्ल  गर्ल बनी लड़की की कहानी है | इस रास्ते पर चल कर वो बहुत सी दौलत कमाती है और बहुत कुछ अफोर्ड करने लगती है जो उसकी उम्र व् समकक्ष नौकरी की लडकियां नहीं कर पाती |  एक गलत रास्ते पर पड़ने के बाद उसे अहसास होता है कि यहाँ सब उसकी देह के भूखे हैं, और तभी कामना जागती है कि कोई तो उसके जीवन में हो जो उसके कोमल मन और भावनाओं को अफोर्ड कर सके | तब उसका दोस्त आमिर हाथ बढ़ाता है | कहानी का सुखद अंत सुकून देता है पर हकीकत में इतनी भाग्यशाली लडकियां नहीं होती और एक बार इस दलदल में गिर कर उबर नहीं पातीं |



" आत्म सम्मान " में एक बोल्ड विषय को उठाया गया है | ये कहानी स्त्री -पुरुष के संबंधों पर आधारित है | आम भारतीय घरों में आज भी जब पति  है तो स्त्री  खुद को समर्पित कर देती है पर जब पत्नी की इच्छा हो तो पति उसके आत्मसम्मान को कुचलने में कोई  गुरेज नहीं करता |

कहानी पति के अन्तरंग रिश्तों से परहेज करने पर  हैं | मधुमेह की बिमारी उसके शरीर को खोखला कर रही है और कहीं न कहीं उसे फेल हो जाने का डर है  इसलिए वो जब तब पत्नी की इच्छाओं को कुचलता रहता है , ना खुद पहल करता है ना पत्नी की पहल का समुचित उत्तर देता है | पत्नी के समझाने बुझाने पर वो डॉक्टर के पास जाता है , कुछ सामन्य भी होता है , फिर भी उसे असफल हो जाने का भय है ... इस लिए खुद की इच्छा और पत्नी की इच्छा में वो एक सपष्ट लकीर खींच देता है | बार -बार पत्नी खुद को अपमानित महसूस करती है |


कहानी में पत्नी का घरेलु सहायिका के साथ हुआ वार्तालाप स्त्री मन की कई परते खोलता है | ये एक ऐसा विषय है जिस पर आम तौर पर पत्नियां मौन रहती है ... पर इसका प्रभाव उनके पूरे व्यक्तित्व पर पड़ता है | वो लिखती हैं ...

" जिस औरत को अन्तरंग पलों में अपने पति का पूर्ण समर्पण मिलता है , उसका आत्मसम्मान अपनी नज़र में तो रहता ही है , साथ ही औरों को भी आत्मतुष्टि उसके चेहरे पर नज़र आ ही जाती है |" 



 लेखिका इस मनोदशा को व्यक्त करने केलिए अखबार की कटिंग का इस्तेमाल करती है ...

" पति को छोड़कर तीन बच्चों की माँ अपने प्रेमी संग फरार " और  आपसी संबंधों को ले कर पति -पत्नी में तलाक "


समाज बदल रहा है | ह्या, शर्म और भाग्य जैसे शब्दों की ओट से निकल कर पत्नियाँ इस विषय पर मुखर हो रही है और अपनी इच्छा और संतुष्टि की बात कर रही हैं | फिर भी बहुत से प्रश्न हैं जो अभी अनुत्तरित हैं |

"वो , एक कोठे वाली कहानी "छोटी है पर प्रभावशाली है | इसमें एक बच्ची जो मेले में अपने माता -पिता से बिछड कर कोठे में पहुंचा दी गयी थी उसकी नाथ उतराई के दिन आया  सेठ उसे बेटी के रूप में  अपना लेता  है क्योंकि एक एक्सीडेंट में उसकी पत्नी व् पुत्री की मृत्यु हो गयी थी | अपने दोस्त के अकेलापन दूर करने के उपाय स्वरुप कोठे आया वो सेठ उस बच्ची को देखकर भावुक हो जाता है और उसे अपनी बेटी के रूप में स्वीकार कर उस कोठे से आज़ादी दिला देता हैं | हालांकि कहानी में फ़िल्मी क्लीशे है फिर भी प्रभावित करती है |


क नज़र संग्रह की अन्य कहानियों पर डाले तो "लिव इन रिलेशन "कहानी ऐसे उन्मुक्त रिश्तों का विरोध करती है जहाँ अंत में स्त्री के हाथ कुछ नहीं आता | मान -सम्मान एक अधेढ़ वी की स्त्री के अपने जीवन में कुछ सकारात्मक करने की इच्छा के ऊपर है , जिसे पहले परिवार नकारता है बाद में साथ देता है | "दहेज़ रुपी दानव " दहेज़ की विभीषिका को दर्शाती है | " ये कैसी तन्हाई "लेखन में संघर्षरत स्त्रियों की दास्ताँ है | जिस संघर्ष में तो अमूमन उनका परिवार साथ नहीं देता ही है , सफलता के उत्सव में भी वो तन्हाँ ही रही है | कई लेखिकाएं इस विषय से अपने को जोड़ कर देख पाएंगी | "खुला आसमान  "भी संघर्षरत लेखिका के ऊपर ही है जो तानों उलाहनों से तंग आकर घर छोड़ने का फैसला करती है | मेरे विचार से ये कहानी थोडा सा विस्तार मांगती है |



और अंत में मैं ये कहना चाहूंगी कि ये कुसुम जी का पहला कहानी संग्रह है , जिसमें उन्होंने स्त्री जीवन से जुडी  तमाम समस्याओं को समेटने का प्रयास किया है | उनकी कहानियाँ समस्याएं उठाती ही नहीं है उनका एक हल , एक समाधान भी प्रस्तुत करती हैं |लिव इन . कॉल गर्ल , घरेलु हिंसा , अनाथ स्त्री , कोठे वाली स्त्री आदि आदि उन्होंने हर समस्या पर अपनी कलम चलायी है |  इस लिहाज से ये संग्रह स्त्री विमर्श को एक नयी दिशा देता हैं | जिसके लिए वो बधाई की पात्र हैं | सभी कहानियों के कथ्य प्रभावशाली हैं कुछ कहानियों में भावजगत को और उकेरने की आवश्यकता महसूस हुई | कहानियाँ " मैं" शैली में अच्छी लगती हैं |
एडिटिंग में कुछ त्रुटियाँ हैं पर इतनी नहीं की अखरे या कहानी के बहाव को प्रभावित करें | कुल मिला कर स्त्री सरोकारों से जुड़ा एक अच्छा पठनीय संग्रह है |


किताब गंज प्रकाशन से प्रकाशित इस संग्रह में कुल 14 कहानियाँ हैं | १२८ पेज के इस संग्रह में कवर पृष्ठ आकर्षक है |

कुछ अनकहा सा -कहानी संग्रह
लेखिका -कुसुम पालीवाल
पेज -128
मूल्य - 195
प्रकाशक -किताबगंज प्रकाशन

अमेज़न पर किताब आप इस लिंक से प्राप्त कर सकते हैं -कुछ अनकहा सा


वंदना बाजपेयी 

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Atoot bandhan

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  1. इतनी अच्छी समीक्षा पढ़ कर पूरा कहानी संग्रह पढ़ने को मन कर रहा हैं।

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