मैं कुल्हड़ हूँ कविता एक कुल्हड़ का अपने रचनाकार को कृतज्ञता भाव है |

कविता -मैं कुल्हड़ हूँ

चाक धीरे -धीरे चल रही है , कुम्हार के सधे हुए हाथ लोनी मिट्टी को आकार दे रहे हैं | उन्हीं में एक कुल्हड़ का निर्माण हो रहा है | कुल्हड़ आकार ग्रहण करने के बाद भी इस लायक कहाँ होता है कि वो जल को संभाल सके , उपयोगी हो सके , तभी तो कुम्हार उसे आग में पकाता है , धूप में सुखाता है और इस दुनिया के लायक बनाता है | अगर छायावाद के सन्दर्भ में इस कविता को देखे तो हम ही वो कुल्हड़ हैं जिसे विधाता समय की चाक पर माटी से आकार देता हैं | जीवन की विषम परिस्थितियाँ हमें तपाती हैं ... और उपयोगी सफल आकार निखर कर आता है ...


मैं कुल्हड़ हूँ

मैं कुल्हड़ हूँ, मैं इतनी खूबसूरत और सुघर यूँ हीं नहीं हूँ, मुझे मेरे कुम्हार नें -- पसीने से तर-ब-तर भीग, बड़ी मेहनत से गढ़ा है, फिर सुखने के लिए इसने घंटो कड़ी धूप में रख मेरी रखवाली की, सुख जाने पे, मेरे कुम्हार ने --- एक एक कर बहुत प्यार से मुझे उठाया ताकि मैं कहीं से फूटूं न ,उसी प्यार से फिर मुझे मेरे कुम्हार ने, आवें मे रख मुझे पकाया और फिर आवें से निकाल उसनें मुझे तका और पूछा, बता तूं , कैसी है?? मैंने भी --- अपने कुम्हार से कहा,कि तेरी कला ही कुछ ऐसी है, कि क्या कहूँ?? बस !तू इतना समझ ले, मेरे कुम्हार , मैं पहले सी खूबसूरत और सुघर हूँ. मैं कुल्हड़ हूँ.

रंगनाथ द्विवेदी. मियांपुर जिला--जौनपुर

कविता -रंगनाथ द्विवेदी

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Atoot bandhan

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