नवगीत-ठहरी शब्द नदी

चढ़े हाशिये  पर सम्बोधन ठहरी शब्द-नदी।। चुप्पी साधे पड़े हुए हैं कितने ही प्रतिमान यहाँ अर्थहीन हो चुकी समीक्षा सोई …

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जीवित कामायनी

इंतजार करती है———– अपने कोठे पे बैठ हर शाम कोई ग्राहक। न आने पे फिर वहीं से खोलती है, जहा …

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बातूनी लड़की

मुस्लिम हो गई———– मुझ ब्राह्मण के गोद की वे बातूनी लड़की। एक वालिद सा मेरा ख़याल रखती थी, आज आई …

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कविता -रेशमा

“रेशमा” महज़ एक लड़की नही बल्कि वे मुझ जैसे किसी शायर की मुहब्बत थी————— तेरे शहर में———– आज रात मै …

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कितने जंगल काटे हमने, कितने वृक्ष गिराए हैं

कितने जंगल काटे हमनेकितने वृक्ष गिराए हैंनीड़ बिना बेघर पंक्षीमौसम ने मार गिराए हैंकितने—चारों ओर कोलाहल भारीजहर घुल गया सांसों …

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बाल दिवस है

चाय की दुकान पे———- सुट-बूट वाले साहब के, अधरो पे सुलगते सिगरेट का कश है, उस फैले धुँऐ में तेरह …

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मैं नन्हीं – सी

मैं नन्हीं – सी प्यार की मूरत हूँ |मैं भविष्य की छिपी हुई सूरत हूँ || मेरे मुस्कराने से कलियां …

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बेगुनाह कर्ण

कर्ण और कुंती दो पात्रो पर लिखी ये महज़ कविता नही अपितु बेगुनाह कर्ण के वे आँसू है जो बिना …

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