समाज में बढ़ते नैतिक अवमूल्यन के लिए कौन जिम्मेदार है ?

समाज में नैतिक अवमूल्यन जारी है \ वक्त आ गया है की हम अपनी जिम्मेदारी समझे व् सुधर का प्रयास करें

समाज में  बढ़ते नैतिक अवमूल्यन के लिए कौन जिम्मेदार है ?


  आज हर व्यक्ति जो थोडा बहुत भी भावनात्मक है,देश की इस हालत से चिंतित है,भारतीय समाज का नैतिक अवमूल्यन क्रमोत्तर हो रहा है.देश में चारो ओर अराजकता है।  किसी भी तरफ नज़र उठा कर देख लीजिये चोरी,डकैती,राहजनी,हत्या,बलात्कर जैसे अपराध अपने अपराधी अट्टहास कर रहे हैं.  पर इसका उत्तरदायी कौन है? वर्तमान राजनीति,पोंगा पंडितो,हर छोटी बड़ी बात में फतवा देने वाले मौलवी,अकर्मण्य सरकार या देश समाज की शोचनीय स्थिति से बेफिक्र आज का युवा ? 

समाज में  बढ़ते नैतिक अवमूल्यन के लिए हम भी हैं  जिम्मेदार 


सच तो ये है की हम सब बराबर के ज़िम्मेदार हैं . हम रोज शिकायत करते हैं कि अपराध बढ़ रहे हैं , भ्रष्टाचार बढ़ रहा है , बुराई बढ़ती जा रही है प्रतिदिन एक बँधे हुए ढर्रे की तरह हम नित्य ही इस संबंध में टीका-टिप्पणी करते हैं, कभी सरकार को दोष देते हैं तो कभी प्रशासन व्यवस्था को । कभी किन्हीं व्यक्तियों को इसके लिए जिम्मेदार ठहराते हैं। इस तरह की शिकायतें एक सामान्य व्यक्ति से लेकर उच्च-स्थिति के लोगों तक से सुनी जा सकती हैं। लेकिन कभी हमने यह भी सोचा है कि इनके लिए हम स्वयं कितने जिम्मेदार हैं। हम भूल जाते हैं कि बहुत कुछ अपराध, बुराइयाँ हमारे व्यावहारिक जीवन में अपने प्रयत्नों का परिणाम हैं। हमारे अनीतिपूर्ण जीवन, सामाजिक उत्तरदायित्व के प्रति उपेक्षा, हाथ धरे बैठ जाने की प्रवृत्ति से ही बुराइयों को प्रोत्साहन मिलता है।

समाज में होने वाले अपराधों पर चुप्पी तोडिये 


 कई बार किसी नागरिक पर बदमाश लोगों के आक्रमण को देखकर भी हममें से बहुत लोग चुपचाप आगे पग बढ़ा देते हैं। हममें से कइयों की जानकारी में रिश्वत का दौर चलता रहता है। कई बार जानते हैं कि सार्वजनिक कार्यों में ठेकेदार तथा नौकरशाही अनावश्यक लाभ उठा रहे हैं। हममें से बहुत से लोग धोखाधड़ी, ठगी, चोरबाजारी, मिलावट करने वालों को भारी भली-भाँति जानते हैं किन्तु यह सब जानकर हम इनका भंडा फोड़ नहीं करते। इनकी शिकायत पुलिस को या अपराध निरोधक संस्थाओं को नहीं करते। इनके खिलाफ संगठित होकर आँदोलन नहीं होता। यदि हम इनके लिए स्वयं को उत्तरदायी मानकर अपना सुधार करने में लगें, अपने कर्तव्यों को समझने लगें तो कोई संदेह नहीं कि बुराइयाँ घटने लगें और एक दिन समाप्त भी हो जायँ। 


            हम नहीं चाहतें कि कोई हमारा अपमान करे तो हमारा भी कर्तव्य है कि हम किसी का अपमान न करें। इसी तरह विश्वासघात, छल, कपट, धोखाधड़ी उत्पीड़न, शोषण नहीं होना चाहते तो हमारा भी धर्म है कि हम दूसरों के साथ ऐसा न करें। लेकिन खेद है कि जब कोई हमारे ऊपर अत्याचार करता है हम बुराई की, सिद्धान्तों, की, दुहाई देते हैं और केवल बचाव के लिए गुहार मचाते हैं किंतु जब हम स्वयं दूसरों के साथ ऐसा करते हैं तब किसी के कुछ कहने सुनने पर वे हमारे कान पर जूँ तक नहीं रेंगती और यही कारण है कि बुराइयां दिनों दिनों बढ़ती जाती हैं। हम उनकी शिकायतें, करने, आलोचना करने, में ही अपना काम पूरा समझ लेते हैं। 
        इस सम्बन्ध में हमारी यह शिकायत हो सकती है कि “आजकल कोई सुनता नहीं, ” जो इस तरफ के कदम उठाता है उसे ही उल्टी परेशानियां उठानी पड़ती हैं।

 बहुत कुछ अंशों में यह ठीक भी है। किसी बात की सूचना देने पर गुँडे के बजाय सूचना देने वाले को ही गिरफ्तार कर लिया जाता है। बुराई का प्रतिरोध करने वाले को दूषित तत्वों का कोप-भाजन बनना पड़ता है। यह सब ठीक है किंतु बिना कोई खतरा उठाये दूर तो नहीं किया जा सकता। सुधार के लिए एक ही मार्ग है, वह है सब तरह के खतरे उठाकर बुराइयों का मुकाबला करना। यदि प्रशासन इस सम्बन्ध में ढील दे तो उसके खिलाफ भी आवाज उठायी जाये। कई सरकारी कर्मचारी या समाज का सदस्य ही दूषित तत्वों का बचाव करे इन्हें प्रोत्साहन दें तो उनकी भी आलोचना करने में नहीं चूकना चाहिए। 

समाज में  बढ़ते नैतिक अवमूल्यन  को रकने के लिए सिद्धांतों न रचें  कर्म करें 


       हमारी एक सबसे बड़ी कमजोरी यह है कि हम बड़े-बड़े सिद्धान्त बघारते हैं, नीति और न्याय की ऊँची-ऊँची बातें करते हैं, लेकिन यह सब दूसरे के लिए। अपने कार्यकलापों को न्याय, नीति की कसौटी पर हम बहुत ही कम कसते हैं। एक दुकानदार बाजार में बैठकर सरकार, पुलिस आदि के भ्रष्टाचार की जी खोलकर आलोचना करता है किन्तु उसकी आलोचक वृत्ति उस समय गायब हो जाती है जब वह वस्तुओं में मिलावट करता है, ग्राहकों को कम तौलता है, अधिक मुनाफा वसूल करता है। आतताई और गुँडों को हम लोग कोसते हैं, उन्हें बुरा कहते हैं किन्तु हमारी समीक्षात्मक बुद्धि उस समय जाने कहाँ चली जाती है। जब हम पराई स्त्री को बुरी निगाह से देखते, बिना प्रति, मूल्य देय समाज के साधनों का उपभोग करते हैं, अनीति के साथ धन एकत्रित करते हैं, दूसरों के श्रम अधिकार एवं साधनों का अनुसूचित शोषण करते हैं।



        भारत का हर नागरिक भारतवर्ष की दुर्दशा में बराबर का सहभागी है.हमारी मुश्किल ये है की अगर हम स्वयं को सज्जनों की श्रेणी में रखते हैं तो दुर्जनों की संगत से बचने के चक्कर में किसी भी प्रकार की दुर्जनता का विरोध नहीं करते और यदि दुर्भाग्यवश हम दुर्जन की श्रेणी में हो तब तो हमारा एक ही ध्येय होता है ‘दूसरो को येन केन प्रकारेण दुखी करना’.अर्थात दोनों ही श्रेणियों के लोगो को देश और समाज की स्थिति से कुछ लेना देना नहीं.यही स्थिति दुखदायी है और इसी प्रवृति ने हमें विनाश की ओर अग्रसर किया है.हमारे आस पास कुछ भी होता रहे हम बस अपने में मगन रहते हैं.मैं,मेरा परिवार,मेरे बच्चे,मेरा घर...... ये सुखी रहे तो हम सुखी हैं.हमारी चिंताए अपने परिवार तक ही सीमित हैं पर जब देश की विपन्नता हम पर सीधे प्रभाव डालती है तो हम चीत्कार करने लगते हैं,राजनीति और प्रशासन को दोष देने लगते हैं.देश की राजनैतिक,आर्थिक,सामाजिक और प्रशासनिक प्रत्येक तरह की व्यवस्थाएं न सिर्फ सुधरे बल्कि सुद्रण भी हो इसके लिए हमें अपने चारो ओर घट रही घटनाओ पर संज्ञान लेना होगा.हर अन्यायपूर्ण व्यवस्था का पुरजोर विरोध करना होगा.और कुछ नहीं तो निर्भीक हो कर तेज आवाज में अपनी राय स्पष्ट करनी होगी.पर सच ये है की हम ऐसा करने की बजाय कभी व्यावहारिक होने का हवाला दे कर और कभी अपने आम आदमी होने का हवाला दे कर अपने कर्तव्यों से तो बचना चाहते हैं और फिर अपनी सुविधानुसार हम अपने आम आदमी के अधिकारों के लिए रोना शुरू कर देते हैं.यदि हर बार अपने अधिकारों के लिए रोते रहना अव्यवहारिक नहीं तो अपने कर्तव्य पालन करना भी व्यावहारिक है,हमें समझना होगा. परन्तु कौन से कर्तव्यों के पालन से हम एक जागरूक समाज की स्थापना कर सकते हैं ये भी समझना होगा.वास्तव में ये बहुत छोटे छोटे कर्त्तव्य हैं-

पालन करें कुछ सामान्य नागरिक कर्तव्यों का 


  •  राह चलते किसी को हमारी मदद की जरुरत हो तो हम जल्दी होने का बहाना न बना कर उसके लिए रुक कर उसकी मदद को हाथ बढ़ाएं,
  • किसी लड़की के साथ छेड़खानी की घटना होते देखे तो छेड़छाड़ करने वालो को चार पांच थप्पड़ लगाने में न डरे,
  • किसी बुजुर्ग का अपमान न करें न होने दे,राहजनी की घटना के प्रत्यक्षदर्शी बने तो मूक बधिर न बने रहे,
  • जब भी मौका मिले बेईमानो को अपमानित करें,श्रम और मेहनत करने वालो का सम्मान करें,
  • कम से कम एक बच्चे को शिक्षित करें,
  • हर बरसात में कम से कम ५ पेड़ लगायें,
  • सड़कों और सार्वजनिक स्थानों पर किसी प्रकार का कचरा न फैलाएं और न दूसरो को फ़ैलाने दें,,,,,

  •  क्या इन सब कर्तव्यों के पालन में बहुत ऊर्जा लगती है?या ये सब न करके हम अमरत्व को प्राप्त करने वाले हैं?यदि नहीं तो फिर डर और झिझक कैसी? आइये इन छोटे-छोटे कर्तव्यों का पालन करें और बड़े-बड़े अधिकारों को स्वतः प्राप्त करें.

नैतिक अवमूल्यन के लिए कुछ इस तरफ भी सोंचें 



 कभी कोई दामिनी कभी कोई गुड़िया ऱोज बल्कि हर घंटे रौंदी जाती हैं, उनके सिर्फ शरीर ही घायल नहीं होते बल्कि उनकी आत्माएं भी मरणासन्न होती हैं.जनता विलाप करती है,सरकार सख्त कार्यवाही का आश्वासन देती है.
हम बढ़ते हुए इन अपराधो के लिए सरकार को जिम्मेदार मानते हैं और सरकार में बैठे मानसिक नपुंसकता से लोग अपनी सुविधा के अनुसार जनता के अलग अलग वर्गों को जिम्मेदार ठहरा देते हैं. कोई कहता है यू.पी. और बिहार वाले जिम्मेदार हैं,
किसी की राय में टी.वी. और फिल्मे और किसी की राय में मोबाइल फोन जिम्मेदार हैं.

इस क्रम में कई हास्यास्पद बयान भी आते हैं,जैसे दुष्कर्म के लिए स्कर्ट और जीन्स जिम्मेदार हैं या ४० वर्ष से कम उम्र की महिलाओ के मोबाइल फ़ोन रखने और अकेले बहार जाने पर पाबंदी होनी चाहिए.

कुछ बयान बेशर्म भी होते हैं जैसे “ऐसे अपराध तो होते रहते हैं,इन पर काबू नहीं पाया जा सकता.” ऐसे बलात्कारो और उसके बाद जुबानी बलात्कार करने वालो की मानसिकता के लिए निःसंदेह कई सतही कारण मौजूद हैं पर मेरे विचार से जो सबसे बड़ा मूल कारण है वो है अशिक्षा. 

भारतीय समाज के तेजी से हो रहे नैतिक पतन और सांस्कृतिक क्षरण के लिए अशिक्षा ही मूल रूप से उत्तरदायी है.ऐसा भी नहीं कि शिक्षित समाज में महिलाओं के यौन शोषण नहीं होते परन्तु वहशीपन और दरिंदगी की साडी हदे पार करने वाले अपराधी अधिकतर अशिक्षित समाज से ही आते हैं.उत्तर प्रदेश और बिहार में ऐसे अपराध अधिक होने का कारण वहां फ़ैली अशिक्षा ही है.


आज समाज दोहरा चरित्र जी रहा है, जिसमें एक तरफ़ तो महिलाओं के सम्मान की बात की जा रही है और दूसरी ओर टी.वी., इंटरनेट, फिल्में जैसे संचार माध्यम समाज के सामने औरत की जो तस्वीर पेश कर रहे हैं, उसमें उसे सिर्फ़ भोग्या एवं मनोरंजन की वस्तु के रुप में ही दिखाया जां रहा है | 


समाज में नैतिकता एवं उच्च मानवीय आदर्शों का भी दिन-प्रतिदिन अवमूल्यन हो रहा है | इन परिस्थितियों में सिर्फ़ मृत्युदंड का भय दिखाकर इस तरह की घटनाओं को रोकना संभव नही है | समाज में उच्च नैतिक मूल्यों एवं आदर्शों की स्थापना करके ही अपराधों पर अंकुश लगाया जां सकता है |
संपर्क -हरकीरत 'हीर'
 सुंदरपुर
 गुवाहाटी-  (असम )

लेखिका

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अटूट बंधन : जो अटूट बंधन में बांधे आपके रिश्तों को : समाज में बढ़ते नैतिक अवमूल्यन के लिए कौन जिम्मेदार है ?
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अटूट बंधन : जो अटूट बंधन में बांधे आपके रिश्तों को
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