March 2019


एक शब्द है संस्कार ... ये कहने को तो महज एक शब्द है पर इस पर किसी व्यक्ति का सारा जीवन टिका होता है | एक माँ के रूप में हर स्त्री के लिए जरूरी है कि अपने बेटों को संस्कारित करें , तभी भविष्य का पुरुष एक संतुलित व्यक्तित्व के रूप में उभरेगा |


भविष्य का पुरुष 


नलनी के हाथ तेजी से बर्तनों को रगड़   रहे थे | उसे सिंक भर बर्तन धोने में पन्द्रह मिनट से ज्यादा का समय नहीं लगता | करीब दस  घरों में काम करती हैं | सुबह सात बजे की निकली रात सात बजे घर पहुँचती हैं | दम मारने की फुर्सत नहीं हैं , करे भी तो क्या , अकेली कमाने वाली है | तीनों बच्चे पढने वाले हैं और पति ....उसे तो वो खुद ही छोड़ आई हैं |


अक्सर अपना किस्सा सुनाती है , मेरा आदमी बहुत पीटता था भाभी , गांजे के नशे का आदी हो गया था ,अपनी कमाई और मेरी सभी उड़ा देता था | फिर भी इस आशा में पिटती रही किएक दिन सब ठीक हो जाएगा | बच्चे बड़े हो रहे थे और मेरी प्रतीक्षा धैर्य छोड़ रही थी | एक दिन फैसला कर लिया कि अब नहीं पिटना है |बस तीनों बच्चों को लेकर चली आई | अब तो अकेले ही काम करके बच्चों को पाल रही हूँ |


ऐसा कहते हुए उसकी आँखों में स्वाभिमान की चमक दिखाई देती | 


कितनी भी तेजी से उसके हाथ काम करें पर नलिनी हर घर की भाभियों , दीदीयों , आंटियों से बात करने का समय निकाल ही लेती है | बात भी कैसी ? ... ज्यादातर उसे अपने घर के किस्से सुनाने होते | उसके घर के किस्सों में किसी की रूचि हो न हो पर उन्हें कह -कह कर कभी उसका दुःख निकल जाता तो कभी ख़ुशी दोगुनी हो जाती | 

अधिकतर घरेलु औरतें से उसका एक दोस्ती का रिश्ता हो जाता , ठाक वैसे ही जैसे ऑफिस में काम करते समय हम अपने साथ काम करने वालों से घुल -मिल जाते हैं चाहें वो बॉस ही क्यों ना हो | 


उस दिन नलिनी अपने छोटे बेटे और बेटी के झगड़ने का किस्सा सुना रही थी | उसकी आवाज़ में उत्साह था , " भाभी कल मेरे बेटे ने बिटिया को इतना मारा कि पूछो मत , दोनों भाई बहन में बहुत ही कुत्तम -कुत्ता हुई | 


"क्यों मारा ?" शालिनी ने दाल का कुकर खाली  करते हुए पूछा 


" क्या बताये भाभी , चार घर छोड़ के अम्मां रहती हैं , आजकल वहां छोटी बहन आई हुई है | बिटिया ने जिद पकड़ ली कि जब तक मौसी हैं मैं वहीँ रहूंगी | अब छोटा बेटा जो उससे पांच साल छोटा है उसी का पाला हुआ है उसे उसके बिना घर में अच्छा नहीं लग रहा था , तो लगा रोकने | अब रोकने का सही तरीकतो आता नहीं ... चोटी पकड के खींच दी , यहीं रह , नहीं जायेगी तू  नानी के घर | बिटिया भी कहाँ कम है , जिद पकड ली कि वो तो जायेगी ही | अब तो बेटे का गुस्सा सर चढ़ कर बोलने लगा | मारते -मारते बिटिया को जमीन पर गिरा दिया ...पीटता जाये और बोलता जाए , तुझे नानी के घर नहीं जाने दूंगा | मुझे यहाँ तुम्हारे बिना अच्छा नहीं लगता , देखें कैसे जायेगी | 


बिटिया किसी तरह से निकल कर भाग कर नानी के यहाँ पहुँच गयी | तो पीछे -पीछे पहुँच गया ... नहीं रहेगी तू यहाँ , मुझे अकेल घर में अच्छा नहीं लगता ... फिर खींच के  ले ही आया | 


भाभी हमारे हाते में सब कह रहे थे , " देखो कितना प्यार करता है अपनी बड़ी बहन से , अकेले अच्छा नहीं लगता है बहन के बिना , बेटे के प्रति गर्व माँ की आँखों में उतर आया | 


प्यार या ... शालिनी के लब थरथरा उठे|

क्या भाभी जी ?

" ये प्यार नहीं है , अधिकार की भावना है , और अधिकार भी कैसा कि मार के पीट के चाहें जैसे रह मेरी इच्छा के अनुरूप ही रहे  | इसे अभी से रोको नलिनी , जो हाथ बहन पर उठ रहा है कल बीबी पर उठेगा ... क्योंकि उसने प्यार की यही परिभाषा समझ रखी है | ११ साल का हो गया है इतना बच्चा भी तो नहीं है अब | समझाओ उसे , नहीं तो अपने पिता जैसा ही निकलेगा |"


नलिनी ने शालिनी की तरफ घूर कर देखा , फिर चुपचाप बर्तन साफ़ कर चली गयी | 


दो दिन तक नलिनी काम पर नहीं आई | शालिनी ने फोन करके उसकी माँ से पूछा | 

" उसने आपके यहाँ काम छोड़ दिया है , कह रही थी कि मेरे मासूम बेटे में ऐब ढूँढतीं हैं | भाई बहन के प्यार में पति -पत्नी की तकरार खोजतीं हैं | कहिये तो मैं आपके यहाँ काम करूँ | "


"बताउंगी" कहकर शालिनी ने फोन रख दिया |एक सवाल उसके सामने आ कर खड़ा हो गया |



भविष्य का पुरुष कैसा होगा इसकी जिम्मेदारी एक माँ की होती है और अक्सर माएं अपना कर्तव्य ठीक से नहीं निभाती हैं | 
.........................                    ......................                      .................


पितृसत्ता को कोसने से ही काम नहीं चलेगा , पितृसत्ता के इस विकृत स्वरुप में स्त्रियों का भी योगदान है | एक पुरुष को स्त्री जन्म ही नहीं देती , उसे आकर भी देती है , बहनों से उसकी मारपीट पर स्वीकृति , घर में काम ना करने की स्वीकृति और बहने से ज्यादा अच्छा भोजन में स्वीकृति देकर वो भावी पुरुष अहंकार को पोषित करती है | अगर हम चाहते हैं कि भविष्य में हमारी बेटियों को अच्छे सुलझे विचारों वाले पति मिलें तो उसका निर्माण हर माँ को आज ही करना होगा | 

नीलम गुप्ता 

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कहानी -पड़ोसी


घर वालों से दूर , परिवार वालों से दूर जब हम किसी अजनबी शहर में अपना घोंसला बनाते हैं तो हमारी सुख में दुःख में जो व्यक्ति सबसे पहले काम आते हैं वो होते हैं पड़ोसी ....एक अजनबी शहर में एक नया परिवार बनने लगता  है , पड़ोस में शर्मा जी , अजहर चाचा , रोजी ताई आदि आदि ... ये वो लोग होते हैं जो रक्त से हमारे ना होते हुए भी हमारे हो जाते हैं ...पर क्या यूँ ही मात्र कहीं रहने से सारा पड़ोस हमारा हो जाता है या एक रिश्ता बनाना और सींचना भी पड़ता है ....

कहानी -पड़ोस 





ज्योहि फोन की घंटी बजी,मैने लपक कर फोन उठा लिया,शायद इसी Call का इन्तजार था।सामने से समधिन जी का फोन था!जैसे ही उन्होने बताया,बेटी हुई है,हमारे घर लक्ष्मी आयी है,पोती के रूप मे! सुनकर मन मयूर प्रसन्नता से झूम उठा।

रात से ही बिटिया ऐडमिट थी डिलीवरी वास्ते। बडी चिन्ता हो रही थी उसकी,किसी काम मे मन नही लग रहा था।बार-बार ईश्वर के आगे हाथ-जोड विनती कर रही थी,जच्चा-बच्चा सुरक्षित हो बस।ऐसे कठिन समय मे कुछ भी हो सकता था,क्योकि समय पूरा हो चुका था,डाक्टर की दी डयू डेट निकल रही थी।बच्चे की जान को खतरा हो सकता था इसी डर के चलते सासु मां ने समय पर ऐडमिट करवा दिया था। डाक्टर ने समय कि नाजुकता को देखते हुऐ आपरेशन से डिलीवरी करा दी थी।अब बेटी की कुशलता जानकर मन शान्त हो गया था।



कैसी होगी,मेरी बिटिया की बिटिया,कुछ सोच मन अतीत के पन्नै खोलने लगा था,मेरी ये बिटिया भी बडे मेजर आपरेशन से ही हुई थी।पर,मेरी बेटी पैदा होने से पूर्वमेरा पहला बच्चा नार्मल घर पर हुआ था।मेरा पूरा प्रयास था कि मेरा दूसरा बेबी भी नार्मल डिलीवरी से हो,पर ऐसा हो ना सका। ये तीस साल पहले की बात है,मै अपने पति संग बेटे सहित कम्पनी के दिये मकान मे यानि कैम्पस मे रहती थी,पर डिलीवरी से पहले जांच हेतु मशहूर डाक्टर उषा गुप्ता के पास नियमित रूप से जाती थी।सब कुछ नार्मल था।मै निशिन्त थी। 



एक बार डाक्टर ने मुझसे पूछा उषा :-यहां कौन रहता तुम्हारे संग?

मै:-जी,यहां तो मै अपने पति व बेटे संग रहती हूं। 
उषा:-मेरा मतलब,डिलीवरी के समय ,तुम्हारे ससुराल वाले,या कोई और रिश्तेदार..... 
मै :-जी,यहां तो कोई नही रहता,सब बहुत दूर-दूर है।
उषा:-फिर तुम मेरे नर्सिंग होम के जनरल वार्ड मे तो नही रह पाओगी,! 
मै :-जी
उषा :-तुम्हे अलग से कमरा लेना पडेगा,क्योकि तुम्हारे पति जनरल वार्ड मे नही जा सकते ,वहां पुरूष ऐलाऊड नही है।तुम अकेली कैसे रहोगी।
मै :-पर उसका तो खर्चा बहुत होगा वो मै नही दे पाऊगी। 
उषा :-कोई बात नही,कुछ तो करना पडेगा.,तुम्हे मै एक अलग छोटा कमरा दे दूगी,वो मंहगा नही पढेगा।

पढ़िए -मेरी दुल्हन 

समय पंख लगाकर उडता रहा,और मै लेबर पेन ले रही थी।पर ये क्या......दर्द लेते -लेते मेरा प्लस्न्टा भी कट-कट कर यूरिन मे आने लगा। मेरी ऐसी हालत देख डाक्टर उषा भी घबरा गयी!उन्होने तुरन्त अपने सर्जन पति मिस्टर गुप्ता को आवाज दी और स्टाफ को ओ०टी (आपरेशन थियेटर) तैयार करने का निर्देश दिया। रात के तीन बज रहे थे।तुरन्त ऐनीथिसया के डाक्टर को फोन किया!मुझे डाक्टर ने दो टूक शब्दो मे बता दिया, "तुम्हारा मेजर आपरेशन करना पढेगा,"।पर तभी मैनै दलील दी कि मेरा पहला बच्चा तो नार्मल हुआ है!तभी डाक्टर बोली-ऐसा है मै कोई रिस्क नही ले सकती,बलीडिगं हो रही है मां अथवा बच्चे मे किसका खून बह रहा है कह नही सकती,हो सकता है मै मां अथवा बच्चे मे से किसी एक को बचा पाऊ!



मेरे पति को देहली के औखला से ब्लड लाने को रवाना कर दिया।उस समय खून केवल देहली मे ही मिलता था।खून लेने जाने से पहले मेरे पति ने डाक्टर से कहा-डाक्टर आप कोशिश कीजिये और दोनो को बचाईये,मां भी बच्चा भी !डाक्टर ने फार्म पर हस्ताक्षर करवा लिये थे।हमारे पास एक बेटा तो था,पर उसके संग खेलने वाली एक बेटी चाहते थे।



पढ़िए -हकदारी



आनन-फानन मे डाक्टर ने आपरेशन करके मुझे व मेरी बच्ची दोनो को बडी होशियारी से बचा लिया था।मै व बच्ची दोनो अब खतरे से बाहर थे और हमे आई०सीयू मे शिफ्ट कर दिया था।रात तक मेरे पति खून की बोतले लेकर लौट आये थे,एक ओर मेरी बाजु मे ग्लूकोज लगाया गया तो दूसरी बाजु मे खून चढाना शुरू कर दिया।


आधी रात के बाद मुझे होश आया,तभी मैने पास बैठी नर्स से पूछा,सिस्टर मुझे क्या हुआ है, बेटा या बेटी, ???नर्स ने मेरी ओर बडे प्यार से देखा,और मेरे सिर पर प्यार से हाथ फेरते हुऐ पूछा,आप की क्या इच्छा थी?मैनै कहा ,बेटी होगी,तो मेरा परिवार पूरा हो जायेगा। ठीक  ,बेटी ही हुई है आपको।खुश हो जाये आप।इस तरह आपरेशन हो जाने के बाद मैने एक सप्ताह अस्पताल मे गुजारा।





जिस कैम्पस मे रहती थी वहां रहने वालो सभी के संग मेरा बडा प्यार था।एक दूसरे के संग दुख-सुख बांटना मुझे खूब भाता।हर त्यौहार को हम मिलकर मनाते चाहे वो हरियाली तीज हो या दिपावली।लेन-देन भी खूब होता खाने का।मै अस्पताल मे हूं सुनकर सभी कालोनी की औरते मेरे पास पहुंचने लगी,बडी भीड सी जुट गयी मेरे कमरे मे!जब भीड हुई तो शोर भी होना ही था,लाजिमी।जब डाक्टर राऊड पर आयी तो मुझसे मुखातिब होकर बोली-"तुम तो कह रही थी,मेरा यहां कोई रिश्तेदार नही रहता,....... पर सबसे ज्यादा भीड तो तुम्हारे कमरे मे हो रही है......??मैनै डाक्टर को बताया-ये सब मेरे पडोसी है,जरुर,पर ये मेरे लिये किसी परिवार से कम नही।। 



मै जितने दिन अस्पताल मे रही,किसी ना किसी के घर से मेरे पति का व मेरा खाना पहुंचता रहा। कोई मेरा बंधा दूध उबालकर पहुंचा रहा।कोई मेरे खाने के बर्तन धो देता।एक सप्ताह कैसे गुजर गया पता भी नही चला था। एक परिवार से भी बढकर था मेरा पडो़स,जिन्होंने दुख की घड़ी मे मेरा पूरा साथ दिया, और आज मेरी उसी बेटी की बेटी हुई थी,अगर उस दिन डाक्टर उषा मेरी बच्ची को नही बचा पाती तो ......क्या ?मै आज ये दिन देख पाती,?




अपनी बेटी की बेटी यानि अपनी नातिन को देखने की चाह मे मै बडे उत्साह से उठ खडी हुई ,और वहां जाने से पूर्व की खरीददारी करने के लिये तैयार होने लगी।मन मे एक उत्साह व उमंग बडी हिलोरे ले रहा था उस नन्ही सी परी को गोद मे लेने हेतु।


रीतू गुलाटी 

                 
लेखिका



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होलिका दहन : अपराध नहीं , लोकतंत्र का उत्सव
फोटो क्रेडिट -भारती वर्मा बौड़ाई
होलिका दहन कर  को आजकल स्त्री विरोधी घोषित करने का प्रयास हो रहा है | उसी पर आधारित एक कविता जहाँ इसे लोकतंत्र समर्थक के रूप में देखा जा रहा है ...


होलिका दहन : अपराध नहीं , लोकतंत्र का उत्सव 


वो फिर आ  गए अपने दल -बल के साथ
हर त्यौहार  की तरह इस बार भी
ठीक होली से पहले
अपनी  तलवारे लेकर
जिनसे काटनी  थी परम्पराएं
कुछ तर्कों से , कुछ कुतर्कों से
और इस बार
इतिहार के पन्नों से खींच कर निकली गयी होलिका
आखिर उस का अपराध ही क्या था ,
जो जलाई जाए हर साल एक प्रतीक के रूप में
हाय ! अभागी ,
एक बेचारी स्त्री
पुरुष सत्ता की मारी स्त्री
जो हत्यारिन नहीं, थी एक प्रेमिका
अपने प्रेमी संग विवाह रचाने को आतुर
एक बहन जो  भाई के प्रेम में
झट से तैयार हो गयी पूरी करने को इच्छा
दे दी आहुति ...
उसके भस्म होने का , जश्न मनाते बीत गयी सदियाँ
धिक्कार है हम पर ,
हमारी परम्पराओं पर ,
आह ,  कितने अधम  हैं हम
बदल डालो , बदल डालो , नहीं जलानी है अब होलिका
आखिर अपराध की क्या था ?


आखिर अपराध की क्या था ?
की सुंदर नक्काशीदार भाषा के तले
बड़ी चतुराई से दबा दिया ब्यौरा
इस अपराध का कि
कि अपने मासूम  भतीजे को भस्म करने को थी तैयार
वो अहंकारिणी
जो दुरप्रयोग करने को थी  आतुर
एक वरदान का
हाँ , शायद !
उस मासूम की राख की वेदी पर करती अपने
प्रियतम का वरण ,
बनती नन्हे -मुन्ने बच्चों की माँ
एक भावी माँ
जो नहीं जो नहीं महसूस कर पायी
अपने पुत्र को खोने के बाद
एक माँ की दर्द नाक चीखों को
अरे नादानों वो भाई केप्रेम की मारी अबला नहीं
उसमें तो
नहीं था सामान्य स्त्री हृदय



जिस पर दंड देने को थी  आतुर
उस मासूम का अपराध भी कैसा
बस व्यक्त कर रहा था ,
अपने विचार
जो उस समय की सत्ता के नहीं थे अनुकूल
उसके एक विचार से भयभीत होने लगी सत्ता ,
डोलने लगा सिंघासन
मारने के अनगिनत प्रयासों का
एक हिस्सा भर थी होलिका
एक शक्तिमान हिंसक की मृत्यु
और मासूम की रक्षा के चमत्कार का
प्रतीक बन गया
होलिकादहन


समझना होगा हमें
ना ये स्त्री विरोधी है
न पुरुष सत्ता का प्रतीक
ये लोकतंत्र का उत्सव है
जहाँ शोषक स्वयं भस्म होगा
अपने अहंकार की अग्नि में
और मासूम शोषित को मिलेगी विजय
शक्तिशाली या कमजोर ,
मिलेगा हर किसी को
अपनी बात रखने का अवसर ...



तोआइये ...
पूरे उत्साह के साथ मनइये होलिका दहन
ये कोई अपराध नहीं है
न ही आप हैं स्त्री मृत्यु के समर्थक
करिए गर्व  अपनी परम्परा पर
शायद वहीँ से
फैली है लोकतंत्र की बेल
जिसे सहेजना है
हम को आपको

नीलम गुप्ता


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गुझिया -अपनेपन की मिठास व् परंपरा का संगम
फोटो क्रेडिट -www.shutterstock.com

रंगों के त्यौहार होली से रंगों के बाद जो चीज सबसे ज्यादा जुडी है , वो है गुझिया | बच्चों को जितना इंतज़ार रंगों से खेलने का रहता है उतना ही गुझिया का भी | एक समय था जब होली की तैयारी कई दिनों पहले से शुरू हो जाती थी | आलू के चिप्स , साबूदाने व् आलू , चावल के पापड़ , बरी आदि  महीने भर पहले से बनाना और धूप  में सुखाना शुरू हो जाता था | हर घर की छत , आँगन , बरामदे में में पन्नी पर पापड़ चिप्स सूखते और उनकी निगरानी करते बच्चे नज़र आते | तभी से बच्चों में कहाँ किसको कैसे रंग डालना है कि योजनायें बनने लगतीं |

गुझिया -अपनेपन की मिठास व् परंपरा का संगम 



संयुक्त परिवार थे , महिलाए आपस में बतियाते हुए ये सब काम कर लेती थीं , तब इन्हें करते हुए बोरियत का अहसास नहीं होता था | हाँ ! गुझिया जरूर होलाष्टक लगने केर बाद ही बनती थी | पहली बार गुझिया बनने को समय गांठने का नाम दिया जाता | कई महिलाएं इकट्ठी हो जाती फाग गाते हुए कोई लोई काटती , कोई बेलती , कोई भरती  और कोई सेंकती, पूरे दिन का भारी काम एक उत्सव की तरह निपट जाता | तब गुझियाँ भी बहुत ज्यादा  संख्या में बनती थीं ....घर के खाने के लिए , मेह्मानों के लिए और बांटने के लिए | फ़ालतू बची मैदा से शक्कर पारे नामक पारे और चन्द्र कला आदि बन जाती | इस सामूहिक गुझिया निर्माण में केवल घर की औरतें ही नहीं पड़ोस की भी औरतें शामिल होतीं , वादा ये होता कि आज हम आपके घर सहयोग को आयें हैं और कल आप आइयेगा , और देखते ही देखते मुहल्ले भर में हजारों गुझियाँ तैयार हो जातीं |



बच्चों की मौज रहती , त्यौहार पर कोई रोकने वाला नहीं , खायी गयी गुझियाओं की कोई गिनती नहीं , बड़े लोग भी आज की तरह कैलोरी गिन कर गुझिया नहीं खाते थे | रंग खेलने आये होली के रेले के लिए हर घर से गुझियों के थाल के थाल निकलते ... ना खाने में कंजूसी ना खिलाने में |





हालांकि बड़े शहरों में अब वो पहले सा अपनापन नहीं रहा | संयुक्त परिवार एकल परिवारों में बदल गए | अब सबको अपनी –अपनी रसोई में अकेले –अकेले गुझिया बनानी पड़ती है | एक उत्सव  की उमंग एक काम में बदलने लगी | गुझिया की संख्या भी कम  होने लगी, अब ना तो उतने बड़े परिवार हैं ना ही कोई उस तरह से बिना गिने गुझिया खाने वाले लोग ही हैं , अब तो बहुत कहने पर ही लोग गुझिया की प्लेट की तरफ हाथ बढ़ाते हैं , वो भी ये कहने पर ले लीजिये , ले लीजिये खोया घर पर ही बनाया है,वाल सेहत का है, जितनी मिलावट रिश्तों में हुई है उतनी ही खोये में भी हो गयी हैं  ... 


फिर भी शुक्र  है कि गुझिया अभी भी पूरी शान से अपने को बचाए हुए हैं | इसका कारण इसका परंपरा से जुड़ा  होना है | 
यूँ तो मिठाई की दुकानों पर अब होली के आस -पास से ही गुझिया बिकनी शुरू हो जाती है ... जिनको गिफ्ट में देनी है या घर में ज्यादा खाने वाले हैं वहां लोग खरीदते भी हैं , फिर भी शगुन के नाम पर ही सही गुझिया अभी भी घरों में बनायीं जा रही है ... ये अभी भी परंपरा  और अपनेपन मिठास को सहेजे हुए हैं |


लेकिन जिस तेजी से नयी पीढ़ी में देशी त्योहारों को विदेशी तरीके से मनाने का प्रचलन बढ़ रहा है ...उसने घरों में रिश्तों की मिठास सहेजती गुझिया  पर भी संकट खड़ा कर दिया है | अंकल चिप्स कुरकुरे आदि आदि ... घर के बने आलू के पापड और चिप्स को पहले ही चट कर चुके हैं, अब ये सब घर –घर में ना बनते दिखाई देते हैं ना सूखते फिर भी गनीमत है कि अभी कैडबरी की चॉकलेटी गुझिया इस पोस्ट के लिखे जाने तक प्रचलन में नहीं आई है ) , वर्ना दीपावली , रक्षाबंधन और द्युज पर मिठाई की जगह कैडबरी का गिफ्ट पैक देना  ही आजकल प्रचलन में है | 


परिवर्तन समय की मांग है ... पर परिवर्तन जड़ों में नहीं तनों व् शाखों में होना चाहिए ...ताकि वो अपनेपन की मिठास कायम रहे | आइये सहेजे इस मिठास को ...

होली की हार्दिक शुभकामनायें 

वंदना बाजपेयी 




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                                               कविता -होली आई रे


होली त्यौहार है मस्ती का , जहाँ हर कोई लाल , नीले गुलाबी रंगों से सराबोर हो कर एक रंग हो जाता है ....वो रंग है अपनेपन का , प्रेम का , जिसके बाद पूरा साल ही रंगीन हो जाता है ...आइये होली का स्वागत करे एक कविता से ...

कविता -होली आई रे 



फिर बचपन की याद दिलाने
बैर  भाव को दूर भगाने
जीवन में फिर रंग बढाने
होली आई रे ...


बूढ़े दादा भुला कर उम्र को
दादी के गालों पर मलते रंग को
जीवन में बढ़ाने उमंग को
होली आई रे


पप्पू , गुड्डू , पंकू देखो
अबीर उछालो , गुब्बारे फेंकों
कोई पाए ना बचके जाने
होली आई रे



गोरे फूफा हुए हैं लाल
तो काले चाचा हुए सफ़ेद
आज सभी हैं नीले - पीले
होली आई रे 


बन कन्हैया छेड़े जीजा
राधा सी शर्माए  दीदी
प्रीत वाही फिर से जगाने
होली आई रे




घर में अम्माँ गुझिया तलती
चाची दही और बेसन मलती
बुआ दावत की तैयारी करती
होली आई रे



बच्चे जाग गए हैं तडके
इन्द्रधनुषी बनी हैं सडकें
सबको अपने रंग में रंगने
होली आई रे 



जिनमें कभी था रगडा -झगडा
चढ़ा प्रेम का रंग यूँ तगड़ा
सारे बैर -भाव मिटाने
होली आई रे

नीलम गुप्ता

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कहानी -मेरी दुल्हन


लाली -लाली डोलिया में लाली रे दुल्हनिया ... नयी नयी दुल्हन का क्रेज ही कुछ ज्यादा होता है | सोचने की बात ये हैं कि जब घर परिवार को इतना होता है तो दुल्हे मियाँ को कितना होता होगा, पर ये लम्बी -लंबी उबाऊ परम्पराएं ..आखिर धीरज रहे भी तो कैसे ?


कहानी -मेरी दुल्हन 



आज मेरी शादी का दिन था!सारा घर मेहमानों से भरा पडा था!मेरी शादी मे सबसे पहले मां भगवती का जागरण हुआ,बाद मे अन्य रस्मे।मेरी शादी मे आये मेरे चचेरे भाई भी ठिठोली से बाज नही आये,और मुझे छेड रहे थे!चचेरी बहने अलग से चुहलबाजी करती रही। खूब धमाल-चौकडी लगी थी।सभी प्रकार के रीति-रिवाजो को करके मेरी शादी ठीक  से सम्पन्न हो चुकी थी। रिवाज के हिसाब से तारो की छांव मे मै अपनी दुल्हन की डोली लेकर अपने घर लौट आया था।


दिसम्बर माह की बर्फानी राते थी।ठंड अपने पूरे शबाब पर थी। मेरी मां ने मेरी दुल्हन को आराम करने के लिये एक कमरे मे सुला दिया,थकी हुई वो जल्द ही नींद की आगोश मे समा गयी।विदाई संग आया भाई भी बहन के कमरे मे ही था। अपनी दुल्हन से बात करने को अधीर था मै,और वो शर्म से निगाहे नीची किये थी।तीखे नैन-नक्श,सुराही दार लम्बी गर्दन,व गोरा मुखडा,जिस पर शर्मीली झुकी हुई आंखे,माथे पर खेलती कटी जुल्फे!सौन्दर्य की साक्षात मूरत मेरे सामने थी पर मै बात नही कर सकता था क्योकि संयुक्त परिवार की कुछ मर्यादा थी।

पढ़िए -स्वाद का ज्ञान 


बाहर अंधेरा था,सभी रिश्तेदार दो घंटे के लिये आराम करने लगे।और मेरी दुल्हन भी सो गयी थी। सूरज निकल आने पर दुल्हन का भाई तो चला गया वापिस अपने घर।तभी मेरी बडी भाभी ने मेरी दुल्हन को तैयार कर दिया था!और नाश्ते हेतु डाईनिंग रुम मे बैठा दिया था! मेरी मां ने बडे प्यार से नाश्ता परोसा।


दही संग आलू के परोठे देख मै खुश हो गया था!पर ये क्या,दुल्हन ने जरा सा खाते ही छोड दिया!मुझसे रहा नही गया!पूछ ही बैठा:- क्या हुआ?खाना अच्छा नही क्या?
दुल्हन :-नही,नही, भूख नही है!शर्माते हुए कहा। 
फिर मैने जोर देकर कहा:-कुछ तो खाओ! 
इस पर दुल्हन ने साफ कह दिया:-इन पराठों मे तो मिर्चें बहुत तेज है,मै नही खा सकती। और जल्द ही व उठ गयी वहां से।

घर मे और रिश्तेदार भी घूम रहे थे,और मै मायूसी से चुप रह गया।। इसी बीच नाश्ते के बाद हमे पग फेरे की रस्म के लिये ससुराल जाना था। वहां जाकर दुल्हन अपने भाई बहनो मे रम गयी,मुझे उससे बात करने का मौका भी नही मिल पा रहा था, रात को हम लोग वहां से वापिस लौट आये। 


हां इतना जरुर था कि वहां से लौटते समय मै उसके संग ही बैठा था तो मै ठंड से बचने के लिये एकाएक अपने दोनो हाथ रगडने लगा,तो उसने धीरे से पूछा:-"आप ये क्या कर रहे हो"? मैनै हंस कर कहा:-"हीट ले रहा हूं"। और फिर वो चुपचाप हो गयी। तभी मै रात होने का इन्तजार करने लगा और कल्पना करने लगा,कि जब रात होगी,तो वो तारो को अपने आंचल मे समेटे मेरी राह देखेगी और मेरे भीतर उफनते मादक प्रेम को अपने कोमल हाथो के स्पर्श से पुलकित कर देगी!उसके यौवन के भार से लदे अप्रतिम सौन्दर्य का रसपान करने के लिये मै व्याकुल हो उठा।


इतनी सुन्दर,कोमलांगी,दुल्हन को पाकर मै खुशी से फूला नही समा रहा था!अपने सपनो मे,अपनी कल्पना मे, जिसकी मूरत बना रखी थी,वो तो उससे भी ज्यादा सुन्दर थी,प्यारी थी,!उसक़ो देखते-देखते मैने अपने प्रेम की उस मीठी अनुभूतियो को बडी शिद्दत से महसूसा।ज्योहि मैने उसे अपनी बाहो मे भरना चाहा,तभी बडी भाभी ने इशारे से अपने पास बुला लिया और मुझे घूमने भेज दिया। सबके सो जाने के बाद,मुझे मेरे कमरे मे जाने की इजाजत मिली।

पढ़िए -सही इलाज़

 रात काफी हो चुकी थी,इधर मेरी दुल्हन मेरा इन्तजार करते-करते कब सो गयी,उसे खुद भी पता नही चला। एक बार तो मेरी दुल्हन को सोता देख मुझे उस पर प्यार भी आया और गुस्सा भी, पर.....मै कुछ सोचने लगा। मेरे सामने अतुलनीय रूप की मल्लिका आंखें मीचे सो रही थी,उसका अंग-अंग प्रेम की अठखेलियां खेलने को तैयार था,मुझे पल पल कामुकता से सरोबार कर रहा था,और मै मौन था। जब काफी समय गुजर गया,मेरे सब्र का प्याला छलकने लगा,तो मुझसे रहा नही गया!मैने उस सोती हुई अपनी दुल्हन को अपने बाहुपाश मे ले लिया।


तभी वो अलसायी सी कुछ बोली:-मुझे सोने दो,बडी नींद आ रही है,!तभी मैने उसके गालो पर चुम्बनो की बोछार कर दी,हंसते हुऐ कहा-आज की रात तुम्हारे मेरे मिलन की रात है,आज की रात जीवन मे एकबार ही आती है,जागो और मुझे प्रेम कर लेने दो,मै तुम्हारे प्रेम का पुजारी हूं,मुझे जी भर कर रसपान कर लेने दो।खैर,मेरी शर्मीली दुल्हन जाग गयी और वो मेरी बाहो मे समा गयी।उसका सामीप्य पाकर मै खिल उठा और सारी रात एक दूसरे से बाते करते गुजर गयी

!एक दूसरे का गीतो का आदान प्रदान करते हुऐ मिलन की रात कब उजाले मे बदल गयी,पता ही नही चला।एक नयी भोर का आगाज हो चुका था,जो संग लायी थी,ढेरो खुशियां.-समर्पण व सहयोग की भावना व जीवन भर साथ देने की कसमे।।।
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रीतू गुलाटी 

लेखिका -रीतू गुलाटी





                                                              हामिद का तोहफा



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