चलो चले जड़ों की ओर : कविता – रश्मि प्रभा

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माँ और पिता हमारी जड़ें हैं
और उनसे निर्मित रिश्ते गहरी जड़ें
जड़ों की मजबूती से हम हैं
हमारा ख्याल उनका सिंचन …
पर, उन्नति के नाम पर
आधुनिकता के नाम पर
या फिर तथाकथित वर्चस्व की कल्पना में
हम अपनी जड़ों से दूर हो गए हैं
दूर हो गए हैं अपने दायित्वों से
भूल गए हैं आदर देना

नहीं याद रहा
कि टहनियाँ सूखने न पाये
इसके लिए उनका जड़ों से जुड़े रहना ज़रूरी है
अपने पौधों को सुरक्षित रखने के लिए
अपने साथ
अपनी जड़ों की मर्यादा निर्धारित करनी होती है
लेकिन हम तो एक घर की तलाश में
बेघर हो गए
खो दिया आँगन
पंछियों का निडर कलरव
रिश्तों की पुकार !

‘अहम’ दीमक बनकर जड़ों को कुतरने में लगा है
खो गई हैं दादा-दादी
नाना-नानी की कहानियाँ
जड़ों के लिए एक घेरा बना दिया है हमने
तर्पण के लिए भी वक़्त नहीं
झूठे नकली परिवेशों में हम भाग रहे
गिरने पर कोई हाथ बढ़ानेवाला नहीं
आखिर कब तक ?
स्थिति है,
सन्नाटा अन्दर हावी है ,
घड़ी की टिक – टिक…….
दिमाग के अन्दर चल रही है ।
आँखें देख रही हैं ,
…साँसें चल रही हैं
…खाना बनाया ,खाया
…महज एक रोबोट की तरह !
मोबाइल बजता है …,-
“हेलो ,…हाँ ,हाँ , बिलकुल ठीक हूँ ……”
हँसता भी है आदमी ,प्रश्न भी करता है …
सबकुछ इक्षा के विपरीत !
……………….
अपने – पराये की पहचान गडमड हो गई है ,
रिश्तों की गरिमा !
” स्व ” के अहम् में विलीन हो गई है
……… सच पूछो,
तो हर कोई सन्नाटे में है !
……..आह !
एक अंतराल के बाद -किसी का आना ,
या उसकी चिट्ठी का आना
…….एक उल्लसित आवाज़ ,
और बाहर की ओर दौड़ना ……,
सब खामोश हो गए हैं !
अब किसी के आने पर कोई उठता नहीं ,
देखता है ,
आनेवाला उसकी ओर मुखातिब है या नहीं !
चिट्ठी ? कैसी चिट्ठी ?
-मोबाइल युग है !
एक वक़्त था
जब चिट्ठी आती थी
या भेजी जाती थी ,
तो सुन्दर पन्ने की तलाश होती थी ,
और शब्द मन को छूकर आँखों से छलक जाते थे
……नशा था – शब्दों को पिरोने का !
…….अब सबके हाथ में मोबाइल है
…………पर लोग औपचारिक हो चले हैं !
……मेसेज करते नहीं ,
मेसेज पढ़ने में दिल नहीं लगता ,
या टाइम नहीं होता !
फ़ोन करने में पैसे !
उठाने में कुफ्ती !
जितनी सुविधाएं उतनी दूरियाँ
समय था ……..
धूल से सने हाथ,पाँव,
माँ की आवाज़ …..
“हाथ धो लो , पाँव धो लो ”
और , उसे अनसुना करके भागना ,
गुदगुदाता था मन को …..
अब तो !माँ के सिरहाने से ,
पत्नी की हिदायत पर ,
माँ का मोजा नीचे फ़ेंक देता है बेटा !
क्षणांश को भी नहीं सोचता
” माँ झुककर उठाने में लाचार हो चली है ……”
…….सोचने का वक़्त भी कहाँ ?
रिश्ते तो
हम दो ,हमारे दो या एक ,
या निल पर सिमट चले हैं ……
लाखों के घर के इर्द – गिर्द
-जानलेवा बम लगे हैं !
बम को फटना है हर हाल में ,
परखचे किसके होंगे
-कौन जाने !
ओह !गला सूख रहा है ………….
भय से या – पानी का स्रोत सूख चला है ?
सन्नाटा है रात का ?
या सारे रिश्ते भीड़ में गुम हो चले हैं ?
कौन देगा जवाब ?
कोई है ?
अरे कोई है ?
जो कहे – चलो चलें अपनी जड़ो की ओर …

रश्मि प्रभा

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