विशाखापट्टनम रेप -संवेदनाएं भी अब आभासी हो गयी हैं

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विशाखापट्टनम रेप -संवेदनाएं भी अब  आभासी हो गयी हैं

विशाखापट्टनम का रेलवे स्टेशन साक्षी है एक ऐसे क्रूरतम कृत्य का जिसे
पशुता कहना भी पशुओं का अपमान होगा |एक स्त्री के साथ हुई इस वीभत्स घटना का
अपराधी केवल एक गंजेड़ी नर पिशाच ही नहीं हर वो आदमी है जो उस समय वहां मौजूद था ,
जिसने उस घटना को देख कर भी अनदेखा कर दिया | जिसने भी उस घटना को देखकर अपना
रास्ता बदल दिया या जिसने भी उस घटना को देखकर सिर्फ शोर मचाना ही अपन कर्तव्य
समझा | और उस घटना को अंजाम देने वाले से कम दोषी नहीं हैं वो जो उस घटना का
वीडियो बनाते रहे | जिन्हें उस औरत से कहीं ज्यादा चिंता थी अपने फेसबुक अपलोड की
| ढेरों लाइक कमेंट उनके झूठे अहंकार को संतुष्ट कर के उनका दिन बना सकते थे | फिर
क्या फर्क पड़ता है की किसी की पूरी जिंदगी बिगड़ जाए |


विशाखापत्तनम  -सरेआम होता रहा रेप


               आज मैं बात कर  रही हूँ 
विशाखा पट्टनम रेप केस की | जहाँ एक औरत के साथ भीड़ भरे रेलवे स्टेशन पर
सरेआम रेप होता रहा और भीड़ ने उसे रोकने का प्रयास भी नहीं किया | घटना के
अनुसार  गंजी सिवा जिसकी उम्र २० वर्ष है
२२ अक्टूबर को दिन दोपहर शराब के नशे में रेलवे स्टेशन जाता है | वहां फुट पाथ पर
सो रही महिला के साथ सरेआम रेप करता है | सामने से लोग गुज़र रहे है | किसी को कहीं
जाना हैं | कोई अपने परिवार को लेने आया है,  कोई किसी को छोड़ने आया है उस भीड़ को केवल अपने
परिवार से मतलब है |  महिला की दर्द भरी
चीखें जो शायद पर्वतों को भी हिला दें | किसी को सुनाई ही नहीं देती | अलबत्ता कुछ
लोग हैं जो सुनते हैं , रुकते हैं , कुछ आवाजे  भी करते हैं पर इतने लोग मिलकर एक निहत्थे शराबी
से एक महिला को नहीं बचा पाते | क्यों ? क्योंकि वो बचाना ही नहीं चाहते थे |







 इन दर्द से बेपरवाह कुछ उत्त्साही युवक  वीडियो बनाने लग जाते हैं |लाइव रेप …  आभासी दुनिया में  तहलका मच जाएगा | वो औरत जो भिखारी है अर्द्धविक्षिप्त
है किसी की लगती ही क्या है ?  हमें तो
लाइक कमेन्ट से मतलब है | फलाने ने जब एक पगली से रेप की कविता डाली थी वो भी रात
के अँधेरे में तो कितने लाइक आये  थे | ये
तो दिन के उजालों में हो रहा है | ये पोस्ट तो वायरल होगी |

अफ़सोस की वायरल ये पोस्ट नहीं ये घृणित चलन हो रहा है

हालांकि  अब अपराधी पकड़ा जा
चुका है और पीड़ित महिला का अस्पताल में इलाज़ चल रहा है | पर किसी घटना को समय रहते
रोकने के स्थान पर हम समय निकल जाने के बाद बस मरहमपट्टी में विश्वास करते हैं |
ये जानते हुए की ये घाव कभी नहीं भरते |




हमारी संवेदनाएं भी बस आभासी हो गयी हैं 



 संवेदन हीनता की ये हद है की जिस घटना में  हमारा कोई पीड़ित नहीं है उस घटना से हमें कुछ
लेना देना नहीं है |हम सब को जल्दी है अपने काम की , नाम की , पैसे की और खुशियों की
| समाज के लिए वक्त निकालने को वक्त ही कहाँ है हमारे पास | हम ये भूल जाते हैं की
जब  पास के घर में आग लग रही है तो हमारा
घर भी सुरक्षित नहीं है | एक चिंगारी हमारे घर को भी स्वाहा  कर सकती है | महिलाओं पर बढ़ते हुए शारीरिक 
अत्याचार  क्या इस बात का
प्रमाण नहीं है की अब हम समाज में नहीं रहते | मुर्दा लोगों की बस्ती में रहते हैं
| जी हाँ मुर्दा लोग जो जीते हैं चलते हैं खाते हैं पर जिनकी संवेदनाएं मर गयी हैं
|


या आभासी दुनिया में दिन रात अपलोड करते हुए  हमारी संवेदनाएं भी बस आभासी हो गयी हैं 


नीलम गुप्ता 



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