बेगम अख्तर- मल्लिकाएं-ए-ग़ज़ल को सलाम

मल्लिकाएं ग़ज़ल पदम् श्री और पदम् विभूषण से सम्मानित बेगम अख्तर का असली नाम अख्तरी बाई फैजाबादी था | वो भारत की प्रसिद्द ग़ज़ल व् ठुमरी ...





मल्लिकाएं ग़ज़ल पदम् श्री और पदम् विभूषण से सम्मानित बेगम अख्तर का असली नाम अख्तरी बाई फैजाबादी था | वो भारत की प्रसिद्द ग़ज़ल व् ठुमरी गायिका थीं | जिनकी कला के  जादू ने सरहदें पार कर पूरे विश्व को अपनी स्वर लहरियों में बाँध लिया |इस साल ग़ज़ल की महान गायिका बेगम अख्तर की जन्मशती मनाई जा रही है | गूगल ने भी डूडल बना कर उनको सम्मानित किया है | ठुमरी की सम्राज्ञी बेगम अख्तर के जीवन के उतार चढाव के  बारे में बहुत कम लोग जानते हैं |आइये हमारे साथ कुछ करीब से जानते हैं बेगम अख्तर को ...


बेगम अख्तर का जीवन परिचय
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बेगम अख्तर का जन्म 7  अक्टूबर 1914 को उत्तरप्रदेश के फैजाबाद जिले में हुआ था |उनकी माता का नाम मुश्तरी बाई व् पिता का नाम असगर हुसैन था |उनके पिता वकील थे व् कहीं और शादी शुदा थे  | मुस्तरी बाई प्रसिद्द गायिका व् तवायफ थीं |जिन्हें उनके पिता ने दूसरी बेगम के रूप में अपनाया था | अपने स्वरों से रूहानी प्रेम को उत्पन्न करने वाली बेगम अख्तर अपनी माता – पिता के अलहदा प्रेम के फलस्वरूप अपनी जुड़वां बहन के साथ दुनिया में आई थीं |



बेगम अख्तर का शुरूआती बचपन

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बेगम अख्तर का बचपन का नाम बिब्बी व् उनकी बहन का नाम जोहरा था | कहते हैं की दो बेटियाँ पैदा होने के बाद उनके पिता ने माँ व् बेटियों  को छोड़ दिया | उनकी माँ मुश्तरी बाई  बच्चियों के साथ संघर्ष मय जीवन जीने को अकेली रह गयीं | तभी दुःख का एक पहाड़ और टूटा | जब बच्चियों ने बचपन में ही भूल वश कुछ जहरीला खा लिया | बिब्बी तो बच गयीं पर जोहरा अल्लाह को प्यारी हो गयीं | अब बिब्बी अकेले ही माँ की जिम्मेदारी और माँ का सहारा बन गयीं |


बचपन में चुलबुली थीं बेगम अख्तर
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जीवन संघर्ष कितना भी क्यों न हों पर बचपन की मासूमियम और चुलबुलापन बेगम अख्तर से कोई चुरा नहीं पाया | फूल तोड़ कर छुप जाना , तितलियाँ पकड़ना और शरारतें करना नन्ही  बिब्बी का शगल था | अलबत्ता पढाई में उनका मन नहीं लगता था | उनका मन लगता था ग़ज़ल और ठुमरी में जिसे वो घंटों सुना करती थीं |उनकी  माँ जरूर उन पर पढाई का दवाब बनाती पर बिब्बी कैसे न कैसे कर बच निकलती | एक बार तो उन्होंने मास्टर जी की चोटी ही काट ली | अब तो मुश्तरी बाई परेशांन  हों गयीं | उन्होंने बिब्बी से पूंछा तुम क्या करना चाहती हो | तो उन्होंने संगीत सीखने की इच्छा जाहिर की | हालांकि मुश्तरी बाई इसके पक्ष में नहीं थीं पर उनके चचा ने उनकी दिली ख्वाइश का साथ दिया और सात साल की उम्र में उनकी संगीत शिक्षा प्रारंभ  हो गयी | उन्होंने चन्द्राबाई थियेटर ज्वाइन किया | मामूली शिक्षित बेगम अख्तर का ग़ज़ल ठुमरी का ज्ञान आकाश की ऊँचाइयों की और बढ़ने लगा |


बड़ा कठिन था बेगम अख्तर का शुरूआती सफ़र
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बिब्बी ने गाना सीखना तो शुरू कर दिया | पर उनका शुरूआती सफ़र बहुत कठिन था |बेगम अख्तर पर किताब लिखने वाली रीता गांगुली ने एक जगह लिखा है की उनके गुरु ने गाना सीखाते समय कुछ गलत हरकत करने की कोशिश की |बेगम अख्तर ने उसका माकूल जवाब दिया | व् अन्य  छात्राओ को संगठित किया | सबने अपने दर्द बयान किये | फिर भी उन्होंने हिम्मत नहीं हारी |  उन्होंने संगीत को कई उस्तादों से सीखा | 


जब गुरु ने कहा मेरी बहादुर बिटिया हार नहीं मानेगी
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एक बार का वाकया  है की वो कोई सुर नहीं लगा पा रही थीं | गुरु बार – बार समझा रहे थे | पर उनसे सुर लग ही नहीं रहा था | आखिरकार वो रोने लगीं और बोली मैं कभी भी गाना नहीं सीख पाऊँगी | उनके गुरु ने उनको डाँटते हुए कहा बस अभी से हार मान गयी | फिर स्नेहपूर्ण शब्दों में बोले ,"मेरी बहादुर बिटिया हार नहीं मानेगी" | इन शब्दों का उन पर जादुई असर हुआ और वो फिर रियाज करने लगीं | तेरह साल की उम्र में बिब्बी अख्तरी बाई हो गयीं |

इसी बीच उनका मन नाटकों की और आकर्षित हुआ | वो पारसी थियेटर से भी जुड़ गयीं | नाटक ज्वाइन करने के कारण उनके गुरु अता उल्ला खां उनसे नाराज़ हो गए | और उनसे कहा तुम नाटक करने लगी हो अब तुम संगीत नहीं सीख सकतीं | अख्तरी बाई ने गुरु से गुजारिश की ,कि वो एक बार आकर नाटक देख तो लें | फिर आप जो कहेंगे मै करुँगी |  गुरु अता उल्ला खान उनका नाटक देखने गए | वहां पर जब उन्होंने चल री मोरी नैया गाना गया तो गुरु की आँखों में आंसूं आ गए और वे बोले ,” तुम सच्ची अदाकारा हो | तुम चाहे जो करो तुम्हें आगे बढ़ने से कोई नहीं रोक सकता |


हालांकि एक अकेली स्त्री होने के नाते उनका उनका उनका संघर्ष बहुत कठिन था | वह कई बार छेड़छाड़ की शिकार हुई | शोषण भी हुआ | उनके जीवन के यह दर्द भरे पन्ने बाद में कई मैगजींस में प्रकाशित हुए | संघर्ष कितने भी कठिन हों पर अख्तरी बाई ने हर संघर्ष से टकराकर नदी की तरह आगे बढ़ने की ठान ली और पीछे मुड  कर नहीं देखा |


बेगम अख्तर की पहली स्टेज परफोर्मेंस
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15 साल की मासूम उम्र में बेगम अख्तर ने अख्तरी बाई फैजाबादी के नाम से पहली बार पहली बार स्टेज पर उतरीं | यह कार्यक्रम बिहार के भूकंप पीड़ितों के लिए कोलकाता में हुआ था | इसमें भारत कोकिला सरोजिनी नायडू भी आयीं थीं | कहतें हैं की उनकी आवाज़ में उनकी जिन्दगी भर का दर्द उतर आता था | ऐसा रूहानी माहौल बनता था की श्रोता मन्त्र मुग्ध हो जाते थे | उनको सामने से सुनने वाले बताते हैं की उनका गाना  सुनने के बाद न जाने कितनी आँखें भीग जाती थीं |


फ़िल्मी  कैरियर की शुरुआत
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बतौर अभिनेत्री बेगम अख्तर ने अपने फ़िल्मी कैरियर की शुरुआत फिल्म “ फिल्म एक दिन का बादशाह से की | फिल्म असफल रही | उनका कैरियर भी रुक गया | फिर उन्होंने 1933 में नल दमयंती फिल्म की | यह फिल्म ईस्ट इण्डिया कम्पनी के बैनर तले बनी थी | फिल्म सफल हुई | अख्तरी बाई को कुछ – कुछ पहचान मिली | उसके बाद उन्होंने अमीना , जवानी का नशा , मुमताज़ बेगम, नसीब का चक्कर जैसी फिल्मों में काम किया | तभी महबूब खान से उनकी मुलाक़ात हुई | वो उनकी प्रतिभा के कायल थे | उन्होंने उन्हें ले कर 1948 में रोटी फिल्म बनायी व् फिल्म के गाने भी गाने दिए | इस फिल्म में उन्होंने ६ गाने गाये जिसमें से संगीतकार जोड़ी के विवादों के चलते ३ काट लिए गए | जो बाद में ग्रामोफोन  डिस्क में जारी किये गए | उसी समय जब उनका सिने कैरियर उठ रहा था वो सुकून लेने मुंबई छोड़ लखनऊ वापस आ गयीं |

अकेलेपन  से घबराती थी बेगम अख्तर
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जिसका पूरा जीवन अकेलेपन  में बीता हो वो बेगम अख्तर अकेलेपन से घबराती थी | बाहर प्रशंसकों को भीड़ से घिरी बेगम अख्तर दिल के अंदुरुनी  कोने में बहुत अकेली थीं | वो होटल में भी अकेले कमरे में रहने से घबराती थी | इस अकेलेपन को उन्होंने शराब व् सिगरेट के साथ बांटा | अब उनकी जिंदगी के तीन दोस्त हो गए | गायन तो पहले से था ही | पर जब जब जीवन में निराशा घिरती सिगरेट का साथ बढ़ जाता | वो चेन स्मोकर हो गयी थी | बाद में यही धुँआ उनकी जिन्दगी को धुआं में तब्दील करने का सबब बना |


बेगम अख्तर का प्रेम और निकाह और गायन की विदाई
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1945 में जब उनकी शोहरत चरम पर थी तभी उनके जीवन में सच्चा प्यार आया | उनका प्यार था लखनऊ के वकील इश्तिआक अहमद अब्बासी | उनसे निकाह करके  वो अख्तरी बाई से बेगम अख्तर बन गयीं | उनसे निकाह करने के लिए इश्तिआक अहमद ने अपने परिवार वालों का बहुत विरोध झेला | अंतत : प्रेम की जीत हुई | हालांकि उनके विवाह पर कहने वाले कहते थे की “ सौ चूहे खाकर बिल्ली हज को चली “| पर बेगम अख्तर ने अपने इस प्रेम के आगे सब कुछ छोड़ दिया | सुर संगीत गायन सब कुछ | यहाँ तक की वो एक घरेलू  महिला की तरह परदे में रहने लगीं | कुछ लोग इसके लिए उनके पति को दोषी भी ठहराते हैं परन्तु उनको करीब से जानने  वाले जानते हैं की ये उनका निजी फैसला था |


जब बेगम अख्तर बीमार पड़ीं
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संगीत छोड़ने के बाद बेगम अख्तर बहुत बीमार पड़ीं | काफी इलाज़ कराया  गया | पर वो ठीक न हुई | तब एक डॉक्टर ने बताया ,” गाना छोड़ने के बाद ये अवसाद में घिर गयीं हैं | इससे बाहर निकलने के लिए इन्हें फिर से गायन शुरू करने होगा | तब अपने पति के बहुत समझाने पर उन्होंने एक बार फिर गाना शुरू किया और १९४९ को आल इण्डिया रेडियो की लखनऊ शाखा से जुड़ गयीं | एक बार फिर से  उन्होंने न सिर्फ गायन बल्कि अभिनय में भी अपनी जोरदार उपस्तिथि दर्ज काराई | अदाकारा के रूप में सत्यजीत रे की बंगाली फिल्म जलसा घर उनकी आखिरी फिल्म थी | उन्होंने करीब ४०० गीत गाये |


बेगम अख्तर की कुछ ख़ास बातें

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 *बेगम अख्तर को लेश मात्र भी घमंड नहीं था | वो कहा करती थी की हर दिन कुच्छ सीखना है व् अपने आप को बेहतर करने है |
* बेगमअख्तर को लेश मात्र भी घमंड नहीं था | वो कहा करती थी की हर दिन कुछ  सीखना है व् अपने आप को बेहतर करना  है |
* बेगम अख्तर को हाई हील का शौक था | वो घर में भी हाई हील पहनती थी | *उनकी पसंदीदा पोशाक थी लुंगी कुरता और दुपट्टा
* उन्हें खाना बनाने और लिहाफ में गाँठ लगाने का भी शौक था |

*एक बार हज यात्रा के दौरान पैसे खत्म होने पर उन्होंने गाना शुरू किया | तुरंत उन्हें 
 पहचान लिया गया | फिर उन्होंने मक्का रेडिया पर भी गाया |
*बेगम अख्तर की कोई संतान नहीं थी | हालांकि वो कई बार गर्भवती हुई पर गर्भपात हो गया |
* उन्होंने पकिस्तान , अफगानिस्तान व् तब केसोवियत संघ में भी गायन किया

* फिराक गोरखपुरी , मदन मोहन , शकील बदायुनी उनके अच्छे मित्र थे |
* गंभीर प्रकृति की बेगम अख्तर मित्रों के साथ हंसी मजाक भी करती थीं | एक बार उन्होंने जिगर मुरादाबादी से मजाक में कहा अगर आप की मेरी शादी होती तो बच्चों में मेरे स्वर व् आपके शब्द दोनों का मेल होता | जिगर मुरादाबादी हंसते हुए बूले अगर उनकी शक्ल मुझ पर जाती तो सब गड़बड़ हो जाता |


सम्मान व् पुरूस्कार
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1948 – पदम् श्री
1972 – संगीत नाटक एकादमी
1975– पदम् भूषण


बेगम अख्तर की मृत्यु
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३० अक्तूबर १९७४ को बेगम अख्तर को इलाहाबाद के मंच पर गाते – गाते दिल का दौरा पड़ा | उन्हें वहीँ से अस्पताल भेजा गया | पर वो उनका अंतिम सफ़र था | और सुरों की ये साम्राज्ञी अपने सुरों को समेट  कर सदा के लिए चली गयी |

                               बेगम  अख्तर भले ही आज हमारे बीच नहीं हैं पर उनके गीत हवाओं  में बिखरे हैं | और चाहने वालों करे दिलों में वो आज भी सुर साम्राज्ञी की गद्दी पर विराजमान हैं व् हमशा रहेंगी |


फोटो क्रेडिट - alchetron.com

वंदना बाजपेयी

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अटूट बंधन : जो अटूट बंधन में बांधे आपके रिश्तों को : बेगम अख्तर- मल्लिकाएं-ए-ग़ज़ल को सलाम
बेगम अख्तर- मल्लिकाएं-ए-ग़ज़ल को सलाम
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अटूट बंधन : जो अटूट बंधन में बांधे आपके रिश्तों को
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