दीपोत्सव के प्रथम दिवस धनतेरस पर निबंध

                 
 यूँ तो खुशियों का और त्योहारों का अटूट बंधन है | इन्ही ख़ुशी के पलों को सहेजने के लिए हर धर्म में अनेकानेक त्यौहार मनाये जाते हैं | इन्हीं त्योहारों की कड़ी में से एक त्यौहार हैं धनतेरस | धनतेरस हिंदुओं  का एक प्रमुख त्यौहार है | यह कार्तिक मास की  कृष्ण पक्ष की त्रियोदशी को मनाया जाता है | इसी दिन से पांच दिन मनाये जाने वाले दीपोत्सव का प्रारंभ  भी होता है | धनतेरस शब्द धन +तेरस से मिल कर बना है | धन से सम्बंधित होने के कारण यह पर्व व्यापारियों में विशेष रूप से लोकप्रिय है | परन्तु इस दिन विशेष रूप से धनवंतरी जी की पूजा की जाती  है | यमराज जी की पूजा का भी विधान है |

क्यों होती है धन्वंतरी जी की पूजा

                        
 धन या संपत्ति कई प्रकार की होती है | हमारे पुराणों  में पहला धन स्वास्थ्य धन माना गया है | जब व्यक्ति निरोग होगा उसका स्वास्थ्य अच्छा होगा तभी वो पर्व त्यौहार या धन का आनंद ले सकता है | इसलिए दीपोत्सव में सबसे पहले धनतेरस को स्थान दिया गया | धन्वंतरी चिकित्सक हैं व् विष्णु के अंशावतार हैं | समुद्र मंथन के समय वह हाथ में अमृत कलश ले कर निकले थे | जिन्होंने अमृत देवताओं को देकर उन्हें अमर कर दिया था | धन्वंतरी की पूजा अच्छे स्वास्थ्य की पूजा है | स्वास्थ्य अच्छा है तो हर तरह का धन कमाया जा सकता है व् उसका आनंद उठाया जा सकता है | साथ ही इस दिन यमराज के नाम भी एक दीपक जलाया जाता है | इसे मुख्य द्वार पर रखा जाता है | ये प्रतीकात्मक है की इस घर में धन्वंतरी का पूजन हो रहा है | हे यम देव आप प्रसन्न हों व् इस घर में सबको जीवन दान देते हुए द्वार से लौट जाएँ |


धनतेरस को क्यों होता है यमदीप का दान


 यम दीप दान के संदर्भ में एक पौराणिक कथा प्रचिलित है | बहुत समय पहले की बात है एक हिम नाम का राजा था | जिसके कोई संतान नहीं थी | बहुत पूजा पाठ  धर्म कर्म करने के पश्चात उसे पुत्र रत्न की प्राप्ति हुई |  युवराज की कुंडली देखते ही पंडित आश्चर्य में पड़ गए | कुंडली के अनुसार युवराज की शादी के चौथे दिन उसकी मृत्यु होनी थी |

समय बीतता गया | युवराज बड़ा हुआ और उसका विवाह हुआ | राजा – रानी ने उसकी पत्नी को सब बात बता दी | विवाह का चौथा दिन भी आ गया | राजा-रानी बहुत चिंतित थे | परन्तु नव ब्याहता पत्नी उन दोनों को दिलासा दे रही थी | उसे माँ लक्ष्मी की भक्ति पर भरोसा था |रात के समय जब सब सो गए तो राजकुमार की पत्नी ने माँ लक्ष्मी के भजन गाने शुरू कर दिए | व् सारा महल दीपों से सजा दिया | जब राजकुमार को लेने यमदूत आये तो उनकी आँखे दीपों की रोशिनी से चुंधिया गयी | वो खाली हाथ लौट गए | तब यमराज स्वयं सर्प का भेष धर राजमहल में पहुंचे | पर जब वो राजकुमार के कक्ष  की ओर अगला कदम रखने जा रहे थे | तभी राजकुमारी के भजनों के मीठे सुर ने उनका ध्यान खींच लिया वो मंत्रमुग्ध से राजकुमारी के पास फूलों व् दीपों के पीछे छुपे भजन सुनते रहे | सारी  रात गुज़र गयी व् राजकुमार की मृत्यु का समय भी निकल गया |यमराज खाली हाथ लौट गए | राजकुमार दीर्घायु हो गया |


यम को दीपदान इसी उद्देश्य से किया जाता है की परिवार में सब दीर्घायु हों | इसके लिए सरसों के तेल का दीपक मुख्य द्वार पर दक्षिण की दिशा की ओर मुंह करके रखा जाता है |


धनतेरस की पौराणिक कथा



धनतेरस की पौराणिक कथा के अनुसार राजा बलि ने देवताओं का सारा धन संपत्ति छीन ली थी | उसके बाद निश्चिन्त हो कर राजा बलि यज्ञ करा रहा था | भगवान् विष्णु देवताओं की सहायता करने के लिए वामन अवतार ले कर बलि के पास गए | बलि ने उनकी आवभगत की | परन्तु राक्षसों के गुरु शुक्राचार्य ने भगवान् विष्णु को पहचान लिया | उसने बलि को समझाया की ये विष्णु हैं, इन्हें वामन समझ कर कुछ भी दान न दें | पर राजा बलि ने उनकी बात मानने से इनकार कर दिया उन्होंने कहा की भले ही ये विष्णु हों पर मेरे द्वार पर वामन भेष में आये हैं तो मैं इन्हें दान अवश्य दूंगा |

राजा बलि जब दान का संकल्प लेने के लिए कमंडल उठा कर आचमन के लिए जल लेने वाले थे | तभी उन्हें रोकने के लिए शुक्राचार्य  अति लघुरूप में कमंडल में घुस  गए व् उसकी टोंटी में ऐसे बैठ गए की जल न निकल सके | भगवान् विष्णु उनकी चाल  समझ गए | उन्होंने शुक्राचार्य को वहां से हटाने के उद्देश्य से एक कृष के तिनके  के सहारे से टोंटी में छेद किया | वो तिनका शुक्राचार्य जी की आँख में लग गया | शुक्राचार्य जी की एक आँख फूट गयी वो बिलबिलाते हुए बाहर निकले | उसे समय बलि ने दान का संकल्प ले लिया |
भगवान् विष्णु ने तीन पग भूमि मांगी | पहले पग में उन्होंने सारी  धरती नाप ली | दूसरे में सारा आकाश  | अब तीसरा पग रखने के लिए कोई जगह ही नहीं बची तो बलि ने अपना शीश आगे कर दिया | भगवान् ने अपना पैर उसके शीश पर रख दिया |
इस तरह राजा बलि को परस्त कर भगवान् विष्णु ने देवताओं की संपत्ति को मुक्त कराया | उस दिन कार्तिक मॉस की कृष्ण पक्ष की त्रियोदशी थी | तभी से देवताओं को धन संपत्ति मिलने की ख़ुशी में यह त्यौहार मनाया जाता है | प्रतीक के रूप में सब लोग कुछ नया धातु का सामन खरीद कर लाते हैं |

धनतेरस की पूजन विधि

१)मंदिर की सफाई करने पश्चात् स्वच्छ कपडा बीछा  कर मिटटी के हठी व् धन्वंतरी भगवान् की मूर्ति स्थापित करें  

२ ) ताम्बे की आचमनी से जल का आचमन करें

३) प्रथम श्री गणेश जी का पूजन व् ध्यान करें , इस मन्त्र का जप करें


देवान कृशान सुरसंघिनी पीडीतांगान , दृष्ट्वा द्यालुर मृतं विप्रीतु काम :
पयोधि मंथन विधौ प्रकटो भवधो , धन्वंतरी : स भगवान्वतात सदा न :
ॐ धन्वन्तरी देवाय नम : धयानार्थे अक्षत पुष्पाणि समर्पयामि

४ ) फिर पुष्प अक्षत व् रोली से धन्वंतरी जी का पूजन करें

५ )धन्वंतरी भगवान् का भोग  लगायें


धनतेरस पर खरीदारी करने का शुभ महूर्त


धनतेरस के दिन किसी नयी वस्तु खरीदारी करने की परंपरा है | यूँ तो लोग दिन भर खरीदारी करते रहते हैं | ज्यादातर शुभ महूर्त शाम को होता है |  कहा गया है की शुभ महूर्त में खरीदारी करने से इसका तेरह गुना ज्यादा फल मिलता है | वस्तुओं के हिसाब से ये महूर्त का समय बदलता रहता है | वैसे धातु के बर्तन , जेवर , रुद्राक्ष , लक्ष्मी माता या कुबेर की फोटी खरीदना शुभ माना जाता है | बदलते समय के हिसाब से अब लोग कंप्यूटर , मोबाइल व् वाहन आदि भी खरीदने लगे हैं |  
                              स्वास्थ्य के प्रति जागरूक करता  धनतेरस दीपोत्सव का एक प्रमुख त्यौहार है | जो स्वास्थ्य के महत्व को धन के ऊपर स्थापित करता है | 

सरिता जैन 

      
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