वाटर मैंन ऑफ़ इंडिया राजेन्द्र सिंह जिन्होंने अपने संकल्प के रास्ते में आने वाले सभी विकल्पों को बंद कर दिया और हिम्मत न हारते हुए अथक परिश्रम से अलवर जिले के सभी गाँवों की पानी की समस्या को दूर किया |

                               
वाटर मैंन ऑफ़ इंडिया राजेन्द्र सिंह -संकल्प लो तो विकल्प न सोंचों



 क्या आप ने कभी कोई संकल्प लिया है ... जैसे सुबह जल्दी उठने का चार घंटे रोज मैथ्स लगाने का या मॉर्निंग वाक , मेडिटेशन, वजन घटाना आदि करने का | अवश्य लिया होगा और ज्यादातर लोगों की तरह सम्भावना है कि आप का ये संकल्प टूट भी गया होगा | क्योंकि  सोचा होगा कि
 चार घंटे रोज़ पढने के स्थान पर तीन घंटे  भी तो पढ़ा जा सकता है या
कभी मित्र के आ जाने पर 
या मूवी देखने वाले दिन कुछ भी नहीं पढ़ा जा सकता है |
आज वाक  का मन नहीं है कल जायेंगे , कल ज्यादा कर लेंगे |
मेडिटेशन में तो ध्यान भटक जाता है .... क्यों  रोज करें , पार्क में शांत बैठना अपने आप में मेडिटेशन है |
अरे डाईट कंट्रोल से वजन तो घटता हीओ नहीं फिर क्यों मनपसंद खाने के लिए मन मारे 

                                                    ये सब कोई बड़े संकल्प नहीं हैं ... बहुत छोटे हैं ... फिर भी टूट जाते हैं | कहने का मतलब ये है कि हम बहुत सारे संकल्प लेते और तोड़ते रहते हैं | क्या आप जानते हैं कि सिर्फ और सिर्फ यही हमारी असफलता का राज है


आज हम बात करेंगे Water man of  India” के नाम से जाने जाने वाले राजेन्द्र सिंह जी की जिन्होंने अपने संकल्प से राजस्थान को हरा-भरा बनाने का प्रयास किया है | अनेकों पुरूस्कार जीत चुके राजेन्द्र जी वर्षों गुमनामी में चुपचाप बस अपना काम करते रहे | उनसे जब उनकी सफलता का राज पूंछा जाता है तो वो हमेशा यही कहते हैं कि लोगों को संकल्प नहीं लेने चाहिए , लेकिन अगर संकल्प ले लिया है तो फिर उसके सारे विकल्प बंद कर देने चाहिए और उसी संकल्पित काम में जुट जाना चाहिए | ये वाक्य खुद राजेन्द्र सिंह ने एक सेमीनार में  साझा किया है , जिसे हम अपने शब्दों में आप तक पहुँचाने का प्रयास कर रहे हैं आइये जाने उनकी कहानी-

 वाटर मैंन ऑफ़ इंडिया राजेन्द्र सिंह -संकल्प लो तो विकल्प न छोड़ो 


                                                    कहते हैं की जहाँ चाह  है वहां राह है | राजेन्द्र सिंह उत्तर प्रदेश के बागपत निवासी थे | उनका जन्म ६ अगस्त १९५९ को हुआ था | उन्होंने हिंदी साहित्य में स्नातक की डिग्री ली थी | उनके पिता जमींदार थे | उनके पास ६० एकड़ जमीन थी | राजेन्द्र सिंह को कोई दिक्कत नहीं थी | वो आराम से जीवन यापन कर सकते थे परन्तु वो समाज के लिए कुछ करना चाहते थे | उन्होंने १९७५ में एक संस्था " तरुण भगत सिंह बनायीं | अच्छी नौकरी को छोड़ कर अपना सब कुछ २३००० रुपये में बेंच कर समाज के लिए कुछ करने की अंत: पुकार उन्हें  घर से बहुत दूर अलवर के एक छोटे से गाँव में ले गयी | एक निश्चय के साथ  " water man of India " अपने चार दोस्तों के साथ अलवर के छोटे छोटे से गाँव में गए | वो चारों  गाँव में शिक्षा का प्रचार करना चाहते थे , परन्तु गाँव में कोई पढ़ने  को तैयार ही नहीं था | राजेन्द्र सिंह व् उनके दोस्त बहुत हताश हुए


एक दिन गाँव के एक बूढ़े व्यक्ति ने उन्हें अपने पास बुलाया और कहा ," हमारे घर की औरतें पानी लेने के लिए २५ -२५ किलोमीटर दूर जाया करती हैं | अगर तुम लोग पानी की समस्या का समाधान कर सको तो मैं वचन देता हूँ कि तुम जो कहोगे , गाँव के सब लोग मानेगें | राजेन्द्र सिंह ने उन्हें समझाने की कोशिश की , कि वो तो शिक्षक हैं वो कैसे ये काम कर सकते हैं | पर बुजुर्ग बोले ,” अब जो है सो है , मैंने तो अपनी शर्त रख दी |  तुम लोगों को खाना मिलेगा व् रहने की जगह मिलेगी पर पैसे हम नहीं दे पायेंगे , अब ये तुम पर है या तो हाँ बोलो और काम शुरू करो या वापस लौट जाओ |


उन बुजुर्ग ने उन्हें पानी लाने का रास्ता भी बताया | बुजुर्ग ने कहा की हमारे गाँव में ये जो पहाड़ है , उसे काट कर तुम्हें नहरे बनानी हैं व् नीचे गाँव में तालाब बनाना है | जब बादल आयेंगे तो पहाड़ से टकरा कर बरसेंगे, जिससे नहरों से होता हुआ पानी तालाब में इकट्ठा होगा और हम उसे पीने में इस्तेमाल करेंगे | ये पानी जमीन के अन्दर भी जाएगा जिससे वाटर टेबल उठेगा | जिससे भविष्य में हमारे गाँव में कुए भी खोदे जा सकेंगे |और पानी की समस्या से जूझ रहा हमारा गाँव ल्लाह्लाहा उठेगा |  

राजेन्द्र सिंह का संकल्प और प्रारंभिक अडचनें 


राजेन्द्र  सिंह ने अपने साथियों से बात की | जाहिर है काम बहुत कठिन था , परन्तु उससे लोगों का बहुत भला किया जा सकता था | काफी सोच –विचार के बाद उन्होंने निर्णय लिया कि वो ये काम करेंगें | उन्होंने उन बुजुर्ग व्यक्ति को अपना निर्णय सुना दिया | बुजुर्ग व्यक्ति ने खुश हो कर उनके रहने की व्यवस्था कर दी | अगले दिन सुबह से काम पर जाने का निश्चय हुआ |


रात में वो पाँचों सोने चले गए | रात के करीब दो बजे होंगे कि राजेन्द्र सिंह के दो दोस्तों ने उन्हें उठाया और कहा कि, भैया तुम तो बहुत हिम्मत वाले हो तुम शायद ये काम कर सको पर हम लोगों के अन्दर इतना motivation नहीं है | हम ये काम नहीं कर पायेंगे | राजेन्द्र सिंह व् उनके दोनों साथियों ने  जाने वाले साथियों को बहुत समझाया | विनती की , "रुक जाओं , ये एक अच्छा काम है , देखो अगर हम  हम पांच लोग ये काम करेंगें तो शायद काम ५, ६ सालों में हो जाए पर अगर हम तीन लोग ही करेंगे तो काम होने में १५ , १६ साल लग सकते हैं "| परन्तु वो दोस्त नहीं माने | तीनों लोग उनके जाने  पर फिर से काम करने का संकल्प ले कर सो गए |



सुबह जब राजेन्द्र सिंह उठे तो उन्होंने देखा कि उनके बाकी के दोस्त भी नहीं हैं | उन्होंने सोचा बाहर होंगे ... वो बाहर भी नहीं थे |उन्होंने उनको गाँव भर में ढूँढा पर अफ़सोस ... वो दोनों भी उन्हें छोड़ कर जा चुके थे | राजेन्द्र सिंह बहुत निराश हुए | पर वो अपने संकल्प  से पीछे हटने वालों में से  नहीं थे | वो अकेले उस बुजुर्ग के पास गए और काम करने की इच्छा जाहिर की | हालांकि राजेन्द्र सिंह जानते थे कि ये काम बहुत कठिन है और उन्हें २५ -३० साल तक भी लग सकते हैं , फिर भी वो इस काम को करने के लिए तैयार थे |


 उन्हें अकेला आया देख वो बुजुर्ग व्यक्ति बहुत जोर से  हँसा , उसने उनसे कहा कि आप अकेले क्या कर लेंगे ?राजेन्द्र सिंह ने निर्भयता से कहा ... प्रयास “ | बुजुर्ग व्यक्ति ने उन्हें एक फावड़ा व् खाने का डिब्बा दे कर विदा कर दिया | राजेन्द्र सिंह शिक्षक थे , वो कोई मजदूर नहीं थे| उन्हेविन फावड़ा चलाने की आदत नहीं थी | वो पूरा दिन पहाड़ खोदते रहे और बहुत जरा सा गड्ढा कर पाए | शाम को जब वो नीचे गाँव में आये तो गाँव के लोग ताली बजा-बजा कर उन पर हँसने लगे | पर इससे राजेन्द्र सिंह का विश्वास डिगा नहीं | वो अगले दिन फिर सुबह फावड़ा ले कर गए ... अगले दिन फिर ... फिर ... फिर...

लोग जुड़ते गए काफिला बनता गया  



गाँव के लोग उनका मजाक बनाते गए और राजेन्द्र सिंह हर दिन गड्ढे पर गड्ढे खोदते गए | इस तरह ६ या ७ महीने बीत गए | एक दिन गाँव का एक युवक फावड़ा ले कर आया और उसने राजेन्द्र सिंह से कहा ,” आप बहुत हिम्मत कर रहे हैं , आप की हिम्मत देख कर मेरे मन में भी आशा जगी है | आज से मैं भी आप के साथ चलूँगा | जहाँ एक आदमी था वहां दो हो गए ... फिर तीन ... फिर चार ... धीरे –धीरे पूरा गाँव जुड़ गया | जो काम अकेले राजेन्द्र सिंह २० -२५ साल में कर पाते वो काम इतने लोगों ने मिल कर कुछ महीनों में निपटा दिया |


नहरें बनीं , तलाब बने और बिलकुल बुजुर्ग के कहे अनुसार जब बादल पहाड़ से टकराकर कर बरसे और पानी नहरों से होता हुआ तालाबों में भरा | गाँव वालों की पानी की समस्या दूर हुई |  अलवर के एक गाँव की समस्या दूर होने की खबर आस –पास के गांवों में भी फ़ैल गयी | वहां से भी लोग राजेन्द्र सिंह को बुलाने लगे | तब –तक राजेन्द्र सिंह ने अपनी एक टीम बना ली थी | वो अपनी टीम के साथ गाँव –गाँव जाने लगे और वहां की पानी की समस्या दूर करने लगे |

त्याग और समर्पण को मिला सम्मान 


 राजेन्द्र सिंह जी गाँव-गाँव पानी की समस्या दूर कर रहे थे | उन्हें न नाम की परवाह थी न दाम की , उन्हें बस अपने काम की परवाह थी | परन्तु उनके त्याग व् समर्पण की ये खबर दिल्ली से होते हुए सिंगापुर पहुंची | जहाँ उन्हें  उनके उस काम के के लिए पहला सम्मान  MAGASAYSAY AWARD मिला |  उनका काम दुनिया की नज़र में आया और सम्मानों की झड़ी लग गयी | २०१५ में उन्हें स्टॉक होम वाटर प्राइज़ मिला जिसे पानी का नोबल प्राइज़ भी कहते हैं |


सेमिनार के अंत में जब उनसे पूंछा गया की आप इतना सब कुछ कैसे कर पाए तो उन्होंने सीधा–सादा सा उत्तर दिया कि मेरी जिन्दगी का एक ही सूत्र है , इसी वजह से मैं ये सब कर पाया , अगर आप भी इसे अपनी जिंदगी में उतार लें तो कोइ काम ऐसा नहीं है जिसे आप न कर सकें | वो सूत्र है ...

“ या तो संकल्प करो नहीं और अगर करो तो उसका विकल्प मत छोड़ो “

अटूट बंधन परिवार 

राजेन्द्र सिंह जी के बारे में अधिक जानकारी आप विकिपीडिया से प्राप्त कर सकते हैं |

 क्रेडिट -विकिपीडिया ओर्ग

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