डॉ. भारती गांधी,
शिक्षाविद् एवं संस्थापक-संचालिका,
सिटी मोन्टेसरी स्कूल, लखनऊ
बोया पेड़ बबूल का तो आम कहाँ से पाये ?:-
एक बार मैं रेलवे स्टेशन पर कहीं जाने के लिए खड़ी थी तो मैंने देखा कि एक नौजवान अपने बूढ़े पिता का हाथ पकड़कर घसीट कर ट्रेन की तरफ ले जा रहा था। इस घटना को देखकर मेरे अन्दर बहुत पीड़ा हुई। मुझे ताज्जुब हो रहा था कि इस नौजवान की कैसे हिम्मत हुई कि वह अपने लगभग 70 वर्षीय बूढ़े पिता को कितनी बेरहमी से घसीटे। इस ट्रेन को आये हुए अभी कुछ ही सेंकण्ड हुए थे और अभी इस ट्रेन को अगले कुछ मिनटों तक प्लेटफार्म पर ही खड़ी रहना था। इस घटना से मेरे दिमाग में एक बात आई कि जब यह बच्चा छोटा रहा होगा तो उनके माता-पिता ने हो सकता है कि अपने बच्चे के साथ में कड़ाई का बर्ताव किया हो? और बच्चे के दिल में एक कुंठा बन गई हो कि जो बुजुर्ग हैं उनके साथ कड़ाई का व्यवहार करना अनुचित नहीं है।

हमें अपने बच्चों को लाड़-प्यार से पालना चाहिए:-
इस युग के कल्कि अवतार बहाउल्लाह ने कहा है कि प्रत्येक माता-पिता को अपने बच्चों को लाड़-प्यार से पालना चाहिए। उन्हें किसी चीज के लिए डांटना नहीं चाहिए। उन्हें किसी प्रकार का शारीरिक दण्ड नहीं देना चाहिए। और अगर उनका बच्चा कोई गलती करता है तो ऐसे में किसी भी माता-पिता को उस बच्चे को दण्ड के रूप में ऐसी चीज को देेने से वंचित कर देना चाहिए, जिस चीज को बच्चा सबसे ज्यादा प्यार करता हो। यह मनोवैज्ञानिकों द्वारा बताया गया सज़ा देने का तरीका है।
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बच्चों को दण्डित करने का सर्वश्रेष्ठ तरीका क्या हो ? :
अगर बच्चा रोज खेलने जाता हो तो उसे अगले दिन के खेल पर दण्ड के रूप में रोक लगा देनी चाहिए। इससे बच्चा अपनी गलती को समझ जायेगा। वास्तव में यह बच्चों को दण्ड देने का सर्वश्रेष्ठ तरीका हैं। बच्चे को किसी भी गलती के लिए उसकी सबसे प्यारी चीज से वंचित रखना चाहिए। यही काम स्कूल में टीचर भी कर सकती हैं। बच्चों को लज्जित न करें, उसको कान पकड़ कर खड़ा न करें, उसको क्लास से बाहर न निकालें, उसे बेंच के ऊपर खड़ा न करें, उसे सबके सामने किसी भी तरीके से प्रताडि़त न करें बल्कि कहें कि देखों! इस समय और बच्चे तो खेलेगे लेकिन तुमको इस समय में खेलना नहीं बल्कि अपना होमवर्क पूरा करना है, या स्कूल के बाद तुमको एक घण्टा रूककर काम करना पड़ेगा। शारीरिक दण्ड देना बच्चों के लालन-पालन का गलत तरीका है। उसके कारण बच्चों के मन-मस्तिष्क में दुर्भावनायें पैदा हो जाती है व ग्रंथिया पड़ जाती है।
बच्चों को बतायें कि उन्हें कौन-कौन से काम करना चाहिए:-
मैं एक माता का हृदय, एक टीचर का हृदय और एक समाज का सदस्य होने के नाते सोचती हूँ कि जो बातें इस युग के अवतार बहाउल्लाह ने बतायी है वे हम क्यों नहीं और लोगों को बतायें? हम क्यों नहीं बच्चों के मन-पसंद कार्य करते हैं? और जो काम हमें बच्चों से कराने होते हैं उन कामों को हम उन्हें क्यों नहीं बताते? ठीक उसी प्रकार जिस प्रकार हम जब किसी चौराहे से गुजरते हैं तो यदि उस समय लाल बत्ती होती है तो हम रूक जाते हैं। इसी प्रकार से हमें बच्चों को बताना चाहिए कि देखों यह काम तो तुम कर सकते हो, यह तुम्हारी हरी बत्ती है। तुम प्यार कर सकते हो। तुम प्रणाम कर सकते हो। तुम पुस्तक पढ़ सकते हो। तुम कुर्सी पर बैठ सकते हो। तुम टाइम से खाना खा सकते हो। तुम गाना गा सकते हो। तुम अपनी माँ की गोद में बैठ सकते हो आदि सद्गुणों की बातें हमें बच्चों को हरी बत्ती के रूप में समझाना चाहिए।
बच्चों को गलत शिक्षाओं से दूर रखें:- 
इसके साथ ही हमें बच्चों को न करने योग्य कामों को लाल बत्ती के रूप में बताना चाहिए कि तुम किसी को अपशब्द नहीं बोल सकते। तुम दूसरों की बुराई नहीं करोगे। तुम दूसरों की पीठ पीछे निंदा नहीं करोगे। तुम्हें झूठ नहीं बोलना है। तुम्हें सदा ही इस तरह की बातों से दूर रहना है। फिर बच्चों को रोज-रोज एक ही बात दोहराई जायेगी कि यह करने योग्य कार्य है और यह न करने योग्य कार्य है। इससे बच्चों को इस बात को समझने में आसानी होगी कि उनके द्वारा किस प्रकार के काम किये जाने हैं।
हमें बच्चों को ईश्वर द्वारा बताये गये तरीकों से ही पालना चाहिए:-
बच्चे कांच के गिलास नहीं हैं जिन्हें हम गुस्से में आकर तोड़ देते हैं। हम बच्चों के साथ कांच के गिलास की तरह व्यवहार नहीं कर सकते। बच्चे हमें ईश्वर से उपहार स्वरूप प्राप्त होते हैं। बच्चे हमारी सम्पत्ति नहीं हैं। बच्चे हमारे पास, हमारी गोद में भगवान की देन हैं, भगवान की भेट हैं। इस प्रकार ईश्वर से प्राप्त उपहार स्वरूप बच्चे के साथ हमें वैसा ही व्यवहार करना चाहिए, जैसा व्यवहार ईश्वर हमसे कराना चाहता है। हमें प्रत्येक बालक को ईश्वर के बताये हुए तरीके से पाल पोसकर बड़ा करना चाहिए ताकि वे विश्व का प्रकाश बन सके।
अटूट बंधन 
हमें प्रत्येक बच्चों को ईश्वर भक्त बनाना है:- 
किस काम को हमें करना है और किस काम को हमें नहीं करना है? इसको बताने के लिए युग-युग में राम, कृष्ण, बुद्ध, मोहम्मद, नानक, बहाउल्लाह आदि के रूप में ईश्वरीय प्रतिनिधि आते रहते हैं। इस युग की समस्याओं के समाधान हेतु कल्कि अवतार आये हैं। उन्होंने हमें बताया है कि हमें इस युग में किस काम को करना है और किस काम को नहीं करना है। हमें प्रत्येक बच्चे को भगवान का भक्त बनाना है। इस युग के अवतार बहाउल्लाह ने बताया है कि शादी भी किसी विशेष कारण अथवा किसी विशेष मकसद से होती हैं। इस सम्बन्ध में उन्होंने कहा है कि ‘‘हे दुनियाँ के लोगों जाओं शादी करों ताकि तुमसे वो पैदा हो जो दुनियाँ मे मेरा नाम ले।’’
बच्चों के द्वारा ही सारी दुनियाँ में आध्यात्मिक साम्राज्य की स्थापना होगी:- 
हमें बच्चों के सामने कभी अपशब्द नहीं बोलना चाहिए। हमें बच्चों को यह नहीं कहना चाहिए कि तुम नालायक हो। तुम बेवकूफ हो। तुम दुनियाँ में कुछ नहीं कर सकते हो। इस तरह की नकारात्मक बातें बच्चों के दिमाग में यदि अंकित हो जायेगी तो आगे चलकर बालक उसी दिशा में चलकर समाज और विश्व का अंधकार बन जायेगा। बच्चे को समाज और विश्व का प्रकाश बनाने के लिए हमें उसके प्रत्येक अच्छे कार्य के लिए उसे शाबाशी देनी चाहिए। साथ ही उसे अच्छे कामों को करने के लिए उत्साहित ओर प्रेरित करते हुए हमें प्रत्येक बालक में ईश्वरीय गुणों को विकसित करना है। इससे हमारे बच्चे ईश्वर भक्त बनकर विश्व में आध्यात्मिक साम्राज्य की स्थापना में अपना महत्वपूर्ण योगदान दे सकेंगे।
-जय जगत्-


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Atoot bandhan

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