श्राद्ध पक्ष या पितृ पक्ष अपने पूर्वजों के प्रति श्रद्धा व्यक्त करने का समय


वंदना बाजपेयी

  हिन्दुओं में पितृ पक्ष का बहुत महत्व है | हर साल भद्रपद शुक्लपक्ष पूर्णिमा से लेकर आश्विन कृष्णपक्ष अमावस्या तक के काल को श्राद्ध पक्ष कहा जाता है |  पितृ पक्ष के अंतिम दिन या श्राद्ध पक्ष की अमावस्या को  महालया  भी कहा जाता है | इसका बहुत महत्व है| ये दिन इसलिए भी महत्वपूर्ण है क्योंकि जिन्हें अपने पितरों की पुन्य तिथि का ज्ञान नहीं होता वो भी इस दिन श्रद्धांजलि या पिंडदान करते हैं |अर्थात पिंड व् जल के रूप में अपने पितरों के प्रति श्रद्धा व्यक्त करते हैं | हिन्दू शस्त्रों के अनुसार पितृ पक्ष में यमराज सभी सूक्ष्म शरीरों को मुक्त कर देते हैं | जिससे वे अपने परिवार से मिल आये व् उनके द्वरा श्रद्धा से अर्पित जल और पिंड ग्रहण कर सके |श्राद्ध तीन पीढ़ियों तक का किया जाता है |  


क्या बदल रही है श्राद्ध पक्ष के प्रति धारणा 


                                         मान्यता ये भी है की पितर जब संतुष्ट होते हैं तो वो आशीर्वाद देते हैं व् रुष्ट होने पर श्राप देते हैं | कहते हैं श्राद्ध में सबसे अधिक महत्व श्रद्धा का होता है | परन्तु क्या आज हम उसे उसी भाव से देखते हैं | शायद नहीं |कल यूँहीं कुछ परिचितों  से मिलना हुआ | उनमें से एक  ने श्राद्ध पक्ष की अमावस्या के लिए अपने पति के साथ सभी पितरों का आह्वान करके श्राद्ध करने की बात शुरू कर दी | बातों ही बातों में खर्चे की बात करने लगी | फिर बोली की क्या किया जाये महंगाई चाहे जितनी हो खर्च तो करना ही पड़ेगा , पता नहीं कौन सा पितर नाराज़ बैठा हो और ,और भी रुष्ट हो जाए | उनको भय था की पितरों के रुष्ट हो जाने से उनके इहलोक के सारे काम बिगड़ने लगेंगे | उनके द्वारा सम्पादित श्राद्ध कर्म में श्रद्धा से ज्यादा भय था | किसी अनजाने अहित का भय |

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वहीँ  दूसरी  , श्राद्ध पक्ष में अपनी सासू माँ की श्राद्ध पर किसी अनाथ आश्रम में जा कर खाना व् कपडे बाँट देती हैं | व् पितरों का आह्वान कर जल अर्पित कर देती है | ऐसा करने से उसको संतोष मिलता है | उसका कहना है की जो चले गए वो तो अब वापस नहीं आ सकते पर उनके नाम का स्मरण कर चाहे ब्राह्मणों को खिलाओ या अनाथ बच्चों को , या कौओ को …. क्या फर्क पड़ता है |

 तीसरी सहेली बात काटते हुए कहती हैं , ” ये सब पुराने ज़माने की बातें है | आज की भाग दौड़ भरी जिन्दगी में न किसी के पास इतना समय है न पैसा की श्राद्ध के नाम पर बर्बाद करे | और कौन सा वो देखने आ रहे हैं ?आज के वैज्ञानिक युग में ये बातें पुरानी हो गयी हैं हम तो कुछ नहीं करते | ये दिन भी आम दिनों की तरह हैं | वैसे भी छोटी सी जिंदगी है खाओ , पियो ऐश करो | क्या रखा है श्राद्ध व्राद्ध करने में |

श्राद्ध के बारे में भिन्न भिन्न हैं पंडितों के मत 

तीनों सहेलियों की सोंच , श्राद्ध करने का कारण व् श्रद्धा अलग अलग है |प्रश्न ये है की जहाँ श्रद्धा नहीं है केवल भय का भाव है क्या वो असली श्राद्ध हो सकता है |प्रश्न ये भी है कि जीते जी हम सौ दुःख सह कर भी अपने बच्चों की आँखों में आंसूं नहीं देखना कहते हैं तो मरने के बाद हमारे माता पिता या पूर्वज बेगानों की तरह हमें श्राप क्यों देने लगेंगें | शास्त्रों के ज्ञाता पंडितों की भी इस बारे में अलग अलग राय है ………..

उज्जैन में संस्कृत विश्वविद्यालय के प्रमुख संतोष पंड्या के अनुसार, श्राद्ध में भय का कोई स्थान नहीं है। वो लोग जरूर भय रखते होंगे जो सोचते हैं कि हमारे पितृ नाराज न हो जाएं, लेकिन ऐसा नहीं होता। जिन लोगों के साथ हमने 40-50 साल बिताएं हैं, वे हमसे नाखुश कैसे हो सकते हैं। उन आत्माओं से भय कैसा?

वहीं इलाहाबाद से पं. रामनरेश त्रिपाठी भी मानते हैं कि श्राद्ध भय की उपज नहीं है। इसके पीछे एक मात्र उद्देश्य शांति है। श्राद्ध में हम प्याज-लहसून का त्याग करते हैं, खान-पान, रहन-सहन, सबकुछ संयमित होता है। इस तरह श्राद्ध जीवन को संयमित करता है। भयभीत नहीं करता। जो कुछ भी हम अपने पितरों के लिए करते हैं, वो शांति देता है। शास्त्र में एक स्थान पर कहा गया है, जो लोग श्रद्धापूर्वक श्राद्ध नहीं करते, पितृ उनका रक्तपान करते हैं। इसलिए श्रद्धा बहुत आवश्यक है और श्रद्धा तभी आती है जब मन में शांति होती है।

क्यों जरूरी है श्राद्ध 

अभी ये निशिचित तौर पर नहीं कहा जा सकता की जीव मृत्यु के बाद कहाँ जाता है | नश्वर शरीर खत्म हो जाता है | फिर वो श्राद्ध पक्ष में हमसे मिलने आते भी हैं या नहीं | इस पर एक प्रश्न चिन्ह् है |  पर इतना तो सच है की उनकी यादें स्मृतियाँ हमारे साथ धरोहर के रूपमें हमारे साथ रहती हैं |स्नेह और प्रेम की भावनाएं भी रहती हैं |  श्राद्ध पक्ष के बारे में पंडितों  की राय में मतभेद हो सकता है | शास्त्रों में कहीं न कहीं भय उत्पन्न करके इसे परंपरा बनाने की चेष्टा की गयी है | लेकिन बात  सिर्फ इतनी नहीं है शायद उस समय की अशिक्षित जनता को यह बात समझाना आसांन नहीं रहा होगा की हम जिस जड़ से उत्पन्न हुए हैं हमारे जिन पूर्वजों ने न केवल धन सम्पत्ति व् संस्कार अपितु धरती , आकाश , जल , वायु का उचित उपयोग करके हमारे लिए छोड़ा है | जिन्होंने हमारे जीवन को आसान बनाया है | उनके प्रति हमें वर्ष में कम से कम एक बार तो सम्मान व्यक्त करना चाहिए | उस समय के न के आधार पर सोंचा गया होगा की पूर्वज न जाने किस योनि में गया होगा उसी आधार पर अपनी समझ के अनुसार ब्राह्मण , गाय , कौवा व् कुत्ता सम्बंधित योनि  के प्रतीक के रूप में चयनित कर लिए गए |

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जैसे जैसे ज्ञान बढ़ा इन प्रतीकों पर प्रश्नचिन्ह लगने लगे | केवल इन्हें ही क्यों चुना गया इस पर विवाद होने लगा | कुछ लोगों में श्राद्ध कर्म से अरुचि होने लगी और कुछ लोग उसे मात्र किसी भय , या अनिष्ट आशंका मान कर लकीर के फ़कीर की तरह ढोने लगे | जहाँ कर्मकांड भावना पर हावी होने लगा | भावना हीन भोजन जब हम नहीं स्वीकारते ,तो पितर जो आत्मा रूप में हैं वो क्योंकर स्वीकारेंगे उन्हें अगर कुछ चाहिए भी तो बस भावना की पवित्रता और श्रद्धा |आपको ये जानकार आश्चर्य होगा की विदेशों में भी अपने पूर्वजों के प्रति सम्मान व्यक्त करने के लिए थैंक्स गिविंग डे होते हैं | जहाँ अपने उनको उनके द्वारा दिए गए प्रेम के लिए धन्यवाद देने की परंपरा है | यह भी लगभग इन्ही दिनों पड़ता है |

लौकिक हों या अलौकिक रिश्ते टूटते नहीं हैं 

अगर हम थोडा गहराई में जाए तो देखेंगे की हमारे देश में रिश्तों को समलने व् सहेजने की भावना पर बहुत बल दिया गया है |तमाम त्यौहार रिश्तों को सजाने व् संवारने के लिए बनाए गए हैं | श्राद्ध पक्ष इसी परंपरा की एक कड़ी है |रिश्ते चाहे लौकिक हो या लोक के परे | जो हमारे अत्यंत प्रिय हैं या रहे हैं उनके प्रति हमारा भी कुछ कर्तव्य बनता है | जितने रिश्ते जीवित हैं उन्हें हम सम्बंधित त्योहारों पर उपहार , सम्मान देकर या अपनी प्रेमपूर्ण व्यवहार करके उनके प्रति अपनी भावनाएं व्यक्त करते हैं | हमारे प्रियजन जो इस लोक से परे चले गए हैं उनके प्रति हम अपना प्रेम कैसे व्यक्त करे , अपनी कृतज्ञता कैसे व्यक्त करे क्योंकि रिश्ते टूट कर भी नहीं टूटटे , चाहे आप इसे विज्ञान के धरातल पर डीएनए से जोड़ कर देखे या भावना के धरातल पर प्रेम से जोड़ कर देखे |


अंधविश्वास नहीं विश्वास के साथ व्यक्त करिए श्रद्धा 



                      यहाँ ये नहीं सोचना है की वो ले रहे हैं या नहीं | पूर्वजों के प्रति कृतज्ञता का भाव , श्रद्धा का भाव हमारे मन में असीम संतोष उत्पन्न करता है | सुद्रण  करता है उस डोर को जो टूट कर भी नहीं टूटती | जहाँ प्रेम है वहां भय का कोई स्थान नहीं है | इसलिए श्राद्ध पक्ष में लकीर के फ़कीर न बन कर चाहे तो पुरानी परम्परा के अनुसार , चाहे किसी नयी परंपरा की शुरुआत करके या महज नाम स्मरण कर हाथ जोड़ कर अपने पूर्वजों के प्रति श्रद्धा तो व्यक्त करिए हर उस पूर्वज  के लिए जिसने हमारे जीवन को आसान बनाया है | साथ ही ये श्रद्धा हमें संकल्प लेना पर विवश करती है की हमें भी आने वाली नस्लों के लिए जीवन आसान बनाना है | 



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Atoot bandhan

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4 comments so far,Add yours

  1. Bahut accha likha sradh ke bare me.....kafi kuch naya mila, dhanyabad!
    Ek baat aapko batana chhata hu, aap post ko wrong Link ke sath publish kar rahi hain jo bahut galat hai.....
    wrong link- http://atootbandhann.blogspot.in/2017/09/blog-post_21.html
    Right link- http://atootbandhann.blogspot.in/2017/09/shradh-paksh-hindi.html (ek keval example hai)

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  2. जानकारी देने के लिए शुक्रिया

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  3. सही कहा आपने...अंधविश्वास नहीं विश्वास के साथ व्यक्त करना चाहिए अपनी श्रद्धा को श्राद्ध में। सुंदर प्रस्तुति।

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    1. धन्यवाद ज्योति जी

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