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कहानी -वो व्हाट्स एप मेसेज

                     जिसने दो साल तक कोई खोज खबर न ली हो .... अचानक से उसका व्हाट्स एप मेसेज दिल में ना जाने कितने सवालों को भर देता है | क्या एक बार  रिश्तों को छोड़ कर भाग जाने वाला पुन : समर्पित हो सकता है |

वो व्हाट्स एप मेसेज 


३१ दिसम्बर रात के ठीक बारह बजे सुमी के मोबाइल पर व्हाट्स एप मेसेजेस की टिंग -टिंग बजनी शुरू हो गयी | मित्रों और परिवार के लोगों को हैप्पी नव्व इयर का आदान -प्रदान करते हुए अचानक सौरभ के मेसेज को देख वो चौंक गयी | पूरे दो साल में यह पहला मौका था जब  सौरभ ने उससे कांटेक्ट करने की कोशिश की थी |

सुमी ने धडकते दिल से मेसेज खोला और मेसेज पढना शुरू किया , " हैप्पी न्यू इयर सुमी , मैं वापस आ रहा हूँ , तुम्हारे पास , फिर कभी ना जाने के लिए " उसके नीचे ढेर सारे दिल बने थे | ना चाहते हुए भी सुमी की आँखें भर आयीं | मन दो साल पीछे चला गया |

वो दिसंबर की ही कोई सुबह थी , जब वो गुनगुनी धूप में पूजा के लिए फूल तोड़ रही थी , तभी सौरभ ने आकर उसके जीवन में कोहरा भर दिया | सौरभ उसकेपास आकर बोला , " सुमी , मैं कल अपनी सेक्रेटरी मीनल के साथ अमेरिका जा रहा हूँ | अब मैं वहां उसी के साथ रहूँगा ,तुम्हारे लिए बैंक में रुपये छोड़े जा रहा हूँ , अब मेरी जिन्दगी में तुम्हारी कोई जगह नहीं है | वहीँ की वहीँ खड़ी  रह गयी थी सुमी , सँभालने का मौका भी नहीं दिया उसने | सारे फोन कनेक्शन काट लिए , ना कोई प्रश्न पूछा और ना ही किसी बात का कोई मौका ही नहीं या |


दो साल ... हाँ पूरे दो साल इसी प्रश्न से जूझती रही कि तीन साल की सेजल और डेढ़ साल के गोलू  ,  -घर -परिवार और सौरभ की हर फरमाइश के लिए दिन भर चक्करघिन्नी की तरह नाचने के बावजूद आखिर क्या कमी रह गयी उसके प्रेम व् समर्पण में कि सौरभ उसके हाथ से फिसल कर अपनी सेक्रेटरी के हाथ में चला गया | महीनों बिस्तर पर औंधी पड़ी जल बिन मछली की तरह तडपती थी , उस वजह को जानने के लिए , ये सिर्फ प्रेम में धोखा ही नहीं था उसके आत्मसम्मान को धक्का भी लगा था  | सहेलियों ने ही संभाला अ उस  सेजल व् गोलू को , उसे भी समझातीं थीं ," वो तेरे लायक नहीं था , कायर था , आवारा बादल .... कोई वजह होती तब तो बताता |

 धीरे -धीरे उसने खुद को संभाला , एक स्कूल में पढ़ना शुरू किया | जिन्दगी की गाडी पटरी पर आई ही थी कि ये मेसेज | थोड़ी देर मंथन के डी उसने मेसेज टैप करना शुरू किया , " सौरभ , वक्त के साथ बहुत कुछ बदल जाता है , कल तुम आगे बढ़ गए थे पर आज मैं भी वहीँ खड़ी हुई नहीं  हूँ कि तुम लौटो और मैं मिल जाऊं , अब  मैंने  आत्मसम्मान से जीना सीख लिया है अब मेरी जिंदगी में तुम्हारी कोई जगह नहीं है |


मेसेज सेंड करने के बाद उसके मन में अजीब सी शांति मिली | खिड़की से हल्की -हलकी  रोशिनी कमरे में आने लगी नए साल का नया सवेरा हो चुका था |

वंदना बाजपेयी

सुरभि में प्रकाशित

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हिन्दी के पाणिनी आचार्य श्री किशोरीदास  बाजपेयी : संस्मरण


आचार्य श्री किशोरीदास बाजपेयी को हिंदी भाषा का पाणिनि भी कहा जाता है | उन्होंने हिंदी को परिष्कृत रूप में प्रस्तुत किया | उससे पहले खड़ी बोली का चलन तो था पर उसका कोई व्यवस्थित व्याकरण नहीं था | इन्होने अपने अथक प्रयास से व्याकरण का एक सुव्यवस्थित रूप निर्धारित कर हिंदी भाषा का परिष्कार किया और साथ ही नए मानदंड भी स्थापित किये , जिससे भाषा को एक नया स्वरुप मिला | 


        हिंदी के साहित्यकार व् सुप्रसिद्ध व्याकरणाचारी आचार्य श्री किशोरी दस बाजपेयी जी का जन्म १५ दिसंबर १८९५ में कानपूर के बिठूर के पास मंधना के गाँव रामनगर में हुआ था | उन्होंने न केवल व्याकरण क्षेत्र में काम किया अपितु आलोचना के क्षेत्र में भी शास्त्रीय सिधान्तों का प्रतिपादन कर मानदंड स्थापित किये | प्रस्तुत है उनके बारे में कुछ रोचक बातें .... 


हिन्दी के पाणिनी आचार्य श्री किशोरीदास  बाजपेयी :

                                               फोटो -विकिपीडिया से साभार

हिन्दी के पाणिनी आचार्य श्री किशोरीदास  बाजपेयी : संस्मरण


                         
हिन्दी के पाणिनी कहे जाने वाले 'दादाजी' यानी आचार्य श्री किशोरीदास जी बाजपेयी के बारे में तब पहली बार जाना जब वह हमारे घर पर अपनी छोटी बेटी (मेरी भाभी) का रिश्ता मेरे म॓झले भाई साहब के लिए लेकर आए।हमारे बड़े भाई साहब उनकी बातों से बहुत प्रभावित हुए। इस सिलसिले में शादी से पूर्व उनका कई बार हमारे घर आना हुआ
और हर बार वह अपने व्यक्तित्व की एक नई छाप छोड़ गए।तब हमने जाना कि वह बात के पक्के हैं और उनके व्यक्तित्व में एक ऐसा खरापन है जो सभी को ऊपनी ओर आकृष्ट करता है।
                         
उन्ही दिनों के आस-पास 'वैद्यनाथ' वालों की ओर से दादा जी का अभिनन्दन किया गया जिसमें उन्हे ग्यारह हजार रुपये प्रदान किए गए। इस अभिनन्दन के पश्चात जब वह हमारे घर आए तो उन्होने कहा कि वह यह ग्यारह हजार रुपये अपनी बेटी की शादी में खर्च करेगें और अगर यह रुपये चोरी हो गए तो कुछ भी खर्च नहीं करेगें।उनकी इस साफगोई और खरेपन को लेकर हमारे घर में कुछ दिनों खूब विनोदपूर्ण वातावरण रहा।
                            
उन्होने कहा,बारात कम लाई जाए लेकिन स्टेशन पर पहुँचने से लेकर वापिस स्टेशन आने तक वह हम लोगों से कुछ भी खर्च नहीं करवाएगें। बारात में कुल बीस- पच्चीस लोग ही गए।लेकिन उन्होने हरिद्वार स्टेशन पर उतरते ही सवारी से लेकर बैंड-बाजे आदि का कुछ भी खर्च हमारी ओर से नहीं होने दिया।उन्होंने शादी शानदार ढंग से निपटाई।भोजन और मिष्ठान्न सभी कुछ देशी घी में बने थे।जो मिठाई उन्होने हमारे घर भिजवाई,वह भी सब शुद्ध देशी घी में बनी थी।उनके द्वारा भिजवाई गई मिठाइयों में पूड़ी के बराबर की चन्द्रकला का स्वाद तो मुझे आज भी याद है।गर्मियों के दिन थे।उन्होने हमारे घर पर बहुत अधिक पकवान व मिठाइयाँ भिजवा दी थीं।माँ ने तुरन्त ही सब बँटवा दीं।आज भी सब रिश्तेदार और मुहल्ले वाले उन मिठाइयों की याद कर लेते हैं।
                          
गर्मियों की छुट्टियों मैं मैं एक महिने भाभी के साथ कनखल में रही। दादाजी सुबह चार बजे उठ जाते और भगोने में चाय चढ़ा देते। वह चाय पीकर मुझे जगा देते और अपने साथ टहलने ले जाते। हम ज्वालापुर तक टहलने जाते। टहलते समय दादा जी मुझे खूब मजेदार बातें बताते। वह कहते , 'जाको मारा चाहिए बिन लाठी बिन घाव, वाको यही सिखाइए भइया घुइयाँ पूड़ी खाव।' फिर हँस कर कहते कि उन्हे घुइयाँ पूड़ी बहुत पसंद हैं।
                                 
एक बार जब वे अंग्रेजों के समय जेल में बन्द थे, उनकी कचेहरी में पेशी हुई। पेशी के लिए जज के समक्ष जाते समय पेशकार ने पैसों के लिए अपनी पीठ के पीछे हाथ पसार दिए। दादा जी ने उसकी गदेली पर थूक दिया। वह तुरन्त अपना हाथ पोंछकर जज के सामने खड़ा हो गया।
                                   
जब हम टहल कर आते , दादा जी नाश्ते में पंजीरी (भुना आटा और बूरा ) में देशी घी डलवा कर लड्डू बनवाते जो एक गिलास ताजे दूध के साथ मुझे नाश्ते में मिलता। यह रोज का नियम था। वह मेरा विशेष ख्याल रखते। जब तक मैं कनखल में रही, दादा जी मेरे लिए मिठाई लाते और मिठाई में अक्सर चन्द्रकला होती।फलों में उन्हे खरबूजा , ककड़ी और देशी आम पसन्द थे। किन्तु हम सबके लिए केला, सन्तरा आदि मौसमी फल भी लाते। आम को वह आम जनता का फल बताते थे।खाने के साथ उन्हे अनारदाने की चटनी बहुत पसंद थी।
                                   
टहल कर आने के पश्चात दादा जी लिखने का कार्य करते। भोजन करके वह कुछ देर विश्राम करते।तत्पश्चात वह हरिद्वार,श्रवणनाथ ज्ञान म॓दिर पुस्तकालय जाते।यह उनका प्रतिदिन का नियम था। रात में वह कहीं नहीं जाते थे। वह कहते,'दिया बाती जले मद्द (मर्द) मानस घर में भले।'
                                    
जब वह हमारे घर कानपुर आते, हम सब उनसे मजेदार किस्से सुनने के लिए उन्हे घेर कर बैठ जाते। ऐसे ही एक समय उन्होने बताया कि एक बार जब वह ट्रेन से जा रहे थे तो उन्होने अपने सामने की सीट पर बैठे व्यक्ति से बात करने की गरज से पूछा कि वह कहाँ जा रहे हैं? उन्होंने कोई जवाब नहीं दिया। ऐसा तीन बार हुआ। अवश्य ही इस व्यक्ति ने धोती कुरता पहने हुए दादा जी को गाँव का कोई साधारण गँवार समझा होगा। जब उन्होने देखा कि यह व्यक्ति बात नहीं करना चाहता तो वह अपनी सीट पर बिस्तर बिछा कर सो गए। सुबह होने पर उन्होने एक केतली चाय, टोस्ट, मक्खन मँगाया और नाश्ता करने लगे।इसी बीच यह व्यक्ति दादा जी से पूछने लगा कि उन्हे कहाँ जाना है? दादा जी ने कोई जवाब नहीं दिया तथा उसकी ओर अपनी पीठ कर ली। ऐसा दो बार हुआ। तीसरी बार वह व्यक्ति जरा जोर से बोला, 'क्या आप ऊँचा सुनते हैं? 'अब दादा जी उसकी ओर मुँह घुमा कर बोले, 'आप मुझसे कहाँ बात कर रहे हैं? आप तो मेरे टोस्ट मक्खन सै बात कर रहे हैं।' रात को जब मैंने आपसे बात करने की कोशिश की, आपने कोई जवाब नहीं दिया। ' वह व्यक्ति बड़ा शर्मिन्दा हुआ।किन्तु पीछे की सीट पर बैठे हुए शुक्ला जी ने उनकी बात सुन ली और कहा, 'अरे यह तो बाजपेयी जी लगते हैं।' दादा जी ने जोर से कहा,'अब तुम्हे भी बाजपेयी जी दिखाई पड़ गए।'उनके इतना कहते ही कई लोग अपनी सीट से उतर कर उनके आस- पास जमा हो गए और उनसे कुछ नई बात बताने का आग्रह करने लगे। उन्होने कहा, 'गुरू-दक्षिणा देनी पड़ेगी।' सबने कहा,'मिलेगी।'इतना बताने के पश्चात दादाजी ने बड़े भाव विभोर होकरआदरणीय मालवीय जी को हाथ जोड़ कर नमन करते हुए कहा कि गीता के जिस श्लोक का अर्थ मालवीय जी ने उस तरीके से नहीं समझा जिसका अर्थ मुझे उसी समय ट्रेन में समझ में आया।ऐसा कह कर उन्होने वह श्लोक कहा (जो आज मुझे याद नहीं ) जिसका अर्थ यह था कि,' स्वतन्त्र कौन है?' फिर उन्होने उन सबको उसकी व्याख्या करके बताया। सभी व्यक्ति उनकी व्यख्या सुन कर अत्यन्त प्रसन्न हुए और स्टेशन आने पर उनका जो भी सामान था,सबने एक-एक उठा लिया । जब वह स्टेशन पर उतर कर खड़े हुए, लोगों ने मुस्करा कर कहा, 'गुरू जी ,आपकी दक्षिणा अदा हो गई या नहीं?' उन्होंने मुस्कराते हुए कहा ,'हो गई।'
                             मुझे बेटा होने की खबर जब उन्हे मिली तो उन्होने पत्र  लिखा ,'यह जान कर बड़ी प्रसन्नता हुई कि चिं0 उषा को 'प्रभात' मिला।बड़े भाई साहब ने कहा कि दादा जी द्वारा दिया गया नाम है।इस नाम के साथ दादा जी की याद जुड़ी रहेगी और उनका आशीर्वाद भी। हमने बेटे का नाम प्रभात रख दिया ।उनका आशीर्वाद खूब फला - फूला।
                      
एक बार भाई साहब के साथ वह मेरे घर मिलने आए।उन्होने मुझे रूपए दिए और कहा,'बच्चों के लिए मिठाई मंगा लेना,कुछ लेकर नहीं आया हूँ। मैने उन्हे नाश्ता कराया।कुछ देर बाद मुझे ध्यान आया कि सेब रक्खे रह गए,मैं काटना भूल गई। मैंने दादा जी से कहा,'मैं अभी सेब काट कर लाती हूँ तब उन्होने हंस कर कहा, 'रहने दे उषा, तुझे देने के लिए अब मेरे पास और पैसे नहीं हैं।'
                        
जब भारत के प्रथान-मंत्री द्वारा उनका अभिनंदन किया जा रहा था, स्टेज पर न जाकर वह  अपनी कुर्सी पर बैठे रहे, तब प्रधान मंत्री मोरार जी देसाई स्वयं मंच से उतर कर आए और उन्होने जहाँ पर वह बैठे थे, वहीं पर उन्हे सम्मानित किया ।
                 
ऐसे थे दादा जी।
                             
              
उषा अवस्थी
           
 गोमती नगर ,
          
लखनऊ ( उ0 प्र0 )


लेखिका -उषा अवस्थी


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कहानी -सिस्टर्स मैचिंग सेंटर

वरिष्ठ लेखिका दीपक शर्मा जी की कहानी सिस्टर्ज़ मैचिन्ग सेन्टर उनकी अन्य कहानियों की तरह अपने नाम को अर्थ देती है | दीपक शर्मा जी बेहतरीन  कहानियाँ ही नहीं लिखती वो उनके नामों पर भी बहुत मेहनत करती हैं | सिस्टर्ज़ मैचिन्ग सेन्टर भी एक ऐसी ही कहानी हुई जहाँ साड़ियों की मैचिंग के साथ -साथ दो बहनों के जीवन साथी की मैचिंग की भी कोशिश उनके पिता द्वरा की जाती है | बहुत कसी हुई ये कहानी जहाँ एक ओर अपनी बेटी के लिए अच्छा वर खोजने की पिता की कसक दिखाती है वहीँ बड़ी बहन का अपनी छोटी बहन को लायक  बनाने का संकल्प प्रदर्शित करती है | इस तरह से कहानी बहुत ही मुलायमियत से  पाठकों के मन में सपनों के लिए परम्पराओं से संघर्ष करती स्त्री की कोशिशों की गहरी चोट करती है | 

सिस्टर्ज़ मैचिन्ग सेन्टर



कस्बापुरके कपड़ा बाज़ार का ‘सिस्टर्ज़ मैचिग सेन्टर’ बाबूजी का है|
सन्तान के नाम पर बाबूजी के पास हमीं दो बहनें हैं : जीजी और मैं|


जीजी मुझ से पाँच साल बड़ीहैं और मुझे उन्हीं ने बड़ा किया है| हमारी माँ मेरेजन्मके साथ ही स्वर्ग सिधार ली थीं| हमारे मैचिनग सेन्टर व बाबूजी को भी जीजी ही सँभालती हैं| बाबूजी की एक आँख की ज्योति तो उनके पैंतीसवें साल ही में उन से विदा ले ली थी|

क्रोनिक ओपन-एंगल ग्लोकोमा के चलते|

और बाबूजी अभी चालीस पार भी न किए थे कि उनकेबढ़ रहे अंधेपन के कारण उस कताई के कारखाने सेउनकी छंटनी कर दी गयी थी जिस के ब्रेकर पर बाबूजीपूनी की कार्डिंग व कोम्बिंग से धागा बनाने का काम करते रहे थे| पिछले बाइस वर्षों से|
ऐसे में सीमित अपनी पूँजी दाँव पर लगा कर बाबूजी ने जो दुकान जा खोली तो जीजी ही आगे बढ़ीं| पढ़ाई छोड़ कर|


दुकानबीच बाज़ार में पड़ती है और घर हमारा गली में है| बाबूजीको घर से बाज़ार तक पहुँचाना जीजी के ज़िम्मे है| छड़ी थामकर बाबूजी जीजी के साथ साथ चलते हैं| जहाँ उन्हें ज़रुरत महसूस होती है जीजी उनकी छड़ी पकड़ लेती हैं या फिर उनका हाथ|

दुकान भी जीजी ही खोलती हैं| फ़र्श पर झाड़ू व वाइपर खुद ही फेरती हैंव मेज़ तथा कपड़ों के थानों पर झाड़न भी| जब तक बाबूजी बाहर चहलकदमी करते करते पास-पड़ोस केदुकानदारोंकी चहल-पहल व बत-रस का आनन्द ले लेते हैं|

स्कूल से मैं सीधी वहीं जा निकलती हूँ|

जीजी का तैयार किया गया टिफ़िन मेरे पहुँचने पर ही खोला जाता है| जीजी पहले बाबूजी को परोसती हैं, फिर मुझे| हमारे साथ नहीं खातीं| नहीं चाहतीं कोई ग्राहक आए और दुकान का कोई कपड़ा-लत्ता बिकने से वंचित रह जाए|

बल्कि इधर तो कुछ माह से हमारी गाहकतायी पच्चीस-तीस प्रतिशत तक बढ़ आयी है|
जब से फैनसी साड़ी स्टोर में एक नया सेल्ज़मैन आ जुड़ा है| बेशक हम दोनों की दुकानें कुल जमा चार गज़ की दूरीपर एक ही सड़क का पता रखती रही हैं, लेकिनयह मानी हुई बात है कि किशोर नाम के इस सेल्ज़मैन के आने से पहले हमारे बीचकोईहेल-मेल न रहा था| पिछले पूरे सभीतीन सालों में|

मगर अब फैनसी साड़ी स्टोर की ग्राहिकाए वहाँसेहमारेमैचिनग सेन्टरही का रुख लेती हैं|
कभी अकेली तो कभी किशोर की संगति में|

अकेली हों तो भी आते ही अपनी साड़ी हमें दिखाती हैं औरविशेष कपड़े की मांग हमारे सामने रखती हैं: “शिफ़न की इस साड़ी के साथ मुझे साटन का या क्रेप ही का पेटीकोट लेना हैऔर ब्लाउज़ भीडकरोन या कोडेल का.....”

किशोर साथ में होता है तो सविस्तार कपड़े के बारे में लम्बे व्यौरे भी दे बैठता है, “देखिए सिस्टर, इसऔरगज़ा के साथ तो आप डाएनेल का पेटीकोट और पोलिस्टर का ब्लाउज़ या फिर प्लेन वीवटेबी का पेटीकोट और ट्विलका ब्लाउज़ लीजिए, जिस के ताने की भरनी में एक सूत है और बाने की भरनी में दो सूत.....”

हम बहनें अकसर हँसती हैं,

कस्बापुर निवासिनियों कोयह अहसास दिलाने में ज़रूर किशोर ही का हाथ है कि साड़ी की शोभा उसके रंग और डिज़ाइन से मेल खाते सहायक कपड़े पहनने से दुगुना-चौगुना प्रभाव ग्रहण कर लेती है|

जभी साड़ीवाली कई स्त्रियों के बटुओं की अच्छी खासी रकम हमारे हाथों में पहुँचनेलगी है|
काउन्टर पर बैठे बाबूजी को रकम पकड़ाते समय मैं तो कई बार पूछ भी लेती हूँ, “फैनसी वाला यह सेल्ज़मैन क्या सब सही सही बोलता है या फिर भोली भाली उन ग्राहिकाओं को बहका लिवा लाता है?”

जवाब में बाबूजी मुस्करा दिया करते हैं, “नहीं जानकार तो वह है| बताया करता है यहाँ आने से पहले वह एक ड्राइक्लीनिंग की दुकान पर ब्लीचिंग का काम करता था औरलगभग सभी तरह के कपड़ों के ट्रेडमार्क और ब्रैनड पहचान लेता है.....”

कपड़े की पहचान तो बाबूजी को भी खूब है| दुकान के लिए सारा कपड़ा वही खरीदते हैं| हाथ में लेते हैं और जान जाते हैं, ‘यह मर्सिराइज़ड कॉटन है| इसे कास्टिक सोडा सेट्रीट किया गयाहै| इसका रंग फेड होने वाला नहीं.....”

या फिर, ‘यह रेयन है| असली रेशम नहीं| इसमें सिन्थेटिकमिला है, नायलोन या टेरिलीन.....’

या फिर, ‘यह एक्रीलीन बड़ी जल्दी सिकुड़ जाता है या फिर ताने से पसर जाता है.....’

“क्यों किशोरीलाल?” बाबूजी किशोर को इसी सम्बोधन से पुकारते हैं, “तुम यहाँ बैठना चाहोगे? हमारे साथ?”

उस दिन किशोर ने अपने फैनसी साड़ी स्टोर से दहेज़ स्वरुप खरीदी गयी एक ग्राहिका कीसात साड़ियों के पेटीकोट और ब्लाउज़ एक साथ हमारे मैचिनग सेन्टर से बिकवाए हैं और बाबूजी खूब प्रसन्न एवं उत्साहित हैं|

“किस नाते?” जीजीदुकान के अन्तिम सिरे पर स्टॉक रजिस्टर की कॉस्ट प्राइस और लिस्ट प्राइस में उलझे होने के बावजूद बोल उठी हैं, “हमारीहैसियत अभी नौकर रखने की नहीं.....”
“तुम अपना काम देखो,” बाबूजी ने जीजी कोडाट दियाहै, “हमआपसमेंबातकर रहे हैं.....”

थान समेट रहे मेरे हाथ भी रुक गए हैं|
जीजी के स्वर की कठोरता मुझे भीअप्रिय लगी है|

कहानी -सिस्टर्स मैचिंग सेंटर


“किशोरीलाल,” जीजी से दूरी हासिल करने हेतु बाबूजी किशोर को मेरे पास खिसकालाए हैं, “उषा की बात का बुरा न मानना| वह शील-संकोच कुछ जानती ही नहीं| माँ इनकी इन बच्चियों की जल्दी ही गुज़र गयी रही.....”
“जीजी मुझ से भी बहुत कड़वा बोल जाती हैं,” किशोर को मैं ढाँढस बँधाना चाहती हूँ|
उसका बातूनीपन तो मुझे बेहद पसन्द है ही, साथ ही उसकी तीव्र बुद्धि व भद्र सौजन्य भी मुझे लुभाता है|
“उषा मूर्ख है,” बाबूजी अपना स्वर धीमा कर लिए हैं, “उसे जब ब्याह दूँगा तो ज़रूर समझदारी से बोलना सीख जाएगी| उसकी बात का तुम बुरा मत मानना..... कहो तो उस काहाथ तुम्हारे हाथ में.....”
“बुरा क्यों मानूँगा, अंकल?” हुलस कर किशोर ने बाबूजी को अपनेअंक में भर लिया है, “अपनी माँ से मैं रोज़कहता हूँ, मेरीअब आठ सिस्टर्ज़हैं, इधरछः घर पर हैं और उधर दो सिस्टर्ज़मैचिनग सेन्टर पर.....”

“छः बहनें हैं तुम्हारी?” बाबूजी की फुसफुसाहट चीख में बदलली है|
“क्या बात है बाबूजी?” जी जी हमारे पास तत्काल चली आयीहैं|

“मैं अपने स्टोरसे फिर किसी कस्टमर को इधर लिवालाने का यत्न करता हूँ,” अप्रतिम किशोर जीजीको देखतेही लोप हो लिया है|


“तुम जानती थीं? उषा? किशोरी लाल की छःबहनेंहैं?” बाबूजीअपनीआँख मिचकाते हैं| पिछले वर्ष तक आतेआते उनकी दूसरी आँख भी अपनी ज्योति पूरी तरह गँवा चुकी है| रेटिनाऔरऑप्टिक नर्व की कोशिकाओं के निरन्तर ह्रास से उनकी आँखों में सम्पूर्ण रिक्तता भर तो दी है, लेकिन उत्तेजना में उनकी आँखों के गोलकपक्ष्म और पपोटे अजीब फुरतीलापन ग्रहण कर लेते हैं|
“हाँ जानती थी,” जीजी बाबूजीका हाथअपने हाथ में लेलेती है, “तो?”
“तुमने मुझे कभी बताया क्यों नहीं?” बाबूजी की उत्तेजना बनी हुई है|
“उसकीअगर कोई बहन नभी होती तो भीमैं उसके संग शादी कभी न करती,” जीजी तुनकतीहैं|
“क्यों?”
“सेल्ज़ के इलावा उसका कोई लक्ष्य नहीं कोई इष्ट नहीं.....”
“हमारा है?” मैं भी तुनकली हूँ|

“हाँ| हमाराहै| हमें तुम्हें डॉक्टर बनाना है| छोटी दुकानदारी में नहीं लगाना, अपनी तरह.....”
मैं हथियार डाल देती हूँ| इसी साल मैं बारहवीं जमात के अपने इम्तिहान के साथ साथ सी.पी.एम.टी. की तैयारी में भी जुटी जो हूँ|
रात में हम बहनें जब सोने लगी हैं तो मैं जीजी के पास खिसक आतीहूँ, “आप जानती थीं किशोरीलाल की छः बहनें हैं?”
“बाबूजी को टालने के वास्ते वह झूठ बोल गया| वरना, उसकी दो बहनें हैं, छः नहीं.....”
“बाबूजी को उसने टाला क्यों?” मैं हैरान हूँ, जीजी से अच्छी पत्नी उसे और कहीं नहीं मिलने वाली है|
“क्योंकि वह तुमसे शादी करना चाहता था| मुझे एक दिन अकेली रास्ते में पा कर बोला, मैं निशा को चाहता हूँ| उस से मेरी शादी करवा दीजिए| मैं ने उसे खूब डा, निशा तुम जैसे छोटे आदमी से कतई शादी नहीं करेगी| उसे तो अभी कई ऊँचे पहाड़ चढ़ने हैं, गहरे कई समुद्र पार करने हैं.....”
“आप ने सही कहा, जीजी,” मैं जीजी के कंधे पर अपना सिर टिका देती हूँ, “मुझे डॉक्टर बनना है, उस सेल्ज़मैन की पत्नी नहीं.....”
अगली सुबह अवसर मिलते ही मैं बाबूजी को जा घेरती हूँ, “उस सेल्ज़मैनसे बात करने से पहले आपने जीजी से पूछा क्यों नहीं?”

उषा से मुझे कुछ भी पूछना-जानना नहीं था| जोपूछना-जानना था, उसी लड़के से पूछना-जानना था| उस के संग एक साँझे भविष्य की ओर जा रहे उषा के कदम पलट क्यों रहे थे? विपरीत दिशा क्यों पकड़ लिए थे?”

“साँझा भविष्य?” मैं हँस पड़ती हूँ, “आप गलत समझ रहे हैं, बाबूजी| जीजी के मन में किशोर के लिए कोई जगह नहीं| वह तो उसे बहुत ही तुच्छ, बहुत ही छोटा आदमी मानती हैं.....”

कहानी -सिस्टर्स मैचिंग सेंटर


“कतई नहीं,” बाबूजी के जबड़े कस लिए हैं और स्वर दृढ़ हो आया है, “मैं तुम से ज़्यादा समझ रखता हूँ| ज़्यादा जानता-बूझता हूँ| आँखें नहीं तो क्या? कान जो हैं| और वह भी तुम आँखों वालियों से दुगुने तेज़, चौगुने ग्रहणशील| मैं तो हवा तक में तैर रहे हर लहराव, हर कम्पन, हर स्पंदन पकड़ लेता हूँ और फिर उषा तो मेरी अपनी बच्ची है| किशोरीलाल के लिए उसका उत्साह भी मेरे पास पहुँचा है और उसका निरुत्साह भी..... और पीछे का सच मुझे किशोरीलाल ही बता सकता था, उषा नहीं.....”

“जी बाबूजी,” मैं चौकस हो ली हूँ| बाबूजी को पूरा सच बतलाना मेरे लिए असम्भव है|


दीपक शर्मा 

लेखिका -दीपक शर्मा




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कहानी -वास्तु दोष

किसी घर में शांति क्यों नहीं रहती ... क्या इसका कारण महज वास्तु दोष होता है या उन लोगों के स्वाभाव में कुछ ऐसा होता है जो एक अच्छे -भले घर को अशांत कर देता है | पढ़िए वास्तु दोष के आधुनिक चलन पर प्रहार करती रीतू गुलाटी जी की सशक्त कहानी ....

वास्तु दोष

ये कहानी है उस दम्पति की,जो रिश्ते मे मेरे भाई -भाभी लगते है दूर के।शहर की जानी-हस्ती,करोडो की कोठी के रहनुमा,सब सुख सुविधाओ के होते हुऐ भी दम्पति एकाकी जीवन जीने को विवश।

कारण दोनो मे छतीस का आकडा।दोनो की राय बिल्कुल नही मिलती आपस मे।दोनो ही ज्यादा पढे-लिखे भी नही।पतिदेव तो दिन रात अपने बिजनेस को आगे बढाने की फिक्र मे थे।बचपन से ही अपने बिजनेस को आगे बढाने के गुर वो अपने पिता से ले चुका था।पर पत्नी की उम्मीदो पर वो खरा नही उतरा था।जिस परिवार से वो आयी थी वो सब नौकरी वाले थे।वो भी यही चाहती थी मै शाम को पति संग घूमने निकलू,खूब सारी शापिंग करू!पर पति के पास फुर्सत कहां थी।अपने पिता के संग दुकान पर बैढना उसकी भी मजबूरी थी।पर पत्नी कहां समझती ये सब।हार कर वो पत्नी को नोटो की गडडी देकर कहता तुम अपनी पसन्द से जो चाहो खरीद लाओ।बच्चे जब छोटे थे तो वो उनके संग खरीददारी कर लेती पर अब तो वो अकेली थी।

इस तरह दोनो पति पत्नी के बीच तनातनी चलती रही।समय गुजरता गया।तभी किसी मित्र ने उन्हे अपने घर को वास्तु शास्त्र विशेषज्ञ को दिखाने की सलाह दी।और घर को वास्तु दोष से बचाने हेतु रेनोवेशन कराने की सोची।घर के वास्तु-दोष को दूर करने के लिये तोडा फोडी शुरु हो गयी। बैडरूम की जगह डांईग रूम व किचन की जगह बाथरूम सब बदल दिया गया।पूरी कोठी को बनने मे पूरा एक साल लग गया।अब कोठी सजकर तैयार थी।

अब घर देखने की उत्सुकता मेरी भी बढ चली थी।किसी काम से मुझे उसी शहर जाना हुआ तो मैने भाभी को मैसेज कर दिया फोन पर।मै निशिन्त होकर अपने पति संग वहां पहुंची तो भाभी डांइग रूम मे सोफे पर लेटी पडी थी।मुझे देख भाभी हैरान सी हो गयी।मेरे पति मुझे अकेला छोड किसी काम से निकल गये।तभी भाभी मुझसे बोली--दीदी आप आ रहे थे तो मैसेज तो कर देते।मै आप लोगो के लिये लंच बनाकर रख देती।मैनै तो आज कुछ बनाया ही नही,तुम्हारे भाई ने तो बाहर ही खा लिया होगा।मैने भी फल वगेरा लेकर दवा खाकर लेट गयी थी।

सामने टी वी चल रहा था,बडी उन्नीदी आंखो से वो बोली,और फिर सोने का उपक्रम करने लगी।खिसयाते हुऐ मैने भाभी को अपने फोन मे भेजे मैसेज को दिखाया।तो भाभी ने अपनी सफाई दी,शायद नेट की समस्या के कारण मुझे मैसेज मिला नही।वैसे आज सुबह से मेरा फोन भी काम नही कर रहा।नौकरानी भी घर की साफ-"सफाई कर जा चुकी थी।पर,भाभी उठी नही फिर सो गयी।मै चुपचाप सारे घर की निरीक्षण करने लगी,सोचा,खुद ही चाय बना लूं!कुछ सोच कर किचन मे पहुंची,पर ये क्या?सब कुछ छिपा हुआ।कुछ भी सामने नजर नही आया।शानदार फिटिग मे सब कुछ मेनैज।हार कर मै वापिस आ गयी।शाम को जब भाभी उठी तब उन्होने ही चाय वगैरा बनायी तब मैने देखा सब समझ गयी,नाम बडे,दर्शन छोटे।।
भाई दुकान से रात को वापिस आया।बडा खुश हुआ बहन को घर देखकर।उदास व खामोश घर मे आज तो कुछ रौनक लगी भाई को।
यूं तो पहले घर मे दो बेटियां व एक बेटा था।घर मे पूरा शोर रहता,अकसर वो आपस मे लडते झगडते थे पर अब घर शान्त था।क्योकि बेटियां दोनो ब्याहकर अपने ससुराल मे चली गयी थी।बेटा पापा का बिजनेस नही पसन्द करता था,उसे नौकरी करना पसन्द था।दोनो बाप बेटा के विचार नही मिले इसीलिये बेटा अपनी पत्नी को लेकर कही और ही रहने चला गया था।

घर मे दो-दो डबलबैड बिछे थे पर भाभी वही सोफे पर व भाई भी पास रखे दिवान पर ही सो गया था। मै सोच रही कि अब तो वास्तु शास्त्र के हिसाब से बने इस घर मे अब ऐसी क्या कमी थी कि ये इस तरह अलग-अलग रह रहे थे?दोनो ही बीमार चल रहे थे,जहां भाभी के हार्ट ब्लोकेज था भाई को किडनी की समस्या थी।सही मायने मे कोठी कम,भूतिया महल ज्यादा लगा मुझे,घर मे सारे साजो सामान होते हुऐ भीदिल बिल्कुल खाली थे,कोई सम्वेदनाएं तो बची ही नही थी!ना ही कोई आतिथ्य सत्कार बचा था।रिशतो मे भरी उकताहट ने जीवन का माधुर्य सोख लिया था।दोनो का आपस मे कटा-कटा रहना साबित कर रहा था कि वास्तुदोष तो था ही नही!दोष तो उनके स्वयं की सोच का था।एक बरस तक कोठी को तोड फोड कर जो पैसा बरबाद किया था वो अलग।

वो दोनो पहले तो ऐसे ना थे,आखिर जिंदगी के इतने साल उन्होने एक साथ गुजारे थे।पर अब बीमारी के कारण चिडचिडे भी हो गये थे।दोनो को इस प्रकार देख मेरे जेहन मे उलट-पुलट होने लगी,मेरे लिये वहाँ एक रात भी गुजारना मुशकिल हो गया था।
मुझे याद आया जब भाभी ब्याह कर आयी थी तो बहुत सुन्दर लगती थी,कद थोडा छोटा जरूर था,पर फिर भी जचती थी।उनके चेहरे पर हर दम मुस्कुराहट खिली रहती।भाभी नाचती बहुत बढिया थी।ननदो के बच्चो से भी खूब प्यार रखती।पर अब हालत ये थी कि उन्हे देख कर कोफ्त होती।हरदम चिडचिडी सी रहती।बच्चो के बिना सूना घर उसे काटने को दौडता पर फिर भी ऊपर-ऊपर से कहती ----नही--नही मै अकेली खुश हूं ,मेरा मन लग जाता है ऐसा मेरे पूछने पर उन्होने कहा,।पर मै सब समझ रही थी बुढापे मे बच्चे कितना महत्व रखते है मां बाप के सूने जीवन मे।पर भाभी तो ये कुबूल ही नही करना चाहती थी।
उस दिन भाभी के रवैये से तंग आकर भाई ने मुझसे अकेले मे पूछा:- भाई:-दीदी , भाभी ने आपसे बात की?या चुप ही रही? बहन:-मैनै भाई का मन रखने के लिये झूठ ही कह दिया,हां,हां,भाभी ने मुझ से बहुत सारी बाते की!भाई:-पर दीदी,मुझसे तो ये आठ-आठ दिन बात नही करती,जब कोई मतलब हो तभी मुंह खोलती है! बहन:-भाई ये तो गलत बात है
भाई:-समझ मे नही आता,इसे हो क्या गया है। बहन:-भाई,हिम्मत रख,सब ठीक हो जायेगा। भाई-बहन दोनो मिलकर एक दूसरे को तसल्ली दिला रहे थे।पर भीतर से भयभीत भी थे।
जब भाभी मां बाऊजी के संग संयुक्त परिवार मे रहती थी तो अलग होने के लिये भाभी ने भाई पर दबाब बनाया था जबकि भाई अलग नही होना चाहता था।आज इतिहास अपनी कहानी दोहरा रहा था।आज भाभी को ये सब खल रहा था कि उसके लाडला बेटा व इकलौती बहू उससे किनारा कर गये थे।आज भाभी को अहसास हो गया था कि जो उसने बोया था ,वही फसल सामने थी।अकेले घर मे सबकुछ था,पर बात करने वाला कोई नही था।सारा दिन टी वी देखती फिर भी सुकून ना मिलता।।डाक्टरो ने बडे-बडे टटैस्ट करवाकर भारी भरकम दवाईयो के बोझ भी लाद दिये थे।हार्ट ब्लाकेज के कारण कोई भी भारी चीज पूडी,पकोडी ,मनपसन्द चीज भी नही खा सकती थी।उबले खाने ने जीभ का स्वाद भी बिगाड दिया था।उधर भाई को भी घूंट चढाने की आदत ने भाभी को परेशान कर दिया था।किडनी की समस्या के चलते मदिरापान मना था।अकसर छोटी-छोटी बातो पर दोनो एक दूसरे की कमियां निकालते,फिर लडाई शुरू कर देते।

दोनो मे सहयोग व समर्पण की बहुत कमी थी।अपनी ईगो के चलते। वास्तु-शास्त्र के नियमो से बनी ये करोडो रूपयो से बनी सुन्दर कोठी अब मुंह चिढ़ा रही थी।।

रीतू गुलाटी

लेखिका -रीतू गुलाटी


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लेख -सच -सच कहना यार मिस करते हो कि नहीं : एक चिंतन




 शायद आपको याद हो अभी कुछ दिन पहले मैंने गीता जयंती पर एक पोस्ट डाली थी , जिस में मैंने उस पर कुछ और लिखने की इच्छा व्यक्त की थी | इधर कुछ दिन उसी के अध्यन में बीते | " जीवन क्या है , क्यों है या सहज जीवन के प्रश्नों का मंथन मन में हो रहा था | इसके विषय में कुछ लेख atootbandhann.com में लिखूँगी , ताकी जिनके मन में ऐसे सवाल उठते हैं, या इस विषय में रूचि हो,  वो उन्हें आसानी से पढ़ सकें | वास्तव में यह लेख नहीं एक परिचर्चा होगी जहाँ आपके विचारों का खुले दिल से स्वागत होगा |

सच -सच कहना यार मिस करते हो कि नहीं : एक चिंतन 



                                 पर आज कुछ लिखने का कारण शैलेश लोढ़ा जी ( तारक मेहता , वाह -वाह क्या बात है , फ्रेम ) की कविता है , जो मैने  यू ट्यूब पर सुनी | कविता का शीर्षक है , " सच -सच कहना यार मिस करते हो कि नहीं |" दरअसल ये कविता एक आम मध्यम वर्गीय परिवार से सफलता की ऊँचाइयों पर पहुंचे व्यक्ति की है | ये कविता उनके दिल के करीब है | इस कविता के माध्यम  से वो अपने बचपन के अभावों वाले दिनों को याद करते हैं और आज के धन वैभव युक्त जीवन से उसे बेहतर पाते हैं | बहुत ही मार्मिक बेहतरीन कविता है |  हम सब जो  उम्र के एक  दौर को पार कर चुके हैं कुछ -कुछ ऐसा ही सोचते हैं | मैंने भी इस विषय पर तब कई कवितायें लिखी हैं जब मैं अपने गृह नगर में सभी रिश्ते -नातों को छोड़ कर महानगर के अकेलेपन से रूबरू हुई थी |



क्योंकि इधर मैं स्वयं की खोज में लगी हूँ इस लिए कविता व् भावनाओं की बात ना करके तर्क की बात कर रही हूँ |  शायद हम किसी निष्कर्ष पर पहुँचे  | आज हम गुज़रा जमाना याद करते हैं पर जरा सोचिये  हम खतों की खुश्बू को खोजते हैं , भावुक होते हैं लेकिन जैसे ही बेटा दूसरे शहर पहुँचता  है तुरंत फोन ना आये , तो घबरा जाते हैं | क्या खत के सुख के साथ ये दुःख नहीं जुड़ा था , कि बेटे या किसी प्रियजन के पहुँचने का समाचार भी हफ़्तों बाद मिलता था | जो दूर हैं उन अपनों से कितनी बातें अनकही रह जाती थीं |

क्या ये सच नहीं है कि साइकिल पर चलने वाला स्कूटर और कार के सपने देखता है | इसके लिए वो कड़ी मेहनत करता है |

सफल होता है , तो स्कूटर खरीदता है , नहीं सफल होता है तो जीवन भर निराशा , कुंठा रहती है |  वहीँ कुछ लोग इतने सफल होते हैं कि वो मर्सिडीज तक पहुँच जाते हैं | फिर वो याद करते हैं कि सुख तो साइकिल में ही था | लेकिन अगर सुख होता तो आगे की यात्रा करते ही क्यों ? क्यों स्कूटर, घर, बड़ा घर , कार , बड़ी कार के सपने पालते , क्यों उस सब को प्राप्त करने के लिए मेहनत करते | जाहिर है सुख तब भी नहीं था कुछ बेचैनी थी जिसने आगे बढ़ने को प्रेरित किया | किसने कहा था मारुती ८०० लेने के बाद मर्सीडीज तक जाओ | जाहिर है हमीं ने कहा था , हमीं ने चाहा था , फिर दुःख कैसा ? क्योंकि जब उसे पा लिया तो पता चला यहाँ भी सुख नहीं है | कुछ -कुछ ऐसा ही हाल नौकरी की तलाश में दूसरे शहर देश गए लोगों का होता है | पर अपने शहर में, देश में वो नौकरी होती तो क्या वो जाते |अगर वहां बिना नौकरी के रह रहे होते तो क्या वहां पर वो प्यार या सम्मान मिल रहा होता जो आज थोड़े दिन जाने पर मिल रहा है | क्या वहां रहने वाले लोग ये नहीं कहते , "अच्छा है आप तो यहाँ से निकल गए |"


पिताजी कहा करते थे , ईश्वरीय व्यवस्था ऐसी है कि दोनों हाथों में लड्डू किसी के नहीं होते | जो हमारे पास होता है उसके लिए धन्यवाद कहने के स्थान पर जो हमारे पास नहीं होता है हम उस के लिए दुखी है | तभी तो नानक कहते हैं , " नानक दुखिया सब संसारा |"लेकिन हम में से अधिकतर लोग नौस्टालजिया में जीते हैं ....जो है उससे विरक्ति जो नहीं है उससे आसक्ति | मुझे अक्सर संगीता पाण्डेय जी की कविता याद आती है , " पास थे तब खास नहीं थे |"मृगतृष्णा इसी का नाम है .... हर किसी को दूर सुख दिख रहा है , हर कोई भाग रहा है |


ख़ुशी शायद यात्रा में है , जब हम आगे बढ़ने के लिए यात्रा करते हैं ख़ुशी तब होती है ... कुछ पाने की कोशिश में की जाने वाली यात्रा का उत्साह  होता है | पर शर्त है ये यात्रा निराशा कुंठा के साथ नहीं प्रेम के साथ होनी चाहिए | यह तभी संभव है  जब ये समझ हो कि ख़ुशी आज जहाँ हैं वहीँ  जो अभी मिला हुआ है उसी में निराश होने  के स्थान पर खुश रहने में हैं | ख़ुशी ये समझने में है कि जब हम -आप अपने बच्चों के साथ ठेले पर  गोलगप्पे खाते हुए पास से गुज़रती मर्सीडीज को देख कर आहे भर रहे होते हैं, ठीक उसी समय वो मर्सीडीज वाला बच्चों के साथ समय बिताते , जिन्दगी के इत्मीनान और लुत्फ़ का आनंद उठाते हुए हम को -आपको देख कर आह भर रहा होता है | तो क्यों ना हम तुलना करने के स्थान पर आज  अभी जो हमें मिला है उस पल का आनंद लेना सीखे ... क्योंकि किसी के लिए वो सपना है , भले ही जीवन की दौड़ में वो उससे पीछे हो या आगे , क्योंकि पीछे की यात्रा संभव नहीं |

जब ये समझ आ जायेगी तो संतोष आएगा और कुछ भी मिस करने की जरूरत नहीं पड़ेगी |




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वंदना बाजपेयी

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