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होलिका दहन : अपराध नहीं , लोकतंत्र का उत्सव
फोटो क्रेडिट -भारती वर्मा बौड़ाई
होलिका दहन कर  को आजकल स्त्री विरोधी घोषित करने का प्रयास हो रहा है | उसी पर आधारित एक कविता जहाँ इसे लोकतंत्र समर्थक के रूप में देखा जा रहा है ...


होलिका दहन : अपराध नहीं , लोकतंत्र का उत्सव 


वो फिर आ  गए अपने दल -बल के साथ
हर त्यौहार  की तरह इस बार भी
ठीक होली से पहले
अपनी  तलवारे लेकर
जिनसे काटनी  थी परम्पराएं
कुछ तर्कों से , कुछ कुतर्कों से
और इस बार
इतिहार के पन्नों से खींच कर निकली गयी होलिका
आखिर उस का अपराध ही क्या था ,
जो जलाई जाए हर साल एक प्रतीक के रूप में
हाय ! अभागी ,
एक बेचारी स्त्री
पुरुष सत्ता की मारी स्त्री
जो हत्यारिन नहीं, थी एक प्रेमिका
अपने प्रेमी संग विवाह रचाने को आतुर
एक बहन जो  भाई के प्रेम में
झट से तैयार हो गयी पूरी करने को इच्छा
दे दी आहुति ...
उसके भस्म होने का , जश्न मनाते बीत गयी सदियाँ
धिक्कार है हम पर ,
हमारी परम्पराओं पर ,
आह ,  कितने अधम  हैं हम
बदल डालो , बदल डालो , नहीं जलानी है अब होलिका
आखिर अपराध की क्या था ?


आखिर अपराध की क्या था ?
की सुंदर नक्काशीदार भाषा के तले
बड़ी चतुराई से दबा दिया ब्यौरा
इस अपराध का कि
कि अपने मासूम  भतीजे को भस्म करने को थी तैयार
वो अहंकारिणी
जो दुरप्रयोग करने को थी  आतुर
एक वरदान का
हाँ , शायद !
उस मासूम की राख की वेदी पर करती अपने
प्रियतम का वरण ,
बनती नन्हे -मुन्ने बच्चों की माँ
एक भावी माँ
जो नहीं जो नहीं महसूस कर पायी
अपने पुत्र को खोने के बाद
एक माँ की दर्द नाक चीखों को
अरे नादानों वो भाई केप्रेम की मारी अबला नहीं
उसमें तो
नहीं था सामान्य स्त्री हृदय



जिस पर दंड देने को थी  आतुर
उस मासूम का अपराध भी कैसा
बस व्यक्त कर रहा था ,
अपने विचार
जो उस समय की सत्ता के नहीं थे अनुकूल
उसके एक विचार से भयभीत होने लगी सत्ता ,
डोलने लगा सिंघासन
मारने के अनगिनत प्रयासों का
एक हिस्सा भर थी होलिका
एक शक्तिमान हिंसक की मृत्यु
और मासूम की रक्षा के चमत्कार का
प्रतीक बन गया
होलिकादहन


समझना होगा हमें
ना ये स्त्री विरोधी है
न पुरुष सत्ता का प्रतीक
ये लोकतंत्र का उत्सव है
जहाँ शोषक स्वयं भस्म होगा
अपने अहंकार की अग्नि में
और मासूम शोषित को मिलेगी विजय
शक्तिशाली या कमजोर ,
मिलेगा हर किसी को
अपनी बात रखने का अवसर ...



तोआइये ...
पूरे उत्साह के साथ मनइये होलिका दहन
ये कोई अपराध नहीं है
न ही आप हैं स्त्री मृत्यु के समर्थक
करिए गर्व  अपनी परम्परा पर
शायद वहीँ से
फैली है लोकतंत्र की बेल
जिसे सहेजना है
हम को आपको

नीलम गुप्ता


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गुझिया -अपनेपन की मिठास व् परंपरा का संगम
फोटो क्रेडिट -www.shutterstock.com

रंगों के त्यौहार होली से रंगों के बाद जो चीज सबसे ज्यादा जुडी है , वो है गुझिया | बच्चों को जितना इंतज़ार रंगों से खेलने का रहता है उतना ही गुझिया का भी | एक समय था जब होली की तैयारी कई दिनों पहले से शुरू हो जाती थी | आलू के चिप्स , साबूदाने व् आलू , चावल के पापड़ , बरी आदि  महीने भर पहले से बनाना और धूप  में सुखाना शुरू हो जाता था | हर घर की छत , आँगन , बरामदे में में पन्नी पर पापड़ चिप्स सूखते और उनकी निगरानी करते बच्चे नज़र आते | तभी से बच्चों में कहाँ किसको कैसे रंग डालना है कि योजनायें बनने लगतीं |

गुझिया -अपनेपन की मिठास व् परंपरा का संगम 



संयुक्त परिवार थे , महिलाए आपस में बतियाते हुए ये सब काम कर लेती थीं , तब इन्हें करते हुए बोरियत का अहसास नहीं होता था | हाँ ! गुझिया जरूर होलाष्टक लगने केर बाद ही बनती थी | पहली बार गुझिया बनने को समय गांठने का नाम दिया जाता | कई महिलाएं इकट्ठी हो जाती फाग गाते हुए कोई लोई काटती , कोई बेलती , कोई भरती  और कोई सेंकती, पूरे दिन का भारी काम एक उत्सव की तरह निपट जाता | तब गुझियाँ भी बहुत ज्यादा  संख्या में बनती थीं ....घर के खाने के लिए , मेह्मानों के लिए और बांटने के लिए | फ़ालतू बची मैदा से शक्कर पारे नामक पारे और चन्द्र कला आदि बन जाती | इस सामूहिक गुझिया निर्माण में केवल घर की औरतें ही नहीं पड़ोस की भी औरतें शामिल होतीं , वादा ये होता कि आज हम आपके घर सहयोग को आयें हैं और कल आप आइयेगा , और देखते ही देखते मुहल्ले भर में हजारों गुझियाँ तैयार हो जातीं |



बच्चों की मौज रहती , त्यौहार पर कोई रोकने वाला नहीं , खायी गयी गुझियाओं की कोई गिनती नहीं , बड़े लोग भी आज की तरह कैलोरी गिन कर गुझिया नहीं खाते थे | रंग खेलने आये होली के रेले के लिए हर घर से गुझियों के थाल के थाल निकलते ... ना खाने में कंजूसी ना खिलाने में |





हालांकि बड़े शहरों में अब वो पहले सा अपनापन नहीं रहा | संयुक्त परिवार एकल परिवारों में बदल गए | अब सबको अपनी –अपनी रसोई में अकेले –अकेले गुझिया बनानी पड़ती है | एक उत्सव  की उमंग एक काम में बदलने लगी | गुझिया की संख्या भी कम  होने लगी, अब ना तो उतने बड़े परिवार हैं ना ही कोई उस तरह से बिना गिने गुझिया खाने वाले लोग ही हैं , अब तो बहुत कहने पर ही लोग गुझिया की प्लेट की तरफ हाथ बढ़ाते हैं , वो भी ये कहने पर ले लीजिये , ले लीजिये खोया घर पर ही बनाया है,वाल सेहत का है, जितनी मिलावट रिश्तों में हुई है उतनी ही खोये में भी हो गयी हैं  ... 


फिर भी शुक्र  है कि गुझिया अभी भी पूरी शान से अपने को बचाए हुए हैं | इसका कारण इसका परंपरा से जुड़ा  होना है | 
यूँ तो मिठाई की दुकानों पर अब होली के आस -पास से ही गुझिया बिकनी शुरू हो जाती है ... जिनको गिफ्ट में देनी है या घर में ज्यादा खाने वाले हैं वहां लोग खरीदते भी हैं , फिर भी शगुन के नाम पर ही सही गुझिया अभी भी घरों में बनायीं जा रही है ... ये अभी भी परंपरा  और अपनेपन मिठास को सहेजे हुए हैं |


लेकिन जिस तेजी से नयी पीढ़ी में देशी त्योहारों को विदेशी तरीके से मनाने का प्रचलन बढ़ रहा है ...उसने घरों में रिश्तों की मिठास सहेजती गुझिया  पर भी संकट खड़ा कर दिया है | अंकल चिप्स कुरकुरे आदि आदि ... घर के बने आलू के पापड और चिप्स को पहले ही चट कर चुके हैं, अब ये सब घर –घर में ना बनते दिखाई देते हैं ना सूखते फिर भी गनीमत है कि अभी कैडबरी की चॉकलेटी गुझिया इस पोस्ट के लिखे जाने तक प्रचलन में नहीं आई है ) , वर्ना दीपावली , रक्षाबंधन और द्युज पर मिठाई की जगह कैडबरी का गिफ्ट पैक देना  ही आजकल प्रचलन में है | 


परिवर्तन समय की मांग है ... पर परिवर्तन जड़ों में नहीं तनों व् शाखों में होना चाहिए ...ताकि वो अपनेपन की मिठास कायम रहे | आइये सहेजे इस मिठास को ...

होली की हार्दिक शुभकामनायें 

वंदना बाजपेयी 




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                                               कविता -होली आई रे


होली त्यौहार है मस्ती का , जहाँ हर कोई लाल , नीले गुलाबी रंगों से सराबोर हो कर एक रंग हो जाता है ....वो रंग है अपनेपन का , प्रेम का , जिसके बाद पूरा साल ही रंगीन हो जाता है ...आइये होली का स्वागत करे एक कविता से ...

कविता -होली आई रे 



फिर बचपन की याद दिलाने
बैर  भाव को दूर भगाने
जीवन में फिर रंग बढाने
होली आई रे ...


बूढ़े दादा भुला कर उम्र को
दादी के गालों पर मलते रंग को
जीवन में बढ़ाने उमंग को
होली आई रे


पप्पू , गुड्डू , पंकू देखो
अबीर उछालो , गुब्बारे फेंकों
कोई पाए ना बचके जाने
होली आई रे



गोरे फूफा हुए हैं लाल
तो काले चाचा हुए सफ़ेद
आज सभी हैं नीले - पीले
होली आई रे 


बन कन्हैया छेड़े जीजा
राधा सी शर्माए  दीदी
प्रीत वाही फिर से जगाने
होली आई रे




घर में अम्माँ गुझिया तलती
चाची दही और बेसन मलती
बुआ दावत की तैयारी करती
होली आई रे



बच्चे जाग गए हैं तडके
इन्द्रधनुषी बनी हैं सडकें
सबको अपने रंग में रंगने
होली आई रे 



जिनमें कभी था रगडा -झगडा
चढ़ा प्रेम का रंग यूँ तगड़ा
सारे बैर -भाव मिटाने
होली आई रे

नीलम गुप्ता

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कहानी -मेरी दुल्हन


लाली -लाली डोलिया में लाली रे दुल्हनिया ... नयी नयी दुल्हन का क्रेज ही कुछ ज्यादा होता है | सोचने की बात ये हैं कि जब घर परिवार को इतना होता है तो दुल्हे मियाँ को कितना होता होगा, पर ये लम्बी -लंबी उबाऊ परम्पराएं ..आखिर धीरज रहे भी तो कैसे ?


कहानी -मेरी दुल्हन 



आज मेरी शादी का दिन था!सारा घर मेहमानों से भरा पडा था!मेरी शादी मे सबसे पहले मां भगवती का जागरण हुआ,बाद मे अन्य रस्मे।मेरी शादी मे आये मेरे चचेरे भाई भी ठिठोली से बाज नही आये,और मुझे छेड रहे थे!चचेरी बहने अलग से चुहलबाजी करती रही। खूब धमाल-चौकडी लगी थी।सभी प्रकार के रीति-रिवाजो को करके मेरी शादी ठीक  से सम्पन्न हो चुकी थी। रिवाज के हिसाब से तारो की छांव मे मै अपनी दुल्हन की डोली लेकर अपने घर लौट आया था।


दिसम्बर माह की बर्फानी राते थी।ठंड अपने पूरे शबाब पर थी। मेरी मां ने मेरी दुल्हन को आराम करने के लिये एक कमरे मे सुला दिया,थकी हुई वो जल्द ही नींद की आगोश मे समा गयी।विदाई संग आया भाई भी बहन के कमरे मे ही था। अपनी दुल्हन से बात करने को अधीर था मै,और वो शर्म से निगाहे नीची किये थी।तीखे नैन-नक्श,सुराही दार लम्बी गर्दन,व गोरा मुखडा,जिस पर शर्मीली झुकी हुई आंखे,माथे पर खेलती कटी जुल्फे!सौन्दर्य की साक्षात मूरत मेरे सामने थी पर मै बात नही कर सकता था क्योकि संयुक्त परिवार की कुछ मर्यादा थी।

पढ़िए -स्वाद का ज्ञान 


बाहर अंधेरा था,सभी रिश्तेदार दो घंटे के लिये आराम करने लगे।और मेरी दुल्हन भी सो गयी थी। सूरज निकल आने पर दुल्हन का भाई तो चला गया वापिस अपने घर।तभी मेरी बडी भाभी ने मेरी दुल्हन को तैयार कर दिया था!और नाश्ते हेतु डाईनिंग रुम मे बैठा दिया था! मेरी मां ने बडे प्यार से नाश्ता परोसा।


दही संग आलू के परोठे देख मै खुश हो गया था!पर ये क्या,दुल्हन ने जरा सा खाते ही छोड दिया!मुझसे रहा नही गया!पूछ ही बैठा:- क्या हुआ?खाना अच्छा नही क्या?
दुल्हन :-नही,नही, भूख नही है!शर्माते हुए कहा। 
फिर मैने जोर देकर कहा:-कुछ तो खाओ! 
इस पर दुल्हन ने साफ कह दिया:-इन पराठों मे तो मिर्चें बहुत तेज है,मै नही खा सकती। और जल्द ही व उठ गयी वहां से।

घर मे और रिश्तेदार भी घूम रहे थे,और मै मायूसी से चुप रह गया।। इसी बीच नाश्ते के बाद हमे पग फेरे की रस्म के लिये ससुराल जाना था। वहां जाकर दुल्हन अपने भाई बहनो मे रम गयी,मुझे उससे बात करने का मौका भी नही मिल पा रहा था, रात को हम लोग वहां से वापिस लौट आये। 


हां इतना जरुर था कि वहां से लौटते समय मै उसके संग ही बैठा था तो मै ठंड से बचने के लिये एकाएक अपने दोनो हाथ रगडने लगा,तो उसने धीरे से पूछा:-"आप ये क्या कर रहे हो"? मैनै हंस कर कहा:-"हीट ले रहा हूं"। और फिर वो चुपचाप हो गयी। तभी मै रात होने का इन्तजार करने लगा और कल्पना करने लगा,कि जब रात होगी,तो वो तारो को अपने आंचल मे समेटे मेरी राह देखेगी और मेरे भीतर उफनते मादक प्रेम को अपने कोमल हाथो के स्पर्श से पुलकित कर देगी!उसके यौवन के भार से लदे अप्रतिम सौन्दर्य का रसपान करने के लिये मै व्याकुल हो उठा।


इतनी सुन्दर,कोमलांगी,दुल्हन को पाकर मै खुशी से फूला नही समा रहा था!अपने सपनो मे,अपनी कल्पना मे, जिसकी मूरत बना रखी थी,वो तो उससे भी ज्यादा सुन्दर थी,प्यारी थी,!उसक़ो देखते-देखते मैने अपने प्रेम की उस मीठी अनुभूतियो को बडी शिद्दत से महसूसा।ज्योहि मैने उसे अपनी बाहो मे भरना चाहा,तभी बडी भाभी ने इशारे से अपने पास बुला लिया और मुझे घूमने भेज दिया। सबके सो जाने के बाद,मुझे मेरे कमरे मे जाने की इजाजत मिली।

पढ़िए -सही इलाज़

 रात काफी हो चुकी थी,इधर मेरी दुल्हन मेरा इन्तजार करते-करते कब सो गयी,उसे खुद भी पता नही चला। एक बार तो मेरी दुल्हन को सोता देख मुझे उस पर प्यार भी आया और गुस्सा भी, पर.....मै कुछ सोचने लगा। मेरे सामने अतुलनीय रूप की मल्लिका आंखें मीचे सो रही थी,उसका अंग-अंग प्रेम की अठखेलियां खेलने को तैयार था,मुझे पल पल कामुकता से सरोबार कर रहा था,और मै मौन था। जब काफी समय गुजर गया,मेरे सब्र का प्याला छलकने लगा,तो मुझसे रहा नही गया!मैने उस सोती हुई अपनी दुल्हन को अपने बाहुपाश मे ले लिया।


तभी वो अलसायी सी कुछ बोली:-मुझे सोने दो,बडी नींद आ रही है,!तभी मैने उसके गालो पर चुम्बनो की बोछार कर दी,हंसते हुऐ कहा-आज की रात तुम्हारे मेरे मिलन की रात है,आज की रात जीवन मे एकबार ही आती है,जागो और मुझे प्रेम कर लेने दो,मै तुम्हारे प्रेम का पुजारी हूं,मुझे जी भर कर रसपान कर लेने दो।खैर,मेरी शर्मीली दुल्हन जाग गयी और वो मेरी बाहो मे समा गयी।उसका सामीप्य पाकर मै खिल उठा और सारी रात एक दूसरे से बाते करते गुजर गयी

!एक दूसरे का गीतो का आदान प्रदान करते हुऐ मिलन की रात कब उजाले मे बदल गयी,पता ही नही चला।एक नयी भोर का आगाज हो चुका था,जो संग लायी थी,ढेरो खुशियां.-समर्पण व सहयोग की भावना व जीवन भर साथ देने की कसमे।।।
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रीतू गुलाटी 

लेखिका -रीतू गुलाटी





                                                              हामिद का तोहफा



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लघुकथा -प्रेम का बंधन

 
सफलता , सुख सम्पत्ति अकेलापन भी लाती है और दुःख में सम भाव का अहसास टूटे  रिश्तों के धागों को जोड़ कर परम का अटूट बंधन बना देता है | मानवीय स्वाभाव की इस विशेषता पर एक लघुकथा ...

लघु कथा -प्रेम का बंधन 


दोनों की आयु बारह-तेरह वर्ष होगी। उनके हाथ में रद्दी का सामान जमा करने वाला एक ठेला था। वे उसे घसीटते हुए गली में आगे बढ़ रहे थे और लोगों से अपने घर के कबाड़ बेचने का ऊंचे स्वरों में आह्वान कर रहे थे। मैंने उनकी पुकार सुनी तो उन्हें अपने घर में बुलाया। वे बड़ी उम्मीद से घर में आए। मगर मैंने उनके घर में घुसते ही सवाल किया, ‘‘तुम लोग पढ़ते क्यों नहीं ? यह उम्र क्या यही सब करने की है ?’’

उन्हें प्रश्न बेहद अवांछित लगा। उनमें जो बड़ा था, उसने उलाहना देते हुए पूछा, ‘‘गरीब पहले खाएगा या पढ़ेगा ?’’
जवाब सुनकर मैं अपराध-बोध से ग्रसित हो गया। आवाज को मुलायम करते हुए मैंने पूछा, ‘‘क्या तुम बहुत गरीब हो ?’’

उसमें से छोटे ने कहा, ‘‘हां, आज हम बहुत गरीब हैं। मगर कभी हम अच्छे खाते-पीते घर के थे। हम बड़े शौक से स्कूल जाते थे। मगर एक दिन हमारे बड़े ताऊ ने धोखे से हमारी पूरी जमीन हथिया ली। मेरे पिता जी कोर्ट-कचहरी करते रहे। मगर हमें हमारी जमीन वापस नहीं मिली। उल्टे जो घर में बचा-खुचा था, मुकदमेबाजी के भेंट चढ़ गया। हम कंगाल हो गए। ऊपर से दोनों परिवारों में भीषण दुश्मनी पैदा हो गई। ’’


पढ़िए -लघुकथा :मिलाप 

मैंने पूछा, ‘‘तुम्हारे उस दुष्ट ताऊ का क्या हुआ ? क्या वह सुख-चैन से जी रहा है ?’’

छोटे लड़के ने जवाब जारी रखते हुए कहा, ‘‘उस अन्यायी ताऊ का भी भला नहीं हुआ। वह बीमार हो गया। उसकी छाती में पानी भर गया। वह इलाज कराता रहा। मगर ठीक नहीं हुआ। हथियाई हुई जमीन इलाज की बलि चढ़ गई। एक दिन वह भी कंगला हो गया और आखिर एक दिन भगवान को भी प्यारा हो गया।’’

यह सब सुनकर मुझे बड़ा अफसोस हुआ। मेरे मुंह से ‘आह!’ निकल गई।

मैंने कहा, ‘‘धन-दौलत तो स्वाहा हो गए मगर दोनों परिवारों की दुश्मनी का क्या हुआ ?’’

इसपर दोनों खिलखिलाकर हंसने लगे। इस बार बड़े लड़के ने कहा, ‘‘बस यही तो फायदा हुआ। मेरे बाऊजी के मरते ही हमारी दुश्मनी हवा हो गई।’’

मैं चैंक पड़ा। बड़े लड़के की तरफ मुंह घुमाकर मैंने पूछा, ‘‘तुम्हारे बाऊ जी ? मतलब ?’’

उसने बड़ी सहजता से कहा, ‘‘मेरे बाऊजी ही इसके दुष्ट ताऊ थे, जिन्होंने मेरे छोटे ताऊ की जमीन हड़प ली थी। ये छोटा मेरा चचेरा भाई है। हम दोनांे की जमीन गई तो हमारे परिवारों की दुश्मनी भी गई। अब हम मिलकर रोजी-रोटी कमाते हैं। हम जमीन पर आ गए तो क्या हुआ, अब हम एक हैं।’’
एकता की ऐसी अद्भुत कहानी सुनकर मैं भौंचक रह गया।                         
                                         -ज्ञानदेव मुकेष                                                               
                                        न्यू पाटलिपुत्र काॅलोनी
                                         पटना-800013 (बिहार)

लेखक -ज्ञानदेव मुकेश


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बदचलन

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ग्वालियर : एक यात्रा अपनेपन की तलाश में



जिस शहर में क़रीब 50 साल पहले नव वधु के रूप में आई थी  उसी शहर में हम कुछ दिन पहले,परिवार ही नहीं कुटुम्ब के साथ पर्यटक की तरह गये थे। मैं ग्वालियर का जिक्र कर रही हूँ।
मेरे पति उनके भाई बहन इसी शहर में पले बढ़े हैं। मेरी बेटी का जन्म स्थान भी ग्वालियर ही है। 1992 तक यहाँ हमारा मकान थाजो बेच दिया था अब उस जगहकपड़ों का होल सेल स्टोर बन चुका है,पर वो गलियाँ सड़कें बदलने के बाद भी बहुत सी यादें ताज़ा कर गई। पुराने पड़ौसी और यहाँ तक कि घर मे काम करने वाली सहायिकाओं की अगली पीढ़ी भी मिली।छोटे शहरों की ये संस्कृति हम दिल्ली वालों के लिये अनमोल है।


ग्वालियर यात्रा संस्मरण


जब यहाँ घर था तब कभी पर्यटन के लिये नहीं निकले या ये कहें कि उस समय पर्यटन का रिवाज ही नहीं था। दूसरी महत्वपूर्ण बात यह है कि अपने शहर की जगहों के नाम इतने सुने होते हैं कि लगता है यहाँ पर्यटन के लायक कुछ है ही नहीं!तीसरी बात कि पिछले तीस दशकों में यातायात और पर्यटन की सुविधाओं काबहुत विकास हुआ है जो पहले नहीं था

हमारे वृहद परिवार से तीन परिवारों ने पर्यटन परतथा पुरानी यादें ताज़ा करने के लिये ग्वालियर जाने का कार्यक्रम बनायाचौथा परिवार रायपुर से वहाँ पहुँचा हुआ था। एक परिवार की तीन पीढ़ियाँ और बाकी परिवारों की दो पीढ़ियों का कुटुंब(15 व्यक्तिअपने शहर पहुँचकर काफ़ी नॉस्टैलजिक महसूस कर रहे थे।

हम दिल्ली से ट्रेन से गये थे, शताब्दी से साढ़े तीन घंटे का सफ़र मालूम ही नहीं पड़ा। आजकल होटलटैक्सी सब इंटरनैट पर ही बुक हो जाते हैं तो यात्रा करना सुविधाजनक हो गया है परन्तु हर जगह भीड़ बढ़ने से कुछ असुविधाये भी होती हैं। होटल में कुछ देर विश्राम करने के बाद हम जयविलास  महल देखने गये।

जयविलास महल शहर के बीच ही स्थित है।ये उन्नीसवीं सदी में सिंधिया परिवार द्वारा बनवाया गया था और आज तक इस महल का एक हिस्सा उनके वंशजों का निजी निवास स्थान है। महल के बाकी हिस्से को संग्रहालय बना कर जनता के लिये खोल दिया गया है।मुख्य सड़क से महल के द्वार तक पहुँचने के मार्ग के दोनों ओर सुन्दर रूप से तराशा हुआ बग़ीचा है जिसमें खिली बोगनवेलिया की पुष्पित लतायें मन मोह लेती हैं।महल के बीच के उद्यान भी सुंदर हैं। संग्राहलय की भूतल और पहली मंजिल पर सिंधिया राज घराने के वैभव के दर्शन होते हैं। भाँति भाँति की पालकियाँ और रथ राजघराने के यातायात के साधन मौजूद थेसाथ ही कई बग्घियों के बीच एक छोटी सी तिपहिया कार भी थी

महल में राजघराने के पूर्वजों के चित्रों को उनके पूरे परिचय के साथ दिखाया गया है। राजघराने में अनेकों सोफ़ासैट और डाइनिंग टेबल देखकर  मुझे उत्सुकता हो रही थी कि एक समय में वहाँ कितने लोग रहते होंगे !नीचे बैठकर खाने का प्रबंध भी था। किसी विशेष अवसर पर दावत के लिये बड़े बड़े डाइनिंग हॉल भी देखे जहाँ एक ही मेज़ पर मेरे अनुमान से सौ ड़ेढ़ सौ लोग बैठकर भोजन कर सकते हैं।यहाँ की सबसे बडी विशेषता मेज़ पर बिछी रेल की पटरियाँ है।इन रेल की पटरियों पर एक छोटी सी रेलगाड़ी खाद्य सामग्री लेकर चक्कर काटती थी। ये रेलगाड़ी एक काँच के बक्से में वहाँ रखी है। एक वीडियो वहाँ चलता रहता है जिसमें ये ट्रेन चलती हुई दिखाई गई है।
जय -विलास महल -विश्व प्रसिद्ध शैंडेलियर


एक दरबार हाल में विश्व प्रसिद्ध शैंडेलियर का जोड़ा हैजिनका वज़न साढ़ तीन तीन टन है और एक एक में ढ़ाई सौ चिराग जलाये जा सकते हैं।संभवतः यह विश्व का सबसे बड़ा शैंडेलियर है। इस दरबार हाल की दीवारों पर लाल और सुनहरी सुंदर कारीगरी की गई है। दरवाज़ो पर भारी भारी लाल सुनहरी पर्दे शोभायमान हैं।जय विलास महल सुंदर व साफ़ सुथरा संग्रहालय हैयह योरोप की विभिन्न वास्तुकला शलियों में निर्मित महल है।

यहाँ पर्यटकों के लिये लॉकर के अलावा कोई  विशेष सुविधा नहीं है।तीन मंजिल के संग्रहालय में व्हीलचेयर किराये पर उपलब्ध हैं परंतु न कहीं रैम्प बनाये गये हैं न लिफ्ट है जिससे बुज़ुर्गों और दिव्यांगों को असुविधा होती है। जन-सुविधाओं का अभाव है। पर्यटकों के लिये प्राँगण में एक कैफ़िटेरिया की कमी भी महसूस हुई।

यदि हर चीज़ को बहुत ध्यान से देखा जाये तो यहाँ पूरा दिन बिताया जा सकता है। हमारे साथ बुज़ुर्ग और बच्चे भी थे तो क़रीब तीन घंटे का समय लगा और कुछ हिस्सा देखने से रह भी गया।यहाँ घूमकर सब थक चुके थेसफ़र की भी थकान थी और भूख भी लगी थी।

दोपहर का भोजन करने के बाद हम महाराज बाड़ा या जिसे सिर्फ़ बाड़ा कहा जाता है,  वहाँ गये। यह स्थान शहर के बीच में हैजहाँ पहले भी 
जब यहाँ घर था हम कई बार जाते रहे थे। यह ख़रीदारी का मुख्य केंद्र लगता था। घर के पीछे की गलियों से होते हुए यहाँ पैदल पहुँच जाते थे। अब यह बहुत बदला हुआ लगा। पहले दुकानों के अलावा कहीं ध्यान नहीं जाता था। अब बाड़े पर पक्की दुकाने नहीं है पर पटरी बाज़ार जम के लगा हुआ  है।अब चारों तरफ़ की इमारतें और बीच का उद्यान ध्यान खींचते है। उद्यान के बीच में सिंधिया वंश के किसी राजा की मूर्ति भी है।


रीगल ताकेज ग्वालियर


 बाड़े पर रीगल टॉकीज़ में कभी बहुत फिल्में देखी थी पर फिल्मी पोस्टरों के पीछे छिपी इमारत की सुंदर वास्तुकला कभी दिखी ही नहीं थी। विक्टोरिया मार्केट कुछ समय पहले जल गया था जिस पर काम चल रहा हैं। पोस्ट ऑफ़िस की इमारत और टाउनहॉल ब्रिटिश समय की योरोपीय शैली की सुंदर इमारतें हैं। बाजार अब इन इमारतों के पीछे की गलियों और सड़केों में सिमट गये हैं।बाड़े से पटरी बाज़ार को भी हटा दिया जाना चाहिये क्योंकि ट्रैफ़िक बहुत है।पास में ही सिंधिया परिवार की कुलदेवी का मंदिर है। हमें बताया गया कि महल से दशहरे पर तथा परिवार में किसी विवाह के बाद यहाँ सिंधिया परिवार अपने पूरे राजसी ठाठ बाट मे जलूस लेकर कुलदेवी के मंदिर तक आता था और पूरे रास्ते में प्रजा इस जलूस को देखती थी। इस मंदिर का रखरखाव तो अब बहुत ख़राब हो गया है।पार्किग भी यहीं पर है। इस जगह को गोरखी कहते हैं यहाँ के स्कूल मे मेरे पति और देवर की प्राथमिक पाठशाला थी। बहनों का स्कूल भी पास में था। यहाँ जिस स्थान पर पार्किंग है वहाँ ये लोग क्रिकेट खेला करते थे।

 यहाँ से हम लाला के बाज़ार गये। हाँ आपने सही  पढ़ा है लाला का बाज़ार यहाँ वह मकान था जहाँ मेरा स्वागत नववधु के रूप में हुआ था। यह मकान जब घर था तो हम लगभग हर साल यहाँ आते थे पर शहर कभी नहीं घूमा था।  उन दिनों घूमने फिरने का रिवाज ही नहीं था,मकान तो टूट चुका हैवहाँ हम अंदाज़ लगाते रहे कि यहाँ आँगन था वहाँ रसोई थी इत्यादि। घर के पीछे एक मकान वैसा का वैसा ही दिखा। उस परिवार की अगली पीढ़ी जो कि हमारे आयुवर्ग की है, उनसे मिले। इसके बाद एक और पड़ौसी के यहाँ गये जिनसे संपर्क बना हुआ था। इन्हे अपने आने की सूचना दे दी थी। उन सबसे मिलकर बहुत सी यादें ताज़ा हो गईं। हमारे घर में काम करनेवाली सहायिकाओं की अगली पीढ़ी भी हमें यहीं मिली। यहाँ से हम लोग होटल वापिस आ गये और ग्वालियर में हमारा पहला दिन पूरा हो गया।


ग्वालियर का किला


अगले दिन हम सब ग्वालियर क़िला देखने गये जो शहर के बीच ही एक पहाड़ी पर स्थित है। यहाँ कार से भी जाया जा सकता है और पैदल जाने का दूसरा रास्ता है। रास्ते में पत्थरों को काटकर कुछ जैन मुनियों के भित्ति चित्र हैं जो आक्रमणकारियों ने खराब कर दिये हैंफिर भी अद्भुत हैं। किले पर पहुचकर एक संग्राहालय है जहाँ जगह जगह से मिली प्राचीन पत्थर की मूर्तियाँ हैं। राजा मानसिंह का महल है। ये महल लाल रंग के सैड स्टोन से बना है तरह तरह के जाली झरोखे हैं। बाहरी दीवारों पर कुछ काल्पनिक जानवरों और मछलियों की पेंटिंग है। सीढ़ियाँ बहुत सकरी और ऊँची है। राजामानसिंह की नवीं रानी अलग महल में रहती थीं वह गुर्जर थीं इसलियें उसे गूजरी महल भी कहा जाता है।



सास -बहु का मंदिर -ग्वालियर



 ग्वालियर के किले पर कई वंश के राजाओं का अधिकार रहायहाँ की इमारतों में हिन्दू और योरोपियन वास्तुकला का मिश्रण नज़र आता है।यहाँ एक गुरुद्वारा भी है क्योंकि ग्वालियर में कभी सिख सैनिकों को लाकर बसाया गया था।यहाँ का एक आकर्षण सास बहू का मंदिर हैं | दरअसल अब यहाँ मंदिर जैसा कुछ नहीं बचा है। ये दो मंदिर  वास्तुकला के अद्भुत नमूने हैं। इस मंदिर का असली नाम सहस्त्रबाहु मंदिर है जो बोलते बोलते सास बहू हो गयाहै।एक स्थानीय किंवदंती है एक मंदिर शिव का है और एक विष्णु कासास बहू के अलग अलग इष्ट थे एक शिव को पूजती थीएक विष्णु कोइसलिये किसी राजा ने ये दो मंदिर बनवाये थें।यें मंदिर भी लाल सैंड स्टोन से बने हुए हैं।यहाँ से नीचे पूरा शहर दिखता हैबड़ा सुंदर लगता हैरात को और भी अच्छा दिखता होगा जैसे आसमान ऊपर है वैसे ही आसमान नीचे नज़र आता होगा।किले में अन्य स्थानों से भी शहर दिखता है।किले पर काफी बड़ा मैदान भी हैएक तेली का मंदिर और सूरज कुण्ड है पर समयाभाव और थकान के कारण सब कुछ देखना मुमकिन नहीं हुआ। इसी पहाड़ी पर सिंधिया स्कूललड़कों का)है जो पूरी तरह रिहायशी है। भारत के मंहगे और अग्रणी स्कूलों मं इसका नाम है।सिंधिया स्कूल से पढ़े हुए लड़के फ़ौज मेंराजनीति में,लेखन और कला में नाम बना चुके है। सलमान ख़ान और अरबाज़ ख़ान यहाँ के पढ़े हुए हैं।


सास बहु का मंदिर -ग्वालियर


पर्यटकों के लिये यहाँ कोई विशेष सुविधायें नहीं हैं। गेट के पास ही एक दुकान पर पानी  कोल्डड्रिंक और कुछ स्नैक्स मिलते हैं। व्हील चेयर चलाना मुश्किल है। जनसुविधायें भी नहीं दिखी । इतने बड़े क़िले के किसी अन्य कोने में हों तो पता नहीं। हमारे देश के पर्यटन स्थलों को वैश्विक स्तर का बनाने के लियें समुचित साफ़ सुथरी जनसुविधायेंएक कैफैटेरिया के साथ होनी चाहिये। हर स्थान को व्हीलचेयर की पहुँच में लाना ज़रूरी हैजिससे वृद्ध और दिव्यांग पर्यटन का पूरा आनंद ले सकें। का़नूनी तौर पर ये अनिवार्य होना चाहिये। ऐतिहासिक इमारतों का प्रारूप बदले बिना हर स्थान पर रैम्प और लिफ्ट लगने चाहियें। बस सरकार की तरफ़ से संवेदनशीलता की कमी है। योरोप और अमरीका के सभी देशों मे ये सुविधायें पर्यटन स्थलों पर ही नहीं यातायात के साधनों में भी  हैं।
किलेसे उतर कर भोजन करते करते शाम हो चुकी थी। भोजन के बाद होटल में आकर कुछ देर आराम किया  कुटुम्ब के सदस्य अलग अलग अपने मित्रों और रिश्तेदारों से मिलने चले गये।हमें मिलने हमारे रिश्तेदा होटल में ही आ गये थे।तीसरे दिन परिवार की युवा पीढ़ी पैदल किले पर चढ़ी,सूर्योदय देखा । हम बुजुर्गों और बच्चों ने होटल में नींद पूरी की।


सुबह निश्चय किया गया कि हम दोनों और तनु कार से वापिस चलें।हमारे ग्रुप में एक कार उपलब्ध थी।गतिमान ऐक्सप्रैस जोकि झाँसी से आती है वो ग्वालियर केवल दो मिनट रुकती है। ग्वालियर के ट्रैफ़िक को देखते हुए ये समय बहुत कम है। ट्रेन में चढ़ने में सबको बहुत दिक़कत हुई क्योंकि सामान चढ़ाने, बुज़ुर्गों और बच्चों को चढ़ाने में सावधानी रखनी पड़ती है समय बहुत कम था।ख़ैर सभी लोग सकुशल ट्रेन में चढ़ गये। हमारे निकलने के बाद बाकी लोगों ने अपने जानने वालों से मुलाक़ात की शाॉपिंग कीखाना खाया और रेलवे स्टेशन पहुँच गये।ग्वालियर से आगरा कार यात्रा में ग्रामीण मध्य प्रदेश बहुत दिखा। जी पी ऐस की कृपा से राष्ट्रीय राजमार्ग तक पहुँच गये। जी पी ऐस रास्ता बंद होने की सूचना तो नहीं देता है। एक जगह फंस ही गये थे ,बहुत संकरी सड़क से निकलना पड़ा। आगरा पार करके यमुना ऐक्सप्रैस वे की ड्राइव तो जानी पहचानी है। शाम को बजे घर पहुंचे और  दो ढाई घंटे बाद ट्रेन से आने वाले मुसाफ़िरों के भोजन की व्यवस्था की।


 ग्वालियर की कोई हस्तकला तो मशहूर नहीं है। केवल किले पर एक बुंदेली हस्तकला की दुकान दिखी थी। कोई सोवेनियर शॉप कहीं नहीं दिखी। ग्वालियर से लोग चँदेरी की साड़ी ख़रीदते हैं। शायद ये पहला मौक़ा होगा जबअपने शहर से बाहर जाकर पाँच रुकी भी शॉपिंग नहीं की। कर दिया न कमाल महिलाओं को बेवजह बदनाम किया जाता है!

बीनू भटनागर


लेखिका- बीनू भटनागर


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