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कविता -जिंदगी मेरे दरवाजे पर


पता नहीं क्यों इस कविता के बारे में लिखते हुए मुझे ये गाना याद आ रहा है , " जिन्दगी मेरे घर आना ...आना जिंदगी" सच है हम कितनी शिद्दत से जिंदगी को बुलाते हैं पर ये जिंदगी ना जाने कहाँ अटकी पड़ी रहती है कि आती ही नहीं ... और हम उदासियों की गिरफ्त में घिरते चले जाते हैं | अगर आप जानना चाहते हैं कि ये जिंदगी क्यों नहीं आती तो ये कविता जरूर पढ़ें ...

जिंदगी मेरे दरवाजे पर 




आज  भोर से थोड़ा पहले
फिर  खड़ी  थी जिंदगी मेरे दरवाजे पर ,
दी थी दस्तक ,
हौले से पुकारा था मेरा नाम ,
और हमेशा की तरह
कान पर तकिया रख
कुछ और सोने के लालच में ,
उनींदी आवाज़ में ,
लौटा दिया दिया था मैंने ,
आज नहीं कल आना ...


बरसों से यही तो हो रहा है
जिन्दगी आती है द्वार खटखटाती है
और मैं टाल देती हूँ कल पर
और भूल जाती हूँ हर रोज
 उठते ही
कि मैंने ही दिखाया है उसे बाहर का रास्ता



हर रोज बोझिल मन से उन्हीं कामों को  करते हुए
ऊबते झगड़ते
कोसती हूँ किस्मत
कहाँ अटक गयी है
कुछ भी तो नहीं बदल रहा जिन्दगी में
साल दर साल उम्र की पायदान चढ़ते हुए भी
ना जाने कहाँ खो गयी है जिन्दगी
जो बचपन में
भरी रहती थी हर सांस में
बात में उल्लास में



बढती उम्र की
उदासियों के गणित में
ये =ये के  की प्रमेय को सिद्ध करने में
बस एक मामूली  अंतर
बदल देता है सारे परिणाम
कि बचपन में
हर सुबह हल्की सी दस्तक पर
हम खुद ही खोलते थे
मुस्कुरा कर
दरवाजा जिन्दगी के लिए

सरिता जैन


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filed under-poem, hindi poem, poetry, Life, door, Liveliness

लघु कथा -परहितकारी


परहित सरिस धरम नहीं भाई ... तुलसीदास जी की यह चौपाई परोपकार को सबसे श्रेष्ठ धर्म बताती है | अच्छे मुश्यों का प्रयास रहता है कि वो परोपकार कर दूसरों का हित करें परन्तु जीव -जंतु भी परोपकार की भावना से प्रेरित रहते हैं | ऐसे ही मूक प्राणियों की परहित भावना को अभिव्यक्त करती लघुकथा ...

लघुकथा -परहितकारी 



सुबह-सुबह आसमान में सूर्य की लालिमा उभरने लगी थी। इस लालिमा के स्वागत में पक्षियों का कलरव शुरू हो चुका था। राहुल नींद से उठकर आंखें मल रहा था। तभी उसके बालकनी में चिड़ियों की चहचहाहट सुनाई दी। राहुल समझ गया कि चिड़ियां पानी पीने के लिए व्याकुल हो रही हैं। राहुल रोज रात में सोने से पहले बाॅलकनी के मुंडेर पर पानी की कुछ प्यालियां रख देता था। मगर कल रात वह प्यालियां रखना भूल गया था।


वह फौरन किचेन में गया और दो प्यालियों में पानी भरकर बालकनी में आया। उसने मुंडेर पर प्यालियां रख दीं और वह पीछे हट गया। मगर प्यासी चिड़ियां पानी के प्याली तक नहीं आईं। राहुल आश्चर्यचकित था।

पढ़ें -जीवन दाता 

   वही मंुडेर पर कुछ गमले रखे थे। सभी चिड़ियां उन गमलों के पौधे के ईर्द-गिर्द मंडरा रही थीं और चीं-चीं कर रही थीं। राहुल कुछ समझ नहीं पाया। वह चिड़ियों की इस हरकत से परेशान होने लगा। तभी दादी मां बालकनी में आई। उन्होंने राहुल को परेशान देखा तो इसका कारण पूछा। राहुल ने कहा, ‘‘देखो न दादी, चिड़ियां मेरा पानी न पीकर गमलों पर क्यों मडरा रही हैं ?’’

  दादी ने गमलों को गौर से देखा। सभी गमले सूख चुके थे। उनमें पड़ी मिट्टी में दरारें पड़ने लगी थीं। दादी मां सब समझ गईं। उन्होंने राहुल एक बाल्टी पानी और मग लाने को कहा। राहुल पानी और मग ले आया। दादी मां ने जल्दी-जल्दी सभी गमलों में पानी डाला। देखते-ही-देखते गमलों में पड़ी मिट्टी की दरारें खत्म हो गईं।

   तभी राहुल ने देखा, सभी चिड़ियां गमलों पर से मंडराना छोड़कर पानी की प्यालियों की तरफ बढ़ गईं और चोंच डुबाकर पानी पीने लगीं। राहुल के आश्चर्य की सीमा न रही। दादी मां ने राहुल को हैरान देखा तो कहा, ‘‘ये पंछी हैं, मनुष्य नहीं। यह अपनी प्यास से ज्यादा दूसरों की प्यास की फिक्र करते हैं।’

  राहुल ने हैरानी से पूछा, ‘‘दूसरों की प्यास ? मतलब ?’’

  दादी मां ने राहुल के गाल थपथपाते हुए कहा, ‘‘इन सूखे पौधों की प्यास। यही पौधे तो हमें जीवन देते हैं। इन्हें भी तो पानी देना होगा।’’

                                                           
                                                                             
                                             
                                                  - ज्ञानदेव मुकेश
                                                न्यू पाटलिपुत्र काॅलोनी
                                                पटना-800013 (बिहार)

लेखक -ज्ञानदेव मुकेश

                                                       


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कहानी -स्पर्श रेखाएं


इससे पहले भी आप atootbandhann.com में वरिष्ठ लेखिका दीपक शर्मा जी की कहानियाँ पढ़ चुके हैं | वो हमेशा एक नया सब्जेक्ट लाती हैं उसकी काफी रिसर्च करती हैं फिर पात्र के मनोवैज्ञानिक और भावनात्मक धरातल पर उतर कर कहानी लिखती हैं | ये कहानी भी एक ऐसी ही कहानी है जिसने मुझे बहुत देर तक विचलित किया | क्यों हो जाती है एक अच्छी भली स्त्री पागल? वो पागल हो जाती है या पागल करार दे दी जाती है | शायद  आशा , प्रेम सम्मान जब सब किसी स्त्री से छीन लिए जाते हैं तो वो अपना मानसिक संतुलन खो बैठती है | क्या अपमान , अप्रेम की स्थिति में एक मानसिक संतुलन खोयी हुई स्त्री के भावनात्मक वलय को छूने वाले स्पर्श रेखाएं नाउम्मीदी की दशा में उसी वलय  में खिची चली जाती है | सच में जीवन बहुत उलझा हुआ है और उससे भी ज्यादा उलझा हुआ है मन और उसका विज्ञान ... आइये पढ़ें एक ऐसी कहानी जिसमें उलझ कर आप थोडा ठहरने को विवश होंगे |

कहानी -स्पर्श रेखाएं 


झगड़ेके बाद माँ अकसर इस मंदिर आया करतीं|घंटे, दो घंटे में जब मेरा गुस्सा उतर कर चिन्ता का रूप धारण करने लगता तो उन्हें घर लिवाने मैं यहीं इसी मंदिर आती|


एक-एक कर मैं प्रत्येक रुकाव एवं ठहराव पर जाती| प्रसाद की परची कटवा रहीं, प्रसाद का दोना सम्भाल रही, माथा टेक रही, चरणामृतले रही, बंट रहे प्रसाद के लिए हाथ बढ़ा रही, सरोवर की मछलियों को प्रसाद खिला रही, स्नान-घर में स्नान कर रही सभी अधेड़ स्त्रियोंको मैं ध्यान से देखती-जोहती और दो-अढ़ाई घंटों में माँ का पता लगाने में सफल हो ही जाती|

मगर उस दिन मंदिर के मुख्य द्वार की ड्योढ़ी पर पाँव धरते ही मैं ने जान लिया सरोवर के जिस परिसर पर भीड़ जमा रही, माँवहीं थीं|

“क्या कोई हादसा हो गया?” परिक्रमा से लौट रही एक दर्शनार्थी से मैंने पूछा|
“हाँ, बेचारी एक बुढ़िया यहाँ मरने आयी थी| स्नान के बहाने डूब जाना चाहती थी मगर लोगबाग ने समय रहते शोर मचा दिया और यहाँ के सेवादारों ने उसे गहरे में जाने से रोक लिया.....”


लोगों की भीड़ को चीरना मेरे लिए कठिन न रहा| अवश्य ही मेरी चाल व ताक कूतना उनके लिए सुगम रहा होगा|

“यह मेरी माँ हैं,” संगमरमर के चकमक फर्श पर माँ पेट के बल लेटी थीं| उनकीसलवार कमीज़ उनकी देह के संग चिपकी थी|

“जब यह दूसरे जोड़े के बिना हमारे स्नानघर में दाख़िल हुईं, मैंने तभी जान लिया था, ज़रूर कुछ गड़बड़ है.....” सम्भ्रान्त एक अधेड़ महिला ने मेरा कन्धा थाम लिया|

“घर में क्या बहू से झगड़ा हुआ?” एक वृद्धा की आँखों से आँसू ढुलक लिए|
“आपके पिता कहाँ हैं?” एक युवक ने उत्साह दिखाया, “मैं उन्हें खबर करता हूँ| आप अकेली इन्हें कहाँ सम्भाल पाएंगी?”
“गुड आफ़्टर नून, मै’म,” भीड़ के एक परिचित चेहरे ने मेरी ओर हाथ हिलाया, “मैं अपनी कार से आयी हूँ| आप दोनों को आपके घर पहुँचा आऊँगी.....”
“थैन्क यू,”मैंने उसका सहयोग स्वीकारा|
“क्या किसी कॉलेज में पढ़ाती हो?” पहली वाली सम्भ्रान्त महिला ने मुझ से पूछा|
“हाँ,” मैंने सिर हिलाया, “यह लड़की मेरी छात्रा है|”
“नौकरी-पेशा हो कर इतनी नासमझी दिखाई,” सम्भ्रान्त महिला ने मुझे फटकारा, “और माँ के लिए यह नौबत ले आयी|”


“तुम्हारा पागलपन बढ़ रहा है, माँ,” शाम को जब माँ मुझे बात सहने लायक दिखायी दीं तो मैं ने उनकी खबर ली, “आज फिर डॉक्टर के पास तुम्हें ले कर जाना पड़ेगा.....”
“मैं पागल नहीं हूँ,” माँ रोने लगीं, “बस, अब और जीना नहीं चाहती.....”
“इसीलिए तो डॉक्टर के पास जाना ज़रूरी है,” मैं कठोर हो ली|
“मैं वहां न जाऊंगी,” माँ व्यग्र हुईं| बिजली के संघात उस डॉक्टर की चिकित्सा-प्रक्रिया के अभिन्न अंग रहे और माँ वहां जाने से बहुत घबरातीं|

“आप ऐसे नहीं मानेंगी तो फिर मजबूर हो कर मुझे आपको वहां दाखिल करवाना पड़ेगा,” मुझे माँ पर बहुत गुस्सा आया|

“यह दुख तो नहीं ही झेला जाएगा,” माँ गहरे उन्माद में चली गयीं; कभीअपने बाल नोचतीं तो कभी अपने कपड़े फाड़ने का प्रयास करतीं, “पुराने दुख कट गए थे कि आगे सुख मिलने वाला है, मगर इस बार तो कहीं उम्मीद की लकीर भी दिखाई नहीं दे रही.....”

“यह दवा खा लो, माँ,” मैं ने डॉक्टर की बतायी दवा माँ के मुँहमें जबरन ठूंस देनी चाही|

माँ ने दवा मेरे मुँह पर थूक दी और मेरा हाथ इतने ज़ोर से दबाया कि न चाहते हुए भी मेरी चीख निकल ली|
चीख सुन कर मकान मालकिन दौड़ी आयीं|
अस्पताल से एम्बुलेंस उन्हीं ने मंगवायी|

कहानी -स्पर्श रेखाएं


माँ और मेरे बीच रिश्ता तब तक ही ठीक रहा, जब तक मैं अपने पिता के घर पर अपनी पढ़ाई पूरी करती रही|
“तेरी नौकरी की उम्मीद पर जी रही हूँ,” उन पन्द्रह वर्षों के दौरान माँ मुझे जब-जब मिलीं, मुझे अपने सीने से लगा कर अपना एक ही सपना मेरी आँखों में उतारती रही, “तेरी नौकरी लगते ही हम दोनों अपने अपने नरक से निकल लेंगी|”

हमारे साथ अजीब बीती थी|असहाय अपनी विधवा माँ तथा स्वार्थी अपने तीन भाइयों के हाथों कच्ची उम्र में ही माँ जब तंगहाल मेरे पिता के संग ब्याह दी गयी थीं तो उधर अपनी महत्वाकांक्षा के अन्तर्गत मेरे पिता बीस वर्ष की अपनी उस उम्र में मिली अपनी स्कूल क्लर्की से असन्तुष्ट रहने की वजहसे अपने लिए कॉलेज लेक्चरर की नौकरी जुटाने में प्रयासरत थे|


घोर संघर्ष वविकट कृपणता का वह तेरह-वर्षीय परख-काल माँ के लिए किसी बल-परीक्षा से कम न रहा था|किन्तुसीढ़ी हाथ लगते ही मेरे पिता को माँ बेमेल लगने लगी थीं|
माँ को उन्होंने फिर ज़्यादा देर भ्रम में न रखा| उसी वर्ष अपने कॉलेज में पढ़ाने आयी एक नयी लेक्चरर से अपनी शादी रचा ली और माँ को अपनी विपत्ति काटने के लिए नानी के पास भेज दिया| बढ़ रही माँ की बड़बड़ाहटों का हवाला दे कर|

हरजाने की एवज़ में माँ ने मेरे पिता से मेरी पढ़ाई का बीड़ा उठाने की मांग रखी थी|जानती रही थीं उनके गरीब मायके पर मेरी पढ़ाई अधूरी रह जाती जब कि मेरे पिता के घर पर एक साथ दो बड़ी तनख्वाहों के आने से मेरी पढ़ाई सही ही नहीं, बल्कि उत्तम दिशा में आगे बढ़ने कीसम्भावना रखती थी|
किन्तु माँ का और मेरा सपना पूरा क्या हुआ, हम दोनों पर मानो एक साथ फिर पहाड़ टूटा|
शुरू के तीन-चार महीने ज़रूर चुटकी में निकल लिए थे| तैंतालीस वर्ष में बुढ़ा आयी माँ को ब्यूटी पार्लर, हेल्थ सेन्टर व बुटीक के बल पर स्वरुप देने में सफल रही थी और माँ स्वयं भी अति प्रसन्न थीं|
हमारी भाव समाधि टूटी राखी के दिन|

“अपने भाइयों को राखी नहीं बांधोगी?” मेरेपिता अपने दूसरे परिवार के साथ उसदिन हमारे घर पर आ टपके|
“क्यों नहीं?” मैं खिसिया गयी|

जब से नौकरी के सिलसिले में मैंने अपना शहर बदला था, अपने पिता के साथ मेरा सम्पर्क टूट गया था|मेरे कॉलेज के पते पर उन्होंने मेरे नाम दो पत्र भेजे भी थे, किन्तु मैंने उन्हें निरुत्तर रहने दिया था|

“आप हमें बहुत याद आती हो, जीजी,” बड़े ने मेरा दुपट्टा खींचा| वह बहुत नटखट था, अपने उस चौदहवें वर्ष में|
“हाँ, बेटी,” मेरे पिता की आँखों के कोर भीगे|

जब तक मैं उधर रही, मेरे पिता ने अपने स्नेह-वृत्त के भीतर अपने दूसरे परिवार ही को रखा था, मुझे कभी नहीं| मैं सदैव एक स्पर्श-रेखा सी वृत्त के बाहर ही रहती रही थी,किन्तु उस दिन पिता की भर आयी आँखें देख कर मेरा दिल पसीज गया और मैं रोने लगी|
“चल, बस कर,” मेरी सौतेली माँ मेरे साथ सदैव औपचारिक व संयत व्यवहारही प्रयोग में लाती थी, “ले, तेरे लिए यह कपड़े और मिठाई लाए हैं|”

“आप भी हमें कुछ दोगी, जीजी?” दस-वर्षीय छोटा लाड़ से मेरी बांह पर झूल गया|
“हाँ, हाँ, क्यों नहीं?” उस दिन महीने की दो तारीख थी और मेरी एक पूरी तनख्वाह मेरे पर्स में ज्यों की त्यों धरी थी, “तुम जो कहोगे मैं सब ले दूँगी.....”
“इन्हें बाज़ार कहाँ ले जाती फिरोगी?” सौतेली माँ ने मुझे टोक दिया, “आज हमें लौटना भी तो है| तुम मुझे कैश दे देना| इन्हें मैं उधर से इन का मनपसन्द सामान दिला दूँगी.....”
अपने पर्स से मैं पांच हज़ार रुपए तत्काल निकाल लायी|

“तुम्हें एक महीने में कितने रुपए मिलते हैं जीजी?” बड़े ने फिर मेरा दुपट्टा खींचा|
जभी अपने कमरे में छिपी बैठी माँ की बड़बड़ाहटबाहरचली आयी, “इधर मैंने सुखचखा नहीं कि ये अपना हक जताने चले आए| तेरी पढ़ाई की खातिर भूख काटी मैंने, बेआरामी सही मैंने, और मलाई चाटने आ धमके ये सौतेले!”

“अपनी माँ को तू अपने पास रखे है क्या?” मेरे पिता ने चौंक कर पूछा|

“जी,” मैंहड़बड़ा गयी|
“उसे पास रखे हो तो पागलखाने के किसी डॉक्टर का टेलीफ़ोन नम्बर भी पास रखे रहो| न मालूम कब वह पगलैट बेकाबू हो कर तुम्हें ही कोई नुकसान पहुँचा दे!” मेरे पिता ने चिन्ता जतलायी|
“नहीं, नहीं, वह ठीक हैं,” जब से माँ मेरे पास आन ठहरी थीं, मुझे उन से कोई शिकायत नहीं रही थी|

“वह छोड़िए,” सौतेली माँ बाथरूम के बहाने मुझे अकेले में ले गयीं, “मुझे ज़रा उधर जाना है.....”
“पीले बंगले वाला त्रिलोक अकसर घर पर आता है,” वह मेरे कान में फुसफुसायीं, “लगता है तुम से शादी करने पर ही दम लेगा.....”
“ऐसी तो कोई बात न रही.....” त्रिलोक एम. ए. में मेरासहपाठी रह चुका था और उसकी धनाढ्यता के चर्चे सुनने में आते रहते थे|
“पर शादी तो तू करेगी ही न! और फिर हम तेरी शादी की न सोचेंगे तो कौन सोचेगा? त्रिलोक में बुराई तो कोई है नहीं|अपनी जात-बिरादरी का है, पैसे वाला है, रोबदार है, और हमें क्या चाहिए?तू कहे तो तेरे पापा जी से कह कर बात चलाऊँ?”
“ठीक है,” मैंने अपनी सहमति दे दी|
“बढ़िया,” सौतेली माँ ने ताली बजा दी| जब भी वह उल्लासित होती, अपनी हीं-हीं के साथ ताली ज़रूर बजाती|


“वे पांच हज़ार तू मंदिर चढ़ा आती, उन्हें क्यों दिए?” उनलोगों के जाते ही माँ चीख पड़ीं, “वे तेरे सगे कभी नहीं हो सकते| मैं उन्हें जानती हूँ, तुम नहीं.....”
“वे इतने बुरे नहीं हैं,” मैं माँ पर पहली बार बरसी, “आखिर मेरी पढ़ाई पर पैसा तो उन्हीं का लगा| बदले में अगर थोड़ा-बहुत उनके बच्चों को दे भी दिया तो क्या हुआ? रोज़ तो वह आएँगे नहीं.....”
“मुँह में खून लग जाए तो आदमी दोबारा शिकार करने ज़रूर आता है| देख लेना तुझे चूना लगाने वे जल्दी ही आएँगे.....”
माँ का अनुमान सही निकला| अगले महीने की चार तारीख को मेरी सौतेली माँ अपने दोनों लड़कों के साथ फिर मेरे घर आ पहुँची|

“इस बार त्रिलोक तुझे पूछने आया तो तेरे पापाजी ने उसे अन्दर बुला लिया| उम्दा चाय-नाश्ता कराया| लगता है दो तीन मुलाकातें और हुईं नहीं कि बात पक्की बनी नहीं,” सौतेली माँ ने मेरी पीठ थपथपायी|
दोनोंलड़कों ने उस बार भी मेरे साथ बहुत लाड़-मनुहार दिखाया और मेरे पांच हज़ार फिर उनकी भेंट चढ़ गए|
तीसरी बार सौतेली माँ अकेली आयीं, “बहन की शादी के इस कार्ड के साथ त्रिलोक ने तेरे लिए यह मिठाई भी भेजी है| बोला, उसे शादी में ज़रूर आना है, वरना मेरा दिल टूट जाएगा|”
मगर जैसे ही सौतेली माँ गेट से बाहर हुईं माँ ने कार्ड फाड़ कर कूड़ेदान में फेंक दिया और मिठाई का डिब्बा खोले बगैर मकान-मालकिन को सौंप दिया, “उस शहर से तेरे जाने का मकसद अब ख़त्म हो चुका है| उस शहर से अब हमें कोई वास्ता नहीं रखना|” उन्हें सौतेली माँ की मंशा की भनक लग चुकी थी और वह किसी भी सूरत में मेरी शादी के लिए राज़ी होने के लिए तैयार न थीं|
“त्रिलोक को मैं जानती हूँ,” मैंने फटा हुआ कार्ड कूड़ेदान से उठा लिया, “वह बहुत भला लड़का है.....”
माँ ने कार्ड मेरे हाथ से छीना और उसके छोटे छोटे टुकड़े कर डाले, “जबमैंने कह दिया हमें उस शहर से वास्ता नहीं रखना तो बस नहीं रखना.....”
“तुम्हें वास्ता नहीं रखना तो तुम वापस जा सकती हो|” मैं आपे से बाहर हो ली, “मगर मुझे तो उस शहर से भी वास्ता रखना है और त्रिलोक से भी.....”
“तो मैं काहे को यहाँ पड़ी हूँ? ऐसा ही है तो फिर मुझे भी तुझ से वास्ता नहीं रखना,” और माँ अपनी चप्पल पहन कर इसी मंदिर की ओर लपक ली थीं|
तदनन्तर जब जब माँ मंदिर में जा बैठतीं, माँ को मानसिक अस्पताल के डॉक्टर के पास मुझे ले जाना ही पड़ता|
“पहले मेरे भाइयों को सिखा-पढ़ा कर तेरे बाप ने पागलखाने में मेरी आवाजाही चालू रखी, अब तुझे भड़का कर मुझे हमेशा के लिए पागलखानेमें फिकवा देगा,” हर बार माँ काँप-काँप जातीं|


अस्पताल में माँ के दाखिले की सूचना मिलते ही मेरे पिता मेरी सौतेली माँ के साथ मेरे पास भागे आए|
“बहुत अच्छा किया, बेटी,” उन्होंने मुझे शाबाशी दी, “समय रहते उसे ठिकाने पर पहुँचा दिया वरना यह पागल लोग तो खून-खराबे पर उतर आते हैं.....”
सौतेली माँ को जब मैंने लगातार मुझसे अपनी आँखें चुराते हुए देखा तो मैं उन्हें ओट में ले गयी|
“बात क्या है?” मैंने पूछा, “इस बार आपने उधर का कोई समाचार नहीं दिया?”

कहानी -स्पर्श रेखाएं


“क्या बताऊँ?” सौतेली माँ मेरी पीठ थपथपाने लगीं, “जब से त्रिलोक की माँ को तुम्हारी माँ के पागलपन की खबर लगी है, वह डर गयी है| लगता है यह रिश्ता अब हाथ से निकल जाएगा|”
“मगर उन लोगों को माँ के बारे में बताने की क्या ज़रुरत थी?” मैंने अपना एतराज़ जतलाया, “माँ हमेशा के लिए थोड़े न पागलखाने गयी हैं| ठीक होकर जल्दी ही लौट आएंगी|”
“तू अभी बच्ची है| नहीं जानती, पागल कभी ठीक नहीं होते| जहाँ उन्हें किसी की बात मन-माफ़िक नहीं लगती, वहीं उनका पागलपन फिर अपना सिर उठा लेता है.....”
“ऐसे में तो भेद बनाए रखना और भी ज़रूरी था,” मैं क्षुब्ध हो ली|

“क्या बताऊँ?” सौतेली माँ ने मेरी पीठ फिर थपथपा दी, “ऐसे भेद छिपाए नहीं छिपते| पागलपन की बीमारी ही ऐसी कमबख्त बीमारी है..... जब माँ को लगती है तो फिर यक़ीनन उसके बच्चों पर भी अपनी बारी बाँध लेती है| कल को उधर अपनी ससुराल मेंकिसी बात केमन-माफ़िक न रहने पर कहीं यह बीमारी तुझे धर लेती तो वे लोग तो मुझी को दोष देते| कहते, मैंने उन्हें अँधेरे में रखा.....”


उसी रात सौतेली माँ का वहम अमल में आया| हूबहू माँ की तरह मैंने पहले अपने बाल नोचे, फिरअपने कपड़े फाड़े और उसके बाद दीवार से सिर टकरा कर देर तक चिल्लायी, “यह दुख सहना मुश्किल है| पिछले दुख इस उम्मीद पर कट गए थे कि आगे सुख आने वाले हैं, मगर इस बार कोई उम्मीद नहीं.....”

कहानी -स्पर्श रेखाएं


मेरे लिए भी माँ के अस्पताल से एम्बुलेंस मेरी मकान-मालकिन ही ने मँगवायी|

लेखिका -दीपक शर्मा
निकट -मई -अगस्त २०१६ में प्रकाशित


                                               
लेखिका -दीपक शर्मा



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समीक्षा -कुछ अनकहा सा -स्त्री जीवन के कुछ अव्यक्त दस्तावेज




बातें , बातें और बातें ...दिन भर हम सब कितना बोलते रहते हैं ...पर क्या हम वो बोल पाते हैं हैं जो बोलना चाहते हैं | कई बार बार शब्दों के इन समूहों के बीच में वो दर्द छिपे रहते हैं हैं जो हमारे सीने में दबे होते हैं क्योंकि उनको सुनने वाला कोई नहीं होता या फिर कई बार उन शब्दों को कह पाना हमारी हिम्मत की परीक्षा लेता है , आसान नहीं होता अपने बाहरी समाज स्वीकृत रूप के आवरण के तले अपने मन में छुपी उस  नितांत निजी पहचान को खोलना जिसको हम खुद भी नहीं देखना चाहते ...शायद इसी लिए रह जाता है बहुत कुछ अनकहा सा ..और इसी अनकहे  को शब्द देने की कोशिश की है कुसुम पालीवाल जी ने अपने कहानी संग्रह " कुछ अनकहा सा " में | जिसमें अनकहा केवल दर्द ही नहीं है प्रेम , समर्पण की वो भावनाएं भी हैं जिनको व्यक्त करने में शब्द बौने पड़ जाते हैं | इस संग्रह की ज्यादातर कहानियाँ स्त्री पात्रों के इर्द -गिर्द घूमती हैं | यह संग्रह किसी स्त्री विमर्श के साहित्यिक ढांचे से प्रेरित नहीं है , लेकिन धीरे से स्त्री जीवन की समस्याओं की कई परते खोल देता है ...जो ये सोचने पर विवश करती हैं कि इस दिशा में अभी बहुत काम किया जाना बाकी है |  कुसुम जी के कई काव्य संग्रह  पाठकों द्वारा पसंद किये जा चुके हैं ये उनका पहला कहानी संग्रह है | जाहिर है उनको इस पर भी पाठकों की प्रतिक्रियाएं व् स्नेह मिल रहा होगा | इस संग्रह को पढने के बाद मैंने भी इस अनकहे  पर कुछ कहने का मन बनाया है ....


कुछ अनकहा सा -स्त्री जीवन के कुछ अव्यक्त दस्तावेज 




"गूँज" इस संग्रह की पहली कहानी है | ये गरीब माता -पिता की उस बेटी की कहानी है  जिसकी पढाई बीच में रोक कर उसकी शादी कर दी जाती है | पिता शुरू में तो अपनी बेटी की शिक्षा में साथ देते हैं फिर उसी सामाजिक दवाब में आ जाते हैं जिसमें आकर ना जाने कितने पिता अपनी बेटियों की कच्ची उम्र  में शादी कर देते हैं कि पता नहीं कब अच्छा लड़का मिले | अपने ऋण से उऋण होने की जल्दी बेटी के सपनों पर कितनी भारी पड़ती है इसका उन्हें अंदाजा भी नहीं होता | यही हाल सरोज का भी है जो अपने सपनों को मन के बक्से में कैद करके कर्तव्यों की गठरी उठा कर ससुराल चली आती हैं | आम लड़कियों और सरोज में फर्क बस इतना है कि उसके पास माँ की शिक्षा की वो थाती है जो आम लड़कियों को नसीब नहीं होती | उसकी माँ ने विदा होते समय  चावल के दानों के साथ उसके आँचल के छोर में ये वाक्य भी बाँध दिए थे कि ,

" बेटा अपना अपमान मत होने देना , मर्द जाति  का हाथ एक बार उठ जाता हैं तो बार -बार उठता हैं तो बार -बार उठता है और इस तरह औरत का समूचा अस्तित्व ही खतरे में आ जाता हैं |" 

अपने आस -पास देखिये , कितनी माएं हैं जो ऐसी शिक्षा अपनी बेटी को देती हैं | ये सरोज की थाती है | शराबी पति , धीरे -धीरे बिकती जमीन , हाथ में कलम के स्थान पर गोबर कंडा पाथना और घर और बच्चों की परवरिश के लिए दूसरों के घर जाकर सफाई -बर्तन करना , सरोज हर जुल्म बर्दाश्त करती हैं | लेकिन जब एक दिन उसका पति उस पर हाथ उठाता  है, तो   ....अपने शराबी पति के लिए किये गए सारे त्याग समर्पण भूल कर एक झन्नाटेदार तमाचा उसे भी मारती है | ये गूँज उसी तमाचे की है .... जिसकी आवाज़ उसकी छोटी से झुग्गी के चारों ओर फ़ैल जाती है |

ये कहानी घरेलु हिंसा के खिलाफ स्त्री के सशक्त हो कर खड़े होने की वकालत करती है | अमीर हो , गरीब हो , हमारा देश हो या अमेरिका हर जगह पुरुष द्वारा स्त्री के पिटने की काली दास्तानें हैं | कितनी सशक्त महिलाएं बरसों बाद जब अपने पति से अलग हुई तो उन्होंने भी इस राज का खुलासा किया कि वो अपने पति से रोज पिटती थीं | आखिर क्या है जो महिलाएं ऐसे रिश्ते में रहती हैं ... पिटती हैं और आँसूं बहाती  हैं | हो सकता है हर स्त्री का पति सरोज के पति की तरह शराब से खोखले हुए शरीर वाला न हो और वो उस पर हाथ ना उठा सके पर पर अन्याय के खिलाफ पहले दिन से ही वो घर के बाहर आ कर खुल कर बोल सकती है | और शब्दों के इस थप्पड़ की गूँज भी कम नहीं होगी |


"कुछ अनकहा सा"   कहानी एक रेप विक्टिम की कहानी है | कहानी लम्बी है और कई मोड़ों से गुज़रती है | कहीं -कहीं हल्का सा तारतम्य टूटता है जिसे कुसुम जी  फिर साध ले जाती हैं | कहानी एक अनाथ बच्ची नर्गिस की है , जिसे उसका शराबी चाचा फरजाना बी को घरेलु काम करवाने के लिए बेंच देता है | उस समय नर्गिस की उम्र मात्र नौ साल होती   है | फरजाना बी एक समाज -सेविका हैं उनके तीन बेटे हैं सलीम , कलीम और नदीम | जिन्हें नर्गिस भाईजान कहती और समझती है | अपने कार्यकौशल से सबका ल जीतते हुए नर्गिस उस घर में   है ... और   साथ ही बड़ी होती है जाती है उसकी अप्रतिम सुंदरता जो तीनों बेटों के लिए आकर्षण का केंद्र हैं | एक  दिन बड़ा बेटा उसे अकेले में दबोच  लेता है | अपनी लुटी हुई इज्ज़त और टूटे मन  साथ जब वो फरजाना बी का सामना करती है तो वो उसे देख कर भी अनदेखा करती है | यहीं से दूसरे भाई को भी शह मिलती है और दोनों भाई जब -तब उसका उपभोग करने लगते हैं | रोज़ -रोज़ होते इन हमलों से खौफजदा बच्ची जो कभी कश्मीरी सेब सी थी  जाती है |


ऐसे में तीसरा भाई नदीम मसीहा बन कर आता है और उससे निकाह का प्रस्ताव रख देता है | नदीम सिर्फ उसके शरीर को ही नहीं भोगना चाहता  उससे प्रेम भी करता है | यहीं  नर्गिस की जिन्दगी  फिर से बहार आती है | नर्गिस से निकाह कर वो उसे ले अलीगढ में बस जाता है ताकि उसके भाइयों का साया भी नर्गिस पर ना पड़े | अपना घर , जायदाद छोड़ कर आया हुआ नदीम एक कंपनी में काम करते हुए कभी खुद का व्यापार खड़ा करने  सपना देखता है , परन्तु  एक के बाद   बेटियों होने , परिवार के खर्चे बढ़ने से वो     अठन्नी खर्चा रुपईया के फेर में पड़  जाता हैं | नर्गिस को  बाहर काम पर जाने देना नहीं चाहता | उसकी निराशा कुंठा दोनों के बीच बढ़ते झगड़ों की वजह बनती जा रही थी |

ऐसे में एक दिन नदीम अलीगढ छोड़ वापस अपने घर में अपने परिवार के साथ रहने का फैसला करता है | यहीं पर नर्गिस  दिल बैठ जाता है अब उसे अपनी फ़िक्र से कहीं ज्यादा अपनी बड़ी होती तीनों बेटियों की फ़िक्र है जो संभवत : उन दो भाइयों द्वारा दबोच ली जायेंगी |


अपनी बेटियों के हक़ में वो नदीम से अलग होने का फैसला करती है और चुपचाप बेटियों को लेकर दूर चली जाती है | उसे विश्वास है कि वो अपने इन अनकहे  दर्दों को अपनी बेटियों को समझा पाएगी... और अपनी बेटियों की जिन्दगी इस तरह से संवारेगी कि उनकी जिन्दगी में कोई दर्द ना हो |


पूरी कहानी  "सैड मोड " में चलती है | एक भारीपन का अहसास होता है | असली जिंदगी में भी तो अनाथ ,  रेप विक्टिम का दुःख के इस दरिया से निकलना आसान नहीं होता | कहानी बीच में थोडा सा खिचती है पर एक स्त्री के संघर्ष की राह को चुनने और अपनी बच्चियों को बेहतर भविष्य देने के सपने के साथ एक सार्थक अंत पर समाप्त होती है  |

"भीखू "कहानी अटूट बंधन में प्रकाशित हो चुकी है | आप चाहें तो इस लिंक पर पढ़ सकते हैं | ये कहानी भी एक शराबी पुरुष की है , जो शराब की लत में अपने घर -परिवार सब से बेखबर धुत्त रहता है | घर में खाने पीने के लाले पड़ने पर उसकी पत्नी अपनी जवान होती बेटी को जमींदार की पत्नी की सेवा के लिए सौंप देती हैं |  हालांकि उसे पता होता है कि उसे जमींदार की जरूरी , गैर जरूरी इच्छाओं का पालन करना पड़ेगा पर  पति के इलाज के लिए अपनी बेटी को इस कीचड में उतार देती है | दर्द से सूखती बेटी और माँ का वार्तालाप सुन कर भीखू का आत्मसम्मान जागता है और वह शराब छोड़ कर अपने परिवार के भरण -पोषण का संकल्प लेता है |


कहानी छोटी है पर इसमें शराबी व्यक्ति के परिवार के उस खौफ  और दर्द को दिखाया गया है जिसको वो भोगता है | शराब की लत केवल एक व्यक्ति को नहीं खाती पूरे परिवार को लीलती है | काश हर शराबी व्यक्ति को अपने परिवार की ये पीड़ा दिखाई दे और उसका आत्मसम्मान जगे |

सरप्राइज़ " इन भारी भरकम कहानियों के बीच में एक नाजुक सी कहानी है जो करवाचौथ के दिन पति के अचानक से आ कर सरप्राइज देने पर आधारित है |कहानी एक मीठा सा अहसास देती है |


"अफोर्ड "कहानी बढ़ती आकांक्षाओ को ओफोर्ड करने की ख्वाइश में कार्ल  गर्ल बनी लड़की की कहानी है | इस रास्ते पर चल कर वो बहुत सी दौलत कमाती है और बहुत कुछ अफोर्ड करने लगती है जो उसकी उम्र व् समकक्ष नौकरी की लडकियां नहीं कर पाती |  एक गलत रास्ते पर पड़ने के बाद उसे अहसास होता है कि यहाँ सब उसकी देह के भूखे हैं, और तभी कामना जागती है कि कोई तो उसके जीवन में हो जो उसके कोमल मन और भावनाओं को अफोर्ड कर सके | तब उसका दोस्त आमिर हाथ बढ़ाता है | कहानी का सुखद अंत सुकून देता है पर हकीकत में इतनी भाग्यशाली लडकियां नहीं होती और एक बार इस दलदल में गिर कर उबर नहीं पातीं |



" आत्म सम्मान " में एक बोल्ड विषय को उठाया गया है | ये कहानी स्त्री -पुरुष के संबंधों पर आधारित है | आम भारतीय घरों में आज भी जब पति  है तो स्त्री  खुद को समर्पित कर देती है पर जब पत्नी की इच्छा हो तो पति उसके आत्मसम्मान को कुचलने में कोई  गुरेज नहीं करता |

कहानी पति के अन्तरंग रिश्तों से परहेज करने पर  हैं | मधुमेह की बिमारी उसके शरीर को खोखला कर रही है और कहीं न कहीं उसे फेल हो जाने का डर है  इसलिए वो जब तब पत्नी की इच्छाओं को कुचलता रहता है , ना खुद पहल करता है ना पत्नी की पहल का समुचित उत्तर देता है | पत्नी के समझाने बुझाने पर वो डॉक्टर के पास जाता है , कुछ सामन्य भी होता है , फिर भी उसे असफल हो जाने का भय है ... इस लिए खुद की इच्छा और पत्नी की इच्छा में वो एक सपष्ट लकीर खींच देता है | बार -बार पत्नी खुद को अपमानित महसूस करती है |


कहानी में पत्नी का घरेलु सहायिका के साथ हुआ वार्तालाप स्त्री मन की कई परते खोलता है | ये एक ऐसा विषय है जिस पर आम तौर पर पत्नियां मौन रहती है ... पर इसका प्रभाव उनके पूरे व्यक्तित्व पर पड़ता है | वो लिखती हैं ...

" जिस औरत को अन्तरंग पलों में अपने पति का पूर्ण समर्पण मिलता है , उसका आत्मसम्मान अपनी नज़र में तो रहता ही है , साथ ही औरों को भी आत्मतुष्टि उसके चेहरे पर नज़र आ ही जाती है |" 



 लेखिका इस मनोदशा को व्यक्त करने केलिए अखबार की कटिंग का इस्तेमाल करती है ...

" पति को छोड़कर तीन बच्चों की माँ अपने प्रेमी संग फरार " और  आपसी संबंधों को ले कर पति -पत्नी में तलाक "


समाज बदल रहा है | ह्या, शर्म और भाग्य जैसे शब्दों की ओट से निकल कर पत्नियाँ इस विषय पर मुखर हो रही है और अपनी इच्छा और संतुष्टि की बात कर रही हैं | फिर भी बहुत से प्रश्न हैं जो अभी अनुत्तरित हैं |

"वो , एक कोठे वाली कहानी "छोटी है पर प्रभावशाली है | इसमें एक बच्ची जो मेले में अपने माता -पिता से बिछड कर कोठे में पहुंचा दी गयी थी उसकी नाथ उतराई के दिन आया  सेठ उसे बेटी के रूप में  अपना लेता  है क्योंकि एक एक्सीडेंट में उसकी पत्नी व् पुत्री की मृत्यु हो गयी थी | अपने दोस्त के अकेलापन दूर करने के उपाय स्वरुप कोठे आया वो सेठ उस बच्ची को देखकर भावुक हो जाता है और उसे अपनी बेटी के रूप में स्वीकार कर उस कोठे से आज़ादी दिला देता हैं | हालांकि कहानी में फ़िल्मी क्लीशे है फिर भी प्रभावित करती है |


क नज़र संग्रह की अन्य कहानियों पर डाले तो "लिव इन रिलेशन "कहानी ऐसे उन्मुक्त रिश्तों का विरोध करती है जहाँ अंत में स्त्री के हाथ कुछ नहीं आता | मान -सम्मान एक अधेढ़ वी की स्त्री के अपने जीवन में कुछ सकारात्मक करने की इच्छा के ऊपर है , जिसे पहले परिवार नकारता है बाद में साथ देता है | "दहेज़ रुपी दानव " दहेज़ की विभीषिका को दर्शाती है | " ये कैसी तन्हाई "लेखन में संघर्षरत स्त्रियों की दास्ताँ है | जिस संघर्ष में तो अमूमन उनका परिवार साथ नहीं देता ही है , सफलता के उत्सव में भी वो तन्हाँ ही रही है | कई लेखिकाएं इस विषय से अपने को जोड़ कर देख पाएंगी | "खुला आसमान  "भी संघर्षरत लेखिका के ऊपर ही है जो तानों उलाहनों से तंग आकर घर छोड़ने का फैसला करती है | मेरे विचार से ये कहानी थोडा सा विस्तार मांगती है |



और अंत में मैं ये कहना चाहूंगी कि ये कुसुम जी का पहला कहानी संग्रह है , जिसमें उन्होंने स्त्री जीवन से जुडी  तमाम समस्याओं को समेटने का प्रयास किया है | उनकी कहानियाँ समस्याएं उठाती ही नहीं है उनका एक हल , एक समाधान भी प्रस्तुत करती हैं |लिव इन . कॉल गर्ल , घरेलु हिंसा , अनाथ स्त्री , कोठे वाली स्त्री आदि आदि उन्होंने हर समस्या पर अपनी कलम चलायी है |  इस लिहाज से ये संग्रह स्त्री विमर्श को एक नयी दिशा देता हैं | जिसके लिए वो बधाई की पात्र हैं | सभी कहानियों के कथ्य प्रभावशाली हैं कुछ कहानियों में भावजगत को और उकेरने की आवश्यकता महसूस हुई | कहानियाँ " मैं" शैली में अच्छी लगती हैं |
एडिटिंग में कुछ त्रुटियाँ हैं पर इतनी नहीं की अखरे या कहानी के बहाव को प्रभावित करें | कुल मिला कर स्त्री सरोकारों से जुड़ा एक अच्छा पठनीय संग्रह है |


किताब गंज प्रकाशन से प्रकाशित इस संग्रह में कुल 14 कहानियाँ हैं | १२८ पेज के इस संग्रह में कवर पृष्ठ आकर्षक है |

कुछ अनकहा सा -कहानी संग्रह
लेखिका -कुसुम पालीवाल
पेज -128
मूल्य - 195
प्रकाशक -किताबगंज प्रकाशन

अमेज़न पर किताब आप इस लिंक से प्राप्त कर सकते हैं -कुछ अनकहा सा


वंदना बाजपेयी 

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अनुपमा गांगुली का चौथा प्यार -अनकहे रिश्तों के दर्द को उकेरती कहानियाँ "

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अँधेरे का मध्य बिंदु -लिव इन को आधार बना सच्चे संबंधों की पड़ताल करता उपन्यास





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चुनाव -2019-नए वोटर



आपने वोट डाला की नहीं ? चुनाव शुरू हो गए हैं ...इस महायज्ञ में एक दूसरे को उत्साहित करने वाले वाक्य अक्सर सुनाई देते रहेंगे, | सही भी है वोट डालना हमारा हक भी है और कर्तव्य भी | ज्यादातर लोग कर्तव्य समझ कर वोट डालते तो हैं पर किसी पार्टी के प्रति उनमें ख़ास लगाव या उत्साह नहीं रहता | एक उम्र आते -आते हमें नेताओं और उनके वादों पर विश्वास नहीं रह जाता , लेकिन जो पहली बार वोट डालने जाते हैं उनमें खासा उत्साह रहता है |और क्यों न हो दुनिया में हर पहली चीज ख़ास ही होती है , पहली बारिश , पहला साल , पहला स्कूल , पहला प्यार और .... पहली बार वोट डालना भी |

नए -नए वोटर 


जब आप ये पढ़ रहे होंगे तो जरूर आप को भी वो दिन याद आ गया होगा जब आपने पहली बार वोट डाला होगा और हाथों में नीली स्याही के निशान को दिन में कई बार गर्व से देखा होगा, कितना खास होता है ये अहसास ...देश का एक नागरिक होने का अहसास , अपने हक़ का अहसास , कर्तव्य  का अहसास और साथ ही साथ इस बात का गर्व भी कि आप भी अपने सपनों के भारत के निर्माता बनने में योगदान कर सकते हैं | पहली बार वोट डालना उम्र का वो दौर होता है जब यूँ भी जिन्दगी में बहुत परिवर्तन हो रहे होते हैं | अभी कुछ साल पहले तक ही तो  फ्रॉक और बेतरतीब बालों में घूमती  लडकियाँ आइना देखना शुरू करती हैं और लड़के अपनी मूंछो की रेखा पर इतराना ....उस पर ये नयी जिम्मेदारी ...बड़ा होना  कितना सुखद लगता है |


उनका उत्साह  देखकर मुझे उस समय की याद आ जाती है जब हमारे बड़े भैया को पहली बार वोट डालने जाना था | महीनों पहले से वो हद से ज्यादा उत्साहित थे | क्योंकि हम लोगों की उम्र में अंतर ज्यादा था , ऊपर से उनका बात -बात में चिढाने का स्वाभाव ,अक्सर हम लोगों को चिढ़ाया करते , " हम इस देश के नागरिक हैं , हम सरकार बदल सकते हैं ... और तुम लोग ... तुम लोग तो अभी छोटे हो , जो सरकार होगी वो झेलनी ही पड़ेगी | यूँ तो भाई -बहन में नोक -झोंक होती ही रहती है पर इस मामले में तो ये सीधा एक तरफ़ा थी | कभी -कभी तो वो इतना चिढाते कि हम बहनों में बहुत हीन भावना आ जाती , लगता बड़े भैया ही सब कुछ है , क्योंकि वो बड़े हैं , इसलिए घर में भी उन्हीं की चलती है और अब तो देश में भी उन्हीं की चलेगी ....हम लोग तो कुछ हैं ही नहीं | कई बार रोते हुए माँ के पास पहुँचते , और माँ , अपना झगडा खुद ही सुलझाओ कह कर डांट कर भगा देतीं |

और हम दोनों बहनें अपनी इज्जत का टोकरा उठा कर मुँह लटकाए हुए वापस भैया द्वारा चिढाये जाने को विवश हो जाते |


वोट डालने के दो दिन पहले से तो उनका उत्साह उनके सर चढ़ कर बोलने लगा | नियत दिन सुबह जल्दी उठे , थोडा रुतबा जताने के लिए हम लोगों को भी तकिया खींच -खींच कर उठा दिया | हम अलसाई आँखों से देश के इस महान नागरिक को वोट देने जाते हुए देख रहे थे | भैया नहा - धोकर तैयार हुए , उन्होंने बालों में अच्छा खासा तेल लगाया , आखिरकार देश के संभ्रांत नागरिक की जुल्फे उडनी नहीं चाहिए , हमेशा सेंट से परहेज  करने वाले भैया ने थोडा सा से सेंट  भी लगाया , हम अधिकारविहीन लोग मुँह में रात के खाने की गंध भरे उनके इस रूप  से अभिभूत हो रहे थे |

 सुबह से ही वो कई बार घडी देख कर बेचैन हो रहे थे |  एक एक पल बरसों का लग रहा था , शायद इतना इंतज़ार तो किसी प्रेमी ने अपनी प्रेमिका से मिलने का भी न किया हो | वो तो अल सुबह ही निकल जाते पर पिताजी        बार -बार रोक  रहे थे , अरे वोटिंग शुरू तो होने दो तब जाना | घर में  तो पिताजी की ही सरकार थी इसलिए उन्हें मानने की मजबूरी थी  |  फिर भी वो माँ -पिताजी के साथ ना जाकर सबसे पहले ही डालने गए |


उस समय सभी पार्टी के कार्यकर्ता अपनी -अपनी टेबल लगा कर पर्ची काट कर देते थे , जिसमें टी एल सी नंबर होता था ताकि लोगों को वोट देने में आसानी हो |  अंदाजा ये लगाया जाता था कि जो जिस पार्टी से पर्ची कटवाएगा वो उसी को वोट देगा .... इसी आधार पर एग्जिट पोल का सर्वे रिपोर्ट आती थी | वो कोंग्रेस का समय था ... ज्यादातर लोग उसे को वोट देते थे | भैया को भी वोट तो कोंग्रेस को ही देना था पर अपना दिमाग लगते हुए उन्होंने बीजेपी की टेबल से पर्ची कटवाई | ताकि किसी को पता ना चले कि वो वोट किसको दे रहे हैं | आपका का मत गुप्त रहना चाहिए ना ?

उस समय छोटी सी लाइन थी , जल्दी नंबर  आ गया |

पर ये क्या ? उनका वोट तो कोई पहले ही डाल गया था | उन्होंने बार -बार चेक करवाया पर वोट तो डल ही चुका था | भैया की मायूसी  देख कर वहां मुहल्ले के एक बुजुर्ग ने सलाह दी , तुम दुखी  ना हो, चलो तुम किसी और के नाम का वोट डाल दो  , मैं बात कर लूँगा | फिर थोडा रुक कर बोले ," पर्ची तो तुमने बीजेपी से ही कटवाई है पर वोट तुम कोंग्रेस को ही देना ... पूरा मुहल्ला दे रहा है |"


भैया ने तुरंत मना  कर दिया ," नहीं , फिर जैसे मैं दुखी हो रहा हूँ कोई और भी दुखी होगा ... और क्या पता वो किसी और पार्टी को वोट देना चाहता हो | कोई बात नहीं मैं अगली बार मताधिकार का प्रयोग कर लूँगा पर देश के द्वारा दिए गए इस अधिकार का  दुरप्रयोग  नहीं करूँगा |"

वो बुजुर्ग उनकी बात कर हंस कर बोले , " नए -नए वोटर हो ना !"


 भैया हाथ पर नीली स्याही का निशान लगवाये हुए घर लौट आये | काफी देर उदास बैठे रहे | मन पर  एक गहरा धक्का लगा था | वो धक्का केवल इस बात का नहीं था कि वो वोट नहीं डाल पाए ... वो धक्का पूरे सिस्टम पर विश्वास उठने से था | पूरा मुहल्ला जब किसी एक पार्टी को जिताने पर लग जाता है तो कितनी मुश्किल होती है एक आम आदमी के लिए जो अपनी मर्जी की सरकार  चुनना चाहता है |


हम सब लोग जो अभी तक बड़े भैया से नाराज़ थे और  थोड़ी -बहुत इर्ष्या भी कर रहे थे , एकदम से पसीज गए | हम सब ने भैया को घेर लिया और कहा ," आप के साथ गलत हुआ पर आपने गलत काम ना करके एक सच्चे नागरिक होने का फर्ज अदा  किया , हमें आप पर गर्व है |"

जवाब में भैया ने अपनी बिना स्याही लगी अंगुली दिखयी और हम सब हँस पड़े |

आज वैसे बलेट पेपर पर वोट नहीं डाले जाते न ही पोखरों में लोगों द्वारा चुने व्यक्ति के मतपत्रों से भरे पूरे  ट्रक डुबो कर फर्जी मतपत्र गड़ना के लिए भेजे जाते हैं | ये सही है कि ई वी एम में अपनी त्रुटियाँ हैं | पर ऐसा कोई समय नहीं था जब हेर -फेर या त्रुटियाँ ना हो रही हूँ | जरूरी है अपने अधिकार को समझने की , सही फैसला लेने की , भैया की तरह गलत में साथ ना देने की और भैया से भी एक कदम आगे बढ़कर गलत की शिकायत करने की |

ये हमारा देश है और हम सब को स नीली स्याही के रूप में अपने अधिकारों और कर्तव्यों का सही प्रयोग करना है |अपने देश के सपनों में साझीदार बनने जा रहे नए -बाये वोटरों को हार्दिक शुभकामनाएं |


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दैनिक जागरण बेस्ट सेलर की सूची में शामिल "अनुपमा गांगुली का चौथा प्यार " के बारे में में जब मुझे पता चला तो मेरी पहली प्रतिक्रिया यही रही कि ये भी कोई नाम है रखने के लिए , ये तो प्रेम की शुचिता के खिलाफ है | फिर लगा शायद नाम कुछ अलग हट कर है , युवाओं को आकर्षित कर सकता है , आजकल ऐसे बड़े -बड़े नामों का चलन है , इसलिए रखा होगा | लेकिन जब मैं किताब पढना शुरू किया तो मुझे पता चला कि लेखिका विजयश्री तनवीर जी भी इस  कहानी संग्रह का नाम रखते समय ऐसी ही उलझन  से गुजरी थीं | वो लिखती हैं ,

"मैंने सोचा और खूब सोचा और पाया कि बार -बार हो जाना ही तो प्यार का दस्तूर है | यह चौथी , बारहवीं , बीसवीं और चालीसवीं बार भी हो सकता है ...प्रेम की क्षुधा पेट की क्षुधा से किसी दर्जा कम नहीं है |"


जैसे -जैसे संग्रह की कहानियाँ पढ़ते जाते हैं उनकी बात और स्पष्ट , और गहरी और प्रासंगिक लगने लगती है , और अन्तत:पाठक भी इस नाम पर सहमत हो ही जाता है |

इस संग्रह में नौ कहानियाँ हैं | ज्यादातर कहानियाँ विवाहेतर रिश्तों पर हैं | जहाँ प्यार में पड़ने , टूटने बिखरने और दोबारा प्यार में पड़ जाने पर हैं | देखा जाए तो ये आज के युवाओं की कहानियाँ हैं , जो आज के जीवन का प्रतिनिधित्व करती हैं |


अनुपमा गांगुली का चौथा प्यार -अनकहे रिश्तों के दर्द को उकेरती कहानियाँ 


" अनुपमा गांगुली का चौथा प्यार " भी एक ऐसी ही कहानी है | अनुपमा गांगुली  अपने दुधमुहे बच्चे के साथ रोज  कोलकाता  लोकल का लंबा  सफ़र तय कर उस दुकान पर पहुँचती है जहाँ वो सेल्स गर्ल है | कोलकाता  की महंगाई से निपटने के लिए उसका पति एक वर्ष के लिए पैसे कमाने बाहर चला जाता है | अकेली अनुपमा इस बीच बच्चे को जन्म देती है , उसे पालती है और अपनी नौकरी भी संभालती है | इसी बीच उसके जीवन में एक ऐसे युवक का प्रवेश होता है जो कोलकाता    की लोकल की भरी भीड़ के बीच अपने बच्चे को संभालती उस हैरान -परेशां माँ की थोड़ी मदद कर देता है | अनुपमा उस मदद को प्रेम  या आकर्षण समझने लगती है | उसके जीवन में एक नयी उमंग आती है , काम पर जाने की बोरियत आकर्षण में बदलती है , कपड़े -लत्तों और श्रृंगार पर ध्यान जाने लगता है , उदास मन को एक मासूम  सा झुनझुना मिल जाता है , जिसके बजने से जिन्दगी की लोकल तमाम परेशानियों के बीच सरपट भागने लगती है | जैसा कि पाठकों को उम्मीद थी ( अनुपमा को नहीं ) उसका ये प्यार ...यहाँ पर सुंदर सपना कहना ज्यादा मुफीद होगा टूट जाता है | ये अनुपमा का चौथा प्यार था और इसका हश्र भी वही हुआ जो उसके पति के मिलने से पहले हुए दो प्रेम प्रसंगों का हुआ था | जाहिर है अनुपमा खुद को संभाल लेगी और किसी पाँचवे प्यार् को ढूंढ ही लेगी ....कुछ दिनों तक के  लिए ही सही |


वैसे जीवन में घटने छोटे -छोटे आकर्षणों को प्यार ना कह कर क्रश के तौर पर भी देखा जा सकता है , हालांकि क्रश में अगले के द्वारा पसंद किये जाने न किये जाने का ना तो कोई भ्रम होता है न इच्छा | इस हिसाब से " अनुपमा गांगुली का चौथा प्यार " नाम सही ही है | इस मासूम सी कहानी में मानव मन का एक गहरा मनोविज्ञान छिपा है | पहला तो ये कि व्यक्ति की नज़र में खुद की कीमत तब बढती है जब उसे लगता है कि वो किसी के लिए खास है | जब ये खास होने का अहसास वैवाहिक रिश्ते में नहीं मिलने लगता है तो मन का पंछी इसे किसी और डाल पर तलाशने लगता है | भले ही वो इस अहसास की परिणिति विवाह या किसी अन्य  रिश्ते में ना चाहता हो पर ये अहसास उसे खुद पर नाज़ करने की एक बड़ी वजह बनता है | कई बार तो ऐसे रिश्तों में ठीक से चेहरा भी नहीं देखा जाता है , बस कोई हमें खास समझता है का अहसास ही काफी होता है | ये एक झुनझुना है जो जीवन की तमाम परेशानियों से जूझते मन रूपी बच्चे के  थोड़ी देर मुस्कुराने का सबब बनता है | ऐसे रिश्तों की उम्र छोटी होती है और अंत दुखद फिर भी ये रिश्ते  मन के आकाश में बादलों की तरह बार -बार बनते बिगड़ते रहते हैं |

आज की भागम भाग जिंदगी और सिकुड़ते रिश्तों के दरम्यान जीवन की परेशानियों से जूझती हजारों -लाखों अनुपमा गांगुली बार बार प्यार में पड़ेंगी ... निकलेंगी और फिर पड़ेंगी |

कहानी की सबसे खास बात है उसकी शैली .... अनुपमा गांगुली के साथ ही पाठक लोकल पकड़ने के लिए भागता है ...पकड़ता , आसपास के लोगों से रूबरू होता है | एक तरह से ये कहानी एक ऐसी यात्रा है जिसमें पाठक  को भी वहीं आस -पास होने का अहसास होता है |


"पहले प्रेम की दूसरी पारी " संग्रह की पहली कहानी है | ये कहानी उन दो प्रेमियों के बारे में है जो एक दूसरे से बिछड़ने , विवाह व् बच्चों की जिम्मेदारियों को निभाते हुए कहीं ना कहीं एक दूसरे के प्रति प्रेम की उस लौ को जलाये हुए भी हैं और छिपाए हुए भी हैं | कहा भी जाता है कि पहला प्यार कोई नहीं भूलता | खैर आठ साल बाद दोनों एक दूसरे से मिलते हैं | दोनों ये दिखाना चाहते हैं कि वो अपनी आज की जिन्दगी में रम गए हैं खुश हैं , पर कहीं न कहीं उस सूत्र को ढूंढते  रहते हैं जिससे उनके दिल को तसल्ली हो जाए ...कि वो अगले के दिल में कहीं न कहीं वो  अब भी मौजूद हैं ... कतरा भर ही सही , साथ बिताये  गए कुछ घंटे जो अपने पहले प्यार के अहसास को फिर से एक बार जी लेना चाहते थे , दोतरफा अभिनय की भेंट चढ़ गए | सही भी तो है विवाह के बाद उस प्रेम को स्वीकारना जो अभी भी धडकनों में हैं, मुश्किल है  ...क्योंकि दिल की चाहरदीवारी से बाहर निकलते ही उस दो घरौंदों के लिए खतरा है जहाँ उनका आज सुरक्षित है | यही कशमश है | लिहाज़ा एक बार फिर प्रेम की नदी को बाँहों में समेट लेने की ख्वाइश उस मुलाकात के बाद  हथेलियों से रेत सी फिसल जाती है ... रह जाता है एक गुदगुदा सा अहसास , जो  मन को सहलाता है पर हथेली पर टीस  बन के उभरता है | कहानी की खास बात ये हैं कि इसमें बहुत कुछ अनकहा है जिसे केवल महसूस किया जा सकता है | लेखिका पाठकों को उस धरातल पर ले जाने में सफल हुई हैं जहाँ वो ये महसूस कर सकें |


" भेड़िया " इस संग्रह की बेहतरीन कहानियों में से एक है | खास बात है इस कहानी को लिखने की शैली | कहानी उस लोककथा का आधार ले कर चलती हैं जहाँ एक गड़ेरिया बार -बार झूठ बोलता है कि भेड़िया आया , भेड़िया आया , गाँव वाले उसकी मदद को आते , पर वहां भेड़िया तो आया नहीं होता ... लेकिन एक एक दिन भेड़िया सचमुच आ गया |

कहानी विवाहेतर रिश्तों पर है | ये रिश्ते बन तो जाते हैं , और तब तक बने भी रहते हैं जब तक तथाकथित दूसरी औरत अपने अधिकारों की माँग नहीं करती | पुरुष के पास अधिकारों युक्त पत्नी , समाज  , रुतबा और प्रेम करने को एक स्त्री सब होते हैं | ये  तिलिस्म तब टूटता है जब वो दूसरी औरत ऐलान करती है कि तुम्हे मुझसे या पत्नी में से एक को चुनना होगा .... एक तरफ अकेली स्त्री दूसरी तरह पुरुष  का सारा राज समाज ... फिर शुरू होता समझाने मनाने और फुसलाने का दौर | स्त्री की की बढती हुई निराशा , कुंठा , बेचैनी और आत्महत्या की धमकी , रोज -रोज मिलने वाली इन धमकियों से लापरवाह होता पुरुष ... और एक दिन भेड़िया सचमुच आ जाता है ...एक दुस्वप्न जब मन के धरातल पर सच्चाई बन  कर ठोकर मारता है , तब शुरू होता है मानसिक विचलन | विवाहेतर रिश्तों में सब हारते हैं ... इसको जिस ख़ूबसूरती से उकेरा है वो काबिले तारीफ है | निश्चित तौर पर इस कहानी के लिए लेखिका  बधाई की पात्र हैं |


" खजुराहो "एक अलग ही मुद्दे को उठती हुई कहानी है | कहानी   एक मशहूर लेखक और उसकी पत्नी के इर्द गिर्द घूमती है | लेखक की नयी किताब खजुराहो बहुत सराही जा रही है | बहुत सी महिलाएं उसकी फैन हैं | लेखक ज्यादतर स्त्री प्रधान कहानियाँ लिखता है | स्त्री मनोभाभावों को सूक्ष्मता से पकड़ने के कारण वो पाठिकाओ में विशेष रूप से लोकप्रिय है | यही बात पत्नी की असुरक्षा का कारण है | वो एक सामान्य स्त्री हैं | सामान्य होना उसे खुद अपनी नज़र में कमतर साबित करता है , जिससे वो निराश और कुंठित होती है | यहाँ तक की एक गैंग रेप विक्टिम जिसने खुद को संभाला और फिर से जीना शुरू किया , अपने पति के मुँह से उसकी प्रशंसा भी उसे आहत करती है | कई बार उसे अहसास होता है कि स्त्री मन को समझने का दावा करने वाला उसका पति उसके मन को ठीक से नहीं समझता | और अन्तत : उसे  लगता है कि पति को केवल उसकी देह से मतलब है वो उसकी ना को हाँ में बदलवाने का हुनर जानता है , उसे भोगता है , इस्तेमाल करता है ...उसके अधकुचले अरमानों के साथ अपनी फंतासी की नायिकाओं की दुनिया रचता है , जिनके मन को पढने का उसे सम्मान प्राप्त है |

और जैसा की स्वाभाविक है नाराज् पत्नी  अपनी देह पर अपना अधिकार समझते हुए पति के स्पर्श से  इनकार करती है , उसका दिल समर्पण  चाहता है पर ... कहानी यहीं पर यू टर्न लेती है | पति उसका हाथ झटक कर कहता है ये मेरी ही नहीं तुम्हारी भी आवश्यकता है  क्या मैं तुम्हारे मनोभावों को नहीं पढ़ सकता | उस पर एक वज्रपात सा होता है | उसने इस तरह से तो कभी सोचा ही नहीं था | उसे तो लगा था कि उसकी देह एक हथियार है जिसे वो पति को अपने मन माफिक झुकाने के लिए इस्तेमाल कर सकती है |

पति अनिकेत का कहना , " खजुराहो तुम जैसी औरतों के लिए नहीं है ?" स्त्री विमर्श  के नए  द्वार खोलता है ...जहाँ पति पत्नी के शारीरिक  रिश्तों को केवल एक तरफ़ा नहीं दोतरफा होना स्वीकार गया | आम घरेलु औरतें अपनी पति से अपनी बात मनवाने के लिए देह को हथियार की तरह इस्तेमाल भी करती हैं .... परन्तु क्या ये सिर्फ पुरुष की जरूरत है ? पति -पत्नी संबंधों में लेखिका ने ये नया विषय उठाया है , संभव है आगे इस पर और विस्तृत चर्चा हो |

"खिड़की" कहानी में खिड़की एक माध्यम है समाज में व्याप्त अनैतिकता को दिखाने का | एक पत्नी एक माँ एक खिड़की के माध्यम  से जब अनैतिक रिश्तों का नंगा नाच देखती है तो  किस तरह  से बेचैन होती  है , अपने बच्चों में  उन चिन्हों को खोजती है  जो उनकी मासूमियत को लील सकते हैं | उनकी मासूमियत देखकर वो चैन की सांस लेती है पर खुद को आश्वस्त करने के लिए कि बाहर की ये हवा उसके घर की धूप -दीप की सुगंध को प्रदूषित ना कर दे वो खिड़की चुनवा देती है | ये कहानी जहाँ सभी समाज को बेपर्दा करती है वहीँ एक पत्नी एक माँ के खौफ का भी सटीक चित्रण  करती है |




"चिड़िया उड़ "कहानी स्त्री मन की दो विरोधाभाषी उड़ानों की अभिव्यक्ति हैं , जहाँ वो समझ नहीं पाती बंधन सही है या मुक्ति | कहानी में एक लेडी डॉक्टर के क्लिनिक पर दो अपरिचित महिलाएं  मिलती हैं | एक शादी कर घर गृहस्थी बच्चों में फंस कर अपना वजूद खो चुकी हैं तो दूसरी उन्मुक्त उड़ान भरने के बाद उसी  नीड़ पर अपना घोसला बनाना चाहती है | साथ रहने वाला पार्टनर नहीं , वो चाहती है एक ऐसा व्यक्ति जिसे वो ज़माने के सामने अपना कह सके , कानूनन उसकी पत्नी बच्चे की माँ बन सके , पर साथी को ये मंजूर नहीं |  वहीँ घर गृहस्थी वाली अपना खुद का वजूद तलाशना चाहती है, जो परिवार के बीच कहीं खो गया है  ... एक उड़ान भरना चाहती है ... पर उन्मुक्त नहीं जिसका छोर उसके घर की नींव में बंधा हुआ हो | ये कहानी दरअसल आज की स्त्री की उलझन दिखाती है ... अपने वजूद की तलाश में स्वछंद हुई स्त्री  के सामने प्रश्न एक ना एक दिन आता है कि क्या उसका  उन सुखों से महरूम होने का फैसला सही था जो एक बंधन में होते हैं ... प्रेम के बंधन में | उपाय मध्य मार्ग ही है | जहाँ बंधन हों ...पर प्रेम के और उनके मध्य स्त्री का वजूद भी स्थापित रहे | इसी विषय पर मैंने कुछ लेखिकाओ की  कहानियाँ और भी पढ़ी हैं पर सबका ट्रीटमेंट , कहन जुदा है | ये बात लेखिकाओ की प्रतिभा का परिचय देती है |


अन्य कहानियों में "समंदर  से लौटती नदी" भी विवाहेतर रिश्तों पर आधारित है | जिसमें अपनी पत्नी व् बच्चों को ना छोड़ सकने की विवशता को प्रेमिका शेफाली समझ लेती है और खुद ही दूर चली जाती है | " एक उदास शाम के अंत में " कहानी भी विवाहेतर संबंधों पर ही है जहाँ  प्रेमिका , प्रेमी के पास आने से इनकार कर देती है क्योंकि वर्षों बाद ईश्वरीय चमत्कार से वो माँ बनने वाली है | ये दोनों कहानियाँ यूँ तो अलग -अलग है पर विषय का दोहराव व् प्रेषण शैली से वो प्रभाव नहीं उत्पन्न  पाती जो संग्रह की बाकी कहानियों में है


 और अंत में अंतिम कहानी की बात करें तो उसमें कुछ छोटी -छोटी कहानियाँ हैं, जो  बेहद प्रभावशाली हैं | ये सब लघु कहानियाँ प्रेम पर ही हैं जो गुदगुदाती हैं और मधुर सा अहसास पीछे छोड़ जाती हैं | कहानी प्रेमी का पति हो जाना एक दुर्घटना है महिला पाठकों को अपने से जोड़ने में विशेष रूप से सक्षम है |

                   कुल मिला कर देखा जाए तो  विजयश्री तनवीर जी की कहानियाँ आज की सच्चाई बयां करती हैं | उनका लिखने  का ढंग ताज़ा हवाके झोंके की तरह है जो मन को पन्ना दर पन्ना उडाये लिए जाता है | उनकी भाषा में उर्दू की मिलावट बहुत प्रभावित करती है | हालाँकि वो कहती हैं की किसी किताब के अंतर्मन के दो पन्ने जिसमें लेखक अपने दिल की बात करता है  पढने का दिल नहीं करता पर उन्होंने उन पन्नों को भी दिलचस्प बना दिया है | ये उनका पहला कहानी संग्रह है | उनसे लेखन की लंबी और बेहतर पारी खेलने की उम्मीद है |

अगर आप आज के युवाओं के उलझते -सुलझते रिश्तों की कहानियाँ पढना चाहते हैं तो हिंदी युग्म से प्रकाशित १२० पेज का ये कहानी संग्रह आप जरूर पसंद करेंगे |

किताब का नाम -अनुपमा गांगुली का चौथा प्यार
लेखिका -विजयश्री तनवीर
प्रकाशक -हिंदी युग्म
पृष्ठ -120
मूल्य :115(पेपर बैक )

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वंदना बाजपेयी 

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