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कहानी -ताई की बुनाई


सृजन से स्त्री का गहरा संबंध है | वो जीवंत  संसार को रचती है | उस का सृजन हर क्षेत्र में दीखता है चाहें वो रिश्ते हो , रसोई हो  , गृह सज्जा या फिर फंदे-फंदे  ऊन को पिरो कर बुनी गयी स्नेह की गर्माहट | लेकिन ये सारी  रचनाशीलता उसकी दूसरों को समर्पित हैं , अपने लिए तो चुटकी भर ख्वाब भी नहीं बन पाती | समाज को खटकता है | ताई ने ये जुर्रत करी, और परिणाम में ....
ये विषय है वरिष्ठ लेखिका आदरणीय दीपक शर्मा जी की लोकप्रिय कहानी "ताई की बुनाई " का | आइये पढ़ें शब्दों के फंदों  से बुनी इस बेहद मार्मिक कथा को ...


कहानी -ताई की बुनाई



गेंद का पहला टप्पा मेरी कक्षा अध्यापिका ने खिलाया था|

उस दिन मेरा जन्मदिन रहा| तेरहवां|

कक्षा के बच्चों को मिठाई बांटने की आज्ञा लेने मैं अपनी अध्यापिका के पास गया तो वे पूछ बैठीं, “तुम्हारा स्वेटर किसने बुना है? बहुत बढ़िया नमूना है?”

“मेरी माँ ने,” रिश्ते में वे मेरी ताई लगती थीं लेकिन कई वर्षों तक मैं उन्हें अपनी माँ मानता रहा था, “घर में सभी लोग उनके बुने स्वेटर पहनते हैं|”
“अच्छा!” मेरी कक्षा अध्यापिका ने अपनी मांग प्रस्तुत की, “क्या तुम नमूने के लिए मुझे अपना स्वेटर ला दोगे? कल या परसों या फिर अगले सप्ताह?”
“वे अपने लिए कभी नहीं बुनतीं,” मैंने सच उगल दिया|

“आज घर जाते ही पिता से कहना उनके स्वेटर के लिए उन्हें ऊन लाकर दें.....”
“अब अपने लिए एक स्वेटर बुनना, अम्मा,” शाम को जब ताऊजी घर लौटे तो मैंने चर्चा छेड़ दी, “तुम्हारे पास एक भी स्वेटर नहीं.....”
अपने ताऊजी से सीधी बात कहने की मुझमें शुरू से ही हिम्मत न रही|

“देखिए,” ताई ने हंस कर ताऊजी की ओर देखा, “क्या कह रहा है?”
“हाँ, अम्मा,” मैं ताई से लिपट लिया| वे मुझे प्रिय थीं| बहुत प्रिय|
“देखिए,” ताऊजी की स्वीकृति के लिए ताई उतावली हो उठीं, “इसे देखिए|”

“अच्छा, बुन लो| इतनी बची हुई तमाम ऊनें तुम्हारे पास आलमारी मेंधरी हैं| तुम्हारा स्वेटर आराम से बन जाएगा.....”
ताई का चेहरा कुछ म्लान पड़ा किन्तु उन्होंने जल्दी ही अपने आपको संभाल लिया, “देखती हूँ.....”
अगले दिन जब मैं स्कूल से लौटा तो ताई पालथी मारे ऊन का बाज़ार लगाए बैठी थीं|
मुझे देख कर पहले दिनों की तरह मेरे हाथ धुलाने के लिए वे उठीं नहीं..... भांति-भांति के रंगों की और तरह-तरह की बनावट की अपनी उन ऊनों को अलग-अलग करने में लगी रहीं|
“खाना,” मैं चिल्लाया|
“चाची से कह, वह तुझे संजू और मंजू के साथ खाना परोस दे,” ताई अपनी जगह से हिलीं नहीं, “इधर ये ऊनें कहीं उलझ गयीं तो मेरे लिए एक नयी मुसीबत खड़ी हो जाएगी| तेरे बाबूजी के आने से पहले-पहले मैं इन्हें समेट लेना चाहती हूँ.....”
उन दिनों हमसब साथ रहते थे, दादा-दादी, ताऊ-ताई, मंझली बुआ, छोटी बुआ, मेरे माता-पिता जिन्हें आज भी मैं ‘चाची’ और‘चाचा’ के सम्बोधन से पुकारता हूँ और मुझसे बड़े उनके दो बेटे, संजू और मंजू.....
मुझसे पहले के अपने दाम्पत्य जीवन के पूरे ग्यारह वर्ष ताऊजी और ताई ने निःसन्तान काटे थे|
दोपहर में रोज लम्बी नींद लेने वाली ताई उस दिन दोपहर में भी अपनी ऊनें छाँटने में लगी रहीं|
“आज दोपहर में आप सोयींनहीं?” अपनी झपकी पूरी करने पर मैंने पूछा|
“सोच रही हूँ अपना स्वेटर चितकबरा रखूँ या एक तरह की गठन वाली ऊनों को किसी एक गहरे रंग में रंग लूं?”

“चितकबरा रखो, चितकबरा,” रंगों का प्रस्तार और सम्मिश्रण मुझे बचपन से ही आकर्षित करता रहा है|

अचरज नहीं, जो आज मैं चित्रकला में शोध कर रहा हूँ|

शाम को ताऊजी को घर लौटने पर ताई को आवाज देनी पड़ी, “कहाँ हो?”

ताई का नाम ताऊजी के मुख से मैंने एक बार न सुना|


यह ज़रूर सुना है सन् सत्तावन में जब ताई ब्याह कर इस घर में आयी थीं तो उनका नाम सुनकर ताऊजी ने नाक सिकोड़ा था, “वीरां वाली?”

अपना नाम ताई को अपनी नानी से मिला था| सन् चालीस में| दामाद की निराशा दूर करने के लिए उन्होंने तसल्ली में कहा था, “यह वीरां वाली है| इसके पीछे वीरों की फ़ौज आ रही है.....”

पंजाबी भाषा में भाई को वीर कहा जाता है और सचमुच ही ताई की पीठ पर एक के बाद एक कर उनके घर में उनके चार भाई आए|

“मैं तुम्हें चन्द्रमुखी कह कर पुकारूँगा,” वैजयन्तीमाला की चन्द्रमुखी ताऊजी के लिए उन दिनों जगत की सर्वाधिक मोहक स्त्री रही होगी|
अपने दाम्पत्य के किस पड़ाव पर आकर ताऊजी ने ताई को चन्द्रमुखी कहना छोड़ा था, मैं न जानता रहा|

पढ़ें क्वाटर नंबर 23

“कहाँ हो?” ताऊजी दूसरी बार चिल्लाए|

उन दिनों हमारे घर में घर की स्त्रियाँ ही भाग-दौड़ का काम किया करतीं| पति के नहाने, खाने, सोनेऔर ओढ़ने की पूरी-पूरी ज़िम्मेदारी पत्नी की ही रहती|
“आ रही हूँ,” ताई झेंप गयीं|
ताई को दूसरी आवाज देने की नौबत कम ही आती थी| अपने हिस्से के बरामदेमें ताऊजी की आहट मिलते ही हाथ में ताऊजीकी खड़ाऊंलेकर ताई उन्हें अकसर चिक के पास मिला करतीं, किन्तु उस दिन आहट लेने में ताई असफल रही थीं|
“क्या कर रही थीं?” ताऊजी गरजे|
“आज क्या लाए हैं?” ताऊजी को खड़ाऊ पहना कर ताई ने उनके हाथ से उनका झोला थाम लिया|
ताऊजी को फल बहुत पसन्द रहे| अपने शाम के नाश्ते के लिए वे लगभग रोज ही बाज़ार से ताजा फल लाया करते|

“एक अमरुद और एक सेब है,” ताऊजी कुछ नरम पड़ गए, “जाओ| इनकासलाद बना लाओ|”

आगामी कई दिन ताई ने उधेड़बुन में काटे| अक्षरशः|

रंगों और फंदों के साथ वे अभी प्रयोग कर रही थीं|

कभी पहली पांत में कोई प्राथमिक रंगभरतीं तो दूसरी कतार में उस रंग के द्वितीय और तृतीय घालमेल तुरप देतीं, किन्तु यदि अगले किसी फेरे में परिणाम उन्हें न भाता तो पूरा बाना उधेड़ने लगतीं|
फंदों के रूपविधान के संग भी उनका व्यवहार बहुत कड़ा रहा| पहली प्रक्रिया में यदि उन्होंने फंदों का कोई विशेष अनुक्रम रखा होता और अगले किसी चक्कर में फंदों का वह तांता उन्हें सन्तोषजनक न लगता तो वे तुरन्त सारे फंदे उतार कर नए सिरे से ताना गूंथने लगतीं|
इस परीक्षण-प्रणाली से अन्ततोगत्वा वह अनुपात उनकी पकड़ में आ ही गया जिसके अन्तर्गत उनका स्वेटर अद्भुत आभा ग्रहण करने लगा|
चित्रकला में गोल्डन मीन की महत्ता के विषय में मैंने बहुत देर
बाद जाना किन्तु ताई की सहजबुद्धि और अन्तर्दृष्टि असामान्य रही| ससंगति और सम्मिति पर भी उन्हें अच्छा अधिकार रहा और शीघ्र ही बहुरंगी उनका स्वेटर पूरे परिवार की चर्चा का विषय बन गया|
पिछले बुने अपने किसी भी स्वेटर के प्रति ताई ने ऐसी रूचि, ऐसीतत्परता और ऐसी ग्रस्तता न दिखायी थी|
वास्तव में एक तो उन पिछले स्वेटरों की रूपरेखा तथा सामग्री पहले से ही निश्चित रहती रही थी, तिस पर वे परिवार के किसी प्रीतिभाजन से सम्बन्धित होने के कारण परिवार की सामूहिक गतिविधियों में ताई को साझीदार बनाते रहे थे, किन्तु इस बार एक ओर यदि अपर्याप्त ऊनें ताई के कला-कौशल को चुनौती दे रही थीं तो दूसरी ओर ताई की यह बुनाई उन्हें परिवार से अलग-थलग रख रही थी|

कहानी -ताई की बुनाई


सभी चकित थे : त्यागमयी पत्नी, स्नेहशील भाभी तथा आज्ञाकारी बहू के स्थान पर यह नयी स्त्री कौन थी जो अपनी सर्जनात्मक ऊर्जा एक स्वगृहीत तथा स्वनिर्धारित लाभ पर खर्च कर रही थी? ऐसे सम्मोह के साथ? फिर अपने स्वपोषित उस हठ में ताई अपनी दिनचर्या, अपनी कर्त्तव्यनिष्ठा तथा अपनी विनम्रता को भी तिलांजलि देने लगी थीं और अब उनके स्वेटर का सम्बन्ध सीधे-सीधे उस वास्तविकता पर आ टिका था, जिसके घेरे में वे स्वयं को नितान्त अकेला पा रही थीं|
ताऊजीको सुबह-सुबह छीले हुए बादाम की, तुलसी की पत्ती में काली मिर्च की, शहद के गुनगुने पानी में नींबू की आदत रही| अब ताई कईबाररात में बादाम भिगोना भूल जातीं, तुलसी की पत्ती में काली मिर्च लपेटना भूल जातीं, गुनगुने पानी में नींबू निचोड़तीं तो शहद मिलाना भूल जातीं या शहद मिलातीं तो नींबू निचोड़ना भूल जातीं|
रसोई में भी कभी दूध उबालतीं तो भगौने से दूध अकसर बाहर भाग आता, सब्जी छौंकतीं तो मसाला कड़ाही में जल जाता, दाल बघारतीं तोतड़कानीचे लग जाता, चावल पकातीं तो उसकीएक कणी कच्ची रह जाती, रोटी सेंकतीं तो उसे समय पर फुलाना भूल जातीं|


उस दिन ताऊजी जब घर लौटे तो उनके हाथ से उनका झोला मैंने पकड़ लिया|

उन्हें खड़ाऊं भी मैंने ही पहना दी|

“कहाँ हो?” ताऊजी ने ताई को पुकारा, “यह अनार छीलना है.....”

“लीजिए,” ताई ने ताऊजी की आज्ञा स्वीकारी और झटपट अनर छील लायीं|


“काला नमक और गोल मिर्च नहीं मिलायी क्या?” अनार का स्वाद अपेक्षानुसार न पाकर ताऊजी रुष्ट हुए|
“अनार अच्छा मीठा है,” ताई का स्वेटर तेजी से अपने अन्तिम चरण पर पहुँच रहा था और अपने सुखाभास में वे अपराध-भाव जताना भूल गयीं, “उनकी ऐसी जरूरत तो है नहीं|”

“क्या मतलब है तुम्हारा?” ताऊजी ने ताई के हाथ से उनका स्वेटर झपट लिया|

“मुझसे भूल हुई,” ताई तत्काल संभल गयीं, “मैं अभी दोनों चीज ला रही हूँ| मगर आप मेरा स्वेटर न छेड़िएगा.....”
“इसे न छेड़ूं?” स्वेटर को उसकी सलाइयों से पृथक कर ताऊजी उसे उधेड़ने लगे, “इसे क्यों न छेड़ूं?”

“मैंने कहा न!” ताई उग्र हो उठीं, “मुझसे भूल हुई| मुझे कोई दूसरी सजा दे दीजिए, मगर मेरा स्वेटर न ख़राब कीजिए| इस पर मैंने जान मार कर काम किया है.....”

“इसे न खराब करूं?” भड़क कर ताऊजी ने उधेड़ने की अपनी गति त्वरित कर दीं, “इसे क्यों न ख़राब करूं?”

“निपूते हो न!” ताई की उग्रता में वृद्धि हुई, “इसीलिए सारा प्रकोप मुझ गरीब पर निकालते हो!”
“क्या बोली तू?” स्वेटर फेंक कर ताऊजी ताई पर झपट लिए, “बोल| क्या बोली तू?”
“बड़ी बहू!” तभी दादा ने दरवाजे की चिक से ताई को पुकारा, “अपनी बुनाई और सभी ऊनें 
मुझे सौंप दो| ये अच्छी आफत किए हुए हैं.....”

“नहीं,” घर का कोई भी सदस्य दादा की आज्ञा का उल्लंघन न कर सकता था मगर ताऊजी के धक्कों और घूँसों से हांफ रही ताई ने दृढ़ स्वर में उत्तर दिया, “मुझे यह स्वेटर पूरा करना है.....”

“यह बौरहा गयी है,” ताऊजी ने ताई को एक आखिरी झटका दिया और कमरे से बाहर चले गए|

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ताऊजी के जाते ही ताई ने अपना स्वेटर फर्श से उठा लिया| उसका बिगाड़ कूतने|
“इतने उछाल ठीक नहीं,” दादा ने धमकी दी, “अपने दिमाग से काम लो| अपनीहोश से काम लो| लाओ, वह बुनाई इधर लाओ|”
“नहीं,” ताई टस से मस न हुईं, “मुझे यह स्वेटर जरूर पूरा करना है|”
“नन्दू,” दादा ने मुझे सम्बोधित किया, “अपनी अम्मा से वह बुनाई लेकर मेरे कमरे में पहुँचा दो..... अभी..... इसी वक़्त.....”
अपना अन्तिम निर्णय देकर दादा दरवाजे की चिक से हट गए|

कहानी -ताई की बुनाई


“क्या मैं बाबूजी का बेटा नहीं?” मैं ताई के पास पहुँच लिया|

“नहीं| वे निपूते हैं|”

“और तुम?” मेरी जान होंठों पर आ गयी|

“मैं भी निपूती हूँ,” ताईअपने हाथों से अपना सिर पीटने लगीं|

“फिर मैं कौन हूँ?” मेरी जान सूख गयी|

“बाहर जाकर पूछ|”


उसी रात ताई ने मेरी स्याही की भरी दवात अपने गले में उंडेल ली और सुबह से पहले दम तोड़ दिया|
दिखाऊ शोक के उपरान्त उनकी मृतक देह को ताऊजी ने यथानियम अग्नि के हवाले कर दिया|
हाँ, आधा उधड़ा और आधा बुना उनका चितकबरा स्वेटर अब मेरी आलमारी में धरा है|

मेरी निजी सम्पत्ति की एक अभिन्न इकाई के रूप में|

ताई की आत्मा उसमें वास करती है, ऐसा मेरा विश्वास है|

दीपक शर्मा 


वरिष्ठ लेखिका -दीपक शर्मा


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लघुकथा -माँ के जेवर


बचपन में जो बेटे माँ मेरी माँ मेरी कह कर झगड़ते थे वही बड़े होने पर माँ तेरी , माँ तेरी ख कर झगड़ते हैं | ऐसी ही एक माँ थी फुलेश्वरी देवी जिसकी सेवा सिर्फ छोटा बेटा ही करता था | फिर भी बड़े बेटे  का फरमान था कि सेवा भले ही छोटा बेटा  कर रहा हो पर माँ के जेवर आधे उसे भी मिलने चाहिए | माँ उसकी इस बात से हताश होती पर उसने भी अपने जेवरों के अनोखे बंटवारे का फैसला कर लिया |

लघुकथा -माँ के जेवर 


माँ , फुलेश्वरी देवी ,  कम्बल से अपना मुँह ढककर लेटी थी | नींद तो उसकी बहुत पहले खुल गयी थी, पर दोनों बेटों  की बहस सुन रही थी | बहस उसी को लेकर हो रही थी |

बड़े भाई छोटे भाई से क्रोध में कह रहा था  ," देखो , ये सेवा -एव का नाटक ना करो | मुझे पता है तुम माँ की जेवर  के लिए ये सब कर रहे हो | लेकिन कान खोल कर सुन लो , माँ जेवर हम दोनों में आधे -आधे  बंटेंगे | एक नाक की कील भी ज्यादा मैं तुमको नहीं लेने दूंगा |"

छोटा भी बोला ," अगर आप को लगता है कि मं इस लिए सेवा कर रहा हूँ कि माँ के जेवर हड़प लूँ , तो आप ले जाइए माँ को अपने साथ , करिए सेवा और रखिये साथ , फिर सारे जेवर आप ही रख लीजियेगा , मुझे एक भी नहीं चाहिए |"

बड़े भाई ने बात काटते हुए कहा ," वाह बेटा ! वाह इसमें सेवा की बात कहाँ आ गयी | जेवर के बहाने  तुम माँ का भार  मेरे ऊपर डालना चाहते हो | माँ इतने समय से तुमहारे  साथ रह रही है , उसको अगर मैं ले जाउंगा तो उसे वहाँ अच्छा नहीं लगेगा | मेरे बच्चे भी बड़े हो गए हैं , वो भी अपनी पढाई में व्यस्त रहते हैं , माँ दो बातों को तरस जायेंगी | तुम्हारे बच्चे तो अभी छोटे हैं , माँ से दुबक सोते हैं , तुम्हारी पत्नी को भी आराम मिल जाता है , घडी दो घडी का | इसलिए माँ को तुम अपने ही पास रखो , पर जेवर में मुझे भी हिस्सा चाहिए |

छोटा भाई बोला ," मैं तो बस आपके मन की टोह लेने के लिए ऐसा कह रहा था | माँ कहीं नहीं जायेंगी वो हमारे साथ ही रहेंगी | आपको हो ना हो मुझको तो अहसास है कि बचपन में माँ ने इससे ज्यादा सेवा की थी | आप जाइए जेवर के पीछे , और अभी जोर -जोर से मत चिल्लाइये , माँ जाग जायेंगी तो उन्हें बुरा लगेगा |

बड़ा भाई - हाँ , हाँ जा रहा हूँ , जा रहा हूँ , पर जेवर की बात ना भुलाना  |

बड़ा भाई चला गया |छोटा भाई माँ के कमरे में जाकर देखता है , कि माँ ने सुन न लिया हो उन्हें दुःख होगा |माँ को सोते देख वो चैन की सांस लेता है, फिर अपनी पत्नी को बुलातेहुए कहता है की ध्यन रखना माँ को भैया की बात न पता चले | पत्नी हाँ में सर हिला देती है |

माँ की आँखों में आसूँ है | उसे पता कि छोटा बेटा बहु उसकी सेवा करते हैं , दिल से करते हैं , उन्हें पैसे का लालच नहीं है | बड़ा बेटा उसे कभी दो रोटी  को भी नहीं पूछता | जब देखो तब लड़ने चला आता है | उसे माँ से प्यार नहीं , जेवरों से प्यार है | बड़ा बेटा उसकी भी कहाँ सुनता है | हर बार जब भी तू -तू, मैं मैं होती है वो बड़े से तो कुछ नहीं कह पाती , छोटे को ही समझा बुझा कर शांत कर देती है ताकी घर में शांति बनी रहे |

.....................

तीन वर्ष ऐसे ही बीत गए | बार - बार हॉस्पिटल  जाना , आना लगा रहता | कभी -कभी कई  दिनों के लिए भी बीमार पड़ती | छोटा बेटा और बहु दौड़ -दौड़ कर सेवा करते | एक बार माँ को मैसिव हार्ट अटैक पड़ा | बचने की उम्मीद कम थी , बस साँसों की डोर थमी थी | सब रिश्तेदार आ कर देख के जा रहे थे | एक दिन अस्पताल में उन्हें देखने उनकी छोटी बहन राधा मौसी भी आई तो माँ ने एक डायरी उसे पकड़ा कर कहा कि मेरा एक काम का देना मेरे मरने के बाद  तेरहवीं  के दिन इसे सबके सामने पढना |


बहन डायरी ले कर अपने घर चली गयी | उसी रात माँ के प्राण पखेरू उड़ गए | शायद बहन को डायरी सौंपने के लिए ही प्राण अटके थे |


तेरहवीं के दिन जब सब लोग खाने बैठे तो मौसी ने डायरी खोल कर पढना शुरू किया |

मेरे बेटों ,
               ये डायरी ही मेरी वसीयत है | अक्सर मैं तुम दोनों को  झगड़ते हुए सुनती | मेरी आत्मा बहुत तडपती पर मैं  ये दिखाती कि मैंने सुना ही नहीं है | ज्यादातर जेवरों की बात होती | मैं बताना चाहती हूँ कि मेरे जेवर भण्डार घर की  अलमारी के तीसरे खाने में छोटू के पुराने कपड़ों के नीचे एक डब्बे में रखे हैं | क्योंकि तुम दोनों मेरे ह बच्चे हो इसलिए मैं उन जेवरों को तौल के अनसुर बाँट कर आधा -आधा तुम दोनों को दे रही हूँ | 


परन्तु मेरे पास कुछ और जेवर हैं वो मैं छोटे बेटे को दे रही हूँ .... वो है मेरा आशीर्वाद | मैं ढेरों आशीर्वाद अपने छोटे  बेटे के लिए छोड़े  जा रही हूँ क्योंकि सिर्फ उसी ने मेरी निस्वार्थ सेवा करी है | 

                                                                      तुम्हारी माँ 


पत्र सुनते ही लोग छोटे बेटे की जयजयकार करने लगे | छोटे बेटे की आँखों में आँसू थे और बड़ा बेटा सर झुकाए लज्जित खड़ा था |


माँ के जेवरों के ऐसे अद्भुत बंटवारे की किसी ने कल्पना भी नहीं की थी |


नीलम गुप्ता

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वैलेंटाइन डे - जानिये प्यार की 5 भाषाओँ के बारे में

हिंदी, अंग्रेजी, उर्दू , फ़ारसी , लैटिन या फ्रेंच .... कितनी भी भाषाएँ आती हो मगर , प्यार की भाषा नहीं आती तो रिश्तों के मामले में तो शून्य ही रह जाते हैं | आप सोच सकते हैं कि ऐसा भला कौन हो सकता है जिसे प्यार की भाषा ना आती हो ... तो ठहरिये आपको अपनी नहीं जिसे से आप प्यार करते हैं उसकी भाषा समझने की जरूरत है | कैसे ? आज वैलेंटाइन डे पर खास ये रहस्य आपसे साझा कर रहे हैं .........

वैलेंटाइन डे - जानिये प्यार की 5 भाषाओँ के बारे में 


अभी कुछ दिन पहले की बात है मैं अपनी सहेली लतिका के साथ दूसरी सहेली प्रिया के घर गयी| प्रिया थोड़ी उदास थी| बातों का सिलसिला शुरू हुआ, तभी मेरी नज़र उसके हाथों की डायमंड रिंग पर गयी | रिंग बहुत खूबसूरत थी | मैंने तारीफ़ करते हुए कहा,” वाह  लगता है जीजाजी ने दी है, कितना प्यार करते हैं आपसे | मेरी बात सुन कर उसकी आँखों में आँसू आ गए, जैसे उनका वर्षों पूराना दर्द बह कर निकल जाना चाहता हो| गला खखार कर बोलीं,” पता नहीं, ये प्यार है या नहीं, नीलेश, महंगे से महंगे गिफ्ट्स दे देते हैं, मेरी नज़र भी अगर दुकान पर किसी चीज पर पड़ जाए तो उसे मिनटों में खरीद कर दे देते हैं, चाहें वो कपड़े हो, गहने हों या श्रृंगार का कोई सामान, पर जब मैं खुश हो कर उसे पहनती हूँ तो कभी झूठे मुँह भी नहीं कहते कि बहुत सुन्दर लग रही हो| पहले मैं पूँछती थी ,” बताओ न, कैसी लग रही हूँ “ , तो हर बार बस वही उत्तर दे देते,  “वैसी  ही जैसी हमेशा लगती हो ... अच्छी”| मेरा दिल एकदम टूट कर रह जाता | मैंने कितनी ऐसी औरते देखी हैं  जो बिलकुल सुन्दर नहीं हैं, पर उनके पति उन्हें सर पर बिठा कर रखते हैं ... परी, हूर , चाँद का टुकड़ा न जाने क्या–क्या कहते हैं, एक तरफ मैं हूँ जिसे दुनिया सुन्दर कहती है उसका पति कभी कुछ नहीं कहता , ये महंगे गिफ्ट्स क्या हैं? ... बस अपनी हैसियत का प्रदर्शन हैं | बिना भाव से दिया गया हीरा भी पत्थर से अधिक कुछ नहीं है मेरे लिए | उनका दुःख जान कर मुझे बहुत दुःख हुआ पर मैंने माहौल को हल्का करने के लिए इधर –उधर की बातें करना शुरू किया | हमने हँसते –खिलखिलाते हुए उनके घर से विदा ली |

                  रास्ते में लतिका कहने लगी,  “कितनी बेवकूफ है प्रिया, उसे अपने पति का प्यार दिखता ही नहीं | अगर प्यार न करते तो क्या इतने महंगे गिफ्ट्स ला कर देते, एक मेरे पति हैं, मेरी दुनिया भर की तारीफें करते रहेंगे, गीत , ग़ज़ल भी मेरे ऊपर लिख देंगे, मगर मजाल है गिफ्ट के नाम पर एक पैसा भी खर्च करें | बहुत महंगा गिफ्ट तो मैंने चाहा ही नहीं , पर एक गुलाब का फूल तो दे ही सकते हैं |”

             घर आ कर मैं प्रिया और लतिका के बारे में सोंचने लगी | दरअसल ये समस्या प्रिया और लतिका की नहीं हम सब की है | हम सब अक्सर इस बात से परेशान रहते हैं कि जिसे हम इतना प्यार करते हैं, वो हमें उतना प्यार नहीं करता, या फिर हम तो अपने प्यार का इजहार बार–बार करते हैं पर वो हमारी  भावनाओं को समझता ही नहीं या उनकी कद्र ही नहीं करता| ये रिश्ता सिर्फ पति –पत्नी या प्रेमी –प्रेमिका का न हो कर कोई भी हो सकता है, जैसे माता–पिता का रिश्ता, भाई बहन का रिश्ता, दो बहनों को का रिश्ता, दो मित्रों का रिश्ता | इन तमाम रिश्तों में प्यार होते हुए भी एक दूरी होने की वजह सिर्फ इतनी होती है कि हम एक दूसरे के प्यार की भाषा नहीं समझ पाते |

क्या होती है प्यार की भाषा –


                  मान लीजिये आप अपनी किसी सहेली से मिलती हैं, वो आपको अपने तमिलनाडू टूर के बारे में बता रही है कि वो कहाँ–कहाँ गयी, उसने क्या–क्या किया, क्या–क्या खाया वगैरह–वगैरह, पर वो ये सारी  बातें तमिल में बता रही है, और आपको तमिल आती नहीं | अब आप उसे खुश देख कर खुश होने का अभिनय तो करेंगी  पर क्या आप वास्तव में खुश हो पाएंगीं ? नहीं, क्योंकि आपको एक शब्द भी समझ में नहीं आया| अब बताने वाला भले ही फ्रस्टेट हो पर गलती उसी की है, सारी कहानी बताने से पहले उसे पूँछ तो लेना चाहिए था कि आपको तमिल आती है या नहीं ? ठीक उसी तरह प्यार एक खूबसूरत भावना है पर हर किसी को उसे कहने या समझने की भाषा अलग–अलग होती है | अगर लोगों को उसी भाषा में प्यार मिलता है जिस भाषा को वो समझते हैं तो उन्हें प्यार  महसूस होता है, अन्यथा उन्हें महसूस ही नहीं होता कि उन्हें अगला प्यार कर रहा है|

अलग होती है सबकी प्यार की भाषा

                        

मनोवैज्ञानिक गैरी चैपमैन के अनुसार प्यार की पाँच भाषाएँ होती हैं और हर कोई अपनी भाषा में व्यक्त  किये गए प्यार  को ही शिद्दत से महसूस कर पाता है | अगर आप किसी से उसकी प्यार की भाषा में बात नहीं करेंगे तो आप चाहे जितनी भी कोशिश कर लें वो खुद को प्यार किया हुआ नहीं समझ पाएगा | आपने कई ऐसे लोगों को देखा होगा जिनके बीच में प्यार है, दूसरों को समझ में आता है कि उनमें प्यार है, पर उनमें से एक हमेशा शिकायत करता रहेगा कि अगला उसे प्यार नहीं करता | कारण स्पष्ट है कि अगला उसे उस भाषा में प्यार नहीं करता जिस भाषा में उसे प्यार चाहिए| मनोवैज्ञानिक गैरी चैपमैन ने इसके लिए लव टैंक की अवधारणा प्रस्तुत की थी | जब आप किसी से उस की प्यार की भाषा में बात करते हैं तो उसका लव टैंक भर जाता है और वो खुद को प्यार किया हुआ महसूस करता है , लेकिन अगर आप  उस के प्यार की भाषा में बात नहीं करते हैं तो आप चाहे जितना मर्जी प्यार कर लें उसका लव टैंक खाली ही रहेगा | ये बात हर रिश्ते पर लागू होती है |

 आइये जानते है प्यार की इन पाँच भाषाओँ के बारे में
 

1-प्यार भरे शब्द 

कुछ लोगों को प्यार तभी महसूस होता है जब आप उन्हें प्यार भरे शब्द कहें | ये शब्द उनके दिमाग पर गहरा असर डालते हैं, बार–बार उनके दिमाग में किसी कैसिट की तरह रिवाइंड हो कर चलते रहते हैं, इससे उनका सेल्फ कांफिडेंस बढ़ जाता है | जब वो अपने बारे में अच्छा महसूस करते हैं तो रिश्ते पर प्यार बरसना स्वाभाविक है| इसलिए ऐसे लोगों से अक्सर कहें कि तुम कितनी सुन्दर लग रही हो, तुमने कितना अच्छा खाना बनाया है, या ये टाई आप पर कितनी जंचती है, वाह! ऑफिस में आप जैसा जीनियस तो कोई है ही नहीं, इसके अलावा बार–बार बताएं कि वो आपके लिए क्यों ख़ास हैं या आप उनसे कितना प्यार करते /करतीं हैं | ये बात आप फोन पर, मेसेज से या व्हाट्स एप के जरिये भी कह सकते हैं |इसे और  प्रेमपूर्ण बनाने के लिए किसी कागज़ के टुकड़े पर लिख कर उनकी अलमारी में छुपा सकते हैं |

२-क्वालिटी टाइम                   


इस कैटेगिरी में ज्यादातर लोग आते हैं जो ये पसंद करते हैं कि आप उनके साथ क्वालिटी टाइम बिताएं | इस समय में आप उनके साथ मूवी देखे, बाहर डिनर करें , कुछ खेलें, या यूँ ही गप्पे मारे|  हालांकि आपको समझना पड़ेगा कि साथ-साथ समय बिताने का ये फलसफा सब के लिए अलग–अलग हो सकता है , जैसे आप की माँ चाहती हैं कि आप उनके साथ बैठ कर सुख–दुःख शेयर करें तो आप चाहें जितने महंगे गिफ्ट अपनी माँ को ला कर दें वो खुद को प्यार किया हुआ महसूस नहीं करेंगी| आपमें से ज्यादातर लोगों ने महसूस किया होगा कि आप की दादी/नानी चाहती हैं कि आप उनके पास बैठ कर उनके पोपले मुँह से उनके अतीत के किस्से सुनें, कैसे वो अमरुद के पेड़ पर चढ़ जाती थी, ११ की उम्र में साड़ी पहनती थी या तलाब से पानी लाती थी | बेशक आप उनको कितनी बार भी आई लव यू , दादी /नानी कहें  पर वो आपका प्यार तभी महसूस करेंगी जब आप उनके कई बार सुने हुए ये किस्से फिर से सुन लें | वहीँ पत्नी या प्रेमिका चाहती है साथ बैठ कर एक दूसरे को अच्छा फील करायें या  भविष्य की कुछ योजनायें बुन लें|  


3-उपहार देना 

      
कुछ लोगों को प्यार तभी महसूस होता है जब कोई उन्हें उपहार दे | ये लोग उपहार को बहुत सहेज कर रखते हैं, हर आये गए को दिखाते हैं| अगर आप के किसी रिश्ते में ऐसा व्यक्ति है तो उसे अपने प्यार का इजहार करने के लिए उपहार अवश्य दें | उपहार के नाम पर खर्चे का सोंच कर घबराइए नहीं| जरूरी नहीं कि आप उन्हें उपहार में महंगे गिफ्ट्स ही दें |  गिफ्ट छोटी भी हो तब भी ये उसे दिल से क़ुबूल करते हैं | इसलिए आप जब उनसे मिले तो कोई न कोई गिफ्ट देने की कोशिश करें| कुछ नहीं तो अपने बगीचे में उगे अमरुद दे सकते हैं, एक गुलाब का फूल दे सकते हैं या आते-आते रास्ते से नत्थू हलवाई के समोसे ले सकते हैं | कर के तो देखिये यकीनन वो बहुत खुश हो जायेंगे|

4-महत्वपूर्ण काम में मदद

कुछ लोग यथार्थवादी होते हैं , उनके लिए  बातों , उपहार या साथ –साथ मूवी देखने के प्यार की कोई कीमत नहीं होती | वो तब ही प्यार किया हुआ महसूस करते हैं जब आप उनके महत्वपूर्ण कामों में मदद करें |  जरूरी नहीं कि आप अपनी पत्नी को खुश करने के लिए रोज रात के बर्तन धोयें | आप कभी–कभी सुबह की चाय बना कर दे सकते हैं | कभी–कभी कह सकते हैं कि तुम परेशान हो आज बच्चों को मैं पढ़ा दूंगा | जैसे मेरी एक मित्र हैं जो लेखन के क्षेत्र में हैं, उन्हें अपने पति का प्यार तब महसूस होता है जब वो उनके लेख सुन कर सही आलोचना करते हैं, कई बार नए शीर्षक सुझा देते हैं या टाइप भी कर देते हैं | अगर आप की बहन का, पत्नी का, दोस्त का जीवन में कोई सपना है तब आप जितना मर्जी आई लव यू कह लीजिये उन को आप का प्यार तभी महसूस होगा जब आप उनके सपने में उनकी मदद करते हैं |


5-स्पर्श

           
सबसे पहले तो स्पष्ट कर दूँ कि यहाँ स्पर्श का मतलब रोमांटिक प्रेम से नहीं है | स्पर्श का अर्थ है गले लगना , हाथ पर हाथ रख कर बात करना, आँख में आँख डाल कर आत्मीय भाव से बात सुनना, एक छोटी से पुच्ची लेना आदि | छोटे बच्चो और बड़े बुजुर्गों को प्यार की स्पर्श की ही भाषा समझ आती है | इसके अतिरिक्त आपका कोई अन्य रिश्ता इसी भाषा में प्यार किया जाना पसंद करता है तो आप उसका हाथ पकड कर ही बात करें, कभी-कभी हाथ पर एक छोटी सी पुच्ची भी ले लें जिससे वो खुद को प्यार किया हुआ  महसूस करे |

आपकी प्यार की भाषा क्या है ?

अभी तक मैंने जो भी प्यार की भाषाएँ बतायीं, अपने रिश्तों के बारे में उन्हें जानकर व् उन्हें अपना कर आप अपने रिश्तों की नींव को और मजबूत कर सकते हैं | आपके मन एक प्रश्न उठना स्वाभाविक है कि आपकी प्यार की भाषा क्या है? तो जरा गौर करिए कि अभी तक आप अपने रिश्तों में किस तरह से प्यार व्यक्त करते आये हैं | आप सहज रूप से जिस तरीके प्यार करते हैं उसी तरीके से प्यार किया जाना पसंद करेंगे क्योंकि यही आपकी प्यार की भाषा है| दरअसल विडंबना भी यही है कि हम जिस तरह से प्यार किये जाना पसंद करते हैं वैसे ही प्यार व्यक्त करते हैं , पर जरूरी नहीं कि दूसरों के प्यार की भी भाषा हो | खैर अपने प्यार की भाषा जानने के बाद आप अपने करीबी रिश्तों को बता सकते हैं कि आप ऐसे प्यार किये जाना पसंद करते हैं | ताकि आप का भी लव टैंक भरा रहे |
                            
रिश्तों में प्यार जीवन की एक मूलभूत आवश्यकता है |  जीवन की हर सफलता आधी–आधूरी लगती है अगर आपका लव टैंक खाली रहे | आशा है इस लेख को पढने के बाद आप को अपने करीबी लोगों की प्यार  की भाषा समझने में व् अपनी प्यार की भाषा समझाने में मदद मिलेगी और सभी का लव टैंक लबालब भरा रहेगा|

वंदना बाजपेयी

नारी शोभा में प्रकशित 

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प्रेरक कथा  -रीता की सफलता

सफलता और असफलता केवल एक सिक्के के दो पहलू हैं | आपके माता -पिता के लिए आपकी सफलता से कहीं ज्यादा आप अनमोल हो | आखिर रीता को ऐसी क्या बात समझ में आ गयी जिससे  उसके जीवन की सफलता के मायने ही बदल गए |

प्रेरक कथा -रीता की सफलता 


ये उस ज़माने की बात है जब हाईस्कूल  रिजल्ट ऑनलाइन नहीं निकलते थे | छात्रों  को मात्र एक संभावित तिथि पता होती थी | उस दिन से एक दो दिन पहले से बच्चों के दिल की धड़कने बढ़ जाया करती थीं | बच्चों और उनके घरों में रिजल्ट की प्रतीक्षा  बढ़ जाती |रिजल्ट के F, S और Th बस तीन अक्षर बच्चों की ख़ुशी मात्र को निर्धारित करते | फेल  होने वाले छात्रों का रोल नंबर नहीं चाप होता था | वो बच्चे निराशा में डूब जाते , तब घर वाले तरह -तरह के प्रयास कर उन्हें , " अरे तो क्या हुआ अगले साल पास हो जाओगे कहकर सँभालने का प्रयास करते |


ये वो समय था जब रिजल्ट माता -पिता की प्रेस्टीज का इशु नहीं हुआ करता था | पर बच्चे तो उत्साहित या निराश हुआ ही करते थे |   "निकल गया भाई निकल गया , हाई स्कूल  का रिजल्ट निकल गया " कहते हुए  जब सड़क  से होकर गुजरता था तो ना जाने  कितनी घरों की साँसे थम जाया करती थीं |



बच्चे जिन्होंने हाईस्कूल  का एग्जाम दिया है वो ना रात देखते ना दिन उसी समय सड़क पर दौड़ लगा पड़ते | लडकियाँ जो रात -बिरात घर से नहीं निकल पातीं | भाइयों की चिरौरी में लग जातीं | भाई पहले तो भाव खाते फिर  मान मनव्वल करके निकल पड़ते साइकिल वाले लड़के की खोज में जिसके पास होता उसी समय  प्रकाशित हुए परीक्षाफल वाला अखबार |


उसी दौर में एक लड़की थी रीता  | जिसने पूरे साल फर्स्ट डिवीजन  लाने के लिए बहुत मेहनत की थी | सारे इम्तिहान सही जारहे थे  , बस विज्ञान का पर्चा बचा था |  उस दिन हिंदी का पर्चा था |  पर्चा बहुत ही अच्छा हुआ था | घर लौटते हुए वो इम्तिहान खत्म होने के बाद मौसी के घर जा कर , अपने मौसेरे भाई -बहनों के साथ खूब मस्ती की योजनायें बना रही थी |  तभी तवे की  टनटनाहट ने उसका ध्यान खींचा | गोलगप्पे उसकी जुबान में खट्टा चटपटा स्वाद उतर आया | गोलगप्पे की तो वो दीवानी थी |  एक रुपये के पांच गोलगप्पे मिला करते थे उन दिनों और वो  दो तीन रुपये से कम के तो खाती ही नहीं थी |


भैया दो रुपये के गोलगप्पे दो कहते हुए उसे ख्याल तक नहीं आया कि माँ ने मना किया है कि इम्तिहान वाले दिन बाहर की चीज मत खाना , तबियत खराब हो गयी तो पछताना पड़ेगा | धडाधड गोलगप्पे खाए और निकल पड़ी घर की ओर |


शाम से ही पेट में दर्द होने लगा | उलटी और दस्त का जो सिलसिला शुरू हुआ वो एग्जाम रुका नहीं | जैसे -तैसे एग्जाम देने गयी | पर ठीक से पर्चा लिखा नहीं जा रहा था | जितना कुछ लिख पायी , लिख दिया |फेल होने की पूरी सम्भावना थी | रोते हुए घर लौटी | माँ से  लिपट करतो घिग्घी  ही बंध गयी | रोते हुए बोली , " माँ मुझे माँ कर देना , मैं पास नहीं हो पाउंगी |"

रीता को सबसे ज्यादा दुःख था अपने माता-पिता की अपेक्षाओं पर खरे ना उतर पाने का | माँ बचपन से ही उसे अच्छे नंबर लाने को कहती थीं , और पिताजी ने ट्यूशन , किताबों आदि पर अपनी सीमा से ज्यादा खर्च किया था | और वो ... वो उनको क्या दे रही है |


माँ ने उसे सीने लगा लिया | अकेली बेटी थी बड़ी मन्नतों बाद हुई थी | उसको यूँ निराश देखकर शब्द ही साथ छोड़ रहे थे | दो महीने बहुत ही निराशा से कटे | माँ कोे बेटी के दुःख का अंदाजा था | वो खुद ही हर रोज उसकी सफलता की दुआएं मांगती , पर रिजल्ट से कुछ दिन पहले माँ ने ये सोच कर उसे मौसी के यहाँ भेज दिया कि अचानक से फेल की खबर पर वहां भाई -बहन उसे संभल लेंगे |


उसने तय कर लिया था कि वो रिजल्ट निकलने के अगले दिन ही घर आ जायेगी |


तय तिथि पर रिजल्ट निकला | शाम को अपने मौसेरे  भाई के साथ घर आते ही वो माँ से चिपक गयी | माँ ... ओ माँ मेरी फर्स्ट डिविजन आई है | लगता है और पेपर में नंबर इतने अच्छे आये कि  विज्ञान का पेपर ख़राब होने के बाद भी फर्स्ट डिविजन बन  गयी |

माँ ने भी हुलस कर उसे गले से लगा लिया |

रीता ने  अंदर आ कर देखा | खाने की मेज पर तरह -तरह के व्यंजन लगे हुए हैं | जैसे घर में कोई पार्टी हो | उसने डोंगों की प्लेट हटा कर देखा , सारे उसी के पसंद के व्यंजन थे | वो समझ गयी कि पार्टी उसी के लिए हैं | तभी उसने एक डोंगा खोला , उसमें एक परचा रखा हुआ था | जिसमें कुछ लिखा हुआ था |


मेरी प्यारी बेटी रीता ,
                      मुझे पता था कि तुम जरूर सफल होगी | आखिर तुमने मेहनत जो इतनी की थी | एक पेपर बिगड़ क्या तो भी तुम्हारी सफलता तय थी  | ये तुम्हारे जीवन की पहली सफलता है | इस पहले कदम को अपनी सफलता के भवन की नींव समझो और कदम दर कदम आगे बढ़ो |
                                                                                ढेर सारे प्यार के साथ
                                                                                   तुम्हारी माँ

रीता की आँखें नम हो गयीं |

तब तक पापा भी आ चुके थे | रीता चहक -चहक कर उनसे बात करने लगी | तभी माँ ने खाने के लिए आवाज़ लगायी | चरों खाना खाने लगे | खाना बहुत ही स्वादिष्ट था | रीता स्वाद ले लेकर खा रही थी | तभी पापा ने पानी माँगा | माँ उठने ही वाली थीं कि रीता ने कहा , " माँ आप  रहने दो मैं ले आती हूँ |


अगले ही पल वो उछलती हुई रसोई में पहुँच गयी | उसने पानी का जग उठाया ही था कि उसकी नज़र एक बंद डोंगे पर पड़ी | ओह , लगता है माँ ने कुछ और बनाया है | लगता है डेजेर्ट है ,बाद में सरप्राइज़ में देंगीं | देखूं , देखूं है क्या ? कहते हुए उसने डोंगा खोला | डोंगे में फिर एक पर्चा रखा था |


रीता पानी का जग एक तरफ रख कर पर्चा पढने लगी |

मेरी प्यारी रीता ,
                     क्या हुआ जो तुम परीक्षा में सफल नहीं हुईं | मुझे पता है तुमने मेहनत तो बहुत की थी | तबियत खराब होने की वजह से तुम्हारा पेपर बिगड़ गया , इसमें तुम्हारा क्या दोष | जीवन हमें बार -बार मौका देता है , पर हम ही हार स्वीकार कर मेहनत का रथ रोक देते हैं | याद रखना दुनिया में जितने सफल लोग हुए हैं उन्होंने बहुत सारी शुरूआती असफलताएं देखीं | इस असफलता की नीव अपने मन में ना जमने देना , देखना बहुत सारी  सफलताएं तुम्हारी प्रतीक्षा कर रही हैं |
                                                                  ढेर सारे प्यार के साथ
                                                                     तुम्हारी माँ

अब रीता अपने आंसुओं को ना रोक सकी | उसे समझ आ गया कि उसकी सफलता या असफलता  नहीं , वह स्वयं  अपनी  माँ की जिन्दगी की पहली प्राथमिकता है |

रीता अपनी इस सफलता पर बहुत खुश थी .... बहुत खुश |

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                           बच्चों  ये प्रेरक कथा भले ही पुराने ज़माने की है | पर सन्देश आज भी वही है | एग्जाम सर पर हैं | कुछ बच्चे सफल होंगे कुछ असफल | जो बच्चे असफल हो जाते हैं अक्सर वो आत्मघाती कदम उठा लेते हैं | जबकि असफलता , सफलता का ही एक हिस्सा है | जो आज सफल दिख रहे हैं जीवन की परीक्षा में कहीं वो भी असफल होंगे  | जो आज असफल हैं वो कल सफल हो सकते हैं | ये समझना होगा की असफलता , सफलता के मार्ग में एक पड़ाव भर हैं | इसलिए  निराश होकर कोई गलत कदम मत उठाना क्योंकि आपके माता पिता की जिन्दगी में आप की सफलता -असफलता की नहीं आपकी कीमत सबसे ज्यादा है |  भले ही उन्होने आप  को सफल देखने के लिए कितना भी प्रेणादायक बोला हो पर उनका आशय सिर्फ आपको मोटिवेट करने का था ना कि दवाब डालने और आप को ओछा या कमत समझने का |

तो ख़ुशी -ख़ुशी इम्तहान दीजिये और जो भी रिजल्ट आये उसे ख़ुशी से स्वीकार कर आगे के लिए फिर प्रयास करिए | अपने माता -पिता के प्रेम को समझिये | आपको प्यार करने वाले  माता -पिता मिले हैं .... ये भी आपके जीवन की सफलता का ही हिस्सा है |


नीलम गुप्ता

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लघुकथा -मीठा अहसास

यूँ तो हमारे हर रिश्ते भावनाओं से जुड़े होते हैं परन्तु संतान के साथ रिश्ते के मीठे अहसास की तुलना किसी और रिश्ते से नहीं की जा सकती | इसी अहसास के कारण तो माता -पिता वो कर जाते हैं अपनी संतान के लिए जिसका अहसास उन्हें खुद नहीं होता | ऐसी ही एक लघु कथा ....

लघुकथा -मीठा अहसास


लोहडी व संक्रान्त जैसे त्यौहार भी विदा ले चुके थे।
लेकिन अब कि बार ग्लोबलाइजेशन के चलते ठंड कम होने का नाम नही ले रही थी।ठंड के बारे बूढे लोगो का तो बुरा हाल था,जिसे देखो वही बीमार।हाड-कांप ठंड ने सब अस्त-व्यस्त कर दिया था।देर रात जागने वाले लोग भी अलाव छोड बिस्तरो मे घुसे रहते शाम होते ही।

बर्फिली हवा से सब दुखी थे।कही बैठा ना जाता।सब सुनसान हो रहा था।रात छोड दिन मे भी कोहरा दोपहर तक ना खुलता।सूर्य देव आंख -मिचौली मे लगे रहते,कभी दिखते कभी गायब हो जाते। स्कूलो मे भी 15-15दिनो की छुट्टियाँ कर दी गयी थी!पर छोटे बच्चे कहां टिकते है? पर इस ठंड मे वो भी बिस्तर मे दुबक गये थे।

बिस्तर पर पडे-पडे मै भी कब यादो के जंगल मे घूमने निकल गयी थी!पुरानी यादे,चलचित्र की रील की तरह मेरे सामने घूम रही थी।मुझे याद आया जब आज से 30 साल पहले मेरे पति की नाइट डयूटी थी।


ये उस दिन की बात है जब मेरे पति रात की पारी मे दो बजे घर से चाय पीकर डयूटी पर जा चुके थे!मुझे आठवां महीना लगा हुआ था,और मेरा चार साल का बेटा बिस्तर पर सोया मीठी नींद ले रहा था।पतिदेव जब जाने लगे थे,तो मै उन्हे "बाय" कहने जब गेट पर आयी तो इतने कोहरे को देख मै भी ठंड से कांपने लगी।

पतिदेव के जाने के बाद मे कुछ सोचने लगी,अभी दीवाली आने मे समय था,!हर दीवाली पर मै अपने बेटे को नयी डैस जरूर दिलवाती,इस बार सोचा,नयी स्कूल डैस दिलवाऊगी,मेरे बेटे को निकर पहन कर स्कूल जाने की आदत थी,अभी छोटा सा लगता था कद मे।फिर इसी साल स्कूल जाना शुरु किया था।मैनै स्कूल पैन्ट का कपडा लाकर रखा हुआ था,सोच रही थी,किसी दिन टेलर को देकर आऊगी,पर अपनी ऐसी हालत मे जा ही नही पायी,झेप के मारे!
आज के कोहरे को देख,कुछ सोचने लगी।इतनी ठंड मे मेरा बेटा स्कूल कैसे जायेगा?कुछ सोचने के बाद मैने खुद उसकी पैन्ट सिलने का फैसला किया!रात के तीन बजे से छह बजे तक मैने पैन्ट सिलकर तैयार कर दी।सात बजे मेरा बेटा जागा,और मैनै उसे गरम पानी से नहला कर नयी पैन्ट पहना दी,वो बडा खुश हो गया,!उसके चेहरे की खुशी देकर मै भी भावविभोर हो गयी और अपनी सारी थकावट भूल गयी,भूल गयी ऐसी हालत मे मुझे मशीन चलानी चाहिये थी या नही।

उसकी स्कूल वैन आने वाली थी,मैने उसे लंचबाक्स व बैग देकर विदा किया! पर,ये क्या?वो थोडी देर मे ही वापिस आ गया!मैने पूछा,बेटा,वापिस क्यो आ गये हो? बडी मासूमियत व भोलेपन से बोला,"मम्मी जी"बाहर तो कुछ दिख ही नही रहा!मै समझ गयी असल मे दूर तक फैले कोहरे के कारण उसे घर से दूर खडी स्कूल वैन दिखाई ही नही दे रही थी।

तभी उसे मैने प्यार से समझाईश दी,-"बेटा" आप बेफिक्र होकर आगे-आगे चलते चलो,आपको आपकी स्कूल वैन दिख जायेगी।मेरे प्यार से समझाने के बाद वो चला गया था अपने स्कूल।।आज फिर इतने सालो बाद इस कोहरे ने उन दिनो की याद ताजा कर दी थी।एक मीठी याद के रूप मे मेरे मन मस्तिष्क मे गहरी छाप छोड गयी थी।

और एक प्रश्न भी,कि अपनी औलाद के स्नेह मे बंधे हम कुछ भी,काम किसी भी समय करने बैठ जाते है ये मीठा अहसास ही तो है जो हमसे करवाता है।

रीतू गुलाटी

लेखिका -रीतू गुलाटी


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प्रश्न पत्र

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