मकर संक्रांति में तिल के लड्डू बनाने का रिवाज है| तिल के लड्डू बनाते समय हाथ जलते हैं | पढ़िए एक मार्मिक किस्सा

                                           
अब मकर संक्रांति में लड्डू बनाते हुए हाथ नहीं जलते


                                         मकर संक्रांति में तिल के लड्डुओं का बहुत महत्त्व है | इसमें तिल के लड्डू बनाये , खाए और दान में दिए जाते हैं |मकर संक्रांति में तिल  स्नान भी होता है | तिल पौष्टिक और तासीर में गर्म होता है | सर्दी के दिनों में इसे खाने से सदीं से सुरक्षा होती है | तिल  के और भी बहुत लाभ हैं पर फिलहाल हम लाये हैं तिल से जुदा एक किस्सा -

पढ़िए अब मकर संक्रांति में लड्डू बनाते हुए हाथ नहीं क्यों जलते 


  मेरी उम्र उस समय 10 या 11 साल रही होगी | संक्रांति आने वाली थी| माँ तिल के लड्डू बना रही थीं| मैंने जिद की ,कि मैं भी मदद करुँगी| माँ ने मना  किया पर मैंने हाथ तिल में डाल दिए | टेढ़े-मेढ़े  दो तीन लड्डू बनाने के बाद मेरी हिम्मत टूट गयी | हथेलियाँ लाल हो गयी|

दौड़ते -दौड़ते पिताजी के पास पहुंची ," देखिये पापा , कहकर अपनी हथेलियाँ फैला दी | पीछे से माँ भी आ रही थीं | पापा को देखते ही बोलीं," देखिये मानी ही नहीं , हाथ जला लिए| पिताजी ने भी माँ को उलाहना देते हुए कहा ," तुम्हें रोकना चाहिए था| ठीक से कराती, देखो कैसे हाथ लाल हो गए हैं | नहीं बानाएगी मेरी बेटी लड्डू -वद्दू , तुम ही बनाओं ,उसे तो अपनी कलम से देश बनाना है |


                    उसके बाद जो भी घर आता  सबको मेरे हाथ लाल हो जाने और कलम से देश बनाने के किस्से सुनाये जाते | जो भी घर आता , सब कहते , अरे मेरी बिटिया के हाथ जल गए , तुम लड्डू न बनाना , तुम पढाई करो | मैं इस दुलार से इतरा जाती | उस समय मुझे बहुत सेलिब्रिटी सा महसूस होता |

                                      उस समय का लाड , उम्र के साथ जिम्मेदारी के अहसास में बदल गया | मुझे कलम से देश बनाना है |  ढेरों किताबें , मेरी  अलमारी में सजती जा रही थीं, वो कहते हैं न जितना ज्यादा पढोगे लेखन में उतना ही निखार आएगा|  हाँ , माँ जरूर लड्डू बनाने के पीछे पड़ी रहती | सीख लो हमें ही थुकाओगी, ससुराल -ससुराल ही होती है | मैं सोंचती थी कि ससुराल की ये परिभाषा सही नहीं है |  मैं तोडूंगी ये भ्रम और अपनी कलम के माध्यम से लिखूंगी नयी परिभाषा |  माँ का मन रखने के लिए लड्डू तो क्या सीना , पिरोना सब सीखती चली गयी |  लड्डू सिखाते समय अबकी बार माँ ने कोई गलती नहीं की | उन्होंने एक बड़े कटोरे में पानी रख दिया | लड्डू बनाते हुए जैसे ही हाथ लाल हों, झट से उसमें डाल दो , थोड़ी जलन कम हो जायेगी , फिर लड्डू बनाओं |


                                                समय बीता , विवाह हुए ६ महीने ही बीते थे | पहली मकर संक्रांति थी| उससे कुछ रोज पहले ही मैंने  सार्वजानिक लेखन की इच्छा अपने पति के आगे व्यक्त की थी | उन्होंने तुरंत इनकार कर दिया | छूटते ही कहा था ," अपने विचार और अपना ये शौक अपने पास रखो, किसी के लिखने से देश नहीं बदलता | तुम्हें ही बस नाम का शौक होगा , सेलेब्रिटी बनने  का शौक ,ये मेरे घर में बिलकुल नहीं होगा |"
 

                 मुझे ऐसे जवाब की उम्मीद नहीं थी |  मनाने की बहुत कोशिश की , पर वो नहीं माने | मैं रात भर तडपती रही, तकिया गीला होता रहा और वो आसानी से सोते रहे|  मन में बहुत उहापोह थी , लेखन की शुरुआत हुई नहीं थी , क्या पता सफल होऊं  या न हो सको , फिर लोग क्या कहेंगे? इतनी सी बात पर घर भी तो नहीं छोड़ा जा सकता |  यूँ ही उधेड़बुन में सुबह हो गयी |  तिल के लड्डू बनाने थे | बेखयाली में कटोरे में पानी रखना भूल गयी |

दो -तीन लड्डू बनाए ही थे की हाथ जल उठे, उफ़ ! कहते हुए ध्यान गया तो दोनों हथेलियाँ लाल हो चुकी थीं | तभी सासू माँ रसोई में आई | मुझे देखते ही बोलीं ," क्या किया हाथ जला लिए , अम्मां ने इतना भी नहीं सिखाया | बनती तो बहुत हैं , मेरी बेटी ये जानती है , वो जानती है .... वो बोले जा रही थीं ,मैंने सुनना बंद कर दिया| उठ कर एक कटोरे में पानी रख लिया , उसमें हाथ डुबोये , जलन  थोड़ी शांत हो गयी | फिर लड्डू बनाना शुरू कर दिए |

                            इस घटना को बरसों बीत गए| लेखन का ख्वाब अधूरा  रह गया | अब मकर संक्रांति में लड्डू बनाते समय हाथ नहीं जलते | मकर संक्रांति ही क्यों , माँ के एक कटोरा पानी की सीख अभी भी मेरे साथ है | जब भी किसी दर्द से दिल दुखी होता है , गम की तपिश से लाल हो जाता है , तो झट से  पानी में हाथ दे देती हूँ | थोड़ी तपिश शांत हो जाती है और लग जाती हूँ , काम पर |

                                        अगर आप पुरुष हैं तो सोंच रहे होंगे ,तो अवश्य सोंच रहे होंगे , आखिर ये कटोरा ले -ले कर कहाँ -कहाँ घूमती है ? और अगर स्त्री हैं तो जानते ही होंगे कि आँखों के कटोरे जब तब भर ही तो जाते हैं , निकलते पानी में हाथ डाल थोड़ी जलन शांत हो जाती है और हम लग जाते हैं काम पर .. हैं ना !

दीप्ति निगम

यह भी पढ़ें ...

इतना प्रैक्टिकल होना भी सही नहीं

13 फरवरी 2006

बीस पैसा




आपको आपको  लेख " इतना प्रैक्टिकल होना भी सही नहीं हैं " कैसा लगा  | अपनी राय अवश्य व्यक्त करें | हमारा फेसबुक पेज लाइक करें | अगर आपको "अटूट बंधन " की रचनाएँ पसंद आती हैं तो कृपया हमारा  फ्री इ मेल लैटर सबस्क्राइब कराये ताकि हम "अटूट बंधन"की लेटेस्ट  पोस्ट सीधे आपके इ मेल पर भेज सकें | 
               
फोटो क्रेडिट विकिमीडिया कॉमन्स

keywords: Makar sankranti, Til ke laddu, Sankranti
Share To:

atoot bandhan

Post A Comment:

2 comments so far,Add yours

  1. जिंदगी का कटु सत्य दिखलाता प्रसंग।

    ReplyDelete